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सुशील यादव के 2 व्यंग्य

व्यंग्य

 

जागो ग्राहक जागो ....

अपने तरफ के हिनुस्तानी ग्राहक, और लन्का के मिस्टर कुम्भकरण के सोने का रिकार्ड लगभग बराबर है। दोनों बेइंतिहा सोते हैं।

मिस्टर ‘कुम्भकर्ण’ की वजह से लंका को, ‘सोने की लंका’ भी कहा जाने लगा|

वहां अगर असली सोना होता, भारत लूटने निकला ‘महमूद गजनवी’ उधर का रुख न कर लेता ?

गजनवी के सिपहसलारों ने कान में फुसफुसा दिया, जनाबेआला ,देखने वाली बात को गौर करे, दोनों जगह सोने का भाव बराबर है।पाच सौ रुपया टन इंडिया में ,और यही भाव लंका में है।ऊपर से समुद्र से लूट का माल लाने का खर्चा, जोखिम.... अलग।पड़ता नई पड़ने का......।इंडिया ही लूट लो|उन्होंने इंडिया लूटने का मन बना लिया।

 

वे, सोते हुए इडिया के राजे महराजे, रजवाड़े,मन्दिरों को लूट ले गए। भोथरी तलवार लिए सिपाही ,गमछा,धोती पहने पंडित ,कहीं अपने विरोध को मुखर नहीं कर पाए।

समय ~समय पर हमले होते रहे।अंग्रेज आये ,पोर्तगीज आये, सबने अपना कमाल,रुमाल और तलवार दिखाया ,माल बनाया और चलते बने।

समय के जिस काल खंड में हम अभी जी रहे हैं उसे कलयुग कहते हैं।

 

पुराणों में इस युग की कलंक गाथा ये है कि, एक दूसरे के साथ, आदमी आदमी के बीच धोखाधड़ी ,फरेबी मक्कारी होने की संभावनाएं अनंत हैं।

हमारे फेमली पंडित से इस बारे में चर्चा कर लें, तो वे डिटेल में बताते हैं ,यजमान जी ,लगता है ,नरक में जीने के या जाने के दिन बहुत नजदीक हैं।

बेटा ,बाप को धकियायेगा ,बहु मरते मर जाओ ,पानी नहीं देगी ,रिश्तेदार उधार ले के मुकर जायेंगे ,किरायेदार मकान हड़प लेगा ,बनिया मिलावटी सामान दे दे के, आपको आई सी यु का मरीज बना देगा ,डाक्टर आपकी तरफ देखने भर की फीस झाड लेगा|मक्कार चांडाल लोग रेप खून करके पैसे के दम बाहर निकल जायेंगे

फेमिली पंडित ने एक और खतरे को भांपा है।वे कहते हैं कलियुग में विज्ञापन के ढोल~धतूरे का, ज्यादा बोलबाला रहेगा।ग्राहक यहीं ज्यादा पिटेंगे ....

वे सत्संग में ,अपनी बात का और खुलासा करते हैं।

 

ये विज्ञापन वाले लोग ,बी पी, के पेशेंट को सुबह सुबह नमक वाला टूथपेस्ट रिकमंड कर रहे हैं| चैन से सोना है तो जाग जाओ स्टाइल में वे पूछते हैं ,आपके पेस्ट में नमक है ...?

ये एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब, सिवाय,मजबूरी में नमक वाला पेस्ट खरीददारी के और कुछ नहीं।दम से ये आपको अपना नमक खिला रहे हैं ,ले हमारा भी नमक चख ....|

एक विज्ञापन ‘मैल में छिपे कीटाणुओ को धो डालता है’ के नाम पर सब के दिमाग में छिपे हुए कीटाणुओं का खौफ पैदा कर रखा है| ये कीटाणु जब डिटर्जेंट इजाद नहीं हुए थे, तब शायद पैदा नहीं हुए होंगे ?

बंटी ! ‘तेरा साबुन स्लो है क्या’,? ऐसा लगता है साबुन को किसी रेस में जाना था ?

‘चौक गए छतरी मेन’....?

घर आके कभी कोशिश करें।वैसी ही बरसात ,वैसे ही कीचड़ सने कपडे....| अगर विज्ञापन वाली धुलाई के उन्नीस बीस कपडे धुल जाएँ और छतरी मेन अगर चौक जाये, तो श्रेष्ठ धुलाई का पुरूस्कार थमा दें। ज़रा वैसी टी वी वाली धुलाई करके दिखा जाओ भाई।

 

टायलेट प्रोडक्ट वालों के प्रोडक्ट से , बी पी एल वालों का टायलेट झकास क्यों नहीं धुलता ...?

