महावीर सरन जैन का आलेख - मानव भाषा का निर्माण एवं विकास

SHARE:

मानव भाषा का निर्माण एवं विकास प्रोफेसर महावीर सरन जैन जिस प्रकार बहुत से पशु-पक्षी आवाज़ों के द्वारा संप्रेषण करते हैं उसी प्रकार आदिम ...

मानव भाषा का निर्माण एवं विकास

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

जिस प्रकार बहुत से पशु-पक्षी आवाज़ों के द्वारा संप्रेषण करते हैं उसी प्रकार आदिम अवस्था में मनुष्य भी प्राकृत एवं सहज अनिच्छायत्त (Involuntary) आवाज़ों के द्वारा ही संप्रेषण करता होगा। इस संदर्भ में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि मनुष्य इन सहज स्नायविक आवाज़ों से भिन्न ‘भाषा’ का निर्माण करने में किस प्रकार समर्थ हो सका ? भाषाविज्ञान में भाषा से अर्थ मानव भाषा से ही लिया जाता है। चॉम्स्की ने यह प्रतिपादित किया है कि केवल मनुष्य में ही अन्तर्जात गुण होते हैं जिसके कारण वह जिस भाषा-परिवेश में पलता और बड़ा होता है, उस भाषा को सीख लेता है। पशु पक्षी कुछ ध्वनियों का उच्चारण करना तो सीख लेते हैं किन्तु भाषा नहीं सीख पाते।

सन् 1960 ईस्वी तक के भाषावैज्ञानिक भाषा पर विचार करते समय भाषा की उत्पत्ति के सिद्धांतों पर बहस करते रहते थे। जब हम सन् 1958-59 में हिन्दी में एम. ए. की उपाधि के लिए अध्ययन कर रहे थे, भाषाविज्ञान के पाठ्यक्रम का आरम्भ ´भाषा की उत्पत्ति' से होता था। भाषा की उत्पत्ति के विभिन्न मत अथवा सिद्धांत पढ़ाए जाते थे। ये थे –

1. देवी उत्पत्ति का सिद्धांत

2. अनुकरणमूलकता का सिद्धांत

3. अनुरणनमूलकता का सिद्धांत

4. मनोराग व्यंजक शब्द मूलकता का सिद्धात

5. श्रम परिहरण मूलकता का सिद्धांत

6. धातु सिद्धांत

7. सामाजिक निर्णय मूलकता का सिद्धांत

उपर्युक्त सिद्धात भाषा की उत्पत्ति की प्रामाणिक एवं वैज्ञानिक व्याख्या नहीं कर पाते। देवी उत्पत्ति का सिद्धांत केवल अंध श्रद्धा पर आधारित है। बच्चा भाषा सीखने के अन्तर्जात गुण लेकर भले ही जन्म लेता हो मगर वह कोई भाषा लेकर पैदा नहीं होता। जिस भाषा-समाज में उसका पालन पोषण होता है वह उस समाज की भाषा अर्जित करता है। अनुरणन के आधार पर कुछ शब्दों की व्युत्पत्ति मानी जा सकती है। संसार की भाषाओं में अनुकरणमूलक शब्द मिलते हैं। उदाहरण के लिए बिल्ली के लिए 'म्याऊँ´, कुत्ते के भौंकने के लिए 'भौं भौं´। मगर इस प्रकार के शब्दों की संख्या बहुत सीमित होती है। अनुरणनमूलक शब्दों की संख्या भी बहुत सीमित है। उदाहरण के लिए इस सिद्धांत के प्रवर्तक प्रतिपादित करते हैं कि पेड़ से कोई डाली गिरी होगी तो 'खट´ की आवाज हुई होगी अथवा लकड़ी में आग लगी होगी तो 'चट´ की आवाज हुई होगी और इन आवाजों के आधार पर मनुष्य ने 'खटखटाना´ तथा 'चटकना´ जैसे शब्द बनाए होंगे। इन दोनों सिद्धांतों की सीमा के बारे में आगे अपेक्षाकृत अधिक विस्तार से चर्चा की जाएगी। मनोराग व्यंजक शब्द के सिद्धांत के प्रवर्तकों का दावा है कि आवेश, विस्मय, हर्ष, पीड़ा आदि मनोभावों को व्यक्त करने के लिए ध्वनियाँ सहज रूप से निकल जाती हैं। चिल्लाने की आवाज, अट्टहास की आवाज के आधार पर निर्मित शब्द इसके उदाहरण हैं। श्रम परिहरण मूलकता के सिद्धांत के प्रवर्तक कहते हैं कि जब व्यक्ति मेहनत का काम करते हैं तो उनके मुख से अनायास आवाज निकल जाती है। बोझा उठाने वाले मजदूर, डोली ढोने वाले कहार, कपड़ो को पत्थर पर मार मारकर धोने वाले धोबी, गाँवों में चक्की पर आटा पीसने वाली महिलाएँ आदि के द्वारा अपने श्रममूलक कार्यों को सम्पन्न करते समय निकलने वाली आवाजें इसके उदाहरण हैं। इस सिद्धांत के मानने वालों का दावा है कि इन आवाजों के आधार पर शब्दों का निर्माण हुआ। धातु सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले जर्मन विद्वान प्रोफेसर हैज ने किया। इनके बाद भारोपीय-परिवार की संस्कृत, ग्रीक एवं लैटिन आदि भाषाओं के आधार पर मैक्समूलर ने प्रतिपादित किया कि मनुष्य ने 400- 500 धातुओं का निर्माण किया और बाद में इन्हीं धातुओं से शब्दों का विकास हुआ। इस मत को आगे बढ़ाने का काम अलैक्जेन्डर जॉन्सन ने किया। भारोपीय परिवार की आदिम भाषा पर विचार करते हुए उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की विभिन्न उच्चारण-स्थानों से निकलने वाली ध्वनियों से आरम्भ होने वाली धातुओं में अर्थ संगति मिलती है। उदाहरण के लिए उन्होंने प्रतिपादित किया कि जिन धातुओं का आरम्भ ओष्ठ्य ध्वनियों से होता है उनसे बनने वाले शब्दों का अर्थ बोलना, दबाना, बाहर निकालना होता है। इसी प्रकार जिन धातुओं का आरम्भ दन्त्य ध्वनियों से होता है उनसे बनने वाले शब्दों का अर्थ स्पर्श करना, ग्रहण करना, फैलना होता है।

