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अखिलेश मिश्रा की कहानी - धरती की व्यथा

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धरती की व्यथा गाँव की कई औरतें अभुआती थीं। किसी के सिर दुर्गा आतीं तो किसी के सिर में काली चढ़ जाती। किसी के सिर बंदरिया देव चढ़ते तो कोई खु...

धरती की व्यथा

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गाँव की कई औरतें अभुआती थीं। किसी के सिर दुर्गा आतीं तो किसी के सिर में काली चढ़ जाती। किसी के सिर बंदरिया देव चढ़ते तो कोई खुद को किसी की प्रेतनी बताती। सब का व्यवहार भी अलग-अलग ही होता। जैसे किसी के सिर में यदि बंदरिया देव चढ़ गए तो वह मुँह में काँटा डालकर उसे चबाने लगती। कोई खड़े-खड़े ही झूमती रहतीं और अजीब-अजीब सी आवाज निकालतीं। लेकिन ज़्यादातर औरतें दोनों हाथों को सामने जमीन पर रखकर बैठ जातीं और सिर को इधर-उधर बड़ी तेजी से हिलातीं। लोग उनसे रक्षा का आशीर्वाद माँगते।

परबतिया के सिर में साक्षात धरती माता बैठ जाती थीं। वह शांत हो जाती और धरती माता की व्यथा कहने लगती। परबतिया की हालत देखकर मुझे सिंहासन बत्तीसी की याद आने लगती। सिंहासन बत्तीसी की सत्यता पर अब मुझे बिलकुल भी अंदेशा नहीं रह गया था। परबतिया,धरती माता के वश में चले जाने पर नियमित एक ही प्रकार की कहानी सुनाती।

मेरा विस्तार अनंत तक है। अपने इस अनंत क्षेत्र में मैं कई करोड़ों लोगों को समेटे हुए हूँ। मेरे लिए मेरे सभी लड़के बराबर हैं। किसी भी प्रकार का भेदभाव मेरी तरफ से नहीं रहता है। मेरे लड़कों ने अपनी मर्जी से मुझे अलग-अलग क्षेत्रों में बाँट दिया है। मेरे ऊपर गहरी और ऊँची कई दीवारें खड़ी कर दी गईं हैं। कुछ दीवारें तो इतनी ऊँची और भारी हैं कि उनके होने के पीछे छिपी कुटिल भावनाओं के भार से मेरे सीने में दर्द होने लगता है। कहीं-कहीं तो जहरीले और कंटीले तारों को काफी गहराई तक गाड़ा गया है।

मैंने अपने अंदर सब कुछ रखा हुआ है। यह सब मेरी पूँजी है। इसे मैंने अपने बच्चों और उनकी आने वाली अनंत पीढ़ियों के लिए रखा हुआ है। पर मेरे कुछ बच्चे इतने लालची होते जा रहे हैं कि वह मेरी पूंजी को अकेले ही गटक लेना चाहते हैं। मुझे बहुत खराब लगता है। यह लोग इस बात को क्यों नहीं समझ पाते कि अंत में सब कुछ मेरे साथ ही मिल जाता है। मैं द्रढ़ होकर कहती हूँ कि मेरी पूंजी पर मेरे सभी बच्चों का बराबर का अधिकार है।

मेरे पास बताने के लिए इतनी सारी बातें हैं कि सृष्टि सारे कागज उनसे भर जाएँगे,इसीलिए मैंने सोचा है कि आज अपने एक-दो छोटे हिस्से की कहानी ही बताऊँगी। इसको सुनकर आप को थकान नहीं लगेगी और नींद भी नहीं आएगी। जैसा की आप लोग जानते हैं कि मेरे विभिन्न रूपों में से एक रूप किसानों के खेत का भी है। रीवा जिले के रमकुई गाँव में ऐसा ही एक खेत था। यह खेत आज से कई बरस पहले बारह एकड़ का था। आज से करीब सौ-डेढ़ सौ साल पहले इस खेत का पट्टा मगनूराम के नाम पर था। इससे पहले की बात याद करने में मुझे दिमाग पर ज़ोर देना पड़ता है। सब बताते हुए मन कुछ उदास भी हो जाता है अतः मैं दिमाग पर ज़ोर नहीं देना चाहती।

