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हरीश कुमार की कविताएँ

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(1)

जे एन यू के बाहर

आज बड़े भाई साहब

और होरी मिल गए

कुशल क्षेम पूछा तो कहने लगे

हमारी गर्दन अभी भी औरों के पाँव तले

दबी है

शिक्षा व्यवस्था अंग्रेज के आधीन हैं

हम कई बार शिकायत लेकर

आलोचकों, चिंतकों, लेखकों, बुद्धिजीवियों

और अनुवादकों के पास गये

पर सब व्यस्त हैं

शोध सेमीनार विदेश यात्रा से उत्पन्न

यशोगान हेतु मठाधीशों की उपासना में

प्रेमचंद औ दूसरे माइबाप उनकी

पुस्तकों के काराग्रह में कैद है

सर्वाधिकार सुरक्षित की बेड़ियां पहने

मन चाहा लिखते हैं

पुस्तकें छपवाते हैं

परस्पर पीठ थपथपाते हैं

क्रम से पुरस्कार पाते हैं

सब जुगाड़ रस से परिपूर्ण है भैया

गोबर औ छोटे वही डटे हैं

कहते है आज प्रेमचंद को आजाद मैंने पूछा आप कहा जा रहे हैं

बोले लमही से आ रहे हैं

दिल्ली मुखर्जी नगर जा रहे हैं

करवाना है

 

(2)

सत्य और शिव

अनचीन्हे हुए

सुन्दरता जीवित लगती है

चलो इसी सहारे

प्रेम उपजता रहे

शेष मिल ही जायेंगे

इसी मोड़ पर ।

 

(3)

सत्य के कई पहलू होते हैं

हर पहलू का अपना सत्य होता है

प्रत्येक व्यक्ति अपने सत्य की स्थापना को ले

सत्ता की और अग्रसर होता है

 

(4)

भगवा
केसरिया
बसंती
लाल
ये रंग है
भक्ति के
बलिदान के
क्रांति के
तुम लाख कर लो प्रयास
इस पर न चढ़ा पाओगे
कट्टरता का रंग
ये रंग आजादी के हैं
हिंदुस्तान की
आत्मा के हैं
न मिटा पाओगे
ये हमारे रक्त में घुले हैं
इन्हें करो स्वीकार
इनमें रंग जाओ
कृष्ण की बांसुरी
नानक की वाणी
चैतन्य की मौज
भगत का जुनून
इसमें घुला है
ये मेरे देश के
इस रंग के
मायने हैं
तो क्यों न कहूं
गर्व से
मैं हिन्दुस्तानी हूँ ।

 

(5)

पीड़ितों की

जाति नहीं होती

ना ही नस्ल

उनमें एक ही

सम्बन्ध होता है

पीड़ा का

जैसे

शोषकों की

कोई जाति नहीं होती

वे परस्पर

जुड़े होते है

अपने हथियारों को

और भी

पैना

नुकीला

मोहक

बनाने हेतु

उनमें

प्रशंसा

चापलूसी और

सत्ता सम्बन्ध होता है ।

 

(6)

सपना जैसे

सोई हुई आँख का पानी

स्वतंत्रता

उत्सव में सिमटी

कुछ जानी पहचानी ।

 

(7)

बहुत दूर तक साहिल को तलाशा हमने

बस कुछ दूर कुछ दूर का भरोसा पाया

इक चाह थी दिल से जो जुडी रहती थी

बन गयी है उमर भर का इक सरमाया

 

(8)

वो बस बांग देकर बनता रहा मसीहा
औ आदमी हर बार सीढ़ी बनता गया

 

(10)

देश के पर्यावरणविद

परेशान है

कौए

चिड़िया

बाज

चील

हो गये लुप्त

चिंता में है

रोग है गुप्त

मित्रों जरा देखो

समझो गौर से

वे लुप्त नहीं है

स्थानांतरित है

कुछ संसद के

भीतर है

कुछ बाहर है ।

--

डा हरीश कुमार
बरनाला,पंजाब

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