उपर्युक्त सभी सिद्धांतों की सीमाएँ हैं। कुछ सिद्धांत भाषाओं के कुछ सीमित शब्दों के निर्माण की प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हैं। धातु सिद्धांत तथा इस सिद्धांत को विकसित करने वाले विद्वानों ने केवल भारोपीय परिवार की कुछ भाषाओं के आधार पर अपने सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। संसार की समस्त भाषाओं में धातु मूलक क्रियाओं के लिए हमें समान शब्द प्राप्त नहीं होते।

सामाजिक निर्णय के सिद्धांत के प्रवर्तकों का मत है कि सामाजिक निर्णय से भाषा की सृष्टि हुई। समाज के सदस्यों ने मिलजुलकर किसी वस्तु को कोई नाम दे दिया और वह शब्द उस वस्तु का वाचक बन गया। यह सिद्धांत अन्य मतों की अपेक्षा संगत है। इससे शब्द एवं अर्थ के सम्बंध की यादृच्छिकता पर प्रकाश पड़ता है।

प्रस्तुत लेख में हम इस सम्बंध में विचार करेंगे कि मनुष्य ही भाषा का निर्माण एवं विकास करने में किन कारणों से समर्थ हो सका। हम "भाषा की उत्पत्ति" के सीमित एवं अधिकांशतः काल्पनिक सिद्धांतों के स्थान पर "भाषा के निर्माण एवं विकास" पर विचार करेंगे।

मानव जाति में प्राकृत प्रवृत्तियों की अपेक्षा अर्जित प्रतिभा अधिक होती हैं। मानव जाति ने इन्हीं अनुकरण और प्रयोग की प्रवृत्तियों के कारण खाना बनाना और पेट भरना, घर बनाना और बसना, कपड़ा बनाना और पहनना सीखा। विश्व में प्रत्येक जाति के खाने, कपड़े और आवास की अपनी निजी विशेषताएँ होती हैं, किन्तु फिर भी यदि हम चाहें तो उनसे वस्तुगत तादात्म्य कर सकते हैं।

‘भाषा’ सीखने की इच्छा करने से नहीं, ‘सीखने’ से आती है। इसका आधार अधिक मानसिक, अमूर्त, निजी एवं कुशल-अभ्यास-परक होता है। मैं हिन्दी बोलता हूँ, दूसरा व्यक्ति तमिल बोलता है। ऐसी स्थिति में मुझे यदि पहले से तमिल भाषा नहीं आती तो मैं न तो तमिल भाषा समझ सकता हूँ और न बिना अभ्यास के उसे सीख सकता हूँ।

मनुष्य ने जब समाज में रहना सीखा होगा तथा किसी वस्तु को उसके प्रतीक रूप शब्द से पुकारने की प्रक्रिया अपनाई होगी, उसी दिन उसने भाषा निर्माण की नींव रखी होगी। इस प्रकार भाषा के शब्द सहज स्नायविक नहीं है। इनकी निर्मिति का रहस्य व्यक्ति के द्वारा उच्चरित रूपों की परम्परित अभिव्यक्ति तथा समाज के अन्य सदस्यों की उन्हें उसी परम्परित अर्थ में ग्रहण करने की स्वीकृति में निहित है। एक बच्चे के द्वारा निर्मित शब्द आज भी इसी प्रक्रिया से उस समाज के भाषा कोष के अंग बन जाते हैं। हार्न की ध्वनि को किसी बच्चे ने ही बार-बार ‘पों-पों’ से पुकारा होगा तथा उनका यह परम्परित उच्चारण ही समाज में स्वीकृति पाकर सामाजिक संप्रेषण का वाहक बना होगा।