मगनूरान एक सीधा-साधा मध्यमवर्गीय किसान था। उस समय ज्यादातर लोग जमीन जायदाद होने के बावजूद ऐसे ही हुआ करते थे। लोग ज्यादा की उम्मीद भी नहीं करते थे। दो वक्त की रोटी मिल जाए,यही पर्याप्त होता था।

मगनूराम शरीर पर आधा मीटर कपड़ा ही पहनते। बड़ी-बड़ी दाढ़ी,लंबे बाल,सुंदर धँसी हुई आँखे,दुबला-पतला शरीर, मगनू अपनी उम्र से ज्यादा के दिखते। वह मेरे ऊपर हल खुद चलाते। वह हल को कुछ इस तरह से चलाते कि मुझे बिल्कुल भी दर्द नहीं होता था। ऐसा लगता मानो कोई इंसान शरीर पर पावडर धुरुक रहा हो। मैं भी प्रसन्न होकर खूब उपज देती। मगनू अपने हांथों से ही फसल को काटते और गहाई करते। जब अन्न का ढेर लगता तब मगनू के चेहरे पर खुशी फैल जाती। उनके आधे बचे दाँत बाहर निकलकर खुशी मनाते। यह अन्न उनके परिवार के साल भर के खाने-पीने की जरूरत को आराम से पूरा कर देता।

मगनू गरीब थे पर उतने ही स्वाभिमानी भी थे। मगनू की लड़की बड़ी हो रही थी। उन्हें उसकी शादी के लिए पैसों की जरूरत थी। उन्होने जमींदार दिलफेंक सिंह से पैसे उधार लिए। दिलफेंक सिंह ने पैसे उधार तो दे दिए पर ब्याज की दर बहुत ऊँची रखी। दुर्भाग्य से अगले साल सूखा पड़ गया और मगनू पैसा लौटा पाने में पूरी तरह असमर्थ हो गए।

दिलफेंक सिंह मगनू के पीछे पड़ गया। वह रोज-रोज मगनू को कुछ न कुछ उलाहना देता रहता। मगनू स्वाभिमानी इंसान था अतः वह दिलफेंक सिंह के सामने गिड्गिड़ाया नहीं और मेरा पट्टा दिलफेंक सिंह के नाम हो गया।

मुझे उस दिन अपने बच्चों की लाचारी और लालच दोनों पर बहुत तरस आया था। मैं दुःखी हुई थी। मैं सच में खूब रोई थी,यद्यपि ऐसा बहुत कम मौकों पर ही होता है। मेरे लिए सभी बच्चे समान हैं पर जो मेरा सम्मान करता है और मुझसे प्यार करता है,उसके प्रति मेरा भी एक अलग लगाव हो जाता है। यह प्रेम का स्वभाव है।

मगनू अगले दिन मेरे पास आया और खूब रोया। वह फफक-फफककर दहाड़ मारकर रो रहा था। मेरे ऊपर लोट-लोटकर छोटे बच्चे की तरह रो रहा था। मुझे उसने न जाने कितनी बार अपने सिर पर लगाया। मैंने भी उसे आशीर्वाद दिया था। उसी के परिणाम स्वरूप आज मगनू के वंशज अमीर हैं। उनके पास बहुत जमीन है।

दिलफेंक सिंह एक साथ कई-कई हल चलवाता। उसके आदमी हल को बेरहमी से काफी गहराई तक चलाते थे। यद्यपि मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता था पर तब भी जो मनुष्य प्यार और सम्मान से व्यवहार करते हैं,मुझे अच्छे लगते हैं।

दिलफेंक सिंह साल में दो-तीन बार ही मेरे पास आते। मैं उनका इंतजार करती रहती। मुझे दुःख होता कि वह मेरी खोज-खबर लेने मेरे पास कम आते हैं। मैं फिर से कहती हूँ,मैं उन्हीं लोगों के पास रहना चाहती हूँ जो मेरी ठीक से देखभाल करते हैं और मेरा सम्मान करते हैं।

जैसे कि लोग चर्चा करते थे,दिलफेंक सिंह ऐयाश किस्म का इंसान था। उसकी कई बीबियाँ थीं। कुछ बीबियाँ वह विदेश में भी रखे हुआ था। जब उसकी पहली बीबी सुलोचना को इसके बारे में पता चला तो उसने केस कर दिया। दिलफेंक सिंह एक दिन सब कुछ बेचकर बाहर भाग गया। मेरी सहानुभूति सुलोचना के साथ थी। वह चाँद जैसे मुँह वाली बड़ी सुशील लड़की थी।

