शशांक मिश्र भारती का आलेख - मेरे अनुरणीय शिक्षक

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प्रेरक प्रसंगः - मेरे आदर्श शिक्षक आज भी अनुकरणीय हैं - शशांक मिश्र भारती तीन लोक नौ खण्ड में गुरु से बड़ा न कोय। करता करै न कर सकै गुर...

प्रेरक प्रसंगः-

मेरे आदर्श शिक्षक आज भी अनुकरणीय हैं-

शशांक मिश्र भारती

तीन लोक नौ खण्ड में गुरु से बड़ा न कोय।

करता करै न कर सकै गुरु करै सो होय ।।

उपर्युक्त पंक्तियों को सार्थक करने वाले गुरुजनों का संरक्षण किसके जीवन में जीवन्तता, परिवर्तन न ला देगा। निश्चय ही ऐसे गुरुजनों की खोज प्रत्येक जिज्ञासु शिक्षार्थी को रहती है। मैंने शिक्षा प्राप्त करने के विविध वर्गों-प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च-उच्चतर में बार-बार ऐसा अनुभव किया और जीवन को एक निश्चित दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करने वाले श्रद्धेय गुरुजन से प्रथम साक्षात्कार कक्षा ग्यारह में प्रवेश के समय साल 1989 जलाई पुवायां इण्टर कालेज पुवायां शाहजहांपुर उ.प्र. में हुआ।

जी हां वह सम्मानित पूजनीय गुरुजन श्री मथुराप्रसाद शर्मा प्रवक्ता भूगोल तीन दशक से अधिक समय से शिक्षण में संलग्न थे। उनके पढ़ाये हुए छात्रों ने पहले से ही भयभीत कर रखा था, कि शर्मा जी बड़े सख्त हैं पूरा दुर्वासा समझो। समय से कक्षा में प्रवेश करते हैं तथा प्रत्येक विद्यार्थी की गतिविधियों पर दृष्टि रखते हुए समय पर ही शिक्षण कार्य समाप्त करते हैं। कभी -कभी आवश्यक होने पर अतिरिक्त कक्षायें भी लेते हैं। पढ़ने वाले लगनशील व परिश्रमी छात्र उनके शीघ्र प्रिय छात्र बन जाते हैं। इस तरह की बातें मेरे मस्तिष्क में थी। इसलिए कदम फूंक -फूंक कर रख रहा था पहले दिन कक्षा में प्रवेश किया; तो सभी उनके सम्मान में उठकर खड़े हो गये उन्होंने -'बैठो' कहा ! उसके बाद सामान्य परिचय की औपचारिकता पूरी की। फिर शिक्षण कार्य प्रारम्भ कर दिया। वादन समाप्त होने पर कक्षा से बाहर जाने से पूर्व उन्होंने कहा -''आप लोग पुस्तक व कापियों की व्यवस्था अतिशीघ्र कर लें ताकि पढ़ाई व्यवस्थित रूप से प्रारम्भ हो सके और हां यदि किसी को विषय से सम्बन्धित कोई समस्या हों; कुछ पूछना हो तो किसी भी समय निःसंकोच आ सकता है।''

उसके बाद मान्य गुरुवर के सानिध्य में भूगेाल विषय का अध्ययन प्रारम्भ हो गया। दो वर्ष के अध्ययन काल में शिक्षण के सैद्धान्तिक व व्यावहारिक दोनों पक्षों पर उनकी कर्मठता, नियमितता व गम्भीरता देखी ।कई बार अपने सहयोगियों को असन्तुष्ट कर भी हम लोगों को समय देने में संकोच न करते। जीवन में अनुशासन व आचरण की पवित्रता उनके व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण विशेषता थी। पाठ्यक्रम अधिक होने के बाद भी पूर्ण करवाने का भरसक प्रयास करते। आपस में चर्चायें करवाकर व्यावहारिक पक्ष सुदृढ़ करते। भूगोल सम्बन्धी उपकरण, मानचित्र, ग्लोब, चट्टानें व भूपत्रक स्वंय प्रयोग कर समझने को कहते। आवश्यकता होने पर प्रायोगिक कक्षाओं के लिए अवकाश में भी बुलाते। दो वर्ष में एक दिन भी वे देर से विद्यालय पहुंचे हों या कक्षा खाली रही हो। ऐसा अवसर न आया और न ही कभी अनुशासन के लिए डण्डा पकड़े या डांटते हुए देखा।

