विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका -  नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.
रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -

पिछले अंक

शशिकांत सिंह की व्यंग्य कथा - खूंटे में दाल है

साझा करें:

खूंटे में दाल है व्‍यंग्‍य कथा एक प्रचलित लोककथा का व्‍यंग्‍य रूपांतरण करके जनहित में जारी किया जा रहा है। भारत वर्ष नामक देश के किसी गांव...

खूंटे में दाल है

image

व्‍यंग्‍य कथा

एक प्रचलित लोककथा का व्‍यंग्‍य रूपांतरण करके जनहित में जारी किया जा रहा है। भारत वर्ष नामक देश के किसी गांव में एक चिड़िया, कहीं से दाल का एक दाना लेकर आई। वह उस दाने को खाने के लिए एक खूंटे के ऊपर बैठी ही थी कि दाना उसके मुंह से गिरकर खूंटे में फंस गया। वह बेचारी बहुत परेशान हुई। मुंह का आहार छिन जाये तो दुःख होता ही है। आदमी होता तो उसके लिए नाना प्रकार की योजनाएं होती। राशन की दुकानों के माध्‍यम से भी उसे दाना दिया जाता। आदमी होने के नाते वह वोटर होती और लोकतंत्र के स्‍तंभ के रूप में उसको मान्‍यता मिल जाती लेकिन वह चिड़िया थी जो शिकारी के काम आती है। वह चिंतन करने लगी कि दाना अब कहां से आयेगा ? उस इलाके में तीन साल से सूखा पड़ा था। अन्‍न की कमी आदमी के लिए भी थी। आदमियों में अन्‍न के लिए संघर्ष करना नियमों के विपरीत माना जाता है। चिड़िया तो चिड़िया थी। आखिरकार उसने संघर्ष करने का मन बनाया। अंत तक अन्‍न के लिए संघर्ष करने का पक्‍का इरादा कर के वह एक बढ़ई के पास पहुंची। उसने बढ़ई से अपील की कि वह खूंटे को चीर कर उसके लिए दाल निकाल दे। वह बढ़ई का आजीवन आभारी रहेगी। बढ़ई आदमी होने के नाते लाभ-हानि के सिद्धांतों को जानता था।

बढ़ई की समझ में यह नहीं आया कि एक दाल के दाने के लिए वह खूंटे को क्‍यों चीरे। उसको क्‍या लाभ होगा ? पता नहीं वह खूंटा किसका है ? कहीं किसी नेता-वेता का खूंटा तो नहीं है। वहीं देश के दाने जाकर अटक जाते हैं। निकलते नहीं है। यदि चीरने का प्रयास करे और नक्‍सली कहकर उसे अंदर कर दिया जाये तो। कहीं किसी पुलिस वाले का खूंटा हुआ तब तो गजब हो जायेगा। पुलिस वाले के खूंटे को तो चीर कर भी आप उसमें से दाना नहीं निकाल सकते क्‍योंकि उनके खूंटे तक के पास खाने की ही नहीं पचाने की भी अद्‌भुत क्षमता होती है। दाना तो नहीं निकलेगा अलबत्‍ता परिवार सहित वह जरूर फंस जायेगा। उस पर कई दफायें लागू हो जायेंगी। उसने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया।

-' चिड़िया देवी। हमें आपसे सच्‍ची सहानुभूति है। हम जानते हैं कि अन्‍न के लिए किया जाने वाला आपका संघर्ष बिल्‍कुल जायज है लेकिन हमें माफ कीजिये हम बाल-बच्‍चे वाले आदमी हें। हमें इस लफडे में मत डालिये। खूंटा चीरना हमारे वश की बात नहीं है।'

चिड़िया बिल्‍कुल निराश नहीं हुई। अब उसके दिमाग से दाल की बात निकल गई। उसने भ्रष्‍टाचार की जड़ों पर प्रहार करने के मन बनाया। बढ़ई एक आदमी होकर भी अपने कर्त्‍तव्‍यों को पूरा करना नही चाहता। यह भीरूता है। इसे जिंदा रहने का कोई हक नहीं है। वह सांप के पास पहुंची।

