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पुस्तक समीक्षा – किसनगढ़ के अहेरी

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किसनगढ़ के शोषण परंपरा की शिनाख्त डॉ. विजय शिंदे सृजनकर्ता सृजन क्यों करता है? साहित्य का उद्देश्य क्या है? यश, कीर्ति, मनोरंजन, रुपए कमाना...

किसनगढ़ के शोषण परंपरा की शिनाख्त
डॉ. विजय शिंदे

सृजनकर्ता सृजन क्यों करता है? साहित्य का उद्देश्य क्या है? यश, कीर्ति, मनोरंजन, रुपए कमाना, समाजहित करना या और कोई? अब साहित्य का क्षेत्र सीमित नहीं रहा है, उसमें परिवर्तन हो गए हैं। अनेक विधाएं और विधाओं के अंतर्गत कई प्रकारों में लेखन हो रहा है। उपन्यास विधा में चर्चित बना प्रकार आंचलिक उपन्यास। पाठक, समीक्षक के साथ हर एक को आह्वान करता आंचलिक उपन्यास। इसे बांचना, गुत्थियां सुलझाना, उद्देश्य को पकड़ना, लेखकीय पीड़ा की व्याख्या करना, भाषा के सौंदर्य का विश्लेषण करना, पात्रों के आत्मा की गुंज सुनना... आदि-आदि ‘चैलेंज’ बनकर अंतरबाह्य झकझोर देता है। वर्तमान हिंदी साहित्यकारों में, लेखन करने वाले आंचलिक लेखकों में अग्रणी लेखक के रूप में संजीव को पहचाना जाता है। इनका प्रत्येक उपन्यास आंचलिकता के अनछुए विषयों को लेकर उठता है और उस संसार की विड़ंबनाएं सामने रखता है। यह विड़ंबना उस गांव, आंचल, प्रदेश या किसी विशिष्ट क्षेत्र की होती है परंतु लेखकीय (आंचलिक लेखकों की) विशेषता यह होती है कि वह सीमित होकर व्यापक दर्शन कराती है। कृष्ण ने कुरुक्षेत्र पर खड़े होकर अर्जुन को विराट दर्शन कराए थे। आज प्रत्येक आंचलिक लेखक जीवन की दुर्गम युद्धभूमि पर खड़ा होकर मनुष्य के कई रूपों के दर्शन कराकर सोचने के लिए मजबूर कर रहा है। संजीव भी ‘किसनगढ़ के अहेरी’ उपन्यास से ‘देखिए, सोचिए और चेतिए का आह्वान’ करते हैं।

‘किसनगढ़ के अहेरी’ उपन्यास के माध्यम से संजीव ने भारत के प्रत्येक गांव और पिछड़े इलाके की शिनाख्त की है। यह शिनाख्त मात्र गांव या पिछड़े इलाके कि नहीं तो प्रकारांतर से पूरे देश की है। नवें दशक में प्रकाशित (1981) यह उपन्यास आजादी के बत्तीस-तैंतीस वर्षों के पश्चात् वाले शोषण परंपरा का इतिहास बताता है। हर कोई चंद रुपए, थोड़ी-सी ताकद या सत्ता के बलबूते पर ‘बाप’ बन जाने का एहसास जताने लगता है। मूलतः शोषक वर्ग नपुंसक है। विधायक कार्य या ठोस भूमिका अदा करने की ताकद उसमें नहीं है। वह रुपए, सत्ता और सामान्य लोगों को डरा-धमकाकर उनके पत्तल में परोसी रोटी की लूट करके अपने पुंसत्व का नारा लगाता है। लेकिन पुंसत्व तो उसी में है जो दोहित-शोषित बनकर संघर्ष का परचम उठाता है। इस उपन्यास में संजीव का उद्देश्य दोहित-शोषित-पीड़ित लोगों के संघर्ष की शिनाख्त करना है। आरंभ से अंत तक लेखक की इस उपन्यास में मौजुदगी है। वे किसनगढ़ के इतिहास का बखान करना चाहते हैं, "मैं हर रंग, हर ध्वनि, हर ‘बू’ और बिंदु-बिंदु, लकीर-लकीर जोड़कर शिनाख्त करना चाह रहा हूं किसनगढ़ की।" (पृ. 10) लेखक के शिनाख्त की आधारभूमि है – शोषण। इस उपन्यास में धर्म, जाति, अज्ञान, अर्थ, व्यवस्था, लिंग, सत्ता या पद आदि के आधार पर होने वाले शोषण का संजीव ने जिक्र किया है।

