सुशील यादव का व्यंग्य - दांत निपोरने की कला

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दांत निपोरने की कला .... बहुत कम लोग इस कला के बारे में जानते हैं । और जो जानते हैं वे इसके मर्म को बताने के लिए सीधे –सीधे तैयार नहीं होत...

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दांत निपोरने की कला ....

बहुत कम लोग इस कला के बारे में जानते हैं । और जो जानते हैं वे इसके मर्म को बताने के लिए सीधे –सीधे तैयार नहीं होते ।

वे जानते हैं की इस कला के कदरदान बढ़ गए, तो उनकी पूछ –परख में कमी आ जायेगी ।

दांत का निपोरा जाना अपने-अपने स्टाइल का अलग-अलग होता है । घर के नौकर, पति ,आफिस के बाबू –चपरासी ,हेड क्लर्क , साहब ,बड़े साहब,संतरी-मंत्री सभी, अपने से एक ओहदे उचे वालों से, घबराते नजर आते हैं या परिस्थितिवश उनके सामने दंत-प्रदर्शन के लिए कभी न कभी बाध्य होते हैं ।

घबराहट में ,’एलाटेड’ काम के प्रति की गई लापरवाही से, जो बिगड़ा परिणाम सामने आता है उसी से कर्ता की घिघी बंध जाती है।

दन्त-निपोरन का बस इतना ही इतिहास है ।

इस विषय में आगे शोध करने वालो को बताये देता हूँ निराशा हाथ लगेगी ,वे ज्यादा अन्दर तक घुस नहीं पायेंगे। उनके गाइड उनको इधर उधर भटकाते रहेंगे औरर अंत में दांत को इस्तेमाल करते हुए आपसे कहेंगे कोई और सब्जेक्ट लेते हैं ,यहाँ स्कोप नहीं है ।

हाँ ये अलग बात है कि वे इतिहास के, दांत निपोरने वाले पात्रो या परिस्थियों पर, आपके ज्ञान में कुछ वृद्धी कर सकें ,मसलन शकुनी का पासा जब दुर्योधन के पक्ष में पड़ रहा था, तो पांडव हक्के-बक्के बगले झांक रहे थे ,सब कुछ हार के, जब दांत निपोराई की रस्म अदायगी होनी थी, तभी द्रोपदी-दु:शासन का चीर-हरण प्रकरण शुरू हो गया। सभासदों का ध्यान हट गया । कहते हैं ,हारे हुए जुआडियों को कोई फरियाद की जगह नहीं बचती ,अपील का कोई मौक़ा नहीं मिलता । वो तो द्रोपदी की पुकार थी जिसे आराध्य कृष्ण ने सुन ली, और लाज सभी की बच गई ।

उन दिनों ,“युद्ध न करना पड़े के लाख बहाने” जैसी किताब तब छपा नहीं करती थी।

हमारे हीरो ‘अर्जुन’, अपने सारथी कृष्ण को, तर्क देकर टाल नहीं पाए । उलटे प्रभु के तर्क उन पर हावी रहे । लगभग वे युद्ध-भूमि में हें` हें,~खी खी करके दांत निपोरने की अवस्था में पीछे हटने की रट लिए थे, मगर प्रभु-लीला ने बुध्धि फेर दी। युद्ध हुआ ,कौरव जीते और हमको पीढ़ी-दर पीढी पढने के लिए उपदेशों की हमको ‘गीता’ मिल गई।

सार संक्षेप ये कि उन दिनों युद्ध में पीठ दिखाना. भरी सभा में गिडगिडाना, घिघियाना या दांत- निपोरना अक्षम्य अपराध जैसा था । आजकल ये राजनीति कहाती है । इसके जानकार प्रकांड पंडित लोगों को चाणक्य की उपाधी से विभूषित होते भी देखा जाता है ।

वैसे अपवाद स्वरूप कुछ क्षत्रिय धर्म मानने वालों के लिए आज भी ये सब अपराध है। मगर कलयुग में ‘सब चलता है’ पर आस्था रखने वालों की कमी भी नहीं है । वे न केवल पीठ दिखा आते हैं, वरन पीछे पोस्टर भी टाँगे रहते हैं, हमें मत मारो हम कभी आपके काम आयेंगे ।

दूसरे शब्दों में ये कहना कि भाई ,हमारी मजबूरी है,कि सामने आपको चेहरा नहीं दिखा पा रहे हैं वरना दांत निपोर के खेद प्रकट कर आपका सम्मान रख देते ।

सतयुग के इन किस्सों को कुदेरने में एक और महाकाव्य लिख जाएगा । हमें मालूम है आप पढ़ नहीं पायेंगे ?