-' सांप बंधु , दुष्‍टों को सजा देने का काम आपका ही है। मैने दाल निकालने के लिए खूंटे से अपील की। खूटे ने मेरी बेइज्‍जती कर दी। खूंटा चीरने के लिए बढ़ई को कहा लेकिन वह लाभ और हानि के हिसाब में लीन है। आप उस दुष्‍ट बढ़ई को डंस कर इस लड़ाई में हिस्‍सा लें। यह न्‍याय और अन्‍याय की लड़ाई है। आप जीवों में आदरणीय है। आपको मेरा साथ देना होगा। '

सांप को जोर से हंसी आ गई। ठहाके लगा चुकने के बाद , उसने लंबी तहरीर दी -

-' चिड़िया बहन, समस्‍या यही है जिसकी दाल फंस गई वह आंदोलनधर्मी हो गया। जिनको दाल मिल रही हैं उनको मनन-चिंतन करने से ही फुर्सत नहीं मिलती। तुम्‍हारा दाना यदि नहीं फंसता, पेट भर जाता तो न्‍याय और अन्‍याय की बात दिमाग में नहीं आती। तुम लोग सापों की दुश्‍मन हो। मोर हमें खोज-खोजकर खाता है। आज बढ़ई को डसने के लिए कहने आ गई। रही बात बढ़ई कि तो उसको डंसना मेरी प्राथमिकता नहीं है। मैं अहिंसावादी सांप हूं। डंसता नहीं हूं। उसकी व्‍यक्‍तिगत स्‍वतंत्रता में मैं बाधक नहीं बन सकता। वह खूंटा नहीं चीरना चाहता तो उसकी मर्जी। '

चिड़िया समझ गई कि मामला स्‍वथोंर्ं का है। यह सांप इस आदमी से नागपंचमी के अवसर पर दूध पीता होगा। शक्‍कर डालकर खूब मीठा और गाढ़ा दूध। यह बढ़ई को क्‍यों काटेगा ? अपनी पेट पर लात क्‍यों मारेगा ? चिड़िया भी मानने वाली नहीं थी। उसका संकल्‍प और मजबूत हो गया। उसने लाठी के पास जाकर आग्रह करने की ठानी कि वह सांप को मारे। लाठी बेचारा अभी-अभी सरसो तेल पीकर, धूप में सूखकर बरामदे में आराम कर रहा था कि चिड़िया आ गई। उसने अपनी करुण कहानी बयान की। लाठी को अपने ऊपर गर्व हुआ कि आखिर उसके पास भी कोई समाज सेवा का अॉफर आया। आजकल तो तोप और बंदूक की चलती है। उसको पूछता ही कौन है ! चलो सांप मारने के लिए ही सही। कोई आया तो....। अचानक उस पर सिद्धांतों का दौरा पड़ गया। वह चिंतक हो गया। उसने आसमान की ओर मुंह उठाया और बोलने लगा -

-' देवी ! मैं अकारण रक्‍तपात की निंदा करता हूं। यह मानवजाति का स्‍वभाव हो सकता है। लाठी समुदाय कभी भी किसी पर अकारण वार नहीं करता। व्‍यर्थ की हिंसा कलह का कारण बनती है। सर्प वध करके मैं पाप का भागी नहीं बनूंगा। मुझे क्षम करें। '

चिड़िया जानती थी कि लाठी नहीं आयेगा। उसे मालूम था कि यह दूसरे के हाथ का खिलौना है। ताकत होने के बावजूद इसकी अपनी कोई मर्जी नहीं है। जो चाहे चला दे। जिस पर चाहे चला दे। सिद्धांत तो पोटली में बंधी सत्‍तु की तरह है जब चाहो निकालो , पानी डालो , गूंथो और निगल जाओ। चिड़िया आगे बढ़ी। आग के पास पहुंची। उसे आशा थी कि लाठी को सबक सिखाने में आग से बड़ी भूमिका किसी की नहीं हो सकती। आग को तो किसी से डरने की जरूरत भी नहीं है। उसने आग को अपनी पूरी रामकहानी सुना दी। आग ने धैर्य से पूरी बात सुनी और बोला -

