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पखवाड़े की कविताएँ

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रामवृक्ष सिंह (1) कभी लक्ष्मी, कभी काली (कविता) डॉ. रामवृक्ष सिंह कभी लक्ष्मी, कभी काली, कभी राधा, कभी सीता। कभी यमुना, कभी पद्मा, कभी गोद...

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रामवृक्ष सिंह

(1)
कभी लक्ष्मी, कभी काली
(कविता)
डॉ. रामवृक्ष सिंह
कभी लक्ष्मी, कभी काली, कभी राधा, कभी सीता।
कभी यमुना, कभी पद्मा, कभी गोदावरी-गंगा।।
कभी गौतम की पत्नी है, कभी मनु संग शतरूपा।
हजारों रूप हैं इसके, मगर हर रूप में पूज्या।।

कभी तो सिंह पर चढ़कर अभय सब पर लुटाती है।
कभी हंसासिनी बनकर मधुर वीणा बजाती है।।
पुरुष की सहचरी प्रकृति बनी संसृति रची इसने
यही माया जो निर्गुण ब्रह्म को सक्रिय बनाती है।।

महीनों कोख में रखकर प्रसव की वेदना सहती
निरन्तर वक्ष से जिसके अमिय की धार है बहती
हजारों दुःख सहकर भी धरा-सा धैर्य धारे जो
वही नारीत्व का गौरव, जिसे दुनिया है माँ कहती

कभी नन्ही-सी बेटी बन कलुष दिल का मिटाती है
कभी बहना बनी भइया को राखी बाँध जाती है।
जो देती साथ साए-सी, सदा दुख में, सदा सुख में
जो अपने सात फेरों को कयामत तक निभाती है।।

कहाँ से राम आते गर न कौशल्या रही होतीं।
कहाँ कान्हा जनम लेते अगर ना देवकी होतीं।
अकेले ही ख़लाओं में भटककर मर गए होते,
अगर पहलू में आदम के कोई हव्वा नहीं होतीं।।

अगर सुन्दर है दुनिया तो उसे किसने सजाया है।
कदम मर्दों के कदमों से सदा किसने मिलाया है।
हो खेती या कि मजदूरी या दफ्तर के मसाइल हों,
कहाँ मर्दों ने औरत को नहीं मौज़ूद पाया है।।

जतन करके जो औरत ने हसीं जन्नत बनाई है।
तो फिर मैं पूछता हूँ क्यों वो इस सबसे पराई है।
जमाने ने ख़वातीनों के हक को छीनकर यारब
अदावत किसलिए उनसे जनम भर की निभाई है।।
नहीं रहना है उनको बुतकदे की मूरतें बनकर।
नहीं है आरती की आरजू उनकी निगाहों में।
उन्हें तो है तमन्ना हर कदम पर साथ चलने की
पुरुष की सहचरी बनकर औ डाले बाँह बाँहों में।

वे खुद मुख्तार हों अपनी, करें हर फैसला अपना।
उन्हें इज़्ज़त मिले हर सू, हो उनका फ़लसफ़ा अपना।
उन्हें वाज़िब मिले हिस्सा सरे-फिरदौसो-जन्नत में
जमीं उनकी रहे अपनी, औ उनका आसमां अपना।।

(2)
    धूप है आई, धूप है आई
(बाल-कविता)
डॉ.रामवृक्ष सिंह

आसमान  ने  ओढ़  रखी थी कुहरे की इक धुली रज़ाई।
काँप रहे थे जीव जन्तु सब, नहीं था पड़ता कुछ दिखलाई।
अभी-अभी  जाने  किसने  आ जरा रज़ाई  है सरकाई।
चमक  उठे  हैं  सबके चेहरे- धूप है आई, धूप है आई।

पेड़ों  ने  पत्ते  फैलाकर  धूप  दिखा,  आरती उतारी।
वृन्त-वृन्त पर चटक-चटक कर कलियों ने सुगंध निज वारी।
खग-कुल  ने  प्रमुदित  हो  अपने  नीड़ छोड़  डैने फैलाए।
पूँछ  उठा  चरने  जाने  की  गो-धन  ने कर ली तैयारी।

