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पखवाड़े की कविताएँ

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सविता मिश्रा

उफ़ गर्मी बहुत है रे
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उफ़ गर्मी बहुत है रे
पैसे कौड़ी रह रह दिखाए
पास खड़ी खूब इतराए
महंगी से महंगी साड़ी पहने
गले में हीरो के लादे गहने
उफ़ गर्मी बहुत है रे ....

महंगे पार्लर में जा के आये
कृत्रिम सुन्दरता पर भी इतराए
बालों की सफेदी महंगे कलर से छुपाये
पैडी-मैनीक्योर क्यों न जाने क्या क्या करवाए
दांत भी डाक्टर से चमकवाये
अपनी हर कुरूपता छुपाये
उफ़ गर्मी बहुत है रे.....

पति की नौकरी पर इठलाये
रह रह बड़ा अफसर बतलाये
भले पति देता न हो रत्ती भर भाव
कहती जमीं पर रखने नहीं देता पाँव
कहती फिरे फूलों की सेज पर सोये
पति करता खूब प्यार मुनादी करवाए
अपने प्रेम की झूठी तस्वीरें दिखलाये
उफ़ गर्मी बहुत है रे.....

बच्चों की बड़ाई करते नहीं अघाए
रह रह उनकी कामयाबी बतलाये
फेल हुए को भी पास दिखाए
उनकी नौकरी पर भी इतराए
असंस्कारी को संस्कारी जतलाये
अच्छी खासी आई शादी भी ठुकराए
उफ़ गर्मी बहुत है रे .....

जताती सास ससुर की करती सेवा
पर चुप्पे-चुप्पे खाती रहती मेवा
सुखी रोटी परोस कहती ला जेवा
पति सामने हो तो मुस्काती रहे
पीठ पीछे सास ससुर को आँख दिखाए
बुजुर्ग त्रिया चरित्र इसी को कह गये
उफ़ गर्मी बहुत है रे.....
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सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा


कैसे कैसे लोग और कैसी उनकी  जिंदगी     

झूठ का, फरेब का मुखौटा है औढ़ा हुआ
नादान सूरतों का तिलिस्म है लपेटा हुआ                                            
धोखे  के तालाबों से भरपूर  उनकी बंदगी           
कैसे कैसे लोग और कैसी उनकी  जिंदगी

हवन यज्  मंत्रों के गढ़े जाते ढकोसले  
मक्कारी से  तय होते ज़िंदगी के फासले
बेजान पत्थरों सी संवेदन  हीन  दरिंदगी
कैसे कैसे लोग और कैसी उनकी  जिंदगी                  
 
शराफत की बातें होतीं सुबह से शाम तक      
आत्म शुद्धि के कसीदे होते दिन में और रात तक
अपनत्व भरी बातों में भरती हैं गंदगी
कैसे कैसे लोग और कैसी उनकी  जिंदगी

देह उनका अध्यात्म है देह ही परमात्म है 
देह उनका मंतव्य है देह ही  गंतव्य है      
देह  को हैं पोसती देह  को ही  ओढ़ती
कैसे कैसे लोग और कैसी उनकी  जिंदगी
                                                                                 
जरूरत के हिसाब से जब जिसे अपना लिया
अग्नि के सामने  दिए वचनों  को जला दिया
रिश्तों की  आड़ में हर रिश्ते को कलंकती
कैसे कैसे लोग और कैसी उनकी  जिंदगी .

                  सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा .
डी-184, श्याम आर्क एक्सटेंशन साहिबाबाद,  Pin : 201005  ( उत्तर प्रदेश )
E.Mail : arorask1951@yahoo.com
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संदीप शर्मा

चेतना
चेतना ! तू पहले क्यों नहीं जाग्रत हुई ?
क्यों रही निश्चल, और सर्वत्र अनछुई ?
संयोग से मिलीं तुम मुझे तब ,
जब ,  उम्र मेरी आधी बीत गई ||

जीवन अब यह बीत रहा ,
सब हार  चुका, न जीत रहा |
पाने - खोने  की गणना में ,
न साज़ बचा, न संगीत रहा ||

कुछ करना था ,
घट भरना था |
जीवन रूपी अमृत रस से , 
अब तो इसे छलक पड़ना था ||

एकाकी और अति नीरव मैं ,
विचार-शून्य सा रहा इस भव मेँ ।
प्रकृति-पुरुष जीवन-अभिलाषा,
जिजीविषा बनी एक प्रत्याशा ॥
 


