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गोवर्धन यादव का यात्रा संस्मरण -- मारीशस माने मिनि भारत की यात्रा- (किस्त-४)

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  किस्त 1 – किस्त 2   -  किस्त 3 दिन तीसरा - रविवार - 25 मई - 201 सुबह के आठ बज चुके हैं. हाटेल कालोडाईन सूर मेर के प्रांगण में तीन बसें...

 किस्त 1किस्त 2  -  किस्त 3

दिन तीसरा-रविवार-25 मई-201

सुबह के आठ बज चुके हैं. हाटेल कालोडाईन सूर मेर के प्रांगण में तीन बसें लगाई जा चुकी हैं. गाईड सुश्री श्वेताजी सभी को बस में बैठ जाने का आग्रह करती हैं. बारी-बारी से लोग आते जाते हैं और अपनी-अपनी सीट पर बैठ जाते हैं. एक बस में श्वेताजी, दूसरी में सुश्री नीतूसिंह, और तीसरी में श्री स्वपनिल बतौर गाईड के सवार हो जाते हैं. दूर-दूर तक फ़ैले गन्ने के खेतों के बीच में से बसें, अपने गन्तव्य माने मारीशस की राजधानी लोर्ट-लुइस की तरह बढने लगती है. बेहतरीन सडकें,भव्य आलीशान इमारतों,के बीच से गुजरती हुई हमारी बस निरन्तर आगे बढती है.

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· (राजधानी पोर्ट लुइस का विहंगम दृष्य)

· उत्तर-पूर्व में स्थित “पोर्ट लुइस” मारीशस की राजधानी है. यह आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीति का प्रमुख केन्द्र है. यहाँ का प्रशासन मुनिसिपल काउंसिल के द्वारा संचालित होता है. उस समय के तत्कालीन गवर्नर बर्ट्रेंड फ़्रैंकोइस माहे दि ला बोर्डोनाइस( Bertrand Francois Mahe de la Bourdonnais) ने तत्कालीन शासक लुइस XV की स्मृति में सन 1735 में इस शहर की आधारशिला रखी थी .एक आंकडॆ के मुताबिक यहाँ की जनसंख्या 148001 है. Place d’ Arms मुख्य सडक के दोनो ओर पाम वृक्ष देखे जा सकते है. यह सडक काफ़ी सकरी है.अतः यहाँ काफ़ी भीड देखी जा सकती है. यहाँ के मुख्य बंदरगाह के किनारे तमाम सरकारी कार्यालय,

· Ministry of Tertiary Education, Science, Research and Technology

· Ministry of Education, Culture and Human Resources

· Human Resource, Knowledge and Arts Development Fund

· Human Resource Development Council

· Mauritius Qualifications Authority,

दूतावास तथा फ़्रेंच कालोनियाँ है.. चुंकि सारे सरकारी दफ़्तर यहाँ पर है, अतः दिन में आने के लिए सेंट्रल मार्केट या कैम्प दि मार्स(champ de Mars)के पास स्थित रेसकोर्स से आना होता है. रात्रि में यह सर्वसाधारण के खुला रहता है. सचिवालय हो अन्य सरकारी इमारत हो, उसके प्रांगण में आप आराम से घूम-फ़िर सकते हैं. न कोई रोकटोक करने वाला होता है और न ही कोई मशीनगन वाला यहाँ दिखाई देता है .सब लोग शांति के साथ यहाँ से आना-जाना करते हैं. सडकें हों या फ़िर समूचा शहर कचरा-कूडे के ढेर आपको दिखाई तक नहीं देते. समूचे शहर मे वाहनों की गति धीमी रहती है. एक खास बात यह कि इस राजधानी की सडकों में चाहे भीड रहे अथवा नहीं रहे हार्न बजाने पर सक्त मनाही है. सब लोग शांति के साथ बिना किसी प्रकार की हुज्जत किए आराम से अपने वाहन चलाते हुए आगे बढ जाते हैं. दूसरी आश्चर्य की बात यह कि यहाँ न तो चौराहे पर कोई पुलिस कर्मी दिखाई देता है और न ही सडक के किनारे. मारीशस की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है, इसलिए सरकार का सारा प्रशासनिक कामकाज अंग्रेजी में होता है. शिक्षा प्रणाली में अंग्रेजी के साथ फ़्रांसीसी का भी इस्तेमाल किया जाता है. फ़्रांसीसी भाषा हांलाकि मीडिया की मुख भाषा है चाहे प्रसारण हो या मुद्रण इसके अलावा व्यापार और उद्धोग जगत के माममॊं में भी मुख्यतः फ़्रांसीसी ही प्रयोग में आती है. सबसे व्यापक रुप में देश में मारीशियन “क्रेयोल” भाषा बोली जाती है. हिन्दी भी एक बडॆ वर्ग द्वारा बोली व समझी जाती है. मारीशस में विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं, जिनमे हिन्दॊ धर्म 52%, ईसाई धर्म 27% और इस्लाम 14.4. एक बडी संख्या नास्तिक लोगो की भी है.