मैं आपसे कुछ छुपाऊंगी नहीं !मैंने दिलफेंक को श्राप दे दिया था। उसी का असर है कि आज दिलफेंक के वंशजों के पास बिल्कुल भी जमीन नहीं है। उसकी सारी संपत्ति उसकी अन्य बीबियों ने लूट लिया था। वह दिनभर खाँसता बिस्तर में पड़ा रहता था। उसकी सेवा सुलोचना ने ही किया।

मुझे वह बच्चे बहुत पसंद हैं जो स्त्री जाति के हर रूपों का सम्मान करते हैं। मेरा आशीर्वाद हमेशा ऐसे लोगों के साथ रहता है।

दिलफेंक ने मेरा पट्टा जुम्मन के नाम कर दिया था। जुम्मन भी एक सीधा-साधा और नेक इंसान था। वह दिनभर मेरे पास ही रहता और खूब मेहनत करता। वह साल में तीन-तीन फसल उगाता। मुझे भी बहुत अच्छा लगता कि वह हर समय मेरे पास ही रहता है। हम दोनों ने मिलकर खेती के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। पूरे गाँव के लोग आश्चर्य करते । कुछ लोग जुम्मन से चिड़ने भी लगे।

एक दिन जुम्मन मेरे पास निदाई का काम कर रहा था। उसी समय उसकी बकरी मेरे बगल वाले खेत में चली गई। बगल के खेत का मालिक कल्लू उरमलिया और जुम्मन आपस में लड़ बैठे। मैं बहुत दुःखी थी क्योंकि दोनों ही मेरे पुत्र थे और बिना खास वजह मुझे कारण बनाकर मेरे सामने लड़ रहे थे।

गाँव में मुसलमानों के सिर्फ दो ही घर थे। जुम्मन काफी अकेला महसूस करते। कुछ साल के बाद वह जमीन,घर इत्यादि बेंच-बाँचकर दूसरे गाँव चले गए।

अब मेरा पट्टा संतू के नाम हो गया। संतू भी मेहनती इंसान था। वह मेरा ख़याल रखता और मेरे पास अकसर आता रहता। खूब मेहनत करता पर वह बूढ़ा हो चला था। उसके चार बेटे थे। वह सब अलग-अलग रहना चाहते थे अतः संतू ने उनका बटवारा कर दिया। मेरा पट्टा चारो बच्चों के नाम हो गया। मैं चार हिस्सों में बट गई।

संतू के दो बेटे मेहनती थे। उन्होने मेरी खूब देखभाल की। लेकिन अन्य दो बेटे लापरवाह थे अतः कुछ साल के भीतर ही उन्होने मेरे कुछ हिस्से को बेंच दिया।

मुझे बहुत बुरा लग रहा था। मैं अपमानित महसूस कर रही थी। मैं समझती हूँ कि कभी-कभी इंसान को जिम्मेदारियों के चलते मजबूरी वश मुझे किसी अन्य को बेंचना पड़ता है और ऐसे समय मैं अपने बच्चों की मजबूरी की पीड़ा को खुद भी महसूस करती हूँ पर जब कोई बिना किसी खास वजह सिर्फ अपनी कमजोरियों के चलते मुझे दूसरे के नाम पर कर देता है तब मैं बहुत दुःखी हो जाती हूँ। ऐसे ही मनुष्यों को मैं श्राप दे दिया करती हूँ। ऐसे व्यक्ति फिर आने वाली कई पीढ़ियों तक जमीन के मालिक नहीं बन पाते हैं।

इसी तरह से मेरे हिस्से के पट्टे बदलते गए और मैं छोटे-छोटे टुकड़ों में सिमटती गई।

इसी गाँव के मैं एक दूसरे खेत की कहानी बताती हूँ। पाँच साल पहले मेरे पट्टेदार ने दस लाख रुपए में मुझे किसी और के नाम कर दिया। नए पट्टेदार ने उसी साल पंद्रह लाख रुपए में मुझे किसी और के नाम करवा दिया। नए मालिक ने मेरे पाँच टुकड़े किए और दो साल के बाद उसने कुल चालीस लाख रुपए में मेरे टुकड़ों को पाँच लोगों के नाम कर दिया। मेरे नए पट्टेदार अब टुकड़ों के भीतर नए टुकड़े बनाकर मुझे फिर से बेचने की योजना बना रहे हैं। बार-बार मालिकाना हक बदलना मुझे अच्छा नहीं लगता है। मैं भी स्थिरता चाहती हूँ।