अंबर और असंख्य तारे ,
शशिमयूख के ये नजारे |
जड़ - चेतन ये खेल – खिलौने ,
प्रेरक बन गए अब ये सारे ||

अब भी मैं कुछ कर सकता हूँ ,
जीवन पथ पर बढ़ सकता हूँ |
चेतना का हुआ विस्तार ,
पथ पर चलना किया स्वीकार  ||

संदीप शर्मा ‘नीरव’   
(शिक्षाचार्य)
प्र. स्ना.  शिक्षक - संस्कृत
केन्द्रीय विद्यालय, टोंक |राजस्थान
इ मैल - educatordeea@yahoo.co.in

पता -86/137 sector-08 tonk road sanganer Jaipur
Pin - 302033

संदीप शर्मा
( वरिष्ठ – अध्यापक )
केन्द्रीय विद्यालय


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प्रेम दान भारतीय

आज के दौर के आदमी की हालत

समझ का अकाल ,नासमझी के तूफान से जूझता हुआ आदमी
मन बेचैनी से भरा बे सूकून दिल से रोज झगड़ता हुआ आदमी

कहीं भी किसी ढंग से देखने से नहीं लगता हैं जिंदा दिल इसका
अपने हाथो तकनीकी के षड्यंत्र में फँसकर मरता हुआ आदमी

संबंध संवेदना रिश्ते अपनापन चरित्र की सुगंध से हैं नावाकिफ
आदमीयत से बेरुखी रखकर अपनी शक्ल से डरता हुआ आदमी

न आँखों में कोई ख्वाब हैं दिल में वतन परस्ती का जजबा कोई
खुद ही नजरों से इस कदर देखा कभी दोस्त गिरता हुआ आदमी

न दीन से वास्ता न अपने करीब की दुनिया के दर्द को जाने यह
युग के थपेड़ों से पल -पल पग -पग पर बिखरता हुआ आदमी

दूर से आ रही हैं बारूद की तेज गंध जाने कब करीब आ जाएगी
खाक दुनिया बचाएगा अपनी बेवजूदी से गुजरता हुआ आदमी

तनाव के तराजू में रोज तौलकर खुद को वो नादान बन जिंदा हैं
मुझे तो दूर तक नजर नहीं आता दौर से उभरता हुआ आदमी

डॉ प्रेम दान भारतीय
भारतीय साहित्य सर्जन संसथान
सूरत

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विजय वर्मा

हिन्दी [कविता]
 
अब यह क्या बात हुई कि
'निवासी हिंदी' और 'प्रवासी हिंदी'
हिंदी तो बस हिंदी है अपनी
सरल अभिव्यक्ति की अभिलाषी हिंदी।
 
कितनी उपभाषाएँ इससे मिलती-जुलती ,
कितनी बोलियाँ इसमें आ घुलती ,
करोड़ों जनों की है मातृ-भाषा हिंदी
और करोड़ों के लिए है माँ -सी हिन्दी।
 
जगह बदलती है तो बदल जाता है लहज़ा ,
इतना मत सोच ,अपनी बात बस कह जा।
बात यह है कि  बात समझ में  आनी  चाहिए 
फिर क्या बक्सर की हिंदी ,क्या झाँसी -हिन्दी। 
 
किसी भाषा से इसमें क्षमता कम  नहीं है,
उपभाषाओं के लिए इसमें ममता कम नहीं है
ब्रज-भाषा,बज्जिका,मैथिली,भोजपुरी,नागपुरी
छत्तिसगढ़ी के लिए भी है अपनी जहाँ-सी हिन्दी।
 
कभी पूरब ने रोका ,कभी दक्षिण ने टोका
समिति ,उपसमितियों ने दिया इसको धोखा
अति-शुद्धता का कभी आग्रही न बनाना ,तभी
न रहेगी कभी अंगरेजी की दासी हिन्दी।
 
उच्चारण न आये पर बोलते है अंगरेजी
वो माधुर्य कहाँ है? बताओ जरा,ए ,जी !
बहुत बोल ली बिन -अपनापन की भाषा
अब तो प्रेम से बोलो जरा सी हिन्दी ।
 
V.K.VERMA.D.V.C.,B.T.P.S.[ chem.lab]
vijayvermavijay560@gmail.com
0000000000000000000


 

सुमन त्‍यागी”आकाँक्षी”

