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वीरेन्द्र सरल का व्यंग्य - अंग्रेज़ी लाल की हिंदी

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अंग्रेजी लाल की हिन्दी वीरेन्द्र सरल सुबह-सुबह घर के बरामदे पर बैठकर मैं चाय पीते हुये अखबार पढ़ रहा था। तभी किसी महिला की सुरीली आवाज सुना...

अंग्रेजी लाल की हिन्दी


वीरेन्द्र सरल


सुबह-सुबह घर के बरामदे पर बैठकर मैं चाय पीते हुये अखबार पढ़ रहा था। तभी किसी महिला की सुरीली आवाज सुनायी पड़ी, ''हाय मिसेज सरल।'' मैं हड़बड़ाया, पहले मैं अपने पहनावे पर ध्यान दिया। पहनावा तो पूर्णतः मर्दाना ही था। श्रृंगार मैंने किया नहीं था। बाल मैंने बढ़ाये नहीं थे, सब कुछ ठीक-ठाक था पर गड़बड़ कहाँ हो गई है? सामने देखा तो एक सुसभ्य महिला मुस्कुराती हुई खड़ी थी। मैंने हाथ जोड़कर कहा-''बहन जी! जरूर आप को धोखा हुआ है, आप जो समझ रही हैं वह मैं नहीं हूँ। शायद आप धोखे से गलत पते पर आ गई हैं।'' वह खिलखिलाकर हँस पड़ी और बोली-''जीं नहीं, मैं बिलकुल सही पते पर आई हूँ। भाई साहब, मैं आपको नहीं आपकी श्रीमती का अभिवादन कर रही हूँ।'' पीछे मुड़कर देखा तो सचमुच मेरी श्रीमती मुसकुरा रही थी। मैं झेंप गया। वे दोनों आत्मीयता से गले मिलते हुये अंदर वाले कमरे में जाकर बातचीत करने लगे


    किसी गहन-गंभीर विषय पर लगभग घंटे भर तक उनकी बातचीत होती रही। शायद वे ध्वनिरोधक जुबान से बातचीत कर रही थी। मजाल है जो कमरे से एक शब्द भी बाहर निकलने की हिम्मत करे। मैं उस महिला को पहचानने का अथक और असफल प्रयास कर रहा था मगर मुझे कामयाबी नहीं मिल पा रही थी। कुछ देर बाद वह विदुषी चली गई तब मैंने श्रीमती से पूछा-''कौन थी यह?'' श्रीमती आश्चर्य से मुझे घूरती हुई बोली-''अपने चश्मे का नम्बर बढ़वा लीजिये। धिक्कार है, हिन्दी के लेखक होकर भी शहर के सबसे बड़े हिन्दी प्रेमी अंग्रेजी लाल की धर्मपत्नी अंग्रेजी बाई को नहीं जानते?''


    अब मुझे याद आया। सचमुच चेहरा कुछ जाना-पहचाना लग रहा था। जरूर कभी मैंने इन्हें भाई अंग्रेजी लाल के साथ ही कहीं देखा रहा होगा वैसे अंग्रेजी लाल मेरे पुराने और सबसे अच्छे दोस्तों में से एक हैं, ये अलग बात है कि अभी बहुत दिनों से मेरी मुलाकात उनसे नहीं हो पाई है। बहरहाल, मैंने  श्रीमती से पूछा-''वैसे अंग्रेजी बाई जी अभी आपसे क्या कह रही थी ?'' श्रीमती ने कहा-''क्या कहेगी बेचारी। हिन्दी की चिन्ता में दुबली हुई जा रही है। पखवाड़े भर से हिन्दी माता के नाम पर व्रत कर रही है और आज हिन्दी दिवस के पावन पर्व पर हिन्दी माता व्रत कथा-पूजन का आयोजन कर रही हैं। उसी का निमंत्रण देने आयी थी।'' इतना बताकर श्रीमती जी उसका दिया हुआ कार्ड मुझे थमाकर अपने काम में ब्यस्त हो गईं।