-' आपके साथ वाकई गलत हुआ है। अच्‍छा आप इस बात का सबूत दे सकती हैं कि वह दाल आपका ही था जो खूंटे में फंस गया। '

-' जी............सबूत.......। मेरी चोंच में दाल थी और खूंटे मेंं गिर गई। भला ...................।'

-' हू..............अच्‍छा किसी ने देखा था आपको खूंटे पर बैठते हुये। '

-' नहीं ..........।'

-' आपको जरूरत क्‍या थी अकेले ऐसे खूंटे पर जाकर बैठने की जिसमें पहले से ही छेद हो। आपलोगों को न अपनी चिंता है न समाज की। समाज की शांति भंग होती है। मीडिया वालों को मसाला मिल जाता है। आपको क्‍या है.........रो पिट कर चुप हो जायेंगी। जवाब तो हमें देना पड़ता है। अग्‍नि को ही साक्षी के लिए बुलाया जाता है। अच्‍छा आपको लाठी ने तो ठीक ही कहा फिर आप उस बेगुनाह को जलाना क्‍यों चाहती हैं। अकारण हिंसा तो अशास्‍त्रीय है। '

-' प्रश्‍न हिंसा या अहिंसा का नहीं है। प्रश्‍न है अपनी जिम्‍मेवारियों से भागने का। आपको लगता है कि वह अहिंसक है जो प्रति दिन सांप मारता है। मेरी चोंच में यदि बल होता तो वह मेरे इशारे पर नाचता। यह तो समाज का कछुआकरण है। '

-' अर्थात ! '

-' कछुए की तरह अपनी खोल में घुस जाना। क्षमतावान लोग भी इसी उम्‍मीद में हैं कि दूसरे लोग अपने कर्त्‍तव्‍य पूरे करें। उन्‍हें कुछ न करना पड़े। '

आग को क्रोध आ गया। उसके इगो को ठेस लगी। एक नन्‍हीं सी चिड़िया उससे विमर्श करे ! उसे यह भी आभास नहीं कि परम ज्ञानी अग्‍नि का विरोध किसी काल में किसी ने नहीं किया। उसने खिल्‍ली उड़ाते हुये कहा -

-' आप सर्वज्ञ हैं। प्रकांड विदूषी हैं। मैं भला अपकी क्‍या मदद कर सकता हूं ! मुझे क्षमा करें। '

चिड़िया ने वहां से उड़ने में ही भलाई समझी। उसको गुस्‍सा तो बहुत आ रहा था। बड़े आग बने फिरते हैं। न्‍याय-अन्‍याय की तमीज नहीं। समाज के पुरोधा हैं। मेरा दाना नहीं निकला तो किसी को छोड़ने वाली नहीं हूं। सबक तो सबको सिखा कर ही रहूंगी। उसने समुद्र के पास जाने की सोची। समुद्र यदि आग को बुझा दे.........। नहीं तो कम से कम धमकाये ही ,......तो हो सकता है कि आग लाठी की अक्‍ल ठिकाने लगा दे। लाठी सांप को और सांप बढ़ई को अपने कर्त्‍तव्‍यों की याद दिला दे। कमजोर की बात तो कोई ध्‍यान से नहीं सुनता। शक्‍तिशाली की हर बात सुभाषित है।

वह सागर तट पर पहुंच गई लेकिर सागर देवता के पास फुर्सत ही कहां से जो चिड़िया से मिल सकें। विदेशी व्‍यापरियों का एक डेलिगेट आया था। उसी की आवभगत में मशगुल थे। व्‍यापारी उनकी छाती पर चढ़कर, दूसरे देशों में जाना चाहते थे। सागर महाराज को मंजूर तो था लेकिन राशि अधिक मांग रहे थे। बिचौलिये और दलाल उनको समझाने में लगे थे। व्‍यापारी भी अपनी शर्त्‍तों पर अड़ गये थे कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गई तो कोई भी सागर के मार्ग से व्‍यापार नहीं करेगा। अंत में वार्त्‍ता सफल रही। व्‍यापरियों की सारी शर्त्‍ते मान ली गईं। चिड़िया तीन दिन से तट पर स्‍थित एक पीपल के पेड़ पर इंतजार कर रही थी। उसको मिलने का मौका ही नहीं मिला।

