विजय शिंदे का आलेख - विवेकी राय का समर शेष है

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विवेकी राय का समर शेष है डॉ. विजय शिंदे विवेकी राय की पहली प्रकाशित पुस्तक ‘अर्गला’ (1951) कविता संग्रह है। परिस्थितिवश कविता के बीच से उ...

विवेकी राय का समर शेष है

डॉ. विजय शिंदे

विवेकी राय की पहली प्रकाशित पुस्तक ‘अर्गला’ (1951) कविता संग्रह है। परिस्थितिवश कविता के बीच से उपजता गद्य लेखक आगे बढ़ते हुए हिंदी साहित्य की अमूल्य सेवा करता है। पत्रकार और अध्यापक रहे विवेकी राय का अनुभव जगत् अभिव्यक्ति पाकर हिंदी साहित्य में साकार हो उठा है। भोजपुरी के प्रति विशेष प्रेम होने के कारण उस भाषा में भी उन्होंने कई किताबों का सृजन किया है। गांव उनका आत्मीय रहा है। अतः उन्होंने गांव की गलियों में घूमते हुए विषयों को उठाकर एक से बढ़कर एक साहित्यिक कृतियों की निर्मिति की है

विवेकी राय

(विवेकी राय)

व्यक्तित्व के आंतरिक पक्ष में स्वभाव, गुण, रुचि, निष्ठा, दृढ़ता, भावुकता, प्रतिभा, व्यक्ति के मानसिक क्रियाकिलाप और अनुभव जगत् का समावेश होता है। रचनाकार का अंतरंग और अनुभव ही व्यापक रूप से अभिव्यक्ति पाकर नई कृति में उतरता है। इसमें स्वयं लेखक द्वारा अनुभव की गई संवेदनाएं या घटनाएं होती है। दूसरा पक्ष यह भी है कि लेखक द्वारा अनुभव न करने पर भी चीजें कागजों पर उतरती है, जिसमें उसका सहृदय मन साधारणीकृत होकर दूसरे के दुःख-सुख, हास-परिहास... के साथ तादात्म्य स्थापित करता है। विवेकी राय का अंतरंग और अनुभव पक्ष प्रबल रहा है। उनका यह पक्ष ही अभिव्यक्ति का संबल बनकर लिखने के लिए उकसाता है।

‘मेरा लेखक’ निबंध में विवेकी राय लिखते हैं, "पैंतालिस से आज तक क्या सांस लेने का भी मौका कभी मिला! कितना लिख गया ’57 से ’69 तक ‘आज’ के साप्ताहिक स्तंभ ‘मनबोध मास्टर की डायरी’ में! कितना लिख गया इधर प्रति वर्ष तीस-पैंतीस रचनाओं के औसत से हिंदी की प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में! और मन संतुष्ट नहीं है, भूख बनी है। पता नहीं वह क्या लिख पाएगा कि मन मान जाएगा। कविता, कहानी, व्यंग्य, रेखाचित्र, डायरी, फीचर, निबंध, उपन्यास, रिपोर्ताज और समीक्षा – लेकिन अच्छा हुआ कि बहुत समय से यानी एक-डेढ़ दशक पूर्व से मेरा पूराना कवि मर गया है।" (आम रास्ता नहीं है, पृ. 96) सन् 1957 के पूर्व विवेकी राय का कवि और लेखक एक साथ चल रहे थे, लेकिन ’57 के बाद ‘आज’ में लिखना शुरू हुआ तब से कवि पिछड़ गया।

विवेकी राय अपने नाम के अनुकूल निर्मल, विवेकी और विनोदी हैं। हंसी-मजाक से दूसरों को प्रसन्न रखते हैं। ‘मनबोध मास्टर’ का व्यंग्य और उपहास विवेकी राय के अंतरंग में मौजूद है। लेकिन उनका व्यंग्य छिछला या मात्र उपहास नहीं होता है। वह सात्विक, निर्मल और विवेकपूर्ण होता है।

सरलता, सादगी, निश्चल वृत्ति और सच्चाई विवेकी राय की स्वभावगत विशेषताएं हैं। उनके बोलने का ढंग, अदब और शैली में सरलता है। यह सरलता सामने वाले को भावविभोर करती है। उनके स्वभाव की निश्चलता के बारे में डॉ. सत्यकाम अपना अनुभव बताते हैं, "हां, एक बार बिजली कटने पर पंखा भी झलने लगे थे। मैंने हाथ पकड़ लिया। वे मुस्कुराने लगे – सहज निश्चल हंसी। मैं मंत्रमुग्ध-सा उन्हें देखता रहा। फिर जोर से उन्होंने ठहाका लगाया। मैं अचंभित। उन्होंने कहा, ‘मैं सबको ठंड़क पहुंचाता हूं। सारे समाज... सारे देश को... आपको भी पहुंचा रहा हूं तो क्या हर्ज है।’ विवेकी राय का स्वभाव असाधारण होने का परिचय प्रस्तुत कथन देता है।" (माटी की महक, पृ. 8) वेदप्रकाश अमिताभ उनके स्वभाव पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं, "किसी तामझाम या आधुनिक सजावट से रहित एक कमरे में साधारण वेशभूषा, किंतु असाधारण व्यक्तित्व के धनी विवेकी राय से मिलना कोई ‘उत्तेजना’ नहीं पैदा करता, अपितु एक विशेष प्रकार का संतोष देता है।" (माटी की महक, पृ. 38) यहीं संतोष उनके साहित्य में नजर आता है।