मनुष्य मूलतः मनुष्य है। उसका मूल धर्म मानवता है परंतु अक्सर ऐसा क्यों होता है कि वह मानवता को हाशिए पर छोड़कर जानवर बनता है। एक-दूसरे पर टूट पड़ता है, खून चुसता है। एक सिंहासन पर तो दूसरा जमीन पर, एक शोषक तो दूसरा शोषित। इस असंगति का कारण संपत्ति है। मनुष्य के विकास में सहायक संपत्ति होती है लेकिन आजकल सिर्फ देश में ही नहीं तो पूरी दुनिया में इंसानों का लक्ष्य यहीं संपत्ति (अर्थ) बन चुका है। इसके चलते इंसान अपना धर्म, रिश्ते-नाते, दायित्व सबकुछ भूल चुका है। और एक छलावे के पीछे दौड़ रहा है। पिछड़े इलाके, आंचलों और गांवों में शोषण का मूलाधार यहीं अर्थ रहा है। ‘किसनगढ़ के अहेरी’ उपन्यास में सबल पक्ष निर्बल पक्ष का आर्थिक शोषण कर रहा है। यह कार्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी शुरू है। लोगों को लगा था आजादी मिली है तो सभी को सुख-शांति-चैन मिलेगा। सुख-शांति-चैन किसे मिला? मोहभंग...! संजीव भगतसिंह की बात उठाते हैं, "आजादी किसके लिए कैसी आजादी? उनके लिए जो महलों में रहते हैं या उनके लिए जो दोहित-शोषित हैं? उस कंठ स्वर को बंद करने वाली ताकतों से समझौता करके जो आजादी हासिल की गई और उसका लाभ मक्कार लूट ले गए।" (पृ. 125) भगतसिंह के क्रातिकारी विचारों का डर अंग्रेजों को था? ...केवल अंग्रेजों को या देशी शक्तियों को, शोषक वृत्ति वाले लोगों को, जो आजादी के पश्चात् पूरी राजसत्ता हथियाने की ताक में बैठे थे, उन्हें? संजीव देश का यथार्थ सामने रखना चाहते हैं। भगतसिंह जैसे कई क्रांतिकारी वीरों का कंठ बंद करने वाली ताकतों के साथ ‘समझौता’ करके आजादी प्राप्त की गई, उसका लाभ तो मक्कार उठा रहे हैं। इन मक्कारों में धूल और मिठ्ठी के साथ नाता तोड़कर कुर्सियों पर, महलों में विराजमान प्रत्येक हिजड़ों का समावेश किया जा सकता है। ‘किसनगढ़ के अहेरी’ में रुपई सफेदपोश हिजड़े का प्रतिनिधि पात्र है। सभी गांव वालों का, कृषक, मजदूर और सामान्य जन का रुपई बनाम नेता शोषण कर रहा है। वह डरा-धमकाकर भ्रष्टाचार को शिष्टाचार मानने को मजबूर करता है। रुपई का कहना है, किसनगढ़ की सरकार वह स्वयं है – ‘हम जो कहेंगे, किसनगढ़ में वहीं होगा।’ अगर आज भी अंग्रेजों की दमनकारी भाषा सुनाई पड़ती हो तो सवाल यह उठता है कि क्या यहीं आजादी है? भगतसिंह ने भविष्यकालीन परिस्थिति की आहट शहीद होने के पूर्व सुनी थी, वह कितनी सही थी। संपत्ति, रुपए, सत्ता, पद आदि के पीछे पड़े नेतानुमा लोग देश को किस ओर ले जाना चाहते हैं। उनकी नीति ‘देश-दुनिया जले अपनी रोटी चले’ की है। यह सफेदपोश लोग अंग्रेजों का दूसरा रूप नहीं तो क्या है? इनकी नजरों में देश की एकता का कोई महत्त्व नहीं है। संजीव सिर्फ किसनगढ़ ही नहीं तो देश की दिशाहीनता और दयनीय स्थिति का वर्णन करते हैं, "परस्पर विरोध में बहती टकराती-जूझती कितनी-कितनी धाराएं हैं? सबको पाल रहे हो और गाते फिरोगे एकता की बात, दंगा हो गया तो गोली है ही। यह क्या सर्कस और अजायबघर बना रखा है देश को? किसनगढ़ तो फिर किसनगढ़ है मगर पूरा देश...?" (पृ. 100) संपत्ति, सत्ता और अपने सुख-सुविधाओं में लिप्त शोषक प्रवृत्ति के लोग निजी स्वार्थ में पूरे देश की व्यवस्था में धांधली पैदा कर रहे हैं। यह धांधली एक-न-एक दिन पूरे देश के लिए खतरा बन सकती है। अतः उपन्याकार का कहना है कि समय पर चेतिए। आर्थिक शोषण के दूसरे पक्ष पर भी संजीव प्रकाश डालते हैं, एक पक्ष होता है शोषक का और दूसरा होता है शोषित का। शोषक शोषण करता है परंतु विड़ंबना यह है कि शोषित व्यक्ति समय के साथ सघर्ष करके कभी तरक्की करता है तो वह भी अपनी औकात पर उतर आता है। वर्तमान परिस्थिति में शोषितों का लक्ष्य शोषण मुक्ति नहीं बल्कि शोषक बनना ही रहा है। उपन्यास में जय और चांदनी (जय की पत्नी) शोषितों को इकट्ठा कर शोषकों का विरोध करते हैं। अज्ञानी, मूढ़ और बिखरे समाज को इकट्ठा करना अग्नि-परीक्षा के समान है। जय और चांदनी के साथ शोषित-पीड़ित गांव वाले हैं पर उनमें आत्मविश्वास नहीं, उनमें भय और डर बैठा है, समय पर मुंह मोड़ते हैं। कलिका पंड़ित जय को गांव में कोई दलित, दोहित, शोषित न होने की बात कहता है। अर्थात् उनका मानना है कि सभी अपने-आप में श्रेष्ठ ब्राह्मण और क्षत्रिय हैं। उसकी इस बात और आत्मबल को काटते हुए जय कहता है, "यह आत्मबल यदि आपको हीनता की ग्रंथि से उबारकर परस्पर बराबरी और आदर के भाव पैदा करता तो बड़ी खुशी की बात होती, मुश्किल है इसका लक्ष्य इतना सीमित है कि यह सिर्फ आपको एक नया शोषक बनाकर छोड़ देगा।" (पृ. 115-116) समाज दिशाहीन बनकर स्वार्थ की बुनियाद पर टिका है। थोड़ी-सी तरक्की, शोषित प्रवृत्ति के लोगों में थोड़ा-सा सुधार हो जाए तो अपनों से निम्न वार्ग वाले लोगों का शोषण करने लगते हैं। अर्थ की ढूलमूल नींव पर बनाए गए समाज का यह महल महज एक छलावा है। अतः आवश्यक है कि इंसान को समानता की धरातल पर लाकर अर्थ की दीवारों को तोड़ना।

‘किसनगढ़ के अहेरी’ उपन्यास में संजीव ने आर्थिक शोषण के पश्चात् जातिगत् और धार्मिक शोषण का विवेचन किया है। इस शोषण का मूल आधार अर्थ ही माना जा सकता है क्योंकि अर्थ के लालच में आकर जाति और धर्म का पाखंड़ रचाकर शोषक वर्ग शोषण की परंपरा कायम रखे हैं। भारत जैसे देश में कई धर्म, पंथ, जाति, संप्रदाय देखे जाते हैं। भारत की एकता और इंसानियत को बनाए रखना है तो धर्म के विष को निकालना जरूरी है। परंतु इसके विपरीत जैसे-जैसे समय बितता जा रहा है वैसे-वैसे यह और भी अधिक फैलता जा रहा है। 1947 को एक बार विभाजन की त्रासदी को देश ने झेला है अब उसकी मानसिकता दुबारा इस स्थिति से गुजरने की नहीं है। कमलेश्वर ने ‘कितने पाकिस्तान’ में इसी संप्रदायवाद और धर्मवाद को उठाया है। एक सवाल, प्रश्नचिह्न प्रत्येक भारतीय के सामने आह्वान बने खड़ा है- ‘कितने पाकिस्तान?’ संजीव ने भी बरसों पहले इस उपन्यास में किसनगढ़ की चर्चा करते समय सवाल उठाया है, कितनी जातियां? कितने धर्म? कितना शोषण? हमारा हिंदुस्तान क्या बनना चाहता था, क्या बन गया? चंद स्वार्थी लोग थोड़े से रुपयों के लिए गरीब जनता और देश की नीलामी करने पर तुले हैं। ‘किसनगढ़ के अहेरी’ में ठेकेदार मंसूर और चमड़े के व्यापारी वृषभानु स्वार्थवश धार्मिक विष फैलाकर अपनी गोटियां बिठाते हैं। फकीर चाचा जय से इसी धार्मिक शोषण की बात करते हैं। "पहले यहां दाहा के वक्त ताजिया पर हिंदू औरतें पूजा करने और मातम मनाने आतीं। दशहरे और होली में हम लोग भूल जाते कि हम मुसलमान हैं। करीम को दाहा बनाने और रावण-मेघनाथ-कुंभकरण का पुतला बनाने में कोई फर्क नहीं महसूस होता था। लेकिन अहिस्ता-अहिस्ता सब क्या से क्या हो गया पहले अंग्रेजों ने लड़ाने की कोशिश की, फिर देशी बनिए और ठेकेदारों ने।" (पृ. 42-43) सामान्य शोषित लोग अज्ञानी और मुर्ख है। इसी का लाभ उठाकर अंग्रेज बने बनिए और ठेकेदार शोषण की परंपरा आगे चला रहे हैं। इनका कोई धर्म और मजहब नहीं है, जो भी है वह रुपैया है। शोषितों में धर्म का विश्वास घोलकर रुपए कमाना इनका धर्म है। धार्मिक शोषण को जोड़कर जातिगत शोषण भी आता है। उपन्यास का प्रमुख पात्र जय और उसकी पत्नी जाति व्यवस्था के बंधनों को तोड़कर शोषितों को जगाने की कोशिश करते हैं। जय ब्राह्मण होकर निम्न जाति की युवती से शादी करता है, निम्न जाति वाले लोगों का ढाढ़स बढ़ाता है, दिशा दिखाता है, उनमें चेतना लाने का प्रयास करता है। वह निम्न जाति वालों के मन से सवर्ण का डर निकालने के लिए उनके घर में चाय-पानी से परहेज नहीं करता है परंतु अज्ञानी-मूढ़-शोषित लोग इसमें भी सवर्ण की कोई चाल होगी ऐसा अंदेशा व्यक्त करते हैं। चाहे कुछ भी हो एक सत्य प्रबल होते जा रहा है, देश आगे बढ़ रहा है, विकास कर रहा है और शिक्षित लोग समझने लगे हैं कि धर्म-जाति को लेकर अब जीया नहीं जा सकता। इंसान बिना धर्म-जाति के इंसान रह सकता है तो फिर इस पाखंड़ की क्या आवश्यकता? संजीव ने इस उपन्यास में इसी तर्क का विश्लेषण किया है। कालू नामक निम्न जाति का पात्र वेशभूषा और रहन-सहन में किसी ब्राह्मण से कम नहीं। बाहर वाले और अपरिचितों को वह ब्राह्मण और ठाकुर ही लगता था और वे उसे प्रणाम तक करते थे। कालू के विचारानुसार समर्थ लोगों की जाति और धर्म नहीं होता है। उसका कहना है, "आदमी की सभ्यता में इतनी उथल-पुथल हुई कि कौन माई का लाल कह सकता है उसका खून शुद्ध है। और सायंस कहता है कि दोगला ही सबसे अच्छी नस्ल है।" (पृ. 116) अर्थात् जैसे-जैसे मनुष्य विकास के पादानों को पार कर रहा है वैसे-वैसे उसके सिर से भगवान का डर दूर हो रहा है, उसी तरह धर्म और जाति के खोखलेपन से भी वह वाकिफ होते जा रहा है। अब धर्म-जाति, उच्च-निचता, खून की शुद्धता आदि को आधार बनाकर शोषण करना हो तो शोषक प्रवृत्ति वाले आदमी को अपनी गिरेबान में झांकना पड़ेगा। जब वह अपनी नस्ल में खोट पाएगा तब जातिगत शोषण की व्यवस्था बिखर-सी जाएगी।
आम आदमी का व्यवस्था द्वारा शोषण हो रहा है। व्यवस्था सेवा हेतु अधिकार, पद तथा कुर्सी देती है और उसका गलत प्रयोग होता है। अधिकार पाने वाले व्यक्ति की हालत मुर्गे के समान होती है, उसे लगता है कि मेरे बांग के बिना सूरज का आगमन नहीं होगा। वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में मुर्गे बने छोटे अधिकारी से लेकर बड़े-बड़े अधिकारी अवैध मार्ग से सामान्यों का शोषण कर रहे हैं। पुलिस, ठेकेदार, दलाल, बनिया, पटवारी, नेता, कुर्सीधारी और हर पूंजीपति गरीबों का शोषण करना अपना अधिकार समझते हैं। उदयभान तिवारी, इनरपति सिंह, फौजदार सिंह, रुपई सिंह, ब्रह्मचारी जी, रामबुझावन यादव आदि शोषक वर्ग के प्रतिनिधि पात्र समय के साथ परिवर्तन कर अपनी शोषण परंपरा को बनाए रखते हैं। रुपई तो ऐसा नेता है जिसके सामने जिलाधीश और एस. पी. की स्थिति भी कुत्ते के समान है। उपन्यास में शोषण का विरोध करने वाले अकेले पात्र जय का मानना है कि शोषक शक्तियां नष्ट नहीं होती, बस, उनका रूप बदलता है। उसका कहना है, "अंग्रेज नहीं है, मगर शासन करने का सपना पाने वाले ‘नव अंग्रेज’ तो है। वहीं जगह है, वहीं मुकाम। सिर्फ वक्त के सूरज ने उन गोरे चेहरों को तनिक काला कर डाला है।" (पृ. 71) भगतसिंह ने इसी बात के लिए आवाज उठाई थी, आजादी किसके लिए? कैसी आजादी? आजादी गरीबों के लिए नहीं है, आजादी शोषकों के लिए है! उन्हें स्वतंत्रता है, वे जैसे चाहे देश की लूट कर सकते हैं, ऐशोआराम की जिंदगी बिता सकते हैं। आज भी ऐसे कई पिछड़े आंचल, पहाड़ी इलाके और जनजातियां हैं जिन्हें आजादी किस झाड़ की पत्ती है, मालूम नहीं। उद्वेलित, पीड़ित, दोहित, शोषित व्यक्ति को अगर पूछा जाए तो वह सहजता से कहता है कि इस आजादी से कहीं अधिक अच्छा समय अंग्रेजों का था। गरीबी हटाव, चकबंदी, आपात्कालीन स्थिति, नसबंदी और इस कालखंड़ में किया गया अन्याय-अत्याचार आज भी लोगों के मन में आक्रोश उत्पन्न करता है। इन सभी बातों का चित्रण उपन्यास में है, अतः आपात्काल की धांधली का लेखा-जोखा भी इस उपन्यास को माना जा सकता है। उपन्यास में पुलिस के अन्याय का एक उदाहरण द्रष्टव्य है। राजा मुसहर को बिना वजह ऊंट से नीचे खिंचकर गंदी-गंदी गालियां दी जाती है, जिसे सुनकर आम आदमी का मन भी घृणा से भर जाता है। "साले बिजली इस देश पर गिरी तो तू क्या जिंदा रहेगा। इस देश के लिए महात्मा गांधी, जवाहरलाल ने कितनी कुर्बानी दी तब जाके आजाद हुआ। साले चले बहन चो.. मादर चो... साजिश करते हैं, जनता और सरकार के खिलाप... ऊ... क्या कहे धर्म के खिलाप! छो-छोटा मुंह बड़ी बात! ब-ब बाप पादने न जाने पूत शंक बजावै। जो ससुर ऐसा करेगा, ठट्ठ ठंड़। कर देंगे – हां। पु-पुलिस अपने बाप की नहीं होती!" (पृ. 121) इस तरह के अन्याय अत्याचार करने वाले पुलिस वालों को गांधी, नेहरु या अन्य देशभक्तों के नाम लेने का अधिकार है? मुसहर जैसा सामान्य शोषित आदमी किस प्रकार का देशद्रोही कार्य करेगा? उसे सरे आम गाली-गलौच करना मुनासिब है? प्रशासन व्यवस्था और अधिकारी वर्ग को लेकर कई सवाल उठते हैं। चारों ओर अंधेरगर्दी है और इसके विरोध में आवाज उठाना, संघर्ष करना, अपना हक मांगना अपराध माना जाता है। ‘किसनगढ़ के अहेरी’ उपन्यास इसी अधिकारी वर्ग के शोषण परंपरा का पर्दापाश करने की सफल, सार्थक पहल है।

समाज का आधा हिस्सा स्त्रियों से बना है परंतु उन्हें इतिहास में कभी सम्मान नहीं मिला। जहां पर सम्मान मिलने या देने की बात कही जाती है वह मात्र झूठ और मिथ्या है। चंद महिलाओं को दिया गया सम्मान संपूर्ण स्त्री जाति का नहीं माना जा सकता। समाज की अधिकांश महिलाओं का दोहन और शोषण हो रहा है। नारी शोषण का भयावह रूप उनके शारीरिक शोषण में देखा जा सकता है। आजादी के पूर्व, आजादी के पश्चात्, नवें दशक नहीं तो आज भी महिलाओं का शारीरिक शोषण हो रहा है। संजीव ने प्रस्तुत उपन्यास में राधा, सोना, रतिया और चांदनी जैसे स्त्री पात्रों के यथार्थ को सामने रखकर शारीरिक शोषण की बात उठाई है। ‘किसनगढ़ के अहेरी’ की यह चार महिलाएं प्रातिनिधिक शोषण का स्वरूप स्पष्ट करती है। वर्तमान में मनुष्य अपनी नैतिकता को खो चुका है, जहां भाई-बहन और बाप-बेटी के रिश्ते को ताक में रखा जा रहा है वहां अन्यों की बात करना भी मुनासिब नहीं है। उपन्यास में विधवा राधा के शरीर की लूट मामा करते हैं और विड़ंबना यह है कि यह मामा ब्रह्मचारी है। कलिका पंड़ित ने राधा की करुण कहानी और गोमती नदी में पड़ी उसकी लाश का वर्णन सुनाया था। "महान् हिंदू धर्म के इन आधार स्तंभों ने छोड़ा नहीं रधिया को। उस एक राधा के सामने कितनी-कितनी धोतियां खुल चुकी है, बताया था कलिका पंड़ित ने।" (पृ. 15) कितने लोगों ने राधा की मजबूरी का लाभ उठाकर दोहन-शोषण किया इसकी गिनती नहीं। उसके गोरे, मांसल, मुलायम बदन को कंकड़, पत्थर, मिट्टी, घास, अंधेरे में और न जाने कहां-कहां कुचला होगा। राधा, रतिया और सोना सभी की एक ही दशा है। ब्रह्मचारी, ज्योतिषी, ठाकुर, जमींदार, पुलिस, नेता और हर पूंजीपति मजबूर महिलाओं के साथ बलात्कार कर रहा है। महिलाएं शिक्षित हो रही है, जाग्रत हो रही है, अन्याय-अत्याचार शोषण के विरोध में आवाज उठा रही है परंतु क्या यह आवाज उठाने वाली महिलाएं सुरक्षित मानी जा सकती है? उपन्यास में चांदनी अपने पति जय के साथ अन्याय-अत्याचार-शोषण का विरोध करती है लेकिन उसके साथ घटित घटना भी भयानक है। पति के सामने उस पर बलात्कार किया जाता है। "शायद यहां पर कसकर बांधा गया होगा जय को, वहां रोता पड़ा होगा चार महिने का शिशु और वहां... या शायद वहां चल रही होगी पाशविक लीला सामूहिक बलात्कार की। इसी खाट पर से छटपटाता हुआ देख रहा होगा जय का वजूद अपनी पत्नी की लूटती अस्मात को।" (पृ. 161) इस दृश्य और घटना में कितनी बड़ी भयानकता है। उस चार महिने के बालक के लाल होठों से फूटा हुआ आक्रोश, जय का रूंधा हुआ कंठ ओर पाशविकता से रौंधा गया चांदनी का शरीर आज भी शोषण के विरोध में आवाज उठा रहा है। पूरे उपन्यास में जय और चांदनी ऐसे पात्र हैं कि जो समाज को जाग्रत करने के लिए कृतसंकल्प है। अंततः उन्हें भी शिकार बनाया जाता है। शहरों में नारी मुक्ति आंदोलन (आड़ंबर!) चलाया जाता है, क्या उनके कानों तक राधा, सोना, रतिया और चांदनी जैसी शोषित स्त्रियों की आवाजें पहुंच रही है? नारी मुक्ति आंदोलन का आड़ंबर अब गांवों में भी किया जा रहा है परंतु "यहां गांव में आते ही उनकी साड़ी मैली होती है? मेकअप खराब होता है?" (पृ. 69)
उपन्यास में शोषण के कई प्रकार और घटनाएं देखी जा सकती है। परंतु इसमें मात्र शोषण नहीं इसका दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष शोषण विरोधी चेतना का है। जय और जय की पत्नी चांदनी शोषण विरोधी चेतना से जाग्रत होकर किसनगढ़ में आवाज उठा रहे हैं। इन दोनों के साथ और एक शख्स है जो इनको सहायता प्रदान करता है, वह स्वयं लेखक संजीव है। वे उपन्यास में आदि से अंत तक उन दोनों के सहयोगी बन ताकत प्रदान करते हैं। लेखक जय के साथ अक्सर बातचीत और सलाह-मशवीरा करते हैं। एक जगह पर वे इस अभियान का उद्देश्य पूछते हैं तब जय बताता है कि विध्वंसात्मक शक्तियों को सृजनात्मक मोड़ देना है। अर्थात् रुपई, हरिया, चंदर, कलुआ और अहेरियों की जो नई पीढ़ी है उन्हें ‘युटिलाईज’ करना तथा ‘जड़’ इनरपति से लेकर मटरू तक को ‘चेतन’  करना जय का लक्ष्य है। जय साम्राज्यवादी, उपनिवेशवादी, सामंतवादी और पूंजीपति शक्तियों का विरोध करता है। जय का मानना है कि हमारे अपने देश और दुनिया के अन्य मुल्कों में मानवीय स्वतंत्रता की लड़ाई चल रही है, उस लड़ाई की इकाई बन योगदान देना हमारा कर्तव्य है। जय अन्य लोगों के जाग्रत न होने पर कहता है, "हवा में आपका-हमारा समाज है। मैं अहेरियों के गांव की परंपरा बदलने को कृतसंकल्प हूं, निशाना निर्बोध जीवों पर नहीं शोषकों पर बदल देना मेरा लक्ष्य है। एक भी आदमी मेरा साथ दे या न दे।" (पृ. 148) जय अभिमन्यु की भांति अकेले चक्रव्यूह तोड़ने जा रहा है। वह शोषण की समरभूमि में सफलता हासिल भी करने लगता है लेकिन विध्वंसकारी शक्तियां अकेले जय पर निशाना साधे खड़ी है। चारों ओर से जाल बिछाया जाता है। उसे खाट को बांधकर उसके सामने पत्नी चांदनी पर बलात्कार होता है, आक्रोश करता निहत्था अभिमन्यु क्रुरता के साथ किसनगढ़ में शहीद होता है। लेखक को यह खबर जब कलकत्ते में मिलती है तब उनके सामने किसनगढ़ का पूरा इतिहास खड़ा होता है। जय की क्रांति पताका की चिंता उन्हें भी सताने लगती है। वे किसनगढ़ में पहुंचकर चांदनी के हालचाल पूछकर कहते हैं, ‘अब यहां पर क्या करोगी? असुविधा हो तो मेरे साथ शहर चलो।’ जय को अपने भीतर जिंदा रखी चांदनी निर्णायक और नकारात्मक उत्तर देती है, "अब हममें से कोई नहीं जाएगा कहीं। उनके पास साधन है। करते रहें दमन, मगर हम अब नहीं रुकने वाले। हमारी लड़ाई अब चल निकली है, हमारे मौत के बाद भी नहीं रुक सकती।" (पृ 165) दुर्गा का प्रतिरूप चांदनी अब अग्नि बनकर धधक रही है। वह अन्याय-अत्याचार-शोषण के प्रति ठोस भूमिका अदा करने के लिए संकल्परत है। चांदनी जो भूमिका बजाती है वह भूमिका उपन्यास में आई अन्य दो शिक्षित नारियां पुष्पलता और दुलारी भी बजा सकती थी या कम-से-कम सहयोग देकर शक्ति तो बढ़ाती, परंतु ऐसा नहीं होता है। उनके जैसी शिक्षित महिलाएं अपनी सुविधाएं, मेकअप और एक अच्छा-खासा-तगड़ा वर ढूंढ़ना पसंद करती है। सवाल यह उठता है कि शोषितों की लड़ाई का ठेका क्या जय और चांदनी ने ही लिया है? बाकी शिक्षित जन क्या मुर्दे-नपुंसक है? निष्कर्षतः संजीव इनके उदाहरण द्वारा सभी शोषितों में चेतना लाने का प्रयास कर रहे हैं। अब अपनी लड़ाई हमें ही लड़नी है।

दुनिया बड़ी जालिम है। इसमें सीधे, सरल और प्रामाणिक व्यक्ति को कोई पूछता नहीं है। अतः यह उचित नहीं कि सभी डाकू, गुंड़े चोर और बदमाश बने। असत्य का पलड़ा थोड़ा-बहुत क्यों न भारी हो आखिरकार जीत सत्य की ही होगी। दुनिया बदल रही है, परंपराएं बदल रही है और शोषण का जो चक्र चल रहा है उसमें भी परिवर्तन आएगा। लोग शिक्षा से चेतित बन रहे हैं, वे अपने हक और कर्तव्य के प्रति सजग हो रहे हैं। शोषक प्रवृत्ति वाले लोगों को शोषण करने के पूर्व आज चार बार सोचना पड़ता है, कल सौ बार सोचना पड़ेगा। संजीव ने ‘किसनगढ़ के अहेरी’ उपन्यास में किसनगढ़ के इतिहास और वहां की शोषण परंपरा का यथार्थ प्रस्तुत किया है। उन्होंने आर्थिक, धार्मिक, जातिगत, व्यवस्थागत, अधिकारी वर्ग और नारी शोषण की शिनाख्त कर किसनगढ़ में चल रहे दमनचक्र का रेखांकन किया है। सवाल यह उठता है कि यह दुःख-दर्द, दोहन-शोषण, अन्याय-अत्याचार किसनगढ़ का है; हमारा उसके साथ क्या ताल्लुक? ताल्लुक है, गहरा ताल्लुक है। यह किसनगढ़, किसनगढ़ नहीं; हिंदुस्तान है। यह दमन चक्र सिर्फ किसनगढ़ में नहीं तो पूरे हिंदुस्तान में शुरू है। संजीव की सफलता इसी में है कि उन्होंने ‘किसनगढ़ के अहेरी’ के माध्यम से पूरे हिंदुस्तान में चल रही शोषण परंपरा की शिनाख्त की है। आंचलिक उपन्यास की परंपरा में योगदान देने वाले सफल सृजक संजीव ने यह उपन्यास शोषणविहिन समाज की कल्पना करने वाले शहीद साथी सूर्यनारायण शर्मा को समर्पित किया है। जय का शहीद होना, लड़ाई का विकास है और उसकी प्रखरता का संदेश है। शोषक प्रवृत्ति वालों को जय की मृत्यु के पश्चात् राहत मिली होगी परंतु उनका इस तरह सोचना अज्ञान रहेगा क्योंकि उसका शहीद होना शोषकों की परंपरा में सुरंग लगाने के समान है।

समीक्षा ग्रंथ –
किसनगढ़ के अहेरी (उपन्यास) – संजीव, प्रकाशन मीनाक्षी पुस्तक मंदिर, नई दिल्ली.
प्रथम संस्करण - 1981, पृष्ठ - 129, मूल्य – 59 ₹

डॉ. विजय शिंदे
देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र)
ब्लॉग -  साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

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रचनाकार: पुस्तक समीक्षा – किसनगढ़ के अहेरी
पुस्तक समीक्षा – किसनगढ़ के अहेरी
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