उसी पेड़ पर एक तोता इस तमाश्‍ो को देख और समझ रहा था। उससे जब नहीं रहा गया तो उसने चिड़िया से पूछ ही लिया। बदले में चिड़िया ने अपनी सारी संघर्ष कथा उसे कह सुनाई। सुनकर तोता देर तक हंसता रहा और चिड़िया उसका मुंह देखती रही।

-' तू भी बिल्‍कुल बावली है। अरी तेरे कहने से कोई तेरी मदद नहीं करेगा। किसी नेता को जानती है दिल्‍ली में। '

-' मैं तो सभी को जानती हूं। '

-' नहीं .....नहीं तुझे कोई जानता है।

-'.......................................।'

-' अच्‍छा , समुद्र तो तुझसे कभी नहीं मिलेगा। जब श्रीराम को तीन दिनों तक इंतजार करवा दिया था तो तुझे तीन जन्‍म भी लग सकते हैं। अब क्‍या करेगी ?'

-' मेरी जानपहचान का एक हाथी है उसे कहूंगी कि वह सागर के पानी को पीकर इसका अहंकार तोड़े। '

-' तो ठीक है। तू जब वहां जायेगी तो मैं एक फोन अपने ताये से करवा दूंगा। वह दिल्‍ली में एक नेता के यहां पिंजरे में रहता है। उसकी पहचान बहुत ऊपर तक है। '

चिड़िया अब निराश हो चली थी। तोते की बात भी उसे खोखली ही लग रही थी। मगर उसकी आशा को पंख लग गये जब वह हाथी के पास पहुंची। हाथी फूल माला लेकर पहले से ही तैयार था। उसने लंबी सलामी ठोकी और बोला -

-' जी आपके लिए दिल्‍ली से फोन आया था। समुद्र की ऐसी की तैसी। अभी के अभी मैं चलता हूं। वह समझता क्‍या है अपने आपको। दरअसल उसकी भी गलती नहीं है। उस बेचारे को क्‍या पता कि आपके मौसा संसद भवन में रहते हैं । '

हाथी तुरंत तैयार होकर समुद्र तट पर आया। उसने दलाल को एक खास किस्‍म का संदेश दिया। अगले पांच मिनट में राज समुद्र उपस्‍थित नजर आये। साथ में एक कीमती उपहार भी।

-' चिड़िया जी का स्‍वागत है। हमारे कर्मचारी इतने निकम्‍मे हो गये हैं। इन्‍होंने हमें आपके आने की सूचना ही नहीं दी। अच्‍छा हम आपकी क्‍या सेवा कर सकते हैं ? '

-' आग का गुरूर तोड़ना है। '

-' वह तो हमें देखते ही ठंडा हो जायेगा। उसे आपने बताया नहीं होगा कि आपके मौसा संसद भवन में रहते हैं नहीं तो बिना पानी के ही ठंडा हो जाता। चलिए , हाथी दादा को आप विदा कर दीजिये। आग के लिए तो मैं अकेला ही काफी हूं।'