यह बात पहले कही जा चुकी है कि जिस प्रकार बहुत से पशु-पक्षी आवाज़ों के द्वारा संप्रेषण करते हैं उसी प्रकार आदिम अवस्था में मनुष्य भी प्राकृत एवं सहज अनिच्छायत्त (Involuntary) आवाज़ों के द्वारा ही संप्रेषण करता होगा। इस संदर्भ में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि मनुष्य इन सहज स्नायविक आवाज़ों से भिन्न ‘भाषा’ का निर्माण करने में किस प्रकार समर्थ हो सका ? इस सम्बन्ध में मनुष्य की सामाजिक जीवन की आवश्यकता एवं प्रतीकात्मकता का विकास करने की क्षमता के अतिरिक्त मनुष्य एवं मनुष्येतर प्राणियों की शारीरिक बनावट (ध्वनि उच्चारण के अवयव एवं श्रवण क्षमता) एव मानसिक विकास के सम्बन्ध में विचार करना भी प्रासंगिक एवं सार्थक है।

मनुष्य एवं मनुष्येतर प्राणियों की शारीरिक बनावट (ध्वनि उच्चारण के अवयव एवं श्रवण क्षमता):

पशु-पक्षियों में भी ध्वनि उत्पादन एवं श्रवण की क्षमताएँ होती हैं। यहाँ उल्लेखनीय है कि बहुत से पशु-पक्षी ध्वनि उत्पादन करने में अधिक दक्ष होते हैं तो बहुत से ध्वनि सुनते में। यह हमारा नित्य प्रतिदिन का अनुभव है कि हमारे घरों में तोता ध्वनि उत्पादन में अधिक प्रवीण होता है तो कुत्ता ध्वनि सुनने में। मनुष्य की दक्षता ध्वनि श्रवण में भी है तथा ध्वनि उत्पादन में भी। इस दृष्टि से मानव वागेन्द्रियों में घोष-तन्त्री के प्रकार्य एवं जिहृा की गतिशील स्थितियों तथा कर्णकुहर की शारीरिक संरचना का मानवेतर प्राणियों के तत्सम्बन्धित शारीरिक अवयवों की संरचना एवं प्रकार्य के तुलनात्मक अध्ययन से बहुत उपयोगी सूत्र ढूँढे जा सकते हैं। इस दिशा में प्राणी-वैज्ञानिकों एवं भाषा-वैज्ञानिकों को मिलकर कार्य सम्पन्न करना चाहिए।

मनुष्य एवं मनुष्येतर प्राणियों का मानसिक विकास:

केवल ध्वनि उत्पादन एवं श्रवण-क्षमता ही नहीं, मनुष्य में शब्दों को याद रखने की भी अद्भुत क्षमता है। वाक् अवयवों के परस्पर सहयोग मूलक संचालन के लिए मस्तिष्क प्रकार्य करता है। इस दृष्टि से मनुष्य अपने मानसिक विकास के कारण विविध शब्दों की स्मृतियाँ संचित रखता है तथा उसी के कारण सीमित ध्वनियों के द्वारा निर्मित हजारों लाखों शब्दों को सही रूप में उच्चरित कर पाता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि शरीर-विज्ञान की दृष्टि से बिना प्रयास के अनिच्छायत्त ध्वनियों के उच्चारण की क्रिया मस्तिष्क के मेरूशीर्ष (Medulla Oblongata) के द्वारा संचालित होती है, किन्तु सायास स्वेच्छाकृत ध्वनियों के उच्चारण का नियन्त्रण एवं संचालन प्रमस्तिष्क (Cerebrum) के चेष्टा क्षेत्र (Motor or Excitable-area) के वाक् चेष्टा क्षेत्र (Motor Speech Centre) द्वारा होता है। यह क्षेत्र अग्रपिण्ड लहरिका (Convolution) के पश्चिम प्रान्त के महाविदर (Fissure of Sylvius) की अग्रिम शाखा के पास स्थित है। इसको ब्रोका केन्द्र (Broca Centre) के नाम से भी पुकारा जाता है। यह विभिन्न वाक् अवयवों की विभिन्न गतियों का मध्यस्थ नियन्त्रण करता है तथा उनकी कार्य विधि एवं क्रमबद्धता का सहयोग मूलक संचालन करता है।

शारीरिक दृष्टि से तोता आदि कुछ पक्षियों को छोड़कर शेष मानवेतर पशु-पक्षी बिना प्रयास के अनिच्छायत ध्वनियों का ही उच्चारण कर पाते हैं, सायास स्वेच्छाकृत ध्वनियों का उच्चारण नहीं कर पाते। यह भी शोध का विषय है कि मनुष्य एवं मनुष्येतर प्राणियों के प्रमस्तिष्क में शारीरिक भिन्नता एवं उसके प्रकार्य का अनुपात कितना है ?

