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मधुरिमा प्रसाद की कहानी - क़र्ज़

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क़र्ज़              "ठांयें ! ठूँयीं ! धांयें ! धांयें !" कहीं धुआँ, कहीं खून, कहीं लाशें l कहीं चोटहिल होकर गिरे पड़े लोग l भागते ...

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क़र्ज़

             "ठांयें ! ठूँयीं ! धांयें ! धांयें !" कहीं धुआँ, कहीं खून, कहीं लाशें l कहीं चोटहिल होकर गिरे पड़े लोग l भागते बच्चे l अस्मत बचातीं, छुपती-छुपातीं औरतें और लड़कियाँ। दुकानों के खटाखट गिरते बंद होते शटर और दरवाज़े l घरों की बंद खिड़कियों की दरारों से झांकते डरे सहमे लोग l  

             "दंगाई आये ! भागो, भागो ! दंगाई आये !" का शोर चारों ओर l उन्हीं में से कुछ नौजवान शोहदे ठाकुर गली की ओर मुड़ गए l रफ़ीक दर्जी का घर ठाकुर गली में ही था l दंगाइयों ने रफ़ीक का दरवाज़ा पीट-पीट कर उसे बाहर निकलने पर मजबूर कर दिया l

             रफ़ीक़ को दरवाज़े पर देखते ही ----"कहाँ है ? निकाल बाहर l"  रफ़ीक के पेट में धकाधक दो घूंसे मारते हुए गुंडे-मवाली सा दिखने वाला एक लड़का धड़धड़ाता हुआ उसके घर में घुस गया और फिर भीतर का सारा सामान उलट-पुलट कर ग़दर सा मचाता हुआ बाहर निकल कर रफ़ीक की कनपटी पर कट्टा सटाते हुए बोला ---"बताता है कि नहीं !"

             रफ़ीक़ का गला सूख गया था l  उसके गले में आवाज़ नहीं थी l कैसे अपनी नाज़ों से पाली इकलौती बेटी को इन दरिंदों के हवाले कर दे ! जिस्म में जान रहते तक तो उसके लिए मुमकिन नहीं था l  लेकिन, मुखबिरी पूरी तरह से हो चुकी थी l उन दिनों दंगाइयों का काम ही था कि  घरों  में घुस कर नौजवान औरतों और लड़कियों को निकाल कर ले जाते या फिर सरे-बाज़ार उनकी इज्ज़त को तार-तार करके वहीं छोड़ जाते थे l इतना ही नहीं अक्सर तो हत्या ही कर देते थे l  रफ़ीक़ की बेटी शकीला बला की ख़ूबसूरत थी l  कुछ लोगों  की नज़र उस पर बराबर बनी हुई  थी l उन दिनों दंगों का माहौल था l बहाना होता था हिन्दू-मुस्लिम झगड़ों का लेकिन आस-पास के छुट्ट नौजवान अपनी हवस पूरी करने का जुगाड़ भी बैठा ह़ी लेते थे l माहौल की गर्माहट को देखते हुए रफ़ीक़ ने काफी दिनों से शकीला को बाहर भेज रखा था l वह कभी-कभी ही आती थी l अभी दो दिन पहले ही वह आई थी l सुरक्षा की दृष्टि से रफ़ीक ने उसे अपने पड़ोसी ठाकुर वेदान्त सिंह के घर पर रख छोड़ा था l दोनों परिवारों में खून के रिश्तों से भी अधिक गहरायी और अपनापन था l बाहर का शोर-शराबा, हल्ला-गुल्ला सुन कर ठाकुर साहब बाहर निकल आए और बोले ---"क्या बात है भाई, ये शोर कैसा है ? आख़िर आप लोग चाहते क्या हैं ?"

             और ..... वेदान्त सिंह ठगे से रह गए जब रफ़ीक़ की कनपटी पर सटा हुआ कट्टा उनकी स्वयं की कनपटी पर सट गया l लड़का हिन्दू था  बोला ---"क्यों रफ़ीक़  मियाँ ! निकालते हो बेटी को या ख़त्म करूँ कहानी तुम्हारे इस सगे वाले की ?"