    मैंने देखा, खूबसूरत और मंहगे निमंत्रण पत्र पर लिखा था कि हिन्दी माता की असीम अनुकंपा से हिन्दी दिवस के पावन पर्व पर आज हमारे यहाँ हिन्दी माता व्रत कथा-पूजा का आयोजन रखा गया है। जिसमें आप सपरिवार पधार कर हमें अनुगृहीत करें। दिनांक चौदह सितम्बर, संध्या पाँच बजे, स्थान अंग्रेजी बंगला हिन्दी कालोनी ।
    इस तरह का यह पहला निमंत्रण कार्ड था इसलिये इसे पढ़कर मेरा दिमाग चकरा गया,  सुनहरे अक्षरों मे छपे इस निमंत्रण कार्ड को पढ़कर मुँह से अनायास ही निकल पड़ा। बाप-रे-बाप! इतना खतरनाक ढंग से हिन्दी प्रेम? नमन है हिन्दी प्रेमी इस दंपत्ति की भावनाओं और हिन्दी दिवस को इस अनुपम ढंग से मनाने के तरीके को। काश! आज अंग्रेजी लाल जी से मेरी भेंट हो जाती तो मैं भी उससे जी भरकर बातें करके अपना जी हल्का कर लेता। वैसे वर्षो से हम चौदह सितम्बर को हिन्दी की दिशा, दशा, दुर्दशा, विकास और महत्व इत्यादि विषयों पर सभा-संगोष्ठी आयोजित करके अपना जी हल्का करने का पुण्य कमा रहे हैं। कुछ ऐसे ही विचारों में खोया मैं फिर से अखबार पढ़ने में व्यस्त हो गया ।


    कुछ ही समय हुआ था कि फिर किसी ने 'गुडमार्निंग सर' कहते हुये मेरा अभिवादन किया। सामने देखा तो अंग्रेजी लाल मुस्कुराते हुये खड़े थे। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। हिन्दी माता ने मेरे मन की बातें सुन ली थी और अपनी सदप्रेरणा से अंग्रेजी लाल को यहाँ भेज दिया था। मैंने खुशी से उछलते हुये कहा-''अरे! आओ भाई अंग्रेजीलाल, बाजार से गायब शुद्ध घी की तरह बहुत दिनों के बाद दिखाई दिये हो। ऐसा लग रहा है, मानो चुनाव जीतने के पूरे पाँच साल बाद फिर से वोट माँगने के लिये ही पधार रहे हो।'' वह मुस्कुराते हुये आगे बढ़ा और गर्मजोशी से मुझसे हाथ मिलाते हुये बोला-''हैलो माय डियर फ्रेन्ड, हैप्पी हिन्दी डे, कान्ग्रेच्यूलेशन। थैंक्स गॉड आपने मुझे पहचाना तो सही।''

हम आमने-सामने रखी कुर्सियों पर बैठ गये। फिर उसने शिकायती लहजे में कहा-''क्या यार! देते भी हो तो वही घिसी-पिटी उपमा। अरे कहना है तो कहो, महीने भर से डयूटी से नदारद अधिकारी की तरह वेतन लेने ही पधारे हो और उसने जोरदार ठहाका लगाया।'' फिर उसने पूछा-''अच्छा यार! मेरा निमंत्रण कार्ड मिला य नहीं?'' मैंने कहा-''मिला है भई, मिला है। भाभी जी अभी-अभी देकर गई हैं। मगर हिन्दी माता व्रत पूजा-कथा मेरी समझ से बाहर है। आज तक मैं अन्यान्य देवी-देवताओं के व्रत कथा-पूजन के बारे में ही पढ़ा-सुना है पर हिन्दी माता?'' उसने पहले मुझे किसी पहुँचे हुये महात्मा की तरह देखा, फिर अपनी छाती ठोंकते हुये कहा-''इस शहर में मुझसे बड़ा हिन्दी भक्त शायद ही कोई दूसरा होगा। लोग भले ही सभा-संगोष्ठियां करके हिन्दी पखवाड़ा मना रहे हों मगर मैं एक अकेला आदमी हूँ जो पखवाडे भर से सपत्नीक हिन्दी माता के नाम पर व्रत कर रहा हूँ। आज उसका उद्यापन है जैसे लोग सोलह शुक्रवार तक संतोषी माता का व्रत रखने के बाद कराते हैं, समझा?'' मैंने मूर्खों की तरह सिर हिलाकर जिज्ञासा प्रकट की, शायद आप इसमें पन्द्रह हिन्दी लेखकों को भोजन करायेंगे जैसे लोग नवरात्रि मे नवकन्या भोज कराते हैं, है ना? उसने माथा पीटते हुये कहा-''अब तुम जैसे मूर्ख को कौन समझाये। घर आकर सब कुछ अपनी आँखो से देखोगे तभी समझ पाओगे।'' मैंने सहमति में सिर हिलाया।