आज के एस एम् एस युग में, बस छोटे-मोटे किस्से ही चल सकते हैं बड़े किस्से पढने की फुर्सत किसको है ?सो बेहतर है कलयुग में लौटें चलें ....

रामू ,प्रेस करवा लाया ...?

-वो साब जी क्या है कि, बीबी जी ने मुझे एडी-घिसने का पत्थर मंगवा लिया था। पूरे बाजार में ढूंढ़ते –ढूंढ़ते थक गया ,कहीं न मिला ,इसी में आपका काम भूल गया ।

रामू के हाथ यकबयक कान खुजलाने में लग जाते हैं, जो इशारा करता है आइन्दा गलती नहीं होगी स्साब्जी...... ।

साहब ,मेम पर भडास निकालते हैं ,ये क्या...? कल बाहर के डेलीगेट्स आ रहे हैं....... तुम्हें एडी केयर की पड़ी है । ढंग से एक जोडी कपडे तैयार नहीं करवा पाती ?शाम खाने में क्या बना रही हो .....?करेला ....?कल मीटिंग है ना ....? बहुत तैयारी करनी है । रात-भर डाक्यूमेंट्स तैयार करने हैं ,करेला खा के ,करेला सा जवाब दिया तो अपनी तो कम्पनी बैठ जायेगी ?

मेम साब, साबजी के , इस चिडचिडाने वाले टेप को सिरे से खारिज कर देती हैं ।

~देखो आफिस का टेशन घर में तो लाया मत करो ।

वैसे कौन सा तीर मार लोगे अच्छे –अच्छे जवाब देके ?

प्रमोशन तो होना नहीं है ?

मल्होत्रा साहब को देखो ,साहबों के आगे खी-खी करके दांत काढ़ते रहते हैं ,सभी साहब खुश रहते हैं । चापलूसी तो आपको ज़रा सी भी आती नहीं । क्या घर क्या आफिस हर जगह ‘रुखंडे’ रहते हो । चेहरे में दो इंच मुस्कान लाओ मिस्टर..... सब काम बनाता नजर आयेगा ।

ओय रामू जा साहब के सूट को अर्जेंट में ड्राई-क्लीनर्स से प्रेस करवा ला (देखें क्या तीर मारते हैं,वाले अंदाज में )

-हाँ बताइये कौन –कौन ,कहाँ –कहाँ से आ रहे हैं ।

-उनके लंच –डिनर ,रुकने –ठहरने की अच्छी व्यवस्था है या नहीं ?

दुनिया के डेलीगेट्स लोग इन्हीं बातों से ज्यादा प्रभावित होते हैं ।

अपने ‘चाइना वाले स्टाइल’ को अमल में लाओ भई,देखा कैसा ‘ढोकला,पूरी छोले में निपटा दिया ?प्रेक्टिकल बनो .....। दुनियादारी इसी का नाम है ।

डेलीगेट्स का क्या है , पर्सनल काम होता है, वही निपटाने के लिए टूर पे आ जाते हैं । इन्सपेक्शन तो बस बहाना होता है समझे साब्जी....... ।

आपका प्लान, आपका प्रोजेक्ट, रात~रात भर घिस~घिस के तैयार किया डिस्प्ले कोई काम आने का नहीं........ । उनके पास आंकड़े –प्लानिग सब मौजूद रहता हैं,रट के आये रहते हैं ।

ये अलग बात है कि ,आपको काम में लगाए रखने की, यही ऊपर वालो की टेक्नीक होती है । वे काम न परोसेंगे तो आप लोगों की बुद्धि में जंग न लग जायेगी .... ..? ऐसा उनका मानना होता है ।

खाना खाईये ,मजे से सोइये ,सुबह –सुबह,आफिस पहुंचते ही कड़क गुड-मार्निंग बोलिए । वे आपके गुड-मार्निग बोलने के तरीके से भांप लेंगे कि आपकी तैयारी कैसी है। फिर चाहे आप उनके, किसी भी प्रश्न के एवज दांत निपोरें सब जायज ।

साबजी ,कल के लिए ,आई विश यू गुड लक......इत्मीनान से ...मजे से सोइए .....और हाँ ....