इतना अवश्य निश्चित है कि मनुष्य में प्रमस्तिष्क का विकास अन्य प्राणियों से अधिक हुआ है, और इसी कारण वह सायास स्वेच्छाकृत प्रतिक्रिया का अधिक प्रयोग करता है। मनुष्य में सहज शक्तियाँ जितनी हैं उनसे सहज गुनी शक्तियों का विकास उसने स्वंय किया है। इन्हीं कारणों से वह प्राकृत आवाज़ करने तक ही सीमित नहीं रहा, सायास बोली जाने वाली भाषा का निर्माण एवं विकास कर सकने में समर्थ सिद्ध हो सका। घोष-तन्त्री को विभिन्न स्थितियों में नियंत्रित कर उसने ध्वनियों को अघोष सघोष के भेदक रूप में बोलना सीखा। नियंत्रित सुरों एवं सुर लहर के विभिन्न स्तरों का प्रयोग करना सीखा। जिहृा को विविध स्थितियों में ले जाकर विविध स्थानों से ध्वनियों का उच्चारण करना सीखा। नॉम चॉम्सकी भाषिक क्षमता को मनुष्य की मानसिक प्रतिभा से जोड़ते हैं तथा भाषिक-क्षमता एवं भाषिक-निष्पादन में अन्तर करते हैं। भाषिक-क्षमता मनुष्य मात्र की मानसिक प्रतिभा से सम्बद्ध है जिससे कोई भी मनुष्य संसार की किसी भी भाषा को सीख लेता है जबकि मनुष्येतर प्राणी नहीं सीख पाते।

(http://thebrain.mcgill.ca/flash/capsules/outil_rouge06.html)

संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक भी यह मानते हैं कि मनुष्य के बच्चे का मस्तिष्क एक कोरी स्लेट की तरह नहीं होता जिस पर उसके द्वारा सीखी गई बात अंकित होती चली जाए अपितु उसके मस्तिष्क में कुछ गुणसूत्र जन्मजात होते हैं। इसी विचार को स्टीवन ऑर्थुर पिन्कर (Steven Arthur Pinker) ने आगे बढ़ाया है।

( How the Mind Works (1997) ISBN 978-0-393-31848-7)

मनुष्य जाति और प्रतीकात्मकता का विकास:

उच्चारण की इन शक्तियों के विकास के अतिरिक्त अपने सामाजिक जीवन की आवश्यकता के अनुरूप वह विभिन्न पदार्थों, वस्तुओं, व्यक्तियों, दृश्यों, स्थितियों, मनोभावों को सीमित ध्वनियों के परस्पर संयोग एवं उनके विभिन्न परिवर्तनों के द्वारा निर्मित अलग-अलग शब्दों के द्वारा अभिव्यक्त कर सकने में समर्थ हो सका। इस प्रकार वह अलग-अलग वस्तुओं को प्रतीक शब्दों के द्वारा अभिव्यक्त कर सकने में समर्थ हो सका।

भाषा में निरर्थक ध्वनियों का उच्चारण नहीं किया जाता। भाषा के अन्तर्गत ध्वनियों से निर्मित शब्द सार्थक होते हैं। भाषा का निर्माण जिन लघुतम इकाईयों से होता है, वे स्वयं अर्थहीन होती हैं। उनका कोई अर्थ नहीं होता। यह भाषा का वैशिष्ट्य है कि अर्थहीन इकाईयों के विशेष क्रम से मिलने पर सार्थक उच्चार खण्ड निर्मित हो जाते हैं। ‘‘भाषा में शब्द का प्रयोग अर्थ बतलाने के लिए ही होता है।’’ भाषा का अर्थ प्रतीकात्मक होता है। दूसरे शब्दों में भाषा के शब्द एवं वाक्य सहज स्नायविक प्रतिक्रिया करने वाले न होकर बाधित उत्तेजक होते हैं।

भाषा के शब्द चिह्न (Sign) नहीं, प्रतीक (Symbol) हैं। चिह्न का वस्तु से स्वाभाविक सम्बन्ध होता है। यह वस्तु के लक्षण का चिह्न प्रकट होता है। प्रतीक में प्रतीकार्थ वस्तु का कोई प्राकृत लक्षण नहीं होता। प्रतीक का अपनी वस्तु से माना हुआ सम्बन्ध होता है। सहज स्नायविक आवाज़ें प्रतीक नहीं है, क्योंकि ये प्राकृत हैं, सहज हैं, मानी हुई नहीं। इसके विपरीत भाषा के शब्द वस्तु के वाचक हैं। जिस वस्तु के लिए जो शब्द जिस भाषा समाज द्वारा मान लिया जाता है उस भाषा समाज के भाषा-भाषी उस वस्तु को उस शब्द से पुकारने के अभ्यस्त हो जाते हैं। चिह्न इसी कारण प्राकृत एवं स्वाभाविक होता है, किन्तु प्रतीक अर्जित एवं मान्य होता है।

