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यशवंत कोठारी का व्यंग्य - पहनावे का संकट

व्यंग्य

पहनावे  का संकट

भारतीय धोती पर फिर विवादों  की छाया  गिर गयी है। एक ख्यातनाम  व्यक्ति को एक तथा कथित  प्रगति शील क्लब  में धोती के कारण  अपमानित  होना पड़ा।

भारतीय संस्कृति में पहनावे के संकट  शुरू से ही रहे है. अच्छे , कीमती  कपडे पहनना स्टेटस  का मामला  बन गया है।   लो वेस्ट जीन्स , आधे अधूरे कपडे सर्वत्र  पहने  ओढ़े  जा रहे हैं. पहनने वाले को  आधुनिक  व् प्रगतिशील समझा  जा रहा है।

लोकसभा में भी पहनावे पर चर्चा  होती रहती  है। कभी यशवंत सिन्हा के कुर्ते पर मीडिया  में बड़ी चर्चा हुई थी।  नरेंद्र मोदी  भी अपने कपड़ों को लेकर बेहद  जागरूक  रहते हैं.  गांधी टोपी  और नेहरू जैकेट  का तो जमाना दीवाना रहा है. आजकल टोपी आम आदमी पार्टी ने धारण कर ली है.

एक पुराना किस्सा याद आ रहा है , अलबर्ट  आइन्स्टाईन को  एक समृद्ध  परिवार ने डिनर  पर बुलाया, आइंसटाइन  सामान्य वेशभूषा में चले गये.  उनको डिनर में शामिल नहीं किया  गया।

आइन्स्टाइन वापस घर आये, शानदार वेश भूषा पहनी और डिनर के लिए पंहुचे. उन्हें इज्जत के साथ अंदर ले जाया गया।

अब आइंस्टाइन की बारी थी उन्होंने  आइसक्रीम  उठाई और पोशाक पर रगड़ने  लगे  और बोले  ले मेरे पेण्ट कोट   आइसक्रीम  खा।  यही क्रम उन्होंने  सभी   केक पेस्ट्री  व् अन्य  खाद्य -पेय पदार्थों के साथ भी किया.

वे कपड़ों को  डिनर कराने लगे. मेजबान ने पूछा  आप ये क्या कर रहे हैं ?

आइंस्टाइन  का जवाब था  -आप अच्छे  कपडे वालों के लिए ही तो ये सब करते हैं। मेजबान बड़ा शर्मिंदा हुआ , माफ़ी मांगी।   मगर भारतीय अभी भी अंग्रेजी  मानसिकता से ग्रस्त हैं।  अभी भी कई क्लब , जिमखानारिसोर्ट   महंगे होटल   आदि ड्रेसकोड  के नाम पर बदतमीजी व् अपमानित करते हैं. निर्धारित  ड्रेस  नहीं  होने पर   बाहर  का रास्ता   दिखा दिया जाता है। दीक्षांत समारोहों में भी   गाउन    पहनना  पड़ता  है  जो गुलामी का प्रतीक है जयराम रमेश ने तो गाउन   फेंक  दिया था.

एक शोक सभा में तो  सभी घर वाले शानदार सफ़ेद झक्क  कलफ  लगे कुर्ते  पायजामे में थे, मानों फैशन  परेड  में आये हों.

ड्रेस  चर्चा में साड़ी की चर्चा भी जरूरी है. रेखा की साड़ी बंधने की कला  का जमाना दीवाना रहा है।

आज कल यदि एक ही घर में तीन  बहुएं हैं तो  पहनावे से पहचाना  जा सकता है  सबसे बड़ी बहू साडी  में मंझली सलवार सूट में  व् छोटी  जीन्स में   होगी।  हर  धारावाहिक का यही किस्सा है।  एक महिला  ने मुझे स्पष्ट   कह दिया - इस ड्रेस में हम कम्फर्टेबल हैं तो आपकी प्रॉब्लम क्या है  ?

गांधीजी एक    कपडे  में गोलमेज कांफ्रेंस  में अंग्रेजों से बात करके आज़ादी ले आये. , फिर धोती  या पजामा  या लंगोट  या कच्छे से क्या होना जाना है.

सब कुछ   आचार- विचार  व्यवहार  भाषा , प्रेम प्यार    पर निर्भर करता है।

आप क्या सोचते हैं  ?

oooooooo

यशवंत कोठारी ८६, लक्ष्मीनगर  ब्रह्मपुरी  जयपुर -३०२००२  

2 टिप्पणियाँ

  1. हम भी सोचते तो आपकी तरह से ही है पर जब करने पर आते हैं तो उनकी तरह हो जाते हैं ।

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