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एस. के. पाण्डेय की तीन लघुकथाएँ - मतलब, क्षमता तथा कोशिश

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मतलब

राजेश ने कहा कि सर आज हम लोग शिक्षक दिवस मना रहे हैं। आप दो शब्द कहकर हम लोगों का मार्गदर्शन करें। मैंने कहा कि शिक्षक रोज अपने विद्यार्थियों का मार्गदर्शन ही तो करता है। राजेश बोला वो तो है सर फिर भी आज कुछ अलग होना चाहिए।

मैंने कहा कि आप लोग शिक्षक दिवस मना रहे हैं यह अच्छी बात है। लेकिन आजकल हम हिन्दुस्तानी लोग मनाते तो बहुत कुछ हैं लेकिन मानते कुछ भी नहीं हैं।

मैंने आगे कहा कि आज कोई भी दिवस मनाने का मतलब एन्जॉय करना भर रह गया है। अगर दिवस मनाने के लिए छुट्टी भी मिल जाय तो सोने पे सुहागा लग जाने वाली बात हो जाती है। अभी कुछ दिन पहले शहर में लोग फादर्स डे मना रहे थे। एक दूसरे को बधाई दे रहे थे। खा-पी रहे थे। एन्जॉय कर रहे थे।

बाद में एक एजेंसी ने पता किया तो ज्ञात हुआ कि फादर्स डे मना रहे उन लोगों में से कईयों के माता-पिता बृद्धाश्रम में रह रहे हैं। अब आप ही बताओ ऐसे दिवस मनाने का क्या कोई मतलब है ?

यह सुनकर राजेश और उसके साथी गंभीर होकर कुछ सोचने लगे।

 

क्षमता

राजीव ने कहा कि सर जब आप लोग पढ़ाते हैं तो किसी को कम और किसी को ज्यादा क्यों समझ में आता है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सबको बराबर समझ में आए ?

मैंने कहा कि प्रयास तो यही रहता है कि सबको समझ में आ जाए। लेकिन किसी को कम, किसी को ज्यादा और किसी-किसी को बिल्कुल समझ में नहीं आता।

मैंने आगे कहा कि यदि लेक्चर की बारिस से तुलना करो तो इस बारिस में ज्ञान रुपी जल की बरसात होती है। इस बारिस में ज्ञान रुपी जल को इकट्ठा करने के लिए विभिन्न आकार और प्रकार के बरतन रुपी विद्यार्थी होते हैं।

सामान्य सी सोच की बात है कि जिस बरतन की जितनी क्षमता होगी उसमें उतना ही जल आएगा। जैसे बाल्टी में गिलास की अपेक्षा ज्यादा जल आएगा। जबकि बारिस गिलास और बाल्टी दोनों के लिए बराबर होती है। फिर भी गिलास बाल्टी का मुकाबला नहीं कर सकता।

ऐसा कहकर मैंने राजीव से प्रश्न किया कि इसमें बारिश का क्या दोष है ? अथवा बारिश करने वाले का ही क्या दोष है ?

राजीव बोला बात तो अपनी-अपनी क्षमता की ही है। मैंने कहा हाँ, यही बात है। सब अपनी-अपनी क्षमता के अनुरूप ही ज्ञानार्जन कर पाते हैं

 

कोशिश

रजनी ने कहा कि कॉम्पटीशन से मुझे डर लगता है यदि किसी परीक्षा में ग्रेजुएशन माँगा जाता है तो उसमें पोस्टग्रेजुएशन से लेकर पीएचडी वाले तक बैठते हैं। मैं सोचती हूँ जहाँ इतने बड़े-बड़े लोग परीक्षा में बैठेंगे वहाँ मैं क्या कर पाऊँगी ?

मैंने कहा कि आजकल बिना कॉम्पटीशन के तो कुछ भी नहीं होता। देश में बेरोजगारी बहुत बढ़ी हुई है। इसलिए अधिक योग्यता वाले लोग भी कम योग्यता वाले परीक्षाओं में बैठकर अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ करना लेना चाहते हैं। फिर भी डरने के बजाय कोशिस करना चाहिए।

मैने आगे कहा कि मच्छर को आकाश में उड़ते हुए देखा जाता है। वहीं दूसरी ओर बड़े-बड़े पक्षी जैसे गिद्ध भी आकाश में उड़ते हैं। लेकिन गिद्ध को उड़ते देख मच्छर उड़ना नहीं छोड़ देता। भले ही वह गिद्ध जितना ऊँचा नहीं उड़ सकता फिर भी कुछ ऊँचाई तक तो जाता ही है।

इसी तरह से हर कोशिस करने वाला व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ न कुछ ऊँचाई जरूर हाशिल करता है।

रजनी बोली आपके इन बातों से बड़ा बल मिलता है। मैं अब कोशिस करने से पीछे नहीं हटूँगी।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.)।
ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/ URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/
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1 टिप्पणियाँ

  1. तीनो ही लघु कथाएं उत्तम हैं और अपना
    सन्देश देने में सफल हैं बधाई पाण्डेय जी

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