पश्‍चिम में यूं क्षितिज किनारे
लाली चूनर ओढे चलती
सांझ की दुल्‍हन धीरे-धीरे
मिलने अन्‍तरतम प्रियवर से

मंत्रोच्‍चारण खग-विहंग का
शंख झालर का मंगलगान
सहज स्‍वीकृत स्‍नेह मिलन
ज्‍यों होता है कन्‍यादान

नभ के उस उन्‍नत शिखर पर
डैने चमक रहे सोने से
कलकल करती जलधारा में
मोती-माणिक खोजे नये से

वात्‍सल्‍य लुटाती गौधूलि में
वृषभ शिशु कर रहे निनाद
पाने को निज मातृ दर्शन
ज्‍यों अटके माता के प्राण

बाट जोहती गृहिणी तकती
राह वही गृहस्‍वामी की
जुआ थामे चला आ रहा
लिए भाव उर सन्‍तुष्‍टि

-----.
तुम बिन
जीवन के इक हसीन मोड पर
इक चेहरा मिला
देखा उसे तो लगा,
जैसे तलाश थी इसी की
यही है वह जो
करता है बेचैन सपनों को
देता है पंख उम्‍मीदों को
बसता है दिल के सिंहासन पर
महसूस होती हैं सांसें जिसकी
जोडा है जिसने धडकनों को
मेरी धडकनों से


पाँव न पड़ रहे जमीन पर
सैर कर रही आसमान की
मानो मिला है वह
जो पाना चाहा सदा
पर भूली नियति को जो,
नहीं चाहती सुख मेरा
सपने जो देखे,
टूटे क्षण में मानो भंगुर शीशा


उसके साथ बीते पलों में
जैसे जी ली जिन्‍दगी सारी
उसके आलिंगन की सिहरन अब भी है बाकी
चुंबन से सुर्ख हुए गालों की लाली
है अब भी
जहन में मेरे उसकी सांसों की खुशबू


भूले ना भूलता है वह दौर
जो मोड़ गया जिन्‍दगी को
खुशियों ने दस्‍तक दी भी नहीं कि
आ घेरा विकराल काल ने
सोचा
हो जाऊं मैं भी सती
जैसे हुई हैं वीरांगनाऐं कई
पर कर ना सकी यह भी मैं
क्‍योंकि पालना है उसे जो निशानी है
अमिट प्रेम की सींचना है माली बन बगिया का
फूल की तरह                    

पर कैसे भूलूंगी उन हसीन सपनों को
जो देखे एक ही तकिये पर रखकर सिर
वे रातें
जिनमें किये वादे साथ जीने मरने के
ली कसमें साथ चलने की
लगता है जैसे बात हो अभी कल की


शुरु हुये मुलाकातों के हसीन सिलसिले
हुआ प्‍यार और लम्‍हे शादी के
लगे पंख उम्‍मीदों को
प्‍यार हुआ साकार ले रुप मेरे गर्भ में
बत्‍तीस से छत्‍तीस का सीना तुम्‍हारा
और उस पर झुकी हुई कृतज्ञ आँखें


बताओ तुम्‍हीं
कैसे रोकूं अपने आँसुओं
कैसे जीऊं जिन्‍दगी बिन तुम्‍हारे
कैसे पालूं उसे जो है तुम्‍हारी निशानी
कैसे करुं साकार उन सपनों को जो हैं हमारे


सहसा!
साकार हुई आकृति किसी की
होंठ लगे हिलने, फूटे शब्‍द
”साकार होंगे सपने अपने
होंगी अपनी खुशियाँ फिर से
मैं साथ रहूंगा सदा तुम्‍हारे“
शायद ये थे वादे पुराने
जो आये उसके अन्‍तर्मन से


ताकत मिली उसको यहीं से
उंगलियों की पोरों से
गाल पर ढुलक आये आँसू पोंछ
हुई खडी़
करने विजय इस जीवन समर को

                            सुमन त्‍यागी”आकाँक्षी”
                             धौलपुर(राजस्‍थान)
00000000000000

 

सुनील जाधव


सुप्रभातम !