जिस दिन मनुष्य ने किसी घटना, परिस्थिति अथवा मनोभाव को अभिव्यक्त करने के लिए उसके किसी दूसरे संकेत को मान लिया होगा, उस दिन प्रतीकात्मकता का जन्म हुआ होगा। जब उसने किसी बात को याद रखने के लिए अपने परिधान में गाँठ बाँधी होगी अथवा संख्या को याद रखने के लिए लकीरें खींची होंगी अथवा अपनी झोपड़ी को याद रखने के लिए उसके बाहर कोई चित्र बनाया होगा उसी समय प्रतीकात्मकता का जन्म हुआ होगा। किसी एक वस्तु को किसी दूसरी वस्तु के द्वारा प्रकट करने के लिए याद्दच्छिक रूप से अपनायी गयी प्रक्रिया ही प्रतीकात्कता है। हायकवर ने मनुष्य जगत की विशिष्टता बताते हुए लिखा है कि जब कभी दो अथवा अधिक मनुष्य परस्पर विचारों का संवहन करते हैं तो वे परस्पर समझौते के द्वारा किसी भी वस्तु को किसी भी वस्तु के लिए मान लेते हैं।

मनुष्य को सामाजिक संप्रेषण एवं सामाजिक विकास के लिए प्रतीकात्मकता की आवश्यकता पड़ी जिसके कारण मनुष्य खाने, देखने एवं चलने जैसी मूल क्रियाओं के समान प्रतीकों का निर्माण करने में समर्थ हो सका। यह मनुष्य के मानसिक जगत की आधारभूत प्रक्रिया है तथा सभ्यता के विकास के साथ यह प्रक्रिया अनवरत बढ़ती रही है।

भाषा के शब्द प्रतीक हैं। इस कारण अर्थवान उच्चरित खंडों का अपने वाच्य से प्राकृत सम्बन्ध न होकर याद्दच्छिक सम्बन्ध होता है।यादृच्छिकता का अर्थ है अपनी इच्छा से माना हुआ सम्बन्ध। शब्द द्वारा हमें उस पदार्थ या भाव का बोध होता है जिससे वह सम्बद्ध हो चुका होता है। शब्द स्वयं पदार्थ नहीं है। हम किसी वस्तु को उसके जिस नाम से पुकारते हैं उस नाम एवं वस्तु में परस्पर कोई प्राकृत एवं समवाय सम्बन्ध नहीं होता। उनका सम्बन्ध स्वेच्छाकृत मान्य होता है। इसी कारण भाषा का शब्द स्वतः स्फूर्त नहीं होता। हम समाज में रहकर भाषा को सीखते हैं।

एक समाज किसी वस्तु के लिए जिस नाम की स्वीकृति दे देता हैं वही नाम उस समाज में उस वस्तु के लिए प्रयुक्त होने लगता है। यही कारण है कि एक ही वस्तु के अलग-अलग भाषाओं में प्रायःभिन्न वाचक मिलते हैं। यदि शब्द एवं वस्तु का प्राकृत एवं समवाय सम्बन्ध होता तो संसार भर की भाषाओं में एक वस्तु का एक ही वाचक होता। हम जानते हैं कि ऐसा नहीं है। एक ही वस्तु को अनेक नामों से पुकारा जाता है। यथा - ' हिन्दी में, जिसे कुत्ता कहते हैं उसको अंग्रेजी में ‘डॉग' (dog) ; चीनी में ‘गोऊ’(gou) ; इटैलियन में ‘कैने’(cane) ; स्पेनिश में ‘पेरो’ (perro) ; जर्मन में ‘हुण्ड’(Hund) ; तथा रूसी में सुबाका(sobaka) कहते हैं।

भारतीय भाषाओं मे भी एक ही पदार्थ के अनेक वाचक मिल जाते हैं-हिन्दी के गेहूँ को पंजाबी में कणक, गुजराती में धउँ, बंगला एवं असमियों में गम अथवा गाम कहते हैं। हिन्दी की आँख मराठी में डोला, तमिल में कणमणि , कन्नड़ में पापे बोली जाती है। गर्दन को पंजाबी में धौण, मराठी में मानू, असमिया में दिङि, उडि़या में बेक तथा तमिल एवं मलयालम में कलुत्तुँ कहते हैं। हिन्दी में भोजन करते हैं, मराठी गुजराती में जेवण या जमण करते हैं। इसके विपरीत एक ही शब्द विभिन्न भाषाओं में भिन्न-भिन्न अर्थों में भी प्रयुक्त होता है।

शब्द

अर्थ

भाषा का नाम

मृग

मृग

हिरण

सामान्य पशु

हिन्दी

दक्षिणी भाषाओं में

शिक्षा

शिक्षा

सिखाना

ताड़ना

हिन्दी

मराठी

अनर्गल

अनर्गल

निरर्थक

धाराप्रवाह

हिन्दी

तेलुगु

बाड़ी

बाड़ी

बगीचा

घर

हिन्दी

बांग्ला

‘‘इस प्रकार वस्तुओं में ऐसी कोई स्वाभाविक बात नहीं होती जो उन्हें निर्धारित नाम प्रदान करे। नाम तो लोगों द्वारा परस्पर सहमति से अथवा परम्परा से स्वीकृत अर्थ में चला आया होता है।’’