    फिर उसने आगे कहा-''अभी तुम मेरे साथ थोड़ा बैंक चलो, मैं तुमको गारंटर बनाना चाहता हूँ।'' मैंने घबराते हुये कहा-''तुम इस शहर के सबसे बड़े हिन्दी भक्त हो इसकी गांरटी भी क्या मुझे लेनी पड़ेगी? हिन्दी दिवस के पावन अवसर पर बैंक में ऐसा कौन-सा काम आ पड़ा?'' उसने गुस्साते हुये घूर कर देखा फिर बोला-''अरे नहीं यार! मैं हिन्दी के विकास और महत्व के लिये कुछ करना चाहता हूँ। देश के दस-बीस बड़े शहरों में अंग्रेजी मिडियम के स्कूल खोलना चाहता हूँ। इसलिये बैंक से लोन ले रहा हूँ, जिसमें तुमको गारंटर बनना हैं।'' मैंने पूछा-''मगर हिन्दी के विकास के लिये अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों का क्या योगदान है भई?'' अब उसने मुझे लगभग डांटने वाले अंदाज में कहा-''फिर वही मूर्खों जैसी बातें, सीधी बात भी तुम्हें समझ में आती है य नहीं? बात बिल्कुल साफ है। जब अंग्रेजी पढ़ने-लिखने वालों की संख्या बढ़ेगी और हिन्दी जानने वाले कम हो जायेंगे तब हिन्दी का महत्व नहीं बढ़ेगा क्या?''


मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। मैंने थूक गटकते हुये कहा-''बाप-रे-बाप! तुम इतने खतरनाक स्तर के हिन्दी प्रेमी हो इसका मुझे अंदाजा नहीं था। मगर भैया मुझे माफ करो कोई दूसरा दरवाजा देखो। तुम्हारे इतने निम्न कोटी के उच्च विचार में मैं कोई सहायता नहीं कर सकता।'' मेरी हिचकिचाहट देख कर उसने अपने सीने पर हाथ रखते हुये कहा-''मैं हिन्दी माता की कसम खाकर कहता हूँ, तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी। तुम्हें मेरी दोस्ती की कसम।'' इस ब्रह्मास्त्र से मैं ढेर हो गया। अन्ततः मुझे उसके साथ बैंक जाने के लिये तैयार होना ही पड़ा।


    मेरे घर के सामने उसकी विलायती कार खड़ी थी। हम दोनों उस पर बैठ गये। गाड़ी वह स्वयं चलाने लगा। बातचीत का सिलसिला फिर शुरू हुआ। मैंने पूछा-''यार! अब तो तुम कार बंगलेदार आदमी हो गये हो। बहुत कम समय में तुमने इतनी तरक्की कैसे कर ली?'' उसने कहा-''सब हिन्दी माता की कृपा और भैया जी का आशीर्वाद है। भैया जी की कृपा से एक अकादमी में पैर जमाये बैठा हूँ।'' मैं उससे कुछ और पूछता तब तक हम बैंक पहुँच गये थे। निर्धारित स्थान पर गाड़ी रखकर हम दोनों बैंक के अंदर गये। मैंने देखा, शाखा प्रबंधक की कुर्सी के ठीक ऊपर एक बैनर टंगा था। जिसमे लिखा था, ''हिन्दी पढ़ना आसान, लिखना आसान, बोलना आसान'' तो छोटी-छोटी बातों से हिन्दी सीखना शुरू करें। शायद प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी वहाँ हिन्दी पखवाड़ा मनाया जा रहा था। प्रबंधक के मेज पर उसके नाम की पट्टिका रखी हुई थी जिसमें उसके नाम के साथ अंग्रेजी में लिखा  हुआ था, ''मे आई हेल्प यू।''