आग तक यह खबर पहुंच चुकी थी कि पहले जो चिड़िया देवी आई थीं। वह कोई सामान्‍य चिड़िया नहीं हैं। उसके मौसा संसद भवन में रहते हैं । बेचारा, पहले से ही लाठी को नीचे डालकर जलाने की तैयारी में था। लाठी भी कांपे जा रहा था। वह बार-बार कसम खा रहा था कि उसे इस बात की बिल्‍कुल ही जानकारी नहीं थी कि चिड़िया देवी कौन हैं। नहीं तो एक सांप तो क्‍या, वह पूरी की पूरी प्रजाति ही सांपों की खत्‍म कर देता। आग की गर्मी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। इतने में वहां समुद्र राजा का भी आगमन हो गया। यह विहंगम दृश्‍य देखकर चिड़िया ने लाठी को क्षमादान दे दिया। वह सांप को सबक सिखाने के मूड में थी। सांप कम से कम बढ़ई को डसने की धमकी तो दे। ताकि वह दाल का दाना निकाले। लाठी को लेकर वह सांप के बिल के पास पहुंची लेकिन सांप वहां था कहां ? वह तो बढ़ई को काटने के चक्‍कर में, आज तीन दिन से उसको खोज रहा था। वह अपना मुंह भी चिड़िया देवी को दिखाने में संकोच कर रहा था। परिवार वालों से सारा हाल जानकर चिड़िया भागी हुई बढ़ई के घर पहुंची कि कहीं बेचारा मारा ही न जाये। बढ़ई अपने आंगन में बैठा थर-थर कांप रहा था। उसकी बुढ़िया बगल में बैठी उसे प्रवचन पिला रही थी। -क्‍या जाता था एक दाना निकालने में।......खूंटा ही चीरना था न। कोई पहाड़ तो नहीं काटना था। दस बार कहा कि इन नेताओं से पंगा मत लो। मानते ही नहीं। अब कटवाओ सांप से। ये सांप बिना काटे मानेगा नहीं। करोगे तो अपनी मर्जी की लेेकिन भुगतना तो पूरे परिवार को पड़ता है न। किसी का भी खूंटा हो तुम्‍हें क्‍या ? अभी बुढ़िया पंचम सुर की ओर पहला ही कदम रख पाई थी कि चिड़िया पहुंच गई। उसको देखते ही बूढा और डर गया। साथ में सांप और लाठी भी थे। सांप डसने के लिए आतुर हो रहा था। आते ही चिड़िया ने उसे समझाया

-' डरो मत , तुम्‍हें कुछ नहीं होगा। सवाल मेरे अन्‍न के दाने का है। खूंटे का चीर दो तकि मैं अपना दाना निकाल सकूं। मैं भूखी-प्‍यासी हूं। '

बढ़ई खुशी-खुशी चल पड़ा। चिड़िया भी खुश थी कि अब खूंटा चीर दिया जायेगा। दाना मिल जायेगा। अपना पेट भर जायेगा। क्रांति को पेटी में बंद कर दिया जायेगा। यह तो अच्‍छा हुआ कि नेताजी का नाम मिल गया। किसी ने पूछा नहीं कि कौन सा नेता है। काग-मंत्र काम आ गया। अभी पूरी टोली खूंटे के पास पहुंची भी नहीं थी कि गांव का सरपंच हाथ में चावल के दो कटोरे और दो बोरियां दाल के लेकर सेवा में उपस्‍थित हो गया। उसने झुक कर सलाम किया। चमचाुसलभ स्‍वर में बोला-

-' आदरणीया , आपकी सेवा मैं ग्राम पंचायत का सरपंच हिाजर है। वह खूटा मेरा ही है। मैंने आपकी दाल भी निकाल दी है। उसे तो जनता के दर्शनों के लिए रख दिया है। आखिर लोगों में यह पैगाम तो जाना ही चाहिए कि संघर्ष किसे कहते हैं। अपने हक की लड़ाई करना प्रत्‍येक जीव का धर्म है। आदमियों के लिए भी आप आदर्श बन गई हैं। आपके नाम पर हम एक विद्यालय की स्‍थापना करने वाले हैं-'चिड़िया देवी ग्राम विद्यालय। फिलहाल आप ये तुच्‍छ सी भेंट स्‍वीकार करें।

चिड़िया कटोरे से दाना निकाल कर खाने लगी। सरपंच ने धीरे से कहा -

-' मैडम, बड़ी कृपा होती आपकी यदि आपके संसद भवन वाले मौसा जी यदि मेरा एक काम करा देते.......। मेरा एक प्रपोजल अटका पड़ा है परिवहन विभाग के पास। एन ओ सी का मामला है। यदि आप मेरे लिए एक सिफारिश कर देती तो मैं आपका आजीवन आभारी रहता। आप जब चाहें जितना चाहें दाना आकर चुग सकती हैं। मेरे खेत आपके लिए ही हैं। मैं तो कहता हूं कि आप हमारे दरवाजे पर ही आम के पेड़ पर घोंसला बना लीजिये। कहीं और आने जाने की जरूरत ही क्‍या है। '

चिड़िया ने फोन करवाने का वादा किया और वहां से उड़ गई। इस बोधकथा से यह शिक्षा मिलती है कि कलयुग में नेता नाम कभी विफल नहीं होता। मानवमात्र को चाहिए कि एक अदद मौसा दिल्‍ली में जरूर रखे। पता नहीं कब किसकी दाल किसी खूंटें में फंस जाये।

 

शशिकांत सिंह 'शशि'

जवाहर नवोदय विद्यालय

शंकरनगर, नांदेड़ महाराष्‍ट्र

7387311701

skantsingh28@gmail.com

शशिकांत सिंह 'शशि'

पिता-स्‍व. रामाधार सिंह

माता- स्‍वर्गीया कांति सिंह

ग्राम-मड़पा मोहन

जन्‍म तिथि- 24.10.1969

पो- देवकुलिया

जिला-पूर्वी चम्‍पारण, बिहार

सम्‍प्रतिः-

जवाहर नवोदय विद्यालय

शंकरनगर, नांदेड़ 431736

महाराष्‍ट्र

 

प्रकाशनः-

1. समरथ को नहिं दोष (व्‍यंग्‍य संग्रह ,2001)

2. ऊधो! दिन चुनाव के आए (व्‍यंग्‍य काव्‍य 2005)

3. बटन दबाओ पार्थ 2013 व्‍यंग्‍य संकलन

4 प्रजातंत्र के प्रेत 2014 व्‍यंग्‍य उपन्‍यास

सम्‍मान-

हरिशंकर परसाई सम्‍मान (क्षितिज पत्रिका द्वारा ,2005 )

सिद्धिनाथ तिवारी व्‍यंग्‍यश्री सम्‍मान 2014 लीलावती फाउंडशन रांची द्वारा

सम्‍पर्कः-

मो- 07387311701 ई मेल

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

---प्रायोजक---

---***---

---प्रायोजक---

---***---

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1$h=100

प्रायोजक

--***--

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच कर पढ़ें : ~

|* कहानी * || * उपन्यास *|| * हास्य-व्यंग्य * || * कविता  *|| * आलेख * || * लोककथा * || * लघुकथा * || * ग़ज़ल  *|| * संस्मरण * || * साहित्य समाचार * || * कला जगत  *|| * पाक कला * || * हास-परिहास * || * नाटक * || * बाल कथा * || * विज्ञान कथा * |* समीक्षा * |

---***---



---प्रायोजक---

---***---

|आपको ये रचनाएँ भी पसंद आएंगी-_$type=three$count=6$src=random$page=1$va=0$au=0$h=110$d=0

प्रायोजक

----****----

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4082,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,341,ईबुक,196,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,262,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,112,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3038,कहानी,2273,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,542,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,102,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,346,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,68,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,29,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,244,लघुकथा,1265,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,19,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,327,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2011,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,712,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,800,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,18,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,89,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,209,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: शशिकांत सिंह की व्यंग्य कथा - खूंटे में दाल है
शशिकांत सिंह की व्यंग्य कथा - खूंटे में दाल है
http://lh4.ggpht.com/-wXSkYimOX8s/VB1EekHAU6I/AAAAAAAAam4/FVlPHHWAjxA/image_thumb.png?imgmax=800
http://lh4.ggpht.com/-wXSkYimOX8s/VB1EekHAU6I/AAAAAAAAam4/FVlPHHWAjxA/s72-c/image_thumb.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2014/09/blog-post_99.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2014/09/blog-post_99.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