खेतों  में फसलों के पत्तों पर बिखरे मोती के दाने।
आसमान से उतर रही है धूप हंसिनी उनको खाने।
कण-कण में उल्लास जगा है धरती के जाने-अनजाने।
धूप है आई धूप है, आई जीव जंतु सब लगे हैं गाने।

रोज रात को जब धरती पर घिरता है घनघोर अंधेरा।
कहीं रोशनी और उष्णता लेकर चलता एक चितेरा।
होता है आक्रान्त मनुज का हृदय कभी जब घोर निशा से,
तब-तब आकर धूप धरा पर करती है जीवन का डेरा।।

धूप के खिलने पर जन-जन का हृदय कमल भी खिल जाता है।
छँट  जाते  अवसाद  के  बादल,  मंद-मंद मन मुसकाता है।
धूप  के  आने  पर  जीवन  की  नई  आस करवट लेती है।
धूप  की  किरणों से जीवों का जन्मों का अद्भुत  नाता है।
---0---

   
महुए रहे नहीं बागों में, नहीं उगाते हम अंगूर।
जौ की खेती भूल गए हैं, शीरे का भी नहीँ शऊर।
बिकती है जो मदिरालय में उसके दाम नहीं हैं पास
किन्तु शाम ढलते ही सबको मदिरा तो चाहिए जरूर।
 
सरकारी ठेके से शासन करता है पैदा राजस्व।
उसे जुटाने में जनता का चाहे लुट जाए सर्वस्व।
शासन की तो सैफइया में सजी हुई महफिल रंगीन
माताओं की गोद उजड़ती हो या माथे का सिन्दूर।
 
त्राहि-त्राहि कर रहे आम जन, मचा हुआ हर सू कोहराम।
बिछी हुईं बागों में लाशें, जहाँ बिछा करते थे आम।
होता है हर बार यही क्यों, कुछ क्यों होता नहीं उपाय
शासन अपनी ही सत्ता के मद में क्यों रहता मगरूर।
 
लोग मरे जाते हैं भूखे या पीकर कच्चा ज़हराब।
दूध नहीं मिलता बच्चों को पर मिलती है खूब शराब।
अब तो जागो, हे नेताजी, अब तो चेतो हे सरकार,
गंगा में लाशें लावारिस सौ-सौ मिलने लगीं हुजूर।
 
हमको क्या, हम तो लिखते हैं अपनी ही मस्ती के गीत।
हमें पता है यहाँ सभी को है केवल पैसों से प्रीत।
मरते हैं तो मर जाएँ सब, हमको हो जाए कुछ लाभ
सत्ता के गलियारों में बस यही फ़लसफ़ा है मशहूर।।


**************.

विजय वर्मा

फिर हवाओं में ज़हर छितराने लगे हैं
रोज़ मिलने वाले भी कतराने लगे हैं।
 
इस कदर शको-शुबहा है तारी फ़िज़ा में
डर लगा जब अपने भी बुलाने लगे हैं।
 
दरिया को तो  दोष है देना बे-मतलब
लोग खुद उसमें गन्दगी मिलाने लगे हैं।
 
रातभर जुगनुओं ने दिया साथ लेकिन
भोर होते लोग घरों से भगाने लगे हैं।
 
तूफानों के बाद दम कितना है बाकी
देखने को वो टहनी हिलाने लगे हैं।
 
तारीफ़ दीये की है ,की अदावत हवा से
उसे देख हम भी हिम्मत जुटाने लगे हैं।
 
 
 
 

 
V.K.VERMA.D.V.C.,B.T.P.S.[ chem.lab]
vijayvermavijay560@gmail.com
************************.