    अंग्रेजी लाल प्रबंधक को नमस्ते श्रीमान कहते हुये अंदर घुसने लगा तो प्रबंधक उसकी इस हरकत से गुस्साते हुये बोला-''ये क्या बदतमीजी है? श्रीमान-श्रीमान रटे जा रहे हो। अदब से सर कहो और परमिशन लेकर अंदर आओ।'' अंग्रेजी लाल हुकुम मेरे आका के अंदाज में झुका और ''मे आई कम इन सर'' कहते हुये पुनः अंदर घुसा। शाखा प्रबंधक मोंगेंम्बो के अंदाज में खुश हुआ। मैं बाहर बैठ कर  अंग्रेजी लाल का इंतजार करने लगा।


    कुछ समय बाद जब अंग्रेजी लाल कर्ज संबंधी दस्तावेज पर जमानतदार के स्थान पर मुझसे हस्ताक्षर कराने के लिये लाया तो मेरा दिमाग घूम गया। सारे कागजात अंग्रेजी में थे। मैं सोचने लगा, आखिर न्यायालय से लेकर  सभी महत्वपूर्ण कार्यालयों के कागजात अंग्रेजी में ही क्यों होते हैं। ये अंग्रेजी भूत आखिर हिन्दी को ऐसे कब तक चिढ़ाता रहेगा। मित्रता के कारण मुझे उन कागजात पर हस्ताक्षर करना पड़ा। शाखा प्रबंधक के पास कागजात जमा करके हम बैंक से बाहर निकल आये और घर की ओर चल पड़े। अंग्रेजी लाल मुझे मेरे घर पर छोड़कर आगे बढ़ गया।


    निर्धारित समयानुसार मैं संध्या पाँच बजे अंग्रेजी लाल के बंगले पर पहुँच गया। बंगले को रंगीन झालरों से खूब सजाया गया था। वहाँ काफी चहल-पहल थी। अंग्रेजी परिधान में सुसज्जित बहुत सारे लोग, हिन्दी माता व्रत कथा-पूजन में भाग लेने आये हुये थे। मैं उस कमरे में गया जहाँ पूजा कार्यक्रम रखा गया था। मैंने देखा, एक उच्चासन पर सफेद कपड़ा रखा गया था। उस पर हिन्दी वर्णमाला को सुंदर तस्वीर की तरह मढ़वा कर स्थापित किया गया था और उसी की पूजा-अर्चना की गई थी। उस पर अक्षत, गुलाल चढ़ाया गया था, पास में ही नारियल फोड़ा गया था और खूशबूदार अगरबत्ती जलाई गई थी। पूरा कमरा महक रहा था, पूजा कार्यक्रम तो सम्पन्न हो गया था। अभी आरती हो रही थी। सब मिल कर 'जय हिन्दी माता, मैया जय हिन्दी माता' गा रहे थे। कमरे का वातावरण बिल्कुल वैसा ही था जैसे सत्य नारायण कथा पूजा में होता है।


    आरती के बाद जब अंग्रेजीलाल की नजर मुझ पर पड़ी तो वह 'वेलकम माय फ्रेन्ड' कहते हुये मेरे पास आया। अंग्रेजी बाई भी किसी महिला को देखकर, 'हाय हाऊ आर यू डियर, प्लीज कम फ्राम हियर' कहते हुये स्वागत कर रही थी। वहाँ बहुत सारे लोग 'हाय' कहते हुये आ रह थे और कुछ लोग 'बाय' कहते हुये जा रहे थे।


    प्रसाद वितरण के पश्चात भोजन ग्रहण करके मैं भी कमरे से बाहर निकल आया था। अपने घर जाने के लिये बस आगे बढ़ा ही था तभी उस बंगले के एक कोने के कमरे से किसी महिला की रोने की आवाज सुनाई दी। मैंने नजदीक जाकर देखा, दरवाजा अंदर से बंद था। मैंने खिड़की से झाँक कर देखने की कोशिश की। एक अधेड़ महिला अपने आँचल से मुँह ढांक कर सुबक-सुबक कर रो रही थी। चेहरा पहचान नहीं आ रहा था। तभी अचानक मेरे दिमाग में एक प्रश्न कौंधा, कहीं ये हमारी हिन्दी माता तो नहीं?


वीरेन्द्र 'सरल'
बोड़रा(मगरलोड़)
जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)

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रचनाकार: वीरेन्द्र सरल का व्यंग्य - अंग्रेज़ी लाल की हिंदी
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