विवेकी राय सीधे-सच्चे मनुष्य हैं, लेखक भी सीधे-सच्चे हैं। किसी के साथ दुश्मनी या छल-कपट नहीं। अतः लेखन में भी उनके उपन्यास के अध्यापक पात्र, निबंधों के मनबोध मास्टर और कहानियों के आत्मकथन करने वाले पात्र सीधे-सच्चे हैं, क्योंकि वे पात्र विवेकी राय के आंतरिक मन को लेकर उभरते हैं।

विवेकी राय बचपन से ही संकोची वृत्ति के हैं। इसी प्रवृत्ति के कारण वे बड़े लोगों, बड़े शहरों से दूर गांव की ओर भागकर ‘गंवई गंध गुलाब’ में रहते हैं। विद्वान और लेखक होने के कारण पाठक, शोधछात्र, आत्मीयजन तथा अन्य लोग जब आदरयुक्त बाते करते हैं तब और भी अधिक संकोच महसूस करते हैं।

उन्हें जब ‘कवि जी’, ‘मास्टर साहब’ और ‘किसान लेखक’ कहा जाता है, तब भी वे अपने आपको सामान्य जनों से अलग न होने का भाव महसूस करते हैं। वे पहले ‘विवकी’ है बाद में सबकुछ।

‘सोना माटी’ (1983), ‘समर सेष है’ (1988), ‘मंगलभवन’ (1994) जैसे बृहत आकार वाले और व्यापक पृष्ठभूमि को लेकर लिखे उपन्यास कठिन परिश्रम का सुफल है। ‘मंगलभवन’ के बारे में लेखक लिखते हैं, "इसकी सृजन-यात्रा में खपे पांच-छह वर्ष मेरे लिए कठिन अग्नि-परीक्षा वाले सिद्ध हुए। नाना प्रकार की आधि-व्याधि और उपद्रव-आघात के चलते मेरा लेखक ऐसा आहत हुआ कि उक्त कृति के पूर्ण होते-होते इस निर्णय-निष्कर्ष पर पहुंच गया कि अब किसी उपन्यास रचना में हाथ नहीं डालूंगा।" (अमंगलहारी – भूमिका, पृ. 7) प्रस्तुत उपन्यास के निर्मिति कालखंड़ में उनकी माता जी का स्वर्गवास हुआ और स्वयं विवेकी राय के हृदय का ऑपरेशन भी हुआ था। लेखन के प्रति निष्ठा होने के कारण न लिखने की कल्पना भी उनके लिए असंभव है। ‘मंगलभवन’ की परीक्षा-घड़ी खत्म होते ही जो संकल्प किया था, जल्दी ही टूट गया। ‘नमामी ग्रामम्’ (1996), ‘अमंगलहारी’ (2000) और देहरी के पार (2003) यह उपन्यास लेखकीय संकल्प को तोड़ते हुए प्रकाशित हो गए।

‘मेरा लेखक’ निबंध में सघर्षशील विवेकी राय बताते हैं, "एक छोटे-से गांव में पैदा होकर गरीबी, असुरक्षा, अव्यवस्था और अनेकमुखी हीनताओं को पहले तो अपनी नियति मान लिया, बाद में ऐसा लगा कि इनसे लड़ा जा सकता है। लड़ाई ठनी और बहुत जबरदस्त लड़ाई हुई।" (आम रास्ता नहीं है, पृ. 102)

विवेकी राय व्यवस्थाप्रिय हैं। उनका जीवन काफी व्यस्त रहा है। व्यस्तता के बीच एकसूत्रता लाने के लिए व्यवस्था की जरूरत होती है। खेत, अध्यापन और लेखन इन तीनों में कभी अव्यवस्था नहीं, सबकुछ व्यवस्थित। उनकी संगति में अव्यवस्थित व्यक्ति भी व्यवस्था के पाठ पढ़ते हुए अनुशासित होगा। एकाध चीज न भी मिली तो समझौता करेंगे, ताल-मेल बिठाएंगे और काम चलाएंगे।