हर्ष लिए आयी प्रभात
गीत नया संगीत नया
नवल नव चैतन्य लिए
मधुर भाषी सुप्रभात ।

   मतिर-मतिर पक्षी रव
नभ गुजन उत्सव चिन्हम
अरुणिम उदय पुष्पम
स्मित हस्य कुसुम वृक्षम ।

अनंत रंग सुगन्धिम
परिवेश प्राप्त पुलकितम
वृक्ष वल्लरी अच्छादम
अतृप्त नयन तृप्तम ।

कर्म वर्षा निशा नित्यम
नखशिख प्रकृति स्नानम
प्रभा स्पर्श कोमल किरणम
उज्वल वस्त्र आकर्षणम ।

मधुर गीत उत्पन्नम
अतुर कर्ण प्रिय एकाग्रम
चित्त अति प्रसन्नम
रक्त आनंदम संचारम ।

किम दिशा आगम पवनम
शीतल रोम-रोम उत्साहम
नाना भांति सुगन्ध मिश्रीतम
तन-मन उवाच्य प्रशंसनम ।

कवि सुनील जाधव,
नांदेड
महाराष्ट्र
भारत ।
0000000000000000

 

 

000000000000

देवेन्द्र सुथार


मैंने बड़ी हैरत से उसे
देखा।
उसका सारा बदन
लहूलुहान था व बदन
से मानों आग की लपटें
निकल रही थीं। मैंने
उत्सुकतावश पूछा,
"तुम्हें क्या हुआ है?"
"मुझे कई रोग लगे हैं;
मज़हबवाद,
भाषावाद,
निर्धनता,
अलगाववाद,
भ्रष्टाचार,
अनैतिकता इत्यादि
जिन्होंने मुझे
बुरी तरह जकड़
लिया है। यह जो आग
मेरे बदन से निकल
रही है यह
मज़हबवाद और
अलगाववाद की आग
है। यदि जल्द
ही मेरा इलाज न हुआ
तो यह आग
सबको भस्म कर
देगी।" उसके दिल
की वेदना चेहरे पर आ
चुकी थी।
उसकी रहस्यमय
बातों से मैं
आश्चर्यचकित था।
"क्या अजीबोग़रीब
बातें करते हो! तुम
हो कौन...?" मैंने
पूछा।
"मैं हिंदोस्तान हूँ!"
00000000000000000000000000

रजनीश कांत


लोकल ट्रेन की बेबस बैग


लोकल ट्रेन की मैं बेबस बैग
हर तरफ से पिसती बैग
मुझमें है कई सारी चीज
कोई ना समझे मेरा दर्द

लोकल ट्रेन की मैं बेबस बैग

अंधेरी में चढ़ूं या दादर में
दहिसर उतरूं या विरार
कहीं नहीं मुझको चैन
हर जगह रहती मैं बेचैन
लोकल ट्रेन की मैं बेबस बैग

इंसानों, तुम्हारी तो फितरत है
हर जगह धक्के खाना
मुझको तो कम से कम सुकुन दो
तुम्हारी ही चीजें मुझमें है सेफ
लोकल ट्रेन की मैं बेबस बैग
                      0000000000000000


 

रमाकांत यादव “सागर”


नारी का जीवन:-
--------
जब एक नारी बयाँ करती है
अपना यथार्थ जीवन
दो टूक हो जाता है
कलेजा कवि का
लेखनी सिसकने लगती है
निर्झर नयन से बहने लगता है
क्योंकि उसका हर इक लब्ज
डूबा हुआ होता है दर्द में |

जब वह सडक पर चलती है
काम्बुक भेडिए लग जाते हैं
उसके पीछे
और उसे बदचलन करार देते हैं
जन्म से लेकर जिंदगी के आखिरी पडाव तक
दर्द में जी रही है नारी |
---.
कलयुगी बेटे का बयान:- "पत्नी मेरी प्यारी है !"
---------------
     ( बाप )
मेरा गम ऐसा तुम सह नहीं पाओगे
पथ मोहब्बत में मँजिल नहीं पाओगे!
मैं उजियारा ही हूँ, पर चाँद सा शीतल
मेरे इक लब से, तुम जल नहीं जाओगे!
मैं अपनी ममता से बना दूँगा महान
मुझसे जुदा कभी रह नहीं पाओगे!
हर इक पल दुआ मिलती है माँ -बाप से,
उनके बगैर तुम कुछ कर नहीं पाओगे!

  ( बेटा )
बक-बक मत कर तात "पत्नी मेरी प्यारी है,
उसकी ऊँचाई तुम ले नहीँ पाओगे!


कवि रमाकांत यादव "सागर"
पता:- नरायनपुर, बदलापुर, जौनपुर उ. प्र.

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एम आर अयंगर.