एक बार की बात है। वह मुझे भारत का मानचित्र (अक्षांशीय व देशान्तरीय विस्तार के आधार पर ) बनाना समझा रहे थे; कि विज्ञान अध्यापक श्रीवास्तव आगये और कहा-''चलो देर हो रही है, इनको कल समझा देना।'' उन्होंने जवाब देते हुए कहा-''आपको जल्दी है तो जाइये। मुझे इस लड़के को आज ही समझाना है।'' उसके बाद श्रीवास्तव जी वहीं रुक गये और बाद में शर्मा जी के साथ ही गये। इससे मैंने समझा निश्चय ही शर्मा जी ने शिक्षण के उपयोग व महत्व को समझकर ही अपने जीवन में उतारा था और जिसे वह पूर्णतया अपने छात्रों में भरना चाहते थे। कभी - कभी वह कहते थे कि जब कोई प्रश्न पूछे या कोई बात जानना चाहे। तो उसका पूरा जवाब दो। अधूरे जवाब से न पूछने वाला सन्तुष्ट हो पायेगा और न तुम्हारे ज्ञान की सच्ची परख होगी। इसके अतिरिक्त उनकी दिनचर्या साधारण वेशभूषा ,बोलचाल का शालीन ढंग, व्यसनों से मुक्त व्यक्तित्व भी धीरे -धीरे प्रभावित कर रहा था। इण्टर उत्तीर्ण करने के बाद जब भी अवसर मिला या सामने पड़े आशीर्वाद अवश्य लिया होगा। उनके सेवानिवृत्त होने के बाद से सम्पर्क न हो सका; परन्तु मेरे हृदय में उनके प्रति श्रद्धा व विश्वास ज्यों का त्यों है।

शर्मा जी के अतिरिक्त हाईस्कूल में श्री देवेन्द्र कुमार शुक्ल (हिन्दी अध्यापक), स्नातक में डा.नित्यानन्द मुदगल (हिन्दी प्राध्यापक) व शिक्षास्नातक में डा.गिरिजानन्दन त्रिगुणायत आकुल के व्यक्तित्व व कृत्तित्व ने मुझे कहीं न कही और किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है

मैंने ऐसे अपने गुरुजनों का विशेषकर उल्लेख किया है। जिनके विद्यार्थियों के मध्य उद्देश्य स्पस्ट थे। विषयवस्तु चरण दर चरण उद्देश्यों के अनुरूप रहती थी। उनके पढ़ाने तरीका व तकनीक विषय वस्तु के अनुकूल रहती थी। किसी प्रकरण को आरम्भ करने के पूर्व वे उसकी भूमिका ऐसे बांधते थे कि जिसे सुनकर विद्यार्थी सीखने के प्रति उत्सुक हो पूरी तन्मयता से सुनते। यही नहीं इनके द्वारा पूर्ण पैकेज को एक साथ न पढ़ाकर पाठ को छोटे -छोटे खण्डों में विभक्त कर पढ़ाया जाता था और यह जानने का प्रयास रहता कि छात्र-छात्राओं ने कितना सीखा- समझा। यही नहीं वे विषय वस्तु की क्रमबद्धता-तर्कसंगतता सीखने के प्रति विद्यार्थियों की सक्रियता, प्रश्न पूछने की छूट देना उनसे सौहार्दपूर्ण व उत्साहवर्द्धक तरीके से चर्चा करते थे। इनकी विषयवस्तु पर पूरी पकड़ थी कहीं पर कोई चूक नहीं करते थे समयबद्धता योजनाबद्ध तैयारी पाठ से भटकाव होने ही नहीं देती थी ।यह बार यह जानने का कोशिश करते थे कि बच्चे समझ रहे हैं या नहीं उनकी रुचि है या नहीं, पाठ समाप्त करने के पहले ये सम्मानित जन उसकी मुख्य- मुख्य बातों दोहरा देते थे कई बार बोलकर अथवा श्यामपट पर लिख कर तारतम्य बिठा देते थे। कुल मिलाकर अपने विषय के ज्ञाता, पढ़ाने के ढंग की समय- समय पर समीक्षा करने वाले, प्रसन्नचित, सामूहिकता से कार्य करने अपने संस्थान पर गर्व की भावना से युक्त, निष्पक्ष, अपने कर्त्तव्य के प्रति ईमानदार रहे।