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Caudan waterfront= विशाल समुद्र के तट पर स्थित यह भीड-भाड वाला इलाका है. यहाँ तरह-तरह की दूकानें, कैसिनो, सिनेमाघर,रेस्टारेंट, कैश-एक्सचैंज करने के लिए अनेक दुकाने देखी जा सकती हैं. मुख्य सडक पर एक दुकान “abbey royal finance ltd के डायरेक्टर श्री एस.नागवाह से मेरी मुलाकात होती है. क्लिन-शेव, मुस्कुराती आँखे देखकर मुझे लगा कि इनकी दुकान से मारीशस के छोटे नोट तथा कुछ चिल्लर मिल सकती है. यह मात्र एक अंदाज था. मैंने उनसे नमस्कार करते हुए पूछा कि क्या वे हिन्दी जानते हैं? उन्होंने तपाक से हाथ मिलाया और अपना परिचय देते हुए कहा कि उनके पूर्वज हिन्दुस्थानी ही थे, उनकी आत्मीयता देखकर मुझे बडी प्रसन्न्ता हुई. मेरे लिए यह पहला अवसर था कि मैं वहाँ के किसी स्थानीय व्यक्ति

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से बात बात कर रहा था. उन्होंने न सिर्फ़ हमें अन्दर बुलाया, बल्कि ऊपर बने छज्जे पर भी ले गए. दुकान छॊटी श्रीनागवाहजी के साथ होने की वजह से ऊपर भी जगह कम थी,लेकिन उस जगह में अलमारियाँ भी रखी थीं,जिनमे हिन्दी की कई किताबें भरी पडी थी. एक छोटे से टेबल पर कंप्युटर भी रखा हुआ था. बैठ चुकने के बाद उन्होंने पानी पिलाया और चर्चा का दौर चल पडा. कंप्युटर खोलकर मैंने rachanakar.org “रचनाकार” में प्रकाशित मेरी कहानियाँ, आलेख और कविताएँ दिखलाया. यह सब देखकर उन्हें अत्यंत प्रसन्न्ता हुई.

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पोर्ट लुईस के कुछ चित्र( १ से ९ )

संकरे रास्ते में स्थित एक होटल में ( अब नाम याद नहीं) हमने खाना खाया,( चित्र-१) जिसके प्रवेश-द्वार पर छतरियाँ तनी हुई थी. सडक के बाएं तरफ़ संगीतकारों की एक टोली अपने में मगन, वाद्ध-यंत्रों पर सरगम छेड रही थे.(चित्र-२) अपने चेहरे पर रंगबिरंगी आकृति और कपडॊं पर भी आकृति काढे यह अनाम व्यकि ने मेरे लाख प्रयास करने के बावजूद अपनी तस्वीर नहीं उतारने दी. जब भी मैं उसकी ओर अपना कैमरा करता, वह मुस्कुराते हुए अपना चेहरा दूसरी ओर मोड लेता था. जब वह पास से गुजर रहा था, तब भी उसने वही हरकतें की. जब वह थोडा आगे बढा तो मैंने उसकी यह तस्वीर अपने कैमरे में कैद कर लिया (मारीशस के यशस्वी लेखक श्री रामदेव धुरंधरजी ने बतलाया कि इनको “कृओल”कहते हैं इन लोगो को अफ़्रीका से मजदूरी करवाने के लिए यहाँ की तत्कालीन सरकार ने लाया था,लेकिन ये कामचोर निकले.(चित्र-३) पास ही में मारीशस के यशस्वी प्रधानमंत्री स्व.श्री शिवसागर रामगुलाम की आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई है.(चित्र-४) बंदरगाह पर अनेक छोटे-छोटे जहाज लंगर डाले हुए थे. हमने इन्हें अपने कैमरे में कैद किया ( चित्र-५) . पास ही में बंदरगाह पर स्थित वह जगह है, जिसे “अप्रवासी घाट” के नाम से जाना जाता है,जहाँ कभी भारतीयों को ठेके पर अथवा बंदी बनाकर खेती करवाने के लिए लाया जाता था. ये गिरमिटिया मजदूर कहलाए. जहाज से उतारकर उन्हें (चित्र-६) इस रास्ते से अन्दर लाया जाता था. (चित्र -७) यहाँ पर अंग्रेज रहा करते थे,तथा उनके घोडॆ को रखने के लिए एक अस्तबल भी बना हुआ है. प्रत्येक मजदूरों को एक नम्बर अलाट किया जाता,था और उस नम्बर को दीवार पर लिख दिया जाता था( चित्र-८). बाद की कार्यवाही में उस नम्बर के आधार पर उसकी फ़ाइल बनाई जाती थी,जिसमे उसका नाम, स्थान का नाम, परिवार के लोगों के नाम आदि दर्ज किए जाते थे.( इन तमाम दस्तावेजॊं को मारीशस के संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है.).यह वह स्थान है जहाँ मजदूरों को रखा जाता था(चित्र-९)