फरियाद

कोरे दिल पर कलम ले, था लिखने चला,
पर कलम भी फफख कर वहीं रो पड़ी,

अब, स्याह दिल पर मैं कैसे लिखूँ,
बस, कालिख लगा है दिल पर मेरे.

श्वेत – श्यामल लिखे जो, कलम है कहाँ,
ढूँढ लाऊँ बता दो है मिलती कहाँ.

काले कागज किए थे कई आज तक,
आज करना धवल है, तो साँसें कहाँ.

जिंदगी इस कदम पर, है थम सी गई,
कल के आने की सोच, मन समाती नहीं.

बीते कल की सुनहरी हैं यादें मेरी,
जिंदगी से नहीं फरियादें मेरी.

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प्रभा मुजुमदार

जडें जिन्दा है
1.
जडें जानती हैं
अपने को जिन्दा रखना
अन्धेरे और गुमनामी के
बरसों, सदियों, युगों...
मिट्टी की अनगिनत पर्तों के भीतर
वे पडी रहती हैं
अविचल, निस्पन्द, निर्वासित सी.
झेलती है
धरती के कम्पन
आसमान का फटना महसूस करती हैं
अपने ठीक उपर.
धंसती है वे
पाताल की अथाह गहराईंयों में
उस शाख के लिये
जो आसमान को छू लेना चाहती हैं.
सूरज को देखे बगैर
महसूसती है उसकी आँच.
डालियों पर झूलती
फूल-पत्तियों की इठलाहट से,
तितलियों के संगीत से
झूमती है मन ही मन.
जडें जानती है
वक्त और हालात की
थोडी भी चूक से,
कितने ही बीज नष्ट हो चुके हैं
वृक्ष बनने की राह में.
फिर भी उसे अभिमान नही
अपेक्षा, महात्वाकांक्षा नही.
विशालकाय वृक्ष से
कृतज्ञता की दरकार नही़.
इसीलिये जिन्दा है जडें
मृतप्राय समझी जाने के बावजूद.
2.
बहुत सुखदायी होता है
ठूंठ पडे वृक्षों पर
नई कोंपलों को फूटते देखना.
हरी भरी ताजा पत्तियों से
सज संवर कर उनका इठलाना.
बारिश से पायी ,
अमृत की थोडी सी बून्दों से,
एक अतीत जैसे उठ खडा हुआ
वर्तमान में
और झाँक रहा है
भविष्य के रोशनदानों से बाहर.
आशा और आस्था से
परिपूर्ण हो गया है मन.
सुदूर आकाश के छोर पर
एक इन्द्रधनुष
झिलमिला रहा है
जीवन के सारे रंगों को समेटे.
3.
तमाम जिन्दगी,
दुनिया की तमाम जगहों की
खाक छानने के बाद
मैं लौट लौट आती हूँ
अपने आरम्भ बिन्दु पर.
ढूंढती हूँ अपनी ही जडों को
शाखाओं के विस्तार को.
देखती हूँ
पत्तियों के झुरमुट में
छन कर आती रोशनी.
रुकी अटकी हुई बारिश की बून्दें.
विकास की यात्रा में
फूल बन चुकी असंख्य कलियों को.
झांकती हूँ आदमकद शीशे में,
तो उभरते हैं कितने ही चेहरे
अपने और अपनों के.
अतीत की दराज से
झाँकती हैं यादे हीं यादें.
मन दौड पडता है
व्यतीत की पगडंडियों पर सरपट.
समय ने मिटाये हुए
पैरों के निशान ,
रेत और मिट्टी की
असंख्य पर्तों के भीतर
जरूर बाकी होंगे अब भी कहीं
पहचाने जाने के लिये बेताब.
सुलगते हुए जंगल में
बाकी होंगी ही कई जडे
बारिश के इंतजार में
लहलहाने को तैयार.
4.
उग आती है जब भी ,
मन की चट्टानी, पथरीली
कठोर जमीन पर
थोडी सी नर्म घास,
जिन्दा हो जाता है
तब अपने जीने का अहसास.
जब भी गिध्धों, बाजों
और चीलों के कब्जाये आकाश से,
उड उड कर लौट आती है
नन्हीं सी एक चिडिया,
मेरे स्वप्न,
फिर बादलों में तैरने लगते हैं.
समर्पण और समझौतों की,
अन्धेरी और गहराती सुरंगों के भीतर से
उम्र दर उम्र गुजरते हुए,
जब भी सुलगी है
मेरे भीतर हल्की सी चिंगारी,
उजास की वही छोटी सी किरण
लौटा कर लायी है
मेरा खोया हुआ वजूद.
बिखरे विश्वासों और आस्थाओं का आलोक
जिन्दा होने का अटूट अहसास भी.
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आचार्य बलवन्त

‘उम्मींदों की आशा हिन्दी’

जन सामान्य  की  भाषा हिन्दी।
जन–मन  की जिज्ञासा हिन्दी।
जन–जीवन में रची बसी
बन जीवन की अभिलाषा हिन्दी।

तुलसी-सूर की बानी हिन्दी।
विश्व की जन कल्याणी हिन्दी।
ध्वनित हो रही घर–आँगन में
बनकर कथा – कहानी हिन्दी।
संकट के  इस विषम दौर में
उम्मींदों की आशा हिन्दी।

गीत प्रेम के गाती हिन्दी।
सबको गले लगाती हिन्दी।
प्रेम – भाव से जीने का
मन में उल्लास जगाती हिन्दी।
प्रेम–भाव से करती, सबके
मन की दूर निराशा हिन्दी।

गीत राष्ट्र के गानेवाले।
हँसकर शीश कटानेवाले।
मातृभूमि  की रक्षाहित
अपना सर्वस्व लुटानेवाले।
राष्ट्रधर्म पर मिटनेवाले
वीरों की है गाथा हिन्दी।

सेवा भाव सिखाती हिन्दी।
सबके मन को भाती हिन्दी।
सबके दिल की बातें करती
सबका दिल बहलाती हिन्दी।
स्नेह, शील, सद्भाव, समन्वय
संयम की परिभाषा हिन्दी। 
        
बलवन्त,  विभागाध्यक्ष हिंदी
कमला कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट एण्ड साईंस
450, ओ.टी.सी.रोड, कॉटनपेट, बेंगलूर-53
Email- balwant.acharya@gmail.com
00000000000000000

 

लोकनाथ ललकार


        
(गीत) आस का दीप

जलाए रखना तू आस का दीप मन के आंगन में
बुझ न जाए तेरे आस का दीप मन के आँगन से
तेरा दिल होवे निर्झर नीर, बरसे जन-जन में

प्रीत बुनियाद पर खड़ा जीवन
प्रीत के डोर से बंधा है जन-जन
प्रीत के पावस से बना है सावन
प्रीत के दीप से रोशन तन-मन
प्रीत से ही काबा-काशी, जग वृंदावन
जलाए रखना तू आस का दीप मन के आँगन में

स्‍वरों को तेरे कोई सुन रहा है
शब्‍दों को तेरे कोई धुन रहा है
भावों को तेरे कोई गुन रहा है
नियति को तेरे कोई बुन रहा है
संवेदना के स्‍वर जड़ भर देते स्‍पंदन
जलाए रखना तू आस का दीप मन के आँगन में

चेहरे के पीछे होते कई चेहरे
ओझल होते हैं कई लिए घनेरे
जुगनू-सा निकट आते बहुतेरे
रात की कसम टूट जाते सवेरे
मन की नजर से देखो मन-दर्पण
जलाए रखना तू आस का दीप मन के आँगन में     काश, ऐसा होता !

भ्रष्‍टाचार को
जला दो,
बत्‍ती की लडियों की तरह
व्‍याभिचार को
उडा दो,
राकेट की कडियों की तरह
समस्‍याओं के अंधेरों में
उम्‍मीद के दीये
रोशन कर दो
और
सदाचार को
बिखेर दो
अनार और फुलझडियों की तरह !
---.

    राष्‍ट्रभाषा

राष्‍ट्रवादी देश
अपनी राष्‍ट्रभाषा में ही
अपना आन-बान समझते हैं
जैसे चीन, रूस, जापान
अपनी मातृभाषा में ही
अपना मान समझते हैं
विश्‍वमंचों में
हिन्‍दी की गंगा बहाने वाला भगीरथ
कोई दिखाई नहीं देता
आलम ये है कि
हमारे नुमाइंदे
गुलामी की भाषा में ही
अपनी शान समझते हैं !
हनीमून