मैं इनके अतिरिक्त कक्षा एक से लेकर एम.ए. बी.एड. तक अपने समस्त गुरुजनों के प्रति भी नतमस्तक हूं और अपने जीवन में बिखरे रंगों व आयामों के लिए उनका आजीवन आभारी हूं। सभी की अनुकम्पा को शब्दों में पिरोना सम्भव नहीं है। सामान्यतः विद्यार्थी के लिए सभी गुरुजन समान ओर पूजनीय होते हैं इसी के साथ माध्यमिक के एक गुरुजन श्री अग्रवाल के उल्लेख के बिना न्याय न होगा जिन्होंने कक्षा दस में केवल दो ही वादनों में आकर दर्शन दिये और अर्थशास्त्र जैसे महत्वपूर्ण विषय में प्रसाद रूपी ज्ञान पुष्प दे गये।

मैंने अपने शिक्षणकाल के आरम्भ से ही चाहे वह प्राथमिक वर्ग रहा हो या उसके बाद माध्यमिक; अपने गुरुजनों के बतलाये-दिखलाये श्रेष्ठ पथ का सदैव अनुकरण करने का प्रयास किया है। सफल भी रहा हूं।भले ही इसके लिए मुझे कक्षा-कक्ष के दूषित-गन्दे वातावरण, सहयोगियों के असहयोग, छींटाकशी, प्रधानाचार्य-प्रबन्धकों के अनावश्यक हस्तक्षेप को जानबूझकर अनदेखा करना पड़ा हो। कई बार आवश्यकता से अधिक परिश्रम किया है। व्यक्तिगत रूप से आज भी अपने श्रेष्ठ आचरणवान, परिश्रमी, मार्गदर्शक गुरुजनों द्वारा स्थापित आदर्शों व मूल्यों के अनुपालन के लिए प्रयासरत हूं और जीवन पर्यन्त रहूंगा।

यदि वर्तमान में शिक्षण-प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम आदि शिक्षा के विविध अंगों को देखें तो परिस्थितियां अत्यन्त कठिन होती जा रही हैं। कर्त्तव्य से अधिक पैसे को महत्व देने वालों की संख्या बढ़ रही है। नैतिक मूल्यों का गिरता स्तर आचरण हीनों की संख्या बढ़ा रहा है। छल -बल के दम पर ऊँची डिग्रियां, अंक, नौकरी, स्थानान्तरण पाने वाले हावी हो रहे हैं। व्यक्ति, परिवार, समाज व सरकारें सभी अपने दायित्व निर्वहन के प्रति गम्भीर नहीं हैं। कर्त्तव्य व अधिकार के मध्य सामंजस्य घट रहा है। रही - सही कसर सर्वशिक्षा अभियान, रमसा व एमडीएम के सदुपयोग न हो पाने से पूरी हो जा़ रही है ।पानी की तरह पैसा खर्च होने के बाद भी परिणाम ढाक के तीन पात से संकुचित हो रहे हैं। ऐसे में निराश होने से श्रेष्ठ है कि सार्थक प्रयास किये जायें कदाचित ही सही शिक्षक इन पक्तियों को ध्यान में रखें-

शिक्षक से ही निर्मित होता है , बालक का व्यक्तित्व ।

वही उसे सफल बनाता , उपजाता जग में अस्तित्व।।

 

28.10.2014

शशांक मिश्र भारती हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401 उ.प्र.

नाम

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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: शशांक मिश्र भारती का आलेख - मेरे अनुरणीय शिक्षक
शशांक मिश्र भारती का आलेख - मेरे अनुरणीय शिक्षक
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