मनोज 'आजिज़'


टुसू पर्व की धूम मची है
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             --
            

फाग परिवेश लेकर आया
मकर-संक्रांति का दिन
खेत-खलिहान, घर-आँगन तक
सब खुशियों में लीन।

सूर्य-देव के दर्शन से
पूर्ण होता स्नान कर्म
तिलकुट और दही-चूड़ा से
शरीर हो जाता गर्म।

टुसू पर्व की धूम मची है
'गुड़-पीठा' का आनंद
'मुर्गा-पाड़ा' गांव-गांव में
ठण्ड भी हो जाये मंद।

ढोल, धमसा, मांदर लेकर
चलती लोगों की टोली
शाम होते घर वापसी
भर उमंग से मन की झोली।

झारखण्ड की मुख्य पर्व यह 
'चौडाल' की मेला
टुसू-गीत पर थिरकते हैं सब
घाट-बाट में रेला।

-                 
-    आदित्यपुर, जमशेदपुर

***********************.

जसबीर चावला


संगीनों के साये में स्कूल
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डरी फ़िक्रमंद मांओं ने
बलैयाँ ली नजर उतारी
दुआएँ माँगी अल्लाह ताला से
जिगर के टुकड़ों को चूम कर रुखसत किया
फ़ौजी संगीनों के साये में स्कूल बैरक हो गई
जेल सी ऊंची स्कूल की दीवारें
अमन की फ़ाख्ता नदारद थी
फूलों में बारूदी गंध
माहौल में गोलियों की आवाज़ें
तितलियों के कटे पंख
लो बच्चे फिर स्कूल आ गये

बच्चों ने क़ौमी तराना गाया
पाक ज़मीं शाद बाद
किश्वर ए हसीन शाद बाद
आगे गाया
परचम ए सितारा ओ हिलाल
रहबर ए तरक़्क़ी ओ कमाल
तर्जुमान ए माज़ी शान ए हाल
जान ए इस्तक़बाल
साया ए खुदा जुल जुलाल
बच्चों ने सोचा होगा
सचमुच ख़ूबसूरत रह गई हमारी जमीं 
सिजदे के क़ाबिल है लहूलुहान ज़मीं
ले कहां जा रहा क़ौमी परचम
कहां है तरक्की की मंज़िल
क्या यही है दिलकश दौर / शानदार आज़
मुस्तकबिल की उम्मीद कहाँ है
जो बचायेगा खुदा का निशान ए परचम

क्लास में नहीं थे ढेरों दोस्त
सलमा नहीं थी सलमान नहीं था
आयशा अरमान नहीं थे
यहाँ रहमान वहां तब्बसुम बैठती थी
अहमद ने इस जगह दम तोड़ा वहाँ नजमा गिरी थी
नौ टीचर क़ुर्बान हुई बच्चों की ख़ातिर
प्रिंसिपाल ताहिरा काजी नहीं थी
ज़िंदा जलायी गयी
रोई आँखों ने सिजदे किये हाथों ने  माँगी दुआएँ
खून के धब्बे नहीं थे दीवारों पर
गोलियों के निशाँ भर दिये
पर ज़ख़्म कहां भरे थे दिलों के

बच्चे जिनकी आँखों में दहशत थी
दिल में नफरत थी
बच्चे जो सोये नहीं कई रातों से
बाबस्ता थे डरावने ख़्वाबों से
दिल में इंतकाम की आग लिये सुलग रहे बच्चे
बच्चे जो चुप थे
बच्चे जो गुमसुम थे
स्कूल में होकर भी गुमशुदा थे
कुछ ग़मज़दा थे
ख़ौफ़ज़दा थे
बोलते थे कैमरे पर
चाहते थे कलाश्निकोव

बच्चे तो बच्चे ही हैं
तालीबानी फ़ितरत क्या जानें
थमा देंगे उनके हाथों में
बाँध देंगे कमर में बम
उड़ जाएंगे बच्चे बेगुनाहों के संग
शहीद का दर्जा देंगे
दहशतगर्द बना देंगे
बोको हराम से कोकराझार
यही करते हैं यही करेंगे

बच्चों बच्चे ही रहो
तालीम लो
इक अमनपसंद नई दुनियाँ की तामीर करो

//जसबीर चावला//

 