इसी कारण वे समाज की अव्यवस्था को देखकर बौखला जाते हैं। उनका पूरा साहित्य समाज की अव्यवस्था को वर्णित करते हुए एक व्यवस्था लाने का प्रयास करता है। उन्होंने समाज, राजनीति, संस्कृति, गांव, कृषि, शिक्षा, प्रशासन आदि की अव्यवस्था को साफ-सुथरा और व्यवस्थित बनाने के लिए कलम की सहायता ली है।

विवेकी राय भीड़-भाड़ की दुनिया से कोसों दूर हैं। वे साहित्य की दलगत राजनीति से भी दूर हैं। किसी के साथ शत्रुता नहीं और किसी के साथ हद से ज्यादा दोस्ती नहीं। वे अपने-आप में मस्तमौला और अपने काम से मतलब रखने वाले एकांतप्रिय व्यक्ति हैं। प्रशंसा या शिकायत सुनने के लिए वक्त भी नहीं है। वे हमेशा अपने कार्य में व्यस्त रहते हैं।

विवेकी राय के अभिव्यक्ति के मुख्य विषय भाषा, संस्कृति, गांव और राष्ट्र हैं। उन्होंने भाषा की वर्तमान स्थिति पर कई निबंध और कहानियों में चर्चा की है और सरकार की भाषा संबंधी गलत नीतियों की आलोचना भी की है। विवेकी राय भोजपुरी-प्रेमी और हिंदी-सेवी रहे हैं। भोजपुरी के शब्द, कहावतें और मुहावरें हिंदी साहित्य के सौंदर्य में और भी अधिक निखार एवं सरसता लाते हैं। संस्कृति के अधःपतन पर भी उनका मौलिक चिंतन हैं। परिवर्तित गांव और आधुनिकता के कारण भारतीय संस्कृति अपना अस्तित्व खोती जा रही है। यह गांव के लिए ही नहीं, देश के लिए भी खतरा है। ‘सोना माटी’ में इस पर विस्तृत चर्चा की है। इसके साथ ही ‘समर शेष है’ ‘लोकऋण’, ‘बबूल’, ‘श्वेत-पत्र’ और ‘मंगलभवन’ में लोकगीत, लोककथाएं, लोकप्रथाएं, रस्म-रिवाज, राष्ट्रगीत आदि प्रचूर मात्रा में है।

‘श्वेत-पत्र’ का स्वतंत्रता आंदोलन, ‘लोकऋण’ के गिरीश का दुःख, ‘समर शेष है’ में चित्रित शिक्षा की अव्यवस्था और गंदी राजनीति, ‘मंगलभवन’ की राष्ट्रीय भावना, ‘नमामि ग्रामम्’ में गांवों की बिगड़ती तस्वीर, निबंधों के ‘मनबोध मास्टर’ की छटपटाहट आदि गांव और देश के प्रति लेखक की प्रतिबद्धता को स्पष्ट करते हैं। विवेकी राय लिखते हैं, "अत्यधिक आत्मीयता और अभिन्नता होने के कारण गांव मेरे सामने सदेह रूप में प्रकट होता है और पीड़ा प्रकट करता है। उसका नकारात्मक दृष्टिकोण, उसकी उलझनें और उनके क्षोभ भरे तर्क और वक्तव्य चौकाने वाले होते हैं। गांव के आदेश से ही उसके वक्तव्य लिखकर मैं अपने पाठकों तक पहुंचना चाहता हूं।" (नमामि ग्रामम्, पृ. 5)

गांव के प्रति आत्मीय भाव ही राष्ट्र की व्यापक परिकल्पना को स्पष्ट करता है।

भारत गांवों का देश है और गांव का प्रमुख आधार किसान है। लेकिन वह गरीबी और पीड़ादायक जिंदगी जीने के लिए मजबूर है। इन्हीं किसानों के यथार्थ रूप को अपने साहित्य में पकड़ने की चेष्टा कई लेखकों ने की है। विवेकी राय के लेखन का विषय गांव, किसान और उनका दिन-ब-दिन बदलता परिवेश ही रहा है। उन्होंने संपूर्ण जीवन में किसान का वास्तविक जीवन अनुभव कर उसका चित्रण किया है। गाजीपुर और बलिया के लोग उनकी साधना और शैक्षिक योगदान को देखकर ‘कवि जी’ और ‘मास्टरसाहब’ कहते हैं लेकिन रामदरश मिश्र सम्मान भाव से ‘किसान लेखक विवेकी राय’ (माटी की महक, पृ. 44) कहते हैं। सही अर्थ और शब्द में की गई विवेकी राय की व्याख्या है – ‘किसान लेखक’। विवेकी राय लिखते हैं, "किसानों का देश मेरा है, बाहर वाला और भीतर वाला, जीवन से जुड़ा हुआ और सृजन से संपृक्त। यह मेरा प्रणम्य देवता है।" (नमामि ग्रामम्, पृ. 5) धरती, गांव और किसान के प्रति समर्पण भाव ही उनकी सृजनशीलता का केंद्रबिंदु है।