शब्द एवं अर्थ की याद्दच्छिकता के बारे में कुछ विद्वानों ने प्रश्वाचक चिह्न लगाया है। इनके मतानुसार आज भले ही शब्द एवं अर्थ का सम्बन्ध याद्दच्छिक हो तथापि भाषा व्यंजक अर्थों की वस्तुओं अथवा क्रियाओं की ध्वनियों के आधार पर किया गया। पेड़ से पत्ते गिरने पर हुई ‘पत्’ ध्वनि को सुनकर गिरने के अर्थ में ‘पत्’ धातु का निर्माण हुआ।तदनन्तर ‘पत्’ से ‘पत्ता’ ‘पतन’ ‘पतित’ आदि शब्द बने। इस दृष्टि से शब्द एवं अर्थ का आधार याद्दच्छिक न होकर ‘ध्वन्यात्मक साम्यता’ प्रतीत होता है।यह सत्य है कि अनुकरणमूलक एवं अनुरणनमूलक शब्दों का निर्माण उनकी वाच्य वस्तुओं से उत्पन्न प्राकृतिक ध्वनियों के अनुकरण अथवा उनके अनुरणन के आधार पर होता है। ‘म्याऊँ, ‘भों-भों’, ‘हिनहिनाहट’, ‘काँव-काँव’, ‘टर्र-टर्र’, ‘चर-चर’, ‘टिक-टिक’, ‘भोंपू’, ‘फटफटिया’, आदि अनुकरणमूलक शब्दों तथा ‘कल-कल’, ‘खट-खट’, ‘झर-झर’, ‘तड़तड़’, ‘साँय-साँय’, ‘भड़भड़’, आदि अनुरणनमूलक शब्दों में यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है।इस सम्बन्ध में हम पूर्व में यह उल्लेख कर चुके हैं कि किसी भी भाषा में इस प्रकार के शब्दों की संख्या अत्यन्त सीमित एवं अल्प होती है। इस कारण इनके आधार पर शब्द एवं अर्थ की याद्दच्छिकता का सामान्य नियम खण्डित नहीं होता।इसके अतिरिक्त केवल ध्वनि करने वाली वस्तुओं का ही नामकरण उनकी ध्वन्यात्मकता का आधार लेकर हो सकता है; भावनाओं, विचारों, एवं शेष पदार्थों का नामकरण इस आधार पर सम्भव नहीं है।

भाषाओं में अनुकरणमूलक शब्द मिलते-जुलते अवश्य हो सकते हैं, प्रायः वही नहीं होते। पेड़ से पत्ते तो सभी स्थानों पर गिरते हैं किन्तु संस्कृत में गिरने के अर्थ में ‘पत्’ धातु है किन्तु अंग्रेजी में ´Fall' है। इसी प्रकार हिन्दी में कुत्ते का भौंकना ‘भों-भों है, अंग्रेजी में 'Bow-wow´ है।

इस प्रकार वस्तु की ध्वनि को किसी भाषा का कोई व्यक्ति अपनी विशिष्ट मनोवैज्ञानिक स्थिति में सुनकर उसके आधार पर शब्द का निर्माण करता है तथा उसे उस अर्थ में बार-बार प्रयोग करता है। जब उस शब्द को उस अर्थ में भाषा समाज की मान्यता प्राप्त हो जाती है तभी वह शब्द के वाक् धरातल से ऊपर उठकर ‘भाषा’ की शब्दावली का अंग बन पाता है।ध्वनि करने वाली वस्तुओं के आधार पर निर्मित होने वाले शब्द भी याद्दच्छिक प्रक्रिया से सर्वथा पृथक नहीं किए जा सकते। इन शब्दों के अर्थ सम्बन्ध को ‘अर्थ-याद्दच्छिक’ कहा जा सकता है।

शब्द एवं अर्थ के याद्दच्छिक सम्बन्ध का अभिप्राय यह है कि पुरानी पीढ़ी ध्वनिक्रमों से निर्मित शब्दों की मान्य अर्थवत्ता को अपने भाषा समाज की नई पीढ़ी को प्रदान करती है। भाषा समाज की नयी पीढ़ी शब्दों के अर्थ को पुरानी पीढ़ी के संसर्ग से प्राप्त करती रहती है। इस प्रकार भाषा की याद्दच्छिकता का अभिप्राय यह है कि भाषा सामाजिक वस्तु है। समाज में शब्दों के परम्परित अर्थ मे प्रयुक्त होते रहने के कारण हमें शब्द एवं अर्थ का सम्बन्ध नित्य एवं समवाय प्रतीत होता है, तत्त्वतः शब्द एवं अर्थ का सम्बन्ध नित्य तथा समवाय नहीं है। शब्द वस्तु को प्रकट नहीं करता; उसके अर्थ को प्रकट करता है। एक भाषा के साहित्य का दूसरी भाषा में अनुवाद प्रक्रिया के समय विचार (बुद्धिस्थ अर्थ) बना रहता है। हम शब्द परिवर्तन करते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि शब्द एवं अर्थ में नित्य एवं समवाय सम्बन्ध नहीं होता।

शब्द एवं वस्तु की भिन्नता के कारण ही शब्द के अर्थ बदलते रहते हैं। एक शब्द का जिस काल में जो भाषा समाज जो अर्थ ग्रहरण करता है उस काल में उस भाषा समाज में उसका वही अर्थ होता है।

यदि शब्दार्थ ही पदार्थ होता तो चीनी कहने से जीभ को मीठेपन के स्वाद का अनुभव होता, भोजन कहने मात्र से पेट भर जाता, आग कहने से जीभ जल जाती। वस्तु या वाच्य तथा शब्द अथवा वाचक की भिन्नता हम प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर सकते हैं। जब कोई शिशु जन्म लेता है तो उसका कोई नाम नहीं होता। उस समय हम उसे जिस नाम से चाहें पुकार सकते हैं। उसका हम कोई भी नाम रख सकते हैं। जब परिवार के सदस्य उसका कोई नाम रख देते हैं तो वह उसी नाम से पुकारा जाने लगता है। प्रयोग के कारण कालान्तर में वह प्राणी तथा उसका मान्य नाम इतना अभिन्न प्रतीत होने लगता है कि उसकी अनुपस्थिति में भी उसके नाम को सुनने भर से उसका बोध हो जाता है। शब्दों के अर्थ इसी प्रक्रिया में रूढ़ होते हैं।

शब्द स्वयं पदार्थ नहीं है। शब्द से पदार्थ का नहीं, पदार्थ के बुद्धिस्थ अर्थ का बोध होता है। इस सम्बन्ध में भारतीय एवं पाश्चात्य विचारक एक मत हैं। डी0 सोस्यूर ने प्रतिपादित किया है कि प्रतिपादक शब्द एवं प्रतिपाद्य वस्तु के बीच एक प्रतिपाद्य भाव होता है, जो बुद्धिस्थ होता है। शब्द उस वस्तु को प्रकट नहीं करता, उस वस्तु के भाव को प्रकट करता है।

भारतीय मनीषियों ने भी स्फोट सिद्धांत में इसका विस्तार से विवेचन किया है। वक्ता की वैखरी वाणी सुनकर मध्यमा नाद उत्पन्न होता है। स्फोट से बुद्धिस्थ अर्थ का ग्रहण तदनन्तर बुद्धिस्थ अर्थ से बाह्य अर्थ का ग्रहण होता है।वैयाकरण ने प्रश्न उठाया है कि ‘गौ’ इसमें कौन-सा शब्द है ? क्या जो गल-कम्बल, पूँछ, कुहान, खुर, सींगवाला पदार्थ है, वह शब्द है ? वह स्वयं उत्तर देता है कि यह शब्द नहीं है, यह तो ´द्रव्य' है।फिर क्या संकेत करना (आँख आदि से हृदय के भाव का प्रकाशन), चेष्टा (शरीर की हलचल) तथा आँख का झपकना ये शब्द हैं ? इसका भी उत्तर वैयाकरण नकारात्मक देता है। ये शब्द नहीं, क्रियाएँ हैं।तो क्या जो शुक्ल, नील, कपिल (भूरा), कपोत (चितकबरा) है, ये शब्द हैं ? इसक भी उत्तर वैयाकरण नहीं में देता है क्योंकि ये शब्द नहीं, गुण हैं।तो फिर क्या जो भिन्न-भिन्न पदार्थों (द्रव्यों) में एक रूप है और जो उनके नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता, सबमें साधारण, अनुगत है, वह शब्द है ?यह भी शब्द नहीं क्योंकि यह तो जाति है। तो फिर शब्द क्या है ?इसका उत्तर वैयाकरण देता है: ‘‘ जो उच्चरित ध्वनियों से अभिव्यक्त होकर गलकम्बल, पूँछ, कुहान, खुर, सींगवाले 'गौ´ व्यक्तियों का बोध कराता है, वह शब्द है। लोक व्यवहार में तो जिस ध्वनि से अर्थ का बोध होता है, वह शब्द कहलाता हैं किन्तु तत्त्वतः उच्चारित होकर क्षणान्तर में नष्ट हो जाने वाली ध्वनियाँ अर्थ बोध नहीं करा सकती। उनमें वाचकत्व नहीं है। जो श्रवण का विषय है, वह बोधक नहीं है। व्याकरण शब्द को एक नित्य तत्त्व मानता है (बुद्धिस्थ के अर्थ में)।यह उच्चरित ध्वनियों से अभिव्यक्त होता है और अभिव्यक्त होने पर उस अर्थ (बुद्धिस्थ) का बोध कराता है। इसी कारण इसे ‘स्फोट’ कहते हैं, जिसका अर्थ हैं-स्फुटत्यर्थोऽस्मादिति।

(पतंजलि: व्याकरण महाभाष्य (प्रथम नवान्हिक), (पतंजलि : व्याकरण महाभाष्य (अनुवादक – चारुदेव शास्त्री), (पतंजलि : व्याकरण महाभाष्य (अनुवादक – चारुदेव शास्त्री),पृष्ठ 3-4 (मोतीलाल बनारसीदास)।

इस प्रकार आदमी ही ऐसा प्राणी है जो अलग-अलग वस्तुओं को उनके प्रतीक शब्दों के द्वारा व्यक्त करने लगा। प्रतीकात्मकता के विकास द्वारा उसने अपने को पशु-जगत से भिन्न बना लिया। पशु-पक्षी प्राकृत एवं सहज आवाजें ही करते रहे। मनुष्य ने अपने शारीरिक संरचना, मानसिक विकास और जीवन की आवश्यकता के कारण प्रतीकात्मकता का विकास कर लेने के कारण भाषा का निर्माण कर लिया। पशु-पक्षी अपनी बात आज भी जहाँ मनोभावाभिव्यंजक आवाज़ों, भाव-भंगिमाओं अथवा अपने शरीर की गतियों के घटाने-बढ़ाने के द्वारा अभिव्यक्त कर पाते हैं वहीं मनुष्य हजारों वर्षों पूर्व ही ज्ञान के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अविच्छिन्न संचय एवं स्थानान्तरण के लिए याद्दच्छिक वाक् प्रतीकों का प्रयोग कर पशु-जगत के संप्रेषण साधनों से भिन्न ‘मानव भाषा’ का निर्माण करने में समर्थ हो गया। इस कारण यह निःसन्देह कहा जा सकता है कि मानवता का इतिहास एक सुगठित भाषा को प्रारम्भ से ही आधार मानकर चला है। भाषा के बिना मानव समाज का विकास सम्भव नहीं था। इस कारण वान्द्रियैज़ ने लिखा है कि यदि मानव का अधिकार भाषा पर न होता तो वह विधि द्वारा नियत जीवन के इतने महत्त्वपूर्ण ध्येय की पूर्ति न कर पाता। विचार की साधन और सहायक भाषा ने ही मानव को स्वत्व की चेतना प्रदान की और इसके द्वारा ही वह अपने भाषा समाज के अन्य सदस्यों से वाक्-व्यापार कर सका। इससे समाजों की स्थापना सम्भव हुई। व्यवहार के इतने प्रभावशाली साधन के न होने पर मानव की आदिम व्यवस्था क्या रही होगी, इसकी कल्पना करना वस्तुतः कठिन है। मानवता के इतिहास के आरम्भ में ही एक सुसम्बद्ध भाषा का अस्तित्व रहा होगा, क्योंकि भाषा के बिना उसकी गति ही न हो पाती।

(जे. वान्द्रियैज़ – भाषा (अनुवादक – जगवंश किशोर बलवीर) प्राक्कथन पृष्ठ 1, हिन्दी समिति, सूचना विभाग, लखनऊ, प्रथम संस्करण, (1966))।

भारतीय मनीषी भी भाषा के महत्त्व के प्रति सजग रहे हैं। ‘शब्द की शक्ति के कारण सारा विश्व बँधा हुआ है’’।

(“शब्देष्वाश्रिता शक्तिर्विश्वस्यास्य निबंधनी” – भर्तृहरि – वाक्यपदीय) ’’वाणी की कृपा से यह लोक यात्रा चल रही है। यदि शब्द (वाणी) रूपी ज्योति इस संसार में न चमकती तो ये तीनों लोक अंधकार में ही रहते।

(इदमन्धतमः कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम्। यदि शब्दाहृयं ज्योतिरासंसारं न दीप्यते।। - काव्यादर्श , सम्पादक – अनुकूल चन्द बनर्जी, पृष्ठ 6, कलकत्ता विश्वविद्यालय (1939))।

भारतीय मनीषियों के इस प्रकार के कथन भाषा के महत्व के प्रति उनकी केवल भावात्मक उक्तियाँ मात्र नहीं हैं। इनमें ‘भाषिक उपलब्धि’ के कारण मनुष्य की ‘सांस्कृतिक जय-यात्रा' का रहस्य भी निहित है

 

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान)

123, हरि एन्कलेव, बुलन्द शहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: महावीर सरन जैन का आलेख - मानव भाषा का निर्माण एवं विकास
महावीर सरन जैन का आलेख - मानव भाषा का निर्माण एवं विकास
https://lh3.googleusercontent.com/-gY2x1Y2oUCw/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/E7BGmIIKJ4g/s120-c/photo.jpg
https://lh3.googleusercontent.com/-gY2x1Y2oUCw/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/E7BGmIIKJ4g/s72-c/photo.jpg
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2014/10/blog-post_87.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2014/10/blog-post_87.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content