*************.

पद्मा मिश्रा

तीन कवितायेँ
[1 ]
ये चरण  शिखर की ओर चलें,
ये चरण शिखर की ओर चलें ,
चाहे कितनी घिरें आँधियाँ -
बाधाएं घनघोर पलें -
संग लेकर सपनों की थाती,
हम नए क्षितिज की ओर चलें,
ये चरण शिखर की ओर चलें ,
जग उठे उम्मीदों का सूरज ,
अभिलाषाओं की भोर तले ,
बढ़ चले कदम फिर रुकें नहीं ,
दृढ़ संकल्पों की ज्योति जले,
ये चरण शिखर की ओर चलें ,
हम नवयुग के जागृत प्रहरी,
संघर्षों में भी झुके नहीं,
साहस के आगे नतमस्तक
मुश्किल पथ पर भी थमे नहीं,
आँखों में जीत भरा सपना,
मंजिल की थामे डोर चले ,
ये कदम शिखर की ओर चलें,
[2 ]
यह भोर सुहानी लगती है!,
शीतलता की छाँह गहे ,
फूलों के खिलने का मौसम,
लालिमा  भरी किरणें नभ पर,
गुंजित विहगों का मृदु सरगम,
सुख का सारा सम्भार लिए-
यह भोर सुहानी लगती है,
अनुरंजित हो हर दिशा-दिशा ,
और मुक्त पवन निर्बाध चले,
सपनों के सुरभित आँगन में,
अभिलाषाओं  के सुमन  खिलें,
स्मृतियों का संसार लिए -
यह भोर सुहानी लगती है,
  मन की सारी ऊर्जा लेकर,
हम कर्म करें-जागृत होकर,
नैतिक आदर्शों की थाती,
स्वीकार करें गर्वित होकर ,
संकल्पों का सम्मान लिए-
यह भोर सुहानी लगती है,- -
[3 ]
भारत की माटी चंदन है !
चन्दन है भारत की माटी,
जहाँ सत्य-अहिंसा कण-कण में,
जन -मन का सहगान बनी,
गांधी के पावन सपनों का ,
साकार रूप -प्रतिमान बनी,
उस माटी को शत बार नमन,
सतकर्मों की सुंदर थाती,
चन्दन है भारत की माटी,
जग में बिखरा अँधियारा तम ,
हमने सूरज बन दिशा गढ़ी
जो नानक-गौतम-ईसा के,
उपदेशों की पहचान बनी,
भारत है जीवित भास्कर सम,
यह सिखलाती श्रम की धरती ,
चन्दन है भारत की माटी,
--पद्मा मिश्रा -जमशेदपुर

************


 

दामोदर लाल जांगिड


छंद-प्रिय छंद

बारह वर्ण बीस मात्रा

ससूत्र -राजभा राजभ राजभा राजभ

दोष तो दूसरों का बताते रहे ।

देश की दुर्दशा को छिपाते रहे ।।

वोट देते  गए  और माथा  धुना ,

चूक  वो  ही  सदा  दोहराते रहे ।

साख थी पीढ़ियों की बची थी जरा ,

वो  उसी को हमेशा  भुनाते  रहे ।

मोहरे  भी  गए  पैदलें  ना बची ,

और  वो  मात पे मात खाते रहे ।

झोंपड़े  निर्धनों  के उठाके वहीं ,

कोठियां ये किलों सी बनाते रहे ।

योजनाएं  बनी  घोषणाएं  हुई ,

जाल ही आंकड़ों के बिछाते रहे ।

आज भी हैं गरीबी वहीं की वहीं ,

खोखले भाषणों से लुभाते रहे ।

             दामोदर लाल जांगिड

***********.

राजेश कुमार पाठक

अर्जुन दिखाए वीरता
खुद आज हम अपनों से भयाक्रांत है
ना एक भी भयमुक्‍त कोई प्रांत है

फिर भी धरा दिखती रही क्‍यों शांत यह
इतना भी क्‍या काफी नहीं वृतांत यह

कानून भी बनते बिगड़ते आज अब
निकले ना कोई जिन्‍न रगड़ते आज तब

क्‍यों आज कौरव है मगर अर्जुन नहीं
क्‍यों आज है वह गीत पर वह धुन नहीं

है कौन वह कौरव हमें जो छेड़ता
ना घेर पाए फिर भी हमको घेरता

आज अब अर्जुन दिखाए वीरता
तब सूर्य भी आए तिमिर को चीरता


समर शेष यह शुरू हुआ

क्‍यों ढोते उन खड्‌गों को, जिनमें कोई धार नहीं
हो सके भी तेरे खड्‌गों से, अब कोई संघार नहीं