बड़े लोगों को, ऐसे लोग भी अच्छे लगते हैं जो अपनी कमजोरियों को छुपाते नहीं ,बत्तीसी निकाल के जग जाहिर कर देते हैं ।

चहरे पर हवाइयां उड़ते मातहत उन्हें अपने काम के आदमी लगते हैं ।

***

ये हर मिडिल क्लास घर के, रोजमर्रा की बातें हैं ।

पति,बड़े से बड़ा ओहदेदार हो, घर में उसकी क्लास पत्नियां ही लेती हैं ।

रहम वो बस इतना करती है कि, मुर्गा बना के उनका सामाजिक प्रदर्शन नहीं किया जाता ।

एक और फील्ड है जिसका जिक्र किये बिना, दांत-निपोरने वालों के आगे हमें दांत-निपोरना पड जाएगा ।

आजकल आप रोज टी वी में खुद देख रहे हैं । सरकार बनाने के लिए कैसे –कैसे जुगाड़ भिडाये जा रहे हैं ।

हमारे देश के कर्मठ लोग , कबाड़ में से काम की चीज बनाने में माहिर हैं । जुगाड़ के छकडे गाँव –देहात में मजे से चल निकलते हैं ।

इसी तर्ज में , कुछ बुजुर्ग कबाड़ी ,उन देहाती विधायको को तव्वजो देते दिख रहे हैं , जो कहीं मीडिया के एक प्रश्न झेलने के काबिल नहीं ।

नए-नए विधायक घेरे जा रहे हैं । घेरे जायेंगे ।

उनके लिए मीडिया के मार्फत ,प्रलोभन का पहाड़ खड़ा किया जाता है ।

ये कबाडिये, वो जुगाडिये होते हैं, जो कभी खुद मेट्रिक,बी ए, एम ए , पास न किये मगर आलाकमान के इशारों में ,बड़े-बड़े आई ए एस,आई पी एस को डांट पिला देते हैं ।

अपने आप को किग मेकर की भूमिका में फिट किये ये स्वयंभू नेता, उसी भाँति बहते हुए किनारे लगे हैं,जैसे बाढ़ में ,शहर का जमा कूड़ा करकट किनारे लग जाता है ।

चूँकि शास्त्र अनुसार, आत्मा अविनाशी है, विज्ञान अनुसार तत्व अविनाशी है अत; दोनों अविनाशी ,नष्ट होने से बचे रहते हैं ।

जनता से ऐसे झांसे-दार वादे कर लेते हैं ,जैसे ट्रेन में बिदाउट टिकट चलने वाला प्रेमी अपनी प्रेमिका से कर लेता है। ”मै तेरे लिए चाँद तोड़ लाऊगा” । सही मानो में अगर चाँद का एक पोस्टर भी ला के देने की हैसियत होती तो ट्रेन का टिकिट न लिया जाता ?

ये चूहे , क़ानून की हर उस लाइन को कुतर लेते हैं जो इनके मकसद के आड़े आता है ।

जिन्दगी भर कानून के दांव~पेचों को कुतरना इन चूहों की बाध्यता है। अगरचे,ये अपना दांत कुतरने में इस्तेमाल न करें या , बेवजह न घिसें तो , इनके दांत अनवरत बढ़ते रहेंगे ।

जो , खी-खी करने में बदसूरत,

स्माइल प्लीज के लिए एकदम बेकार और

निपोरने में नाम पर बेडौल नजर आयेंगे .....?

 

सुशील यादव

202 ,shaligram .Shrim srusthi

Atladara .SunPharma rd

Vadodara (guj) 390012

Mob :08866502244

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मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: सुशील यादव का व्यंग्य - दांत निपोरने की कला
सुशील यादव का व्यंग्य - दांत निपोरने की कला
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