चन्द्रकुमार जैन का आलेख - एकनिष्ठ तुलसीमय जीवन डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र

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जयन्ती : 12 सितम्बर ================= एकनिष्ठ तुलसीमय जीवन डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र डॉ.चन्द्रकुमार जैन  आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने लिखा है ...

जयन्ती : 12 सितम्बर

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एकनिष्ठ तुलसीमय जीवन डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने लिखा है कि प्रभावित होना और प्रभावित करना जीवंतता का लक्षण है। कुछ लोग हैं, जो प्रभावित होने को दुर्बलता मानते हैं। मैं ऐसा नहीं मानता। जो महत् से, साधारण में छिपे असाधारण से प्रभावित नहीं होते,मैं उन्हें जड़ मानता हूँ। चेतन तो निकट सम्पर्क में आने वालों से भावात्मक आदान-प्रदान करता हुआ आगे बढ़ता जाता है। जिस व्यक्ति या परिवेश से अन्तर समृद्ध हुआ हो, उसे रह-रहकर मन याद करता ही है,करने के लिए विवश है। जब चारों तरफ़ के कुहरे से व्यक्ति अवसन्न होने लगता है तब ऐसी यादें मन को ताजगी दे जाती हैं। उनके कथन को यदि ध्यान में रखें तो उनकी कृति स्मरण को पाथेय बनने दो में संचित मानस के राजहंस डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र जी की यादें वास्तव में हर पाठक के मन को ताज़ा कर जाती हैं। 

भावयोगी साहित्य साधक

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स्मरणीय है कि मिश्रा जी ने अपने विशिष्ट शोध ग्रन्थ तुलसी दर्शन में कहा है कि साहित्यकार भावयोगी होता है। उसकी साधना ज्ञानयोगी अथवा कर्मयोगी की साधना से किसी प्रकार कम महत्वपूर्ण नहीं। भावयोग का तो लोकोत्तर आनंद से सीधा सम्बन्ध रहता है अतएव वह मुक्तावस्था में स्वतः ही अनायास पहुँच सकता और अपने सहृदय श्रोताओं अथवा पाठकों को भी अनायास पहुँचा सकता है। यही वह साधन है जिसकी साधनावस्था में भी आनंद है और सिद्धावस्था में भी आनंद है,जिसका साध्य भी आनंद स्वरूप है और साधन भी आनंदस्वरूप है। परन्तु इस साधना के लिए शक्ति,अध्ययन और अभ्यास तीनों के ऊँचे सहयोग आवश्यकता रहती है। 

कहना न होगा कि जीवन के बहुआयामी कर्म क्षेत्र के अप्रतिम योद्धा रहे मिश्र जी का साहित्य इसलिए प्रभावित करता है कि उसमें ऊपर कहीं गईं तीनों बातों का संगम है। मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मलेन के अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने अंग्रेजी के बदले हिन्दी में शोध प्रबंध लिखकर डी.लिट् की गौरवशाली उपाधि प्राप्त की थी। इस समादृत ग्रन्थ के अलावा मानस में रामकथा और मानस माधुरी जैसी आपकी कृतियाँ हैं जिनकी भूमिका भारत के राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्रप्रसाद ने लिखी। इसमें भी उनके उक्त तीनों गुणों की महत्वपूर्ण भूमिका से भला कौन इंकार कर सकता है। 

स्मरणीय 65 वां जन्म-दिवस

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12 सितम्बर 1898 मिश्र जी का, राजनांदगाँव में जन्म हुआ था। उधर 19 सितम्बर 1962 को बम्बई में प्रकाशित परिचय दीर्घा में उनका परिचर सार देते हुए लिखा गया है कि राजनांदगांव में मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मलेन के अध्यक्ष डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र का 65 वाँ जन्म-दिवस सोत्साह मनाया गया। समारोह की अध्यक्षता बड़ोदा विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष कुंवर चन्द्रप्रकाश सिंह ने की।  संस्कारधानी की पचास से भी अधिक संस्थाओं ने डॉ.मिश्र जी का अभिनन्दन किया। अभिनन्दन समिति के अध्यक्ष पंडित किशोरीलाल शुक्ल जी ने नागरिकों की ओर से डॉ.मिश्रजी को रजत मंजूषा में एक मानपत्र भेंट किया और अभिनन्दन समिति की तरफ से उन्हें 1001 रू. की थैली भेंट की, जिसे मिश्रजी ने साहित्य साधना के क्षेत्र में लगाने की घोषणा की।  इस समारोह में पहला वक्तव्य  देते हुए दिग्विजय कालेज के प्राध्यापक गजानन माधव मुक्तिबोध जी ने डॉ. मिश्र जी की साहित्य साधना और जीवन के विविध पहलुओं पर प्रकाश डाला। अन्य महानुभावों के वक्तव्यों के बाद पंडित शिवकुमार शास्त्री जी ने आभार ज्ञापन किया। बाद में हुए कवि सम्मलेन में अभ्यागत कवियों के साथ मिश्र जी ने भी काव्य पाठ किया था। 

निष्काम कर्मयोग  के प्रतिमान

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हमने आरम्भ में स्मरण को बनने दो कृति की चर्चा की थी। प्रसंगवश उस पर कुछ बातें और कर लीं जाएँ। आचार्य विष्णुकांत शास्त्री जी ने मिश्र जी का स्मरण करते हुए लिखा है - 

जो कुछ मनुष्य का,मनुष्य का कहाँ है वह,

आँखें मुंदती  हैं तो रहस्य खुल जाता है।

न्यास जो मिला है, उसकी समृद्धि ही के लिए,

मनुज निज आयु के बरस कुछ पाता है।

साकेत संत की इन आरंभिक पंक्तियों में डॉ. बलदेवप्रसाद मिश्र ने अपनी जीवन साधना के आदर्श का ही संकेत दिया है। साधारण मनुष्य और संत दीखते तो बाहर  से एक जैसे ही हैं, किन्तु दोनों की दृष्टियों और व्यवहार में कितना अंतर होता है। साधारण मनुष्य अपने छोटे से दायरे में कोल्हू के बैल के समान चक्कर काटता हुआ राग-द्वेष से ग्रस्त जीवन बिताता है।  ज्यादा से ज्यादा बटोर लेना चाहता है, किन्तु जब उसकी आँखें मूंदती हैं तो उसका संचय यहीं  छूट जाता है। संत इस रहस्य को जनता है कि मनुष्य जिसे अपना समझता है चाहे वह उसका परिवार हो या समाज, धन संपत्ति हो या यश,यहां तक कि उसका जीवन ही क्यों न हो, ये सब न्यास की तरह, धरोहर की तरह उसे मिले हैं। उसका कर्तव्य यही है कि अपनी आयु के थोड़े से वर्षों में इसकी यथासंभव वृद्धि कर जाए। अनासक्त कर्मयोग द्वारा लोक-मंगल, इसी आदर्श को अपने जीवन में चरितार्थ कर जाने वाले डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र का नश्वर शरीर बहले 4 सितम्बर 1975 को न रहा हो, उनका यशः शरीर चिरकाल तक इस आदर्श पर चलते रहने की प्रेरणा जनगण को देता रहेगा। वास्तव में यदि ध्यान पूर्वक मनन करें तो उनका व्यक्तित्व उनके कृतित्व से भी ऊंचा प्रतीत होता है। उनका जीवन तुलसीमय था। तुलसी की व्याख्या करते समय वे पुलकित हो उठते थे। उनका विवेचनात्मक साहित्य मूलतः तुलसी पर ही है। तुलसी में ही उन्होंने अपने जीवन दर्शन का अनुसंधान किया और अपने जीवन दर्शन में तुलसी का ही गुणगान किया। 

निष्काम कर्मयोग और निष्ठा, सरलता, विनम्रता और तुलसी के साथ तुलसी के राम के प्रति समर्पणशीलता के जीवंत प्रतिरूप डॉ. बलदेवप्रसाद मिश्र जी ने जीवन संगीत में अभिव्यक्त अपनी इस मान्यता को सचमुच जीकर और जीवन को जीतकर अजेय बन गए -

हमने तो इन सुमनों को जीवन की प्रतिकृति मन।

हँसते-हँसते खिल उठना, हँसते-हँसते झड़ जाना।।

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

प्राध्यापक, हिंदी विभाग 

दिग्विजय कालेज, राजनांदगांव

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रचनाकार: चन्द्रकुमार जैन का आलेख - एकनिष्ठ तुलसीमय जीवन डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र
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