नहीं धार हो जब खड्‌गों में उनमें तुम अब धार भरो
रहे आज तक चुप बैठे पर अब तो तुम हुंकार भरो

चारों ओर अराजकता का यह कैसा माहौल
नहीं चाहता फिर भी देखो धरती जाती डोल

खुद से बोलूं आज मगर अब सारा जग सुनता है
नहीं बची हिम्‍मत इनमें बस अपना सिर धुनता है

       तब किसे सुनाउं कालचक्र की करूणामयी व्‍यथा
क्‍या स्‍वर्ग सिधारे वीरों से कह दूं कि लौट के आ

नहीं नहीं यह न्‍याय नहीं
क्‍या इसका अब पर्याय नहीं ?
पर आज मुझे क्‍यों लगता है
कुछ में अर्जुन अब दिखता है

मत धारण कर तू आज मौन
न खोजूं मैं आचार्य द्रोण

इक दूजे का शिष्य हुआ, एक दूजे का अब गुरु हुआ
देखो अब स्‍वर्ग से हे अर्जुन, समर शेष यह शुरू हुआ

यह समर आज अंतिम होगा
मत सोच कि यह मद्धिम होगा
मिट जायेगा अब हर शोषण
कह दो आए न दुर्योधन

       मिट जायेगा अब सब अंतर
हर दुख भय होगा छूमंतर
बिछड़े का होगा आज मिलन
बिनव्‍याही बने नहीं दुल्‍हन

हर दिशा आज संवाद करे
हर क्षण हर पल अनुनाद भरे

अब कोई नहीं छोटा होगा, ना कोई आज बड़ा होगा
हो लघुकाय या भीमकाय सब एक ही साथ खड़ा होगा


नारीत्‍व आज भी जिंदा है

नारी तेरा वह रूप कहां, जब दुर्गा काली कहलाती,
दुश्मन दिख जाने पर उनके, खून से नहलाती

पर आज अचानक अपने को, क्‍यों मान रही मजबूर
तुझसे तेरी वह शक्‍ति, क्‍यों होती जाती दूर

तेरा वह विकराल रूप, है आज मुझे भी याद
दिखते ही सब करते थे, थम जाने की फरियाद

आज मुझे क्‍यों लगता है, उस शक्ति को तुम खो बैठी
जब तेरे ही जिस्‍मों से जलती, कुछ लोगों की भट्ठी

जिस्‍मों से जलती जो भठ्‌ठी, वह आग नहीं बुझने देना
जब बना कसाई कोई तब, ना अपना सिर झुकने देना

    अपनी शक्ति अब पहचानो
    क्‍या सच है अब तुम यह जानो
    सच यही है तुम हो शक्तिमान
    न धरती पर तेरे समान

बस तेरी अर्न्‍तज्‍वाला को, इक चिंगारी की जरूरत
अब दिखो नहीं तुम दीन-हीन और अबला जैसी मूरत

कलम में स्‍याही न भर कर, अब चिंगारी भरता हूँ
पर कभी-कभी लगता है, मैं खुद से क्‍यों डरता हूँ

मैं डरता नहीं कि चिंगारी भड़की तो आग बन जाएगी
बस डरता हूँ कि लगी आग तब कैसे फिर बुझ पायेगी

आग बुझाने का भी सूत्र चलो आज गढ़ता हूँ
धीरे पर मैं सही दिशा में चलो आज बढ़ता हूँ

आग बुझेगी नारी से ही जिसका मान हुआ मर्दन
कानून जहां न पहुंच सके यह जा पहुंचे थामे गर्दन

हौसला यही, यही जज्‍बा मैं ढूंढ़ रहा शहर-कस्‍बा
लग रहा आज मल जायेगी अब देखो गर्म हुआ है तवा

जिसकी खोज जमाने से मिल गयी आज वो सूरत
अगवाई की डोर संभाले इनकी रही जरूरत

इनