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चन्द्रकुमार जैन का आलेख - कार्यस्थल पर सकारात्मक वातावरण का प्रभाव

कार्यस्थल पर सकारात्मक वातावरण का प्रभाव

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

 

किसी भी संस्था अथवा प्रतिष्ठान के  मुखिया की सबसे बड़ी ड्यूटी और चुनौती

है ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिसमें पूरा स्टाफ परस्पर सहयोग के भाव

के साथ काम कर सके. प्रश्न यह है कि वे कौन से रास्ते और तरीके हो सकते

हैं जिनके दम पर कार्य के लिए बेहतर माहौल का निर्माण संभव है ? यदि

वास्तव में आप इस प्रश्न को लेकर गंभीर हैं तो इसका उत्तर भी आसान है.

ऐसे कई उपाय हैं जिनसे कार्यस्थल की ऊर्जा को सकारात्मक और सृजनात्मक

दिशा में अग्रसर किया जा सकता है,  जहाँ काम स्वयं एक तरह का आनंद और

निर्माण का पर्याय बन जाए. आइये इन में से चुनिन्दा उपायों पर गौर करें। 

 

संदेह छोड़ें, विश्वास करें

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जी हाँ ! जहाँ ट्रस्ट हो, विश्वास हो वहीं काम का माहौल और उसकी प्रबल

इच्छा संभव है. संस्था में विश्वास के वातावरण का निर्माण अति महत्वपूर्ण

कदम है. याद रहे सफल लीडर जानता है कि उसके स्टाफ के हर काम में उसकी खुद

की इमेज उभर कर सामने आती है.  दरअसल उसके विचारों और काम करने के तरीकों

से उसकी पूरी टीम कम या अधिक प्रभावित होती है. इसलिए भरोसा या ट्रस्ट का

सीधा अर्थ है मुखिया का वैसा होना जैसा वह कहता है. अगर वह बातें

क्वालिटी की करे तो उसे अपने काम और काम लेने के तरीकों के साथ-साथ किससे

कौन सा काम करवाया जाये जैसे मसलों पर भी क्वालिटी की बलि कभी नहीं

चढ़ाना चाहिए. प्रतिभावान सदस्य से  दोयम दर्जे का या औपचारिक साधारण

स्तर के काम न लें तो बेहतर होगा.

 

स्पष्ट संवाद करें

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जिस संस्था में कार्य की दशाएँ अच्छी हों, वहाँ का हर सदस्य स्वयं को

महत्वपूर्ण अनुभव  करता है. यह तभी मुमकिन है जब मुखिया हरेक की बात पर

गौर करे और कभी भी उसे अपमानित या ज़लील न करे. बल्कि जो भी कहना या

पूछना है नितांत अकेले  में कहें  या पूछे और यह भी कि अपने चहेतों के

सामने यदि कोई हों, ऎसी हर बात का ज़िक्र भी न करें करे  ताकि हर सदस्य का

आत्मसम्मान सुरक्षित रह सके. काम न करके सिर्फ गप्प गोष्ठी तथा चापलूसी

में वक्त बिताने वाले कुछ कर्मचारियों को जब संस्था प्रमुख सिर पर बिठा

लेते हैं तब कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि माहौल स्वस्थ संवाद का नहीं

रह जाता. लिहाजा, जरूरत समझें तो सभी सदस्यों से पूछकर, सुझाव लेकर काम

देने और लेने का माहौल बनाएं. खुले संवाद का वातावरण सचमुच एक बड़ी बात

है. इससे संस्था के काम की दशाएँ सुधरती हैं.

 

स्टाफ से सर्वश्रेष्ठ हासिल करें

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एक सामान्य सा सिद्धांत है कि लोग उतना ही अच्छा  कर पाते हैं जितने की

आशा आप उनसे करते हैं. ये बात बड़े पते की है. यदि लीडर अपने स्टाफ से

बड़े काम की उम्मीद करता हो तो उसे उसके साथ वैसा व्यवहार भी करना चाहिए.

मशीनी ढर्रे वाले काम और क्रिएटिव वर्क के बीच अंतर समझे बगैर आप दोनों

को अगर एक ही लाठी से हांकेंगे तो परिणाम कभी अच्छे नहीं मिल सकते. अगर

आप किसी कर्मचारी को माइक्रो मैनेज करने की कोशिश करेंगे, उसकी लगातार और

गैर ज़रूरी मानीटरिंग करेंगे तो वह कभी औसत दर्जे से ज्यादा नतीजे नहीं दे

पायेगा. अतः लीडर को स्टाफ से सर्वोत्तम की आशा करने के साथ उसके अनुरूप

वातावरण और सम्मान देना के लिए भी तत्पर रहना चाहिए.

 

टीम भावना विकसित करें

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मनुष्य की आधारभूत आकांक्षाओं में से एक यह है कि वह जहाँ काम करता है

वहाँ से खुद से भी बड़ी किसी चीज़ की आशा करता है. उसकी यह आशा केवल तब

पूरी ही सकती है जब संस्था अथवा प्रतिष्ठान में मिलजुलकर कार्य करने का

वातावरण हो. इसलिए संस्था प्रमुख की यह अहम जिम्मेदारी हो जाती है कि वह

टीम भावना के विकास पर प्राथमिकता से ध्यान दे. इससे टीम के सदस्य

महत्त्व का अनुभव करेंगे फलस्वरूप उनमें संस्था से  के प्रति  गर्व बोध

भी बना रहेगा. इसका एक और परिणाम यह होगा कि वह काम करने में दिलचस्पी

लेगा और अवकाश लेने या टालमटोल रवैये से दूर भी रहेगा. इससे अंततः संस्था

की  प्रतिष्ठा और उत्पादकता भी बढ़ेगी.

 

सम्मान दें, सराहें

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जी हाँ ! किसी भी संस्था  के सदस्यों के लिए सम्मान और सराहना प्रगति के

लिए  संजीवनी के सामान है. जब कभी मुखिया के नाते आप किसी भी स्टाफ मेंबर

को कुछ अच्छा करते देखें,  उसे अहसास कराएँ कि आपको इसकी न सिर्फ जानकारी

है बल्कि इस अच्छाई से आपका दिल से वास्ता भी है. इतना ही नहीं, आप बड़े

सधे हुए अंदाज़ में उस अच्छे काम की जानकारी अन्य सदस्यों तक भी पहुँचाएँ

ताकि  प्रेरणा के साथ-साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का वातावरण भी बन सके.

इससे दूसरों में कुछ बेहतर कर दिखाने  की ललक पैदा हो सकती है. सम्मान और

प्रशंसा खुलकर करें. हो सके तो सबके सामने करें. याद रहे प्रशंसा सिर्फ

ज़बानी जमा-खर्च बनकर न रह जाए. उसमें हार्दिकता हो. इससे आपका स्टाफ

स्वयं को संस्था का एक अहम हिस्सा मानकर काम करेगा. फिर क्या, बन जायेगी

आपकी बात !

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लेखक प्रेरक वक्ता,कुशल प्रशिक्षक और 

राजनांदगांव,छत्तीसगढ़ के दिग्विजय कालेज 

में प्राध्यापक हैं। मो.9301054300 

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