             बैसाखी के सहारे किसी तरह अपने को सम्हाले रफ़ीक थर-थर कांप रहा था l आस-पास के कुछ और लोग भी जमा हो गए थे l सभी भौंचक्के से खड़े थे l किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या कहे, क्या बोले ! साफ दिखलायी पड़ने लगा था कि झगड़ा दंगाइयों  का न होकर व्यक्तिगत है l कोई कुछ समझ पाता कि तभी ----

             "ठहरो !" ठाकुर साहब की देहरी लाँघते हुए काले रंग के बुर्क़े में से छन कर आया एक दबा हुआ, मद्धम सा नारी कंठ ----"मैं शकीला हूँ l "

             कट्टा लिए हुए लड़का एकदम से उस पर झपट पड़ा l

             "बेटी,ये क्या किया तुमने !"                                                                                                                   

             ठाकुर वेदान्त सिंह और रफ़ीक़ दोनों की एक साथ चीख निकल गई l रफ़ीक की पत्नी फ़रीदा चक्कर खा कर ज़मीन पर गिरी और बेहोश हो गई l चारों तरफ अफ़रातफ़री मच गई l उधर ठाकुर साहब के घर से भी रोने-चीखने की आवाजें आने लगीं l

             शकीला और सुनयना साथ-साथ स्कूल जाया करती थीं l सुनयना दसवीं में और शकीला छठवीं  में l दोनों में बहनों से भी बढ़ कर प्रेम था l उसी समय ठाकुर वेदान्त सिंह पर दुर्दिन का साया टूट पड़ा l आर्थिक स्थिति बड़ी दयनीय हो उठी थी l ट्रकों के कारोबार में ज़बरदस्त घाटा हो गया था l कारोबार को फिर से चालू करने के लिए बड़ी पूँजी कि ज़रुरत थी l घर में पूँजी के नाम पर तो कुछ था नहींl यहाँ तक कि रेहन रखने के लिए भी कुछ नहीं बचा 

था l मजबूरी में उन्हें ब्याज पर रुपया लेना पड़ा था l तकदीर ने फिर भी साथ न दिया और ब्याज की रक़म भी अदा कर पाने के काबिल न रहे l अंजाम यह हुआ कि लेनदारों की धमकियाँ आने लगीं l तीन साहूकारों से रुपया लिया था ठाकुर साहब ने l तीन के तीनों साहूकार इस स्तर तक गिर गए कि उन लोगों ने आपस में मिल कर एक घृणित योजना बनायी और फिर प्रस्ताव ठाकुर साहब के सामने रखा ----

             "देखिये ठाकुर साहब ! आपस की बात है, कुछ आप दबिये कुछ हम दबते हैं l"

             वेदांत को लगा कुछ समझौता पूर्ण बात होगी, सो बड़े हौसले के साथ बोले --"हाँ,हाँ ! कहिए न l" 

             "देखिए ! आपको पैसा चाहिए था ; हमने दिया l बदले में देने के लिए आपके पास कुछ नहीं था ; रेहन रखने के लिए भी कुछ नहीं था ; हमने माना l ब्याज समय पर देने की बात तय हुई थी ; आप वह भी अदा नहीं कर पा l मूल तो पड़ा है ही l क्यों है न सब सही ? "

             "ठीक है l" ठाकुर साहब बड़ी ह़ी दबी-टूटी आवाज़ में बोले l

             "हाँ ! तो फिर अब आगे की बात हो जाए l दरअसल आप एक इज्ज़तदार व्यक्ति हैं और हमारे आपके आपस में बहुत अच्छे संबंध भी रहे हैं l इसलिए हम चाहते हैं कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे l मतलब यह कि मूल और ब्याज दोनों से आप चुटकियों में मुक्त हो जाएं l"        

             वेदांत सिंह की जागती आँखों में कोई अनोखा, अदभुत स्वप्न तैर उठा, सचमुच ह़ी अनोखा और अद्द्भुत l लेकिन जल्दी ह़ी सपनों की दुनियाँ से वापस आ गए वेदांत -- "क्यों ठीक है न ?" तीनों  साहूकारों में से एक ने कहा l

             "लेकिन अभी तो मेरे पास कुछ भी नहीं है l  मैं कैसे .........l " 