इस स्थान को देख लेने के पश्चात अब हम म्युजियम की ओर प्रस्थान करते हैं. हमारे साथ होती हैं डा.श्रीमती अलका धनपतजी, जो महात्मा गांधी संस्थान में हिन्दी की वरिष्ठ प्राध्यापिका हैं. वे उस संस्थान का कोना-कोना दिखलाती हैं. इस म्युजियम में उन तमाम चीजों को बडॆ जतन के साथ सुरक्षित रखा गया हैं,जिन्हें मजदूर अपने साथ यहाँ लाए थे. कांच के बने अलग-अलग प्रकोष्ठों में खाना पकाने के बर्तन, कपडॆ-लत्ते, कुछ मुखौटे, श्रम करते मजदूर की झांकी, गैती-फ़ावडा, गीता-रामायण, सुखसागर कुछ वाद्ध-यंत्र,आदि करीने से सजाकर रखे हैं. कुछ प्रकोष्ठॊं में उनके रहन-सहन को दर्शाया गया है, और कुछ में उनके कठिन परिश्रम की झांकी प्रस्तुत की गई है. इन्हें ग्राउण्ड-फ़्लोर पर कडी मेहनत के साथ व्यवस्थित रखा गया है. इन साब चीझॊं को देखकर लगता है कि

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कि कितनी कडी मेहनत करते हुए उन्होंने अपने दिन बेबसी और लाचारी में गुजारे थे. अफ़्रीका मूल के भी मजदूर यहाँ लाए गए थे,लेकिन वे उतनी कडी मेहनत नहीं कर पाए. भारतीय मजदूर जो यहाँ आकर “गिरमिटिया” कहलाए, उन्होंने मारीशस को स्वर्ग की तरह बना दिया है.

सीढियाँ चढते हुए हम अब ऊपर के कक्ष की ओर बढते हैं.जहाँ प्राचीन ग्रंथ,लेख आदि को बडॆ मनोयोग से संभालकर रखा गया है. ऊँचें कद-काठी के श्री देव काहुलेसुरजी ( Dev Cahoolessur ) जो इस कक्ष के प्रमुख हैं, मुस्कुराते हुए हम सब का स्वागत करते है. वे एक-एक चीज पर गहराई से प्रकाश डालते हुए हमें इतिहास के उस काल-खण्ड की ओर ले जाते हैं, जब भारतीय मजदूर एक सौ अस्सी साल पहले गुलाम अथवा बंधुआ मजदूर के रुप में यहाँ लाए गए थे, अपने साथ गीता, रामायण,सुखसागर भी लाए थे और कठोर श्रम करने के बाद, मन को तसल्ली देने के लिए इनका पाठ करते और वाद्दयंत्रों को प्रयोग में लाते थे. उन तमाम ग्रंथॊं को एक बडॆ कांच के पेटीनुमा कक्ष (चित्र-६) में सम्भाल कर रखा गया है. दूसरे कक्ष में मजदूरों के माईग्रेशन सर्टिफ़िकेट, रजिस्टर आदि रखे गए हैं और कांच के एक कमरानुमा कक्ष में उस समय का सारा लेखा-जोखा (चित्र-४) सुरक्षित रखा गया है, जिसमें हर व्यक्ति की बारिक से बारिक जानकारियाँ उपलब्ध हैं.

हाटॆल कालोडाइन सूर मेर के मालिक हों, मैनेजर हों, या फ़िर वहाँ काम कर रहे अन्य शाखा-प्रशाखा के कर्मचारी हों, जब आप उनसे मुखातिब होते हैं तो उनके चेहरे पर एक प्रसन्नता का स्थायी भाव स्पष्ट द्दिखाई देता है. आप जो भी उनसे पूछना-अथवा जानना चाहें, वे बडी ही विनम्रता के साथ आपके साथ वार्तालाप करते हैं और आपकी समस्याओं को तत्काल दूर करने का उपक्रम करते हैं. और जब आप उनके अतीत के बारे में जानना चाहते हैं तो बडी ही आत्मीयता के साथ बतलाते हैं कि उनके पूर्वज भारतीय थे, जो बिहार में रहा करते थे. इस समय उनके गर्वोक्ति के साथ ही उनके मन में विस्थापन की जो पीडा रही है, स्पष्ट ही परिलक्षित होती है.इसी प्रकार जब आप सुसज्जित मेस में पहुँचते हैं, वहाँ का भी कर्मचारी आपसे मुस्कुराते हुए आपका स्वागत कराता है और खाना खाने के पश्चात आपसे यह पूछना नहीं भूलता कि आपको आज का खाना पसंद आया अथवा कोई कमी रह गयी. हर व्यक्ति कि विनम्रता-शालीनता और व्यवहार कुशलता जिसमे कहीं भी बनावटीपन दिखाई नहीं देता, देखकर, आप यह महसूस ही नहीं कर पाते कि आप अपने देश से बाहर रह रहे हैं.

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 2
  1. बेहद सजीव वर्णन . आज पहली बार मारीशस के विषय में इतनी जानकारी प्राप्त हुई .

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  2. धन्यवाद सुश्री सुनीताजी

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: गोवर्धन यादव का यात्रा संस्मरण -- मारीशस माने मिनि भारत की यात्रा- (किस्त-४)
गोवर्धन यादव का यात्रा संस्मरण -- मारीशस माने मिनि भारत की यात्रा- (किस्त-४)
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