मंहगाई डायन के कोप से
आज बमुश्‍किल
तेल-नून चल रहा है
किल्‍लत की गर्मी इतनी कि
लगता है साल भर
मई-जून चल रहा है
एयरकंडीशन कमरों में
सोने वाले कुंभकरणों !
अब तो जाग जाओ
सीमा पार
ड्रैगन के उजाले में
सियार-लोमड़ी का
हनीमून चल रहा है !     दूसरा गाल दे रहे हैं

जिसने लद्‌दाख का
भू-भाग हड़प लिया,
उसे हम
श्रीफल-शॉल दे रहे हैं,
अरूणाचल पर
जिसकी नीयत ठीक नहीं,
उसे चाऊमिन बेचने
अपने मॉल दे रहे हैं
बापू !
अब तो समझा दीजिए
अपने बंदरों को
बासठ में जिसने हमें
एक गाल पर मारा,
उसे हम
अपना दूसरा गाल दे रहे हैं ।
जिम्‍मेदार कौन है ?

संस्‍कृति गई भाड़ में, 
आग लगी संस्‍कार में,
चरित्र हुआ गौण है !
अबलाएँ
आज तार-तार हो रहीं,
फिर भी
आधुनिकाएँ
क्‍यों मौन हैं ?
रूपहले पर्दों की
टीआरपी के लिए
सबलाएँ
बिंदास बिखर जातीं हैं !
इस अश्‍लीलता की अदा
नग्‍नता की नज़ाकत का
जिम्‍मेदार कौन है ?     तरक्‍की

हमारे देश ने
खूब तरक्‍की कर ली है,
पाकर सैंतालीस की आज़ादी
नदी-नाले,
जंगल-पहाड़,
श्‍मशान तक को
निगल रही है,
हमारी आबादी
अब तो हम अपने खेतों में
फसल नहीं,
मॉल, प्‍लांट और इमारतें
उगाने लगे हैं !
देश को खिलाने वाले
किसान मर रहे हैं,
देख अपने खेतों की बर्बादी !


      
               Loknath Lalkar
Qr No. 106/B/1, Balco Nagar
Korba CG
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बाल कवि किशोर चौहान

          इक्‍कीसवीं सदी में ढूंढते रह जाओगे

चीजों में चीजें
बातों में कुछ बातें
वो होंगी
जिन्‍हें कभी देख नहीं पाओगे ।
इक्‍कीसवीं सदी में
ढूंढते रह जाओगे
           बच्‍चों में बचपन
           जवानों में यौवन
           शीषों में दर्पन
           जीवन में सावन
           गांव में अखाडा
           शहर में सिंघाडा
           ढूंढते रह जाओगे
आँखों में पानी
दादी की कहानी
प्‍यार के दो पल
संतों की वाणी
कर्ण जैसा दानी
घर में मेहमान
मनुष्‍यता का सम्‍मान
ढूंढते रह जाओगे
      भरत जैसा भाई
      लक्ष्‍मण सा अनुयाई
      चूडी भरी कलाई
      शादी में शहनाई
      सच में सच्‍चाई
      मंच पर कविताएँ
      गरीब की खोली
      आंगन में रंगोली
परोपकारी बंदे
और अर्थी को कंधे
अघ्‍यापक जो सचमुच पढाये
अफसर जो रिश्वत न खाये
कानून जो न्‍याय दिलवाये
ऐसा बाप जो समझाये
और ऐसा बेटा जो समझ समझ जाये
ढूंढते रह जाओगे
          गाता हुआ गाँव
           पनघट की छांव
          किसानों का हल
          मेहनत का फल
          मेहमानों की आस
          छाछ की गिलास
          चहकता सा पनघट
           लम्‍बा सा घूंघट
          लज्‍जा से थरथराते होंठ
          और पहलवान का लंगोट
          ढूंढते रह जाओगे
आपस में प्‍यार
भरा पूरा परिवार
कल में आज
संगीत में रियाज
बातचीत का रियाज
दोस्‍ती में लिहाज
सड़क किनारे प्‍याऊ
सम्‍बोधन में ताऊ
दो रूपये उधार
और नेता ईमानदार
ढूंढते रह जाओगे  
 
- बाल कवि किशोर चौहान बागरा जालोर

5 टिप्पणियाँ

  1. बहुत रोचक कविताऐं हैं विशेष रूप मे प्रभा मजूमदार एवं बालकवि चौहान की. बधाई

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  2. सुंदर कवितायेँ एक से बढ़कर एक बधाई

    जवाब देंहटाएं
  3. वाकई तारीफ ए काबिल हैं ये प्यारी प्यारी कवितायेँ।

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