             वेदान्त का कथन पूरा न हो पाया और एक कड़वा घिनौना सच तीर की भांति उनके कानों को बेधता हुआ कलेजे में जा चुभा l   

             "अरे वाह ! इतनी बड़ी दौलत घर में रख कर कहते हो कि कुछ भी नहीं है ! क्या सुनयना की कीमत कभी पहचानी है तुमने ? " 

             क्रोध से लाल आँखें करके वेदांत ने मुक्का ताना ही था कि तीनों में से एक ने उनका हाथ पकड़ लिया ---- "शांत,शांत ! ठाकुर साहब ! होश में आइये l गरम होने से बात बिगड़ भी सकती है l"

             दूसरा बोला ----"सिर्फ कुछ घंटों की ही तो बात है l जगह हम लोग बता देंगे, आप बेटी को वहाँ पहुँचा दीजिएगा l और हाँ, जहाँ तक पर्देदारी का सवाल है ; उस तरफ से आप पूरी तरह बेफिक्र रहिये l बात सिर्फ और सिर्फ हम चारों में ही रहेगी l आप क़र्ज़ मुक्त हो जाएंगे l कहिये, है मंजूर ?" 

             उसके बाद कुछ बाता-बाती, तू-तू, मैं-मैं l तीन लोगों के सामने अकेले वेदांत l गर्मागर्मी सभी कुछ हुआl ठाकुर साहब से न बोलते बन रहा था, न चुप रहते बन रहा था और न ही सहते बन रहा था l

             अंत में ---"ठीक है ठाकुर साहब, हफ्ते  भर की मोहलत ले लीजिये l सोच कर बताइयेगा l वरना हम वसूलना तो जानते ही हैं l" तिर्यक सी मुस्कान ओठों पर बिखेरते हुए एक ने कहा l

             उस दिन के बाद से वेदांत अनमने से रहने लगे थे l कोई पूछता तो टाल जाते l पत्नी पूछती, उसे भी कुछ कह कर समझा देते थे l एकाएक उन्हें अपने एक पुराने मित्र कि याद आयी l लगा, उससे उन्हें मदद मिल सकती 

है l अगले ही दिन वे आगरा के लिए रवाना हो गए l मित्र कहीं बाहर गया हुआ था l दो चार दिन में आने वाला था l रुकने के सिवाय कोई चारा नहीं था l मिली हुई मोहलत के हिसाब से हफ्ता भी पूरा होने वाला था किन्तु  होनी- अनहोनी कब किसी को दिखलायी पड़ी है l रात को वेदांत के वापस आने की सम्भावना थी l आधी रात के समय दरवाज़े पर दस्तक हुई l ठकुराइन ने दरवाज़ा खोला तो मुँह पर कपड़ा बांधे हुए तीन लोग धड़धड़ा  कर घर में घुस आए l

             "बचाओ ,बचाओ " की आवाजों से घर गूँज उठा था l ठकुराइन, सुनयना और बेटा रोहित तीनों गला फाड़-फाड़ कर चिल्ला रहे थे l तीनों की चीख़ दीवार के पार रफीक़ के कानों तक भी पहुँच गई l वह दौड़ कर पहुँचा तो दरवाज़ा भीतर से बंद था l रफीक ने पास पड़ा एक बड़ा सा पत्थर उठा कर दरवाज़े पर मारा तो भीतर से सिटकनी खुल गई l भीतर का दृश्य देख कर रफ़ीक के होश उड़ गए l तीन दरिन्दे और वह अकेला l दो ने ठकुराइन और रोहित के गले पर छुरा रख छोड़ा था और तीसरा सुनयना पर काबू पाने के प्रयास में लगा हुआ था l सुनयना के सारे कपड़े फट चुके थे l रफ़ीक़ को देखते ही एक ने ठकुराइन को छोड़ कर रफ़ीक़ पर हमला बोल दिया l रफ़ीक़ के साथ हाथापायी हुई l रफीक़ ने भी अपनी भरसक उसे धूल चटाने में कोई कमी नहीं रखी पर रफ़ीक़ निहत्त्था था l उस दरिन्दे ने झट से कमर में खोंसा हुआ छुरा निकाल लिया और रफ़ीक़ के पेट में भोंकना चाहा पर वार सटक कर रफ़ीक की जांघ को घायल कर गया l इस बीच ठकुराइन ने त्वरित बुद्धी से काम लिया l वे झट से ढेर सारा लाल मिर्च पाउडर ले आयीं और एक-एक मुट्ठी तीनों की आँखों में झोंक दिया l तीनों बेहाल हो गए l मुँह पर बंधे हुए कपड़े भी खुल गए l ठकुराइन ने तीनों को पहचान लिया l वे तीनों वही साहूकार थे जिनसे क़र्ज़ लिया हुआ था  