मैं हमेशा अपने बच्चों की भलाई ही चाहती हूँ और ऐसा ही करती रहूँगी। मेरा सबसे निवेदन एक ही है कि सब मिलकर रहें। मेरे छोटे से अंश के लिए अपने और दूसरे के सिरों को मत फोड़े।

आजादी के पहले हिन्दुस्तान के नाम से मेरा बहुत बड़ा भूभाग था। इस क्षेत्र को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए हिन्दू,मुसलमान साथ होकर लड़े। पर बाद में वह अपने-अपने क्षेत्र के लिए लड़ने लगे। कितनी लाशें देखी हैं मैंने ?दिन -रात रोती थी मैं !आजादी मिली पर बटवारे के साथ। मुझे दो हिस्सों में बाँट दिया गया। मैं सोच रही थी कि हो सकता है मेरे लड़के अब दुश्मनी भूलकर प्रेम से रहने लगें। मैं यही सोचकर अपने आप को संतुष्ट कर रही थी। लेकिन मेरी सोच गलत निकली । नफरत का जो बीज अंग्रेजों ने बोया था,वह आज भी फल-फूल रहा है। मेरे बच्चे एक-दूसरे की जमीन पर खून बहाने में ही लगे रहते हैं। क्या किसी ने कभी सोचा है कि मुझे कैसा लगता होगा ?अपने-अपने स्वार्थ के लिए मेरा बटवारा कर दिया। अपने हिस्सों पर आधिपत्य जमा लिया पर मेरी आत्मा तो वही है। मैं तो वही हूँ।

मेरे अंदर पानी है। बहुमूल्य खनिज पदार्थ है। सब कुछ है। पर इसे कुछ लालची लोग अकेले गटकना चाहते हैं। अरे !यह तो सबके लिए है फिर इसमें अकेले कुछ का अधिपत्य क्यों ?

पहले कहते थे कि अंग्रेज सब लूटे ले जा रहे हैं,पर अभी क्या हो रहा है ?क्या मुझे लूटना बंद हुआ है ?

यह सब लोग इस बात को भूल जाते हैं कि मैं सब कुछ देखती रहती हूँ। जो मुझे एक तरफ से लूटेगा,उसका सब कुछ मैं दूसरी तरफ से निकाल लूँगी। दूसरों का कर्ज उतारना ही पड़ेगा।

बड़े-बड़े महाराजाओं के वंशजों की हालत देखो ? सिर्फ वही बचेंगे जो जनता के प्रति अपने कर्तव्यों को समझते थे और जनहित का काम करते थे। बाँकी अपने पूर्वजों के लालच और कुकर्मों की कीमत चुका रहें हैं और आगे भी चुकाएंगे।

मैं अपने पुत्रों का अहित नहीं चाहती हूँ पर यदि मेरे बच्चे अपने लालच और स्वार्थ पर नियंत्रण नहीं रखेंगे तो मेरा धैर्य जबाब भी दे सकता है। इसीलिए कहती हूँ कि,” सुधर जाओ मेरे पुत्रों !”

यह सुनाने के बाद परबतिया के सिर से धरती माता उतर जातीं और तब वह अपने घर के दैनिक कार्यों में व्यस्त हो जाती। उसका व्यवहार बिलकुल सामान्य हो जाता। उसे बोलने में संकोच होने लगता और वह सर को ढँक लेती । धरती माता के बारे में पूंछने पर वह भोले भाव से कह देती,”हम कुछ नहीं जानित आहेन । ”

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परिचय ----

नाम- अखिलेश मिश्रा

जन्म स्थान –रीवा मध्यप्रदेश

शिक्षा- एम टेक

संप्रति-भारतीय रेल में कार्यरत

रचनाएँ-हंस,परिकथा,आधारशिला,जनपथ,साक्षात्कार,साहित्य परिक्रमा,परिंदे,साहित्य कुंज इत्यादि पत्रिकाओं में कहानी प्रकाशित

 

पता- क्वार्टर नंबर 26/1,टाइप 5 बी

रेल अफसर कालोनी

बँगला यार्ड बिलासपुर (छत्तीसगढ़ )

पिन-495004

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रचनाकार: अखिलेश मिश्रा की कहानी - धरती की व्यथा
अखिलेश मिश्रा की कहानी - धरती की व्यथा
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