विवेकी राय के जन्म (19 नवंबर, 1924) के एक-डेढ़ महीना पूर्व पिताजी का प्लेग की बीमारी से स्वर्गवास हुआ, तब से कठिनाइयों का सिलसिला जारी है। खेती-बाड़ी संभालते हुए अपने बलबूते पढ़ाई-लिखाई पूरी की। उन्होंने मीडल के बाद वाली सारी पढ़ाई बहिस्थ विद्यार्थी के रूप में, अध्यापन कार्य करते हुए पूरी की है। परिवर्तित गांवों की दशा, शिक्षा की अव्यवस्था और संस्कृति का अधःपतन उनका आंतरिक दर्द रहा है। इसी दर्द और दुखते-टीसते हृदय से साहित्य की धारा अखंड़ प्रवाहित होकर कागजों पर उतरती रही है। वे बीमारी और मानसिक तनाव के बाद भी लिखते रहे हैं। इतना सारा क्यों लिखते हो, पूछने पर कहते हैं, "सौ रोगों की एक दवा है काहे न आजमाए।" लिखते रहने से उनका दुःख-दर्द हल्का होता है। इसी कारण विष को पचाने की ताकत उनमें आई है। पूरी जिंदगी समरभूमि पर डटा हुआ यह योद्धा हृदय से कमजोर बनता गया। वे सन् 1992 में हृदय रोग से आक्रांत हुए। बचने की भी संभावनाएं नहीं थी, लेकिन उनकी दूर्दम्य जिजीविषा और डॉ. वी. जे. पी. सिनहा की कुशलता से जान बची। लेकिन 1993 में – जिसने पाला-पोसा, बड़ा किया, माता-पिता दोनों का प्यार दिया, उस माता जी का देहांत हो गया। माता की ममता, प्यार, झीना-झीना अंचल जिसमें वे छिपे रहते थे, जिसकी छत्रछाया में उन्होंने साहित्यिक संसार खड़ा किया था, वह खिसक गया। आंतरिक दर्द को हृदय में छिपाकर छतविहिन विवेकी राय आकाश की ओर ताकते रहें। इस दुःख से संभलना भी नहीं हुआ कि कठोर कालगति ने 7 मार्च, 1997 को युवा पुत्र ज्ञानेश्वर को उनसे अलग कर दिया। ट्रेन दुर्घटना का खेल खेलते हुए समय ने उनके जीवनाधार की डोर ही काट डाली। इस घटना से उनकी हंसती-खिलती पूरी दुनिया में सूखा पड़ गया और वे गुमसुम हो गए। उनकी अंतरबाह्य की सारी दुनिया तहस-नहस हो गई।

मसिजीवी विवेकी को साहित्य की दलगत राजनिति के चलते उपेक्षा का सामना करना पड़ा है। साहित्य जगत् के दलों ने उन्हें बांधने का प्रयास किया। लेकिन वे इस दल-दल से परे रहें। उनका कहना हैं, "मेरे कुछ ही मित्र मुझे अच्छी तरह से जाने, यहीं क्या कम है! हिंदी में अनगिनत लेखक हैं, जो उपेक्षाओं से मर गए, मगर मेरे विषय में निश्चिंत रहें। मुझे तो उपेक्षाओं से ऊर्जा मिलती है।" (माटी की महक, पृ. 43) प्रतिष्ठा की कामना किए बगैर यह उपेक्षित लेखक अततः प्रतिष्ठित रहा है।

विवेकी राय का जन्म 1924 में हुआ। तब भारत आजादी की लड़ाई लड़ रहा था और पूरे देश पर गांधी जी का ज्वर चढ़ा हुआ था। विवेकी राय कैसे अछूते रह सकते थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् गांधी जी की हत्या हो गई। पूरे देश में कोलाहल मच गया। विवेकी राय भी आहत हो गए। कई दिनों तक उनकी आंखों से आंसुओं की धाराएं बहती रही। उन्हें बीड़ी, तमाखु और सुरती की लत थी। इस घटना का परिणाम यह हुआ कि उन्हें विरक्ति हो गई और नशे का सारा सामान उठाकर बाहर फेंक दिया और तब से आज तक उसे हाथ नहीं लगाया।

गांधी जी का रामराज्य उनके साथ चला गया, अब तो रावणराज्य शेष है। इसी रावणराज्य के साथ विवेकी राय की लड़ाई है और अब तक उनका यह ‘समर शेष है।’

 

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र)

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

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रचनाकार: विजय शिंदे का आलेख - विवेकी राय का समर शेष है
विजय शिंदे का आलेख - विवेकी राय का समर शेष है
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