             सुनयना की इज्ज़त बच गयी। पर रफ़ीक़ की हालत बहुत नाज़ुक हो गयी थी l बहुत सारा खून बह गया 

थाl आस-पास वालों की मदद से उसे अस्पताल पहुँचाया गयाl सुबह वेदांत भी आगरा से वापस आ गएl रात को पहुँचने वाली उनकी ट्रेन सुबह पहुँची थी l सब कुछ जान कर बदहवास से वेदांत भागते हुए अस्पताल पहुँचे l रफीक़  बेहोश थाl दवा इलाज चल रहा था लेकिन उसकी हालत बिगड़ती चली गयी और फिर उसे गैंग्रीन हो गयाl जान जाने तक की नौबत आ गयी l वेदांत ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी रफीक़ के इलाज में l उनके व्यवहार और सज्जनता के चलते बड़े-से-बड़े डॉक्टरों ने दिल लगा कर रफीक़ का इलाज किया l जान तो बच गयी रफ़ीक़ की, पर एक टाँग काटनी पड़ी l उसका जीवन बैसाखी के साथ बंध कर रह गया l ठाकुर वेदांत सिंह रफीक़ के अहसान तले जीवन भर के लिए दब गये थे l उनके घर की इज्ज़त बचाने का अहसान l एक ऐसा कर्ज़ जिसको जान दे कर भी वे चुका नहीं सकते थे l

             "बचाओ,बचाओ!" रफ़ीक़ की दर्दनाक चीख सुन कर वेदांत वर्तमान में लौट आये l जैसे बड़ी गहरी नींद से जागे हों l देखा, एक शोहदा बुर्के में ढँकी शकीला को घसीटे लिये जा रहा है l तभी पुलिस का सायरन सुनायी पड़ा l चारों और अफ़रातफ़री मच गयी l जिसे जिधर जगह मिली भाग लिया l शक़ीला को घसीटता लड़का भी भाग खड़ा हुआ l              

             फ़रीदा को होश आ चुका था l पुलिस पूछताछ में लगी हुयी थी कि 'क्या हुआ, कैसे हुआ' वगैरह वगैरह l 

             फ़रीदा ने होश में आते ही दौड़ कर बेटी को गले से लगा लिया---"या अल्लाह ! तुझे कुछ हो जाता तो मेरा क्या होता l ऊपर वाले का लाख-लाख शुक्र है कि तुझे उसने बचा लिया मेरी बच्ची l"

             " बच्ची नहीं बहन !" बुर्का पलटते हुये ठकुराइन ने कहा और दोबारा फ़रीदा को गले से लगा लिया l दोनों की आँखों से खुशी के आँसू झर रहे थे l उधर शकीला भी ठाकुर वेदांत सिंह के घर से निकल आयी थी l सब की आँखें ठकुराइन के इस कृत्य पर आशचर्य से फटी की फटी रह गयीं थीं l सभी सोच में पड़ गए कि ' क्या कोई इतना बड़ा त्याग भी कर सकता है ? '

             वेदांत सिंह की आँखों में एक अद्भुत चमक दिखलायी पड़ रही थी जैसे वे बहुत बड़े कर्ज़ से मुक्त हो गये हों l उनकी धन्यवाद भरी दृष्टि पत्नी  पर टिक कर रह गयी थी l 

             एकाएक रफीक़ और फरीदा ठकुराइन के पैरों पर गिर पड़े ---"ऐसा तो कोई वीरांगना ही कर सकती 

है l   

  समाप्त

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रचनाकार: मधुरिमा प्रसाद की कहानी - क़र्ज़
मधुरिमा प्रसाद की कहानी - क़र्ज़
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