किचन बरतन बार के खिलाफ, मेरी काम वाली बाई का अपना अनुकरणीय मुहीम है|

देखो साब जी, मै बर्तन राख से धोउगी,ये जो आप टी वी में देख देख के तंग करते हैं बर्तन साफ नहीं धुलते तो मै कहे देती हूँ ,ये सब बडे लोगों का चोचला है।जो सफाई राख से घिस कर मिलेगी, वो कहीं न मिल पायेगी।घिसने से लगता है अल्लादीन घर के आसपास मंडराते रहता है।हर बर्तन में जो हुक्म आका वाली परछाई दिखा करती है।हाँ राख आजकल मिलता नहीं साब जी ,सब लोग गैस इस्तेमाल करते हैं ,|होटलों से या तो आप ला दिया करो या हमको पैसे दो हमी ला देंगे।बाबूजी इक और राज की बात ,अपना एक्सपर्ट ओपीनियाँ रखते हुए बोली ,बरतनों के बार या लिक्विड से,बर्तन में डिटरजेंट चिपके रह जाते हैं आगे जाके ,यही सब केन्सर ,टी बी होने का खतरा पैदा कर देते हैं।अब आगे खतरा उठाना हो तो आपकी मर्जी।

 

उसके ज्ञान स्रोत पर अदभुत आश्चर्य हुआ।मैंने सहमति में सर हिला के बर्तनों में राख,और मेरी अल्प मति में भभूत मलने की अनुमति दे दी।मुझे लगा आगे भी मै बर्तनों में ‘अल्लादीन ब्रांड की राख’ रगडवाता रहूंगा।

मुझे उन सतसंगी ढकोसलेबाजों से महरी की साफगोई ज्यादा अच्छी लगी जो दो दिन के योग के बाद हाथ उठा के कहलवाते हैं ,किसका वजन दो किलो , कम हुआ...? किसका चार किलो ...हाथ उठायें .? हजारों हाथ उठ जाते हैं।बेशर्म लोग जाने किस चाईनाब्रांड मशीन से तुल के आये होते हैं,रामजाने ?

यही सत्संगी,भूतप्रेत बाधा झाड़ने वाले ,मूली,मेथी, टमाटर, हरी सब्जी ,हर्रा बहेरा के गुणों की बखान करंगे और अपने कष्ट का इलाज रातो`रात विदेश जा के करवा आयेंगे।

ग्राहको का एक बड़ा तबका वो भी है जो किसी की सुनते नहीं खुद अपना कहा भी मानते नहीं।जिसने भी झांसा दिया, चार दिन में पैसे दुगने, चौगुने ...... वे दोनों कान, दोनों आँख और एकमात्र दिमाग कहे जाने वाली इन्द्रिय को सुप्तप्राय कर लेते हैं।

 

मगर हाँ ,गच्चा खाने के बाद वही दिमाग सोलहो आने सही काम करने लग जाता है।वो एफ आई आर करवा लेता है ,मिनिस्टरो का एप्रोच भिडाता है ,धरने हड़ताल के लिए फरियादी इकत्र कर लेता है।चेतना जगती है मगर तब तक आपको ठगने वाला फरार हो जाता है या सशक्त राजनीतिक शरण में जाकर अभयदान पा चुका होता है।

आजकल की राजनीति भी ‘प्रोडक्ट बेचो’ की तर्ज पर अपने आप को एक ब्रांड बना लिए हैं।

हम हैं एकमात्र बिल्डर ,पच्चास मंजिला राम मन्दिर हम मुफ्त में बना देंगे बशर्ते आप हमें कुर्सी काबिज करवा दें।हमसे बेहतर गंगा सफाई करने का दम है किसी में ....?मन माफिक काम करके देंगे। ये लोग बड़े बड़े अभियान को, कानों के मैल साफ करने की तर्ज पर लिए चलते हैं।बहरे लोग ,सोचते हैं शायद साफ कान से धीमा सही कुछ तो सुनाई देने लग जाएगा।

आप अँधेरे में कब तक बैठे रहेंगे ...?हमारे ब्रांड की बिजली घर में जलाइये इसमें रोशनी ज्यादा दमदार और टिकाऊ है ऊपर से ये करेंट नहीं मारता ,एकदम आधी कीमत पर वापरने के लिए हमें व्होट दें।

हम आपके प्रदेश में मेट्रो सुविधा देंगे।आप मर्जी हो तो नाती ~पोतो के साथ डब्लू टी (बिदाउट टिकट ) साफर कर लें।

 

लेपटाप ,टी वी ,टेबलेट ,बैल ,गाय,सायकल और सुविधा बांटने वाले मायाजाल कुछ यूँ फैलाते हैं की आपको फंसना लाजिमी है ही ....?

वोट देने वाली जनता, और सपने देखने वाले ग्राहक माने बैठे हैं, चलो इसी बहाने उनको खाली समय में बहस करने का मुद्दा मिल जाता है,वरना सपाट मैदान अमेरिका जैसे देशों में झख मारते हुए ,एक सपाट उबाऊ जिन्दगी जियो।

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खिसयानी बिल्ली से खंभा बचाओ ..... व्यंग्य

एक बिल्ली चूहे के ताक में अक्सर रहा करती थी |चूहा देखते ही झपट के दबोच लेना उसकी शिकार कला के प्रशिक्षण का अहम पाठ था | उनके माँ-बाप ने उसी भाँती ट्रेंड भी किया था |शिकार करते वक्त कहीं चूक होने का सवाल नहीं था |मगर एक बार ऐसा हो गया |चूहे के पीछे बिल्ली भागते हुए आई |आगे-आगे चूहा पीछे-पीछे बिल्ली ,चूहा छुपने का सहारा ढूढ़ रहा था अचानक सामने एक खंभा आया जिसके पीछे पाइप रखे थे भयभीत चूहा पाइप में घुस कर जान बची और लाखो पाए वाली, गहरी-गहरी साँसे लेने लगा|बिल्ली ,नजरों से ओझल हुए चूहे को घात लगाये खम्भे के चारों ओर चक्कर लगा के देखती रही |उसे यूँ लगा कि हो न हो चूहा इसी खंभे में घुस गया है |वो खंभे को हांफते दम तक नोचने-खुरचने में लगी रही |

आजकल यही खेल अपने इन्द्रप्रस्थ में हो रहा है |प्रजातंत्र का बीचो-बीच खंभा गडा है|इर्द-गिर्द चूहे-बिल्ली के रोल माडल विधायक दौड़ रहे हैं |

दिल्ली वाली जनता ने ‘भगत’ को हिसाब से पसाद बाटे थे|जैसी सेवा वैसी मेवा के अनुरूप जिसने जैसे भी वादे किये उन पर आँख मुद कर विश्वास जताते हुए अपना वोट दे बैठी |नतीजा में एक को 34 , दूसरे को 28 तीसरे को 8 विधायक मिल सके |यानी बहुमत 34 से सब दूर |आठ वाले ने कहा हमसे ले के छत्तीस कर लो |अगला लेने को तैय्यार नहीं |सोचा इतने सारे वादे किये बैठे हैं कहाँ तक निपटा पायेंगे |वे जनता के पास गए |जनता बोली ,’जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा’रोके ज़माना चाहे रोके खुदाई तुमको सत्ता मे आना पड़ेगा |

वे महत्वाकान्छी जीव थे ,कसमे तोड़ के जीत वाली हार पहन लिए |इस तरह कहते हैं, बिल्ली के भाग्य से उन दिनों छिका टूटा था |

सहज में छिका टूटते देख लगा चलो ऊपर लटकी दही हांडी फोडे|वे दलबल के साथ छीका जैसी तुच्छ चीज को छोड़ दही-हांडी की तरफ लपक पड़े |

ये दही-हांडी वाले बड़े उस्ताद होते हैं |इनाम का लालच जबरदस्त रखते हैं |उपर उठो |सारा तुम्हारा है |नौसिखिया अक्सर इस मायाजाल में फंस जाते हैं |उंचाई से गिर कर हाथ पैर लहुलुहान करवा लेते हैं |अपने वाले का भी कुछ इसी के आस-पास हुआ |वे लुटे-पिटे इंद्रप्रस्थ लौट आये |

जिसने गंगा नहा लिया, वे दिल्ली प्रजातंत्र के सबसे बड़े खंभे को सम्हालने लगे |उधर २८० इधर मात्र २८ |२८० की नीयत छोटे खंभे पर आ गई |

आलाकमान की बिल्लियाँ ,दो –चार चूहों को पकड़ना चाहती हैं ?

भाई साहब ,आप इस बारे में क्या सोचते हैं,क्या कमजोर चूहे पकड़ में आ जाएंगे ?या खिसयानी बिल्ली प्रजातंत्र के खम्भे को खुरच-खुरच के खोखला कर देगी ?

 

सुशील यादव

२०२ श्रीम सृष्ठी,अटलादरा

वडोदरा (गुजरात)

susyadav7@gmail.com

1 टिप्पणियाँ

  1. सुशील जी आपके दोनों ही व्यंग एक से बढ़कर एक
    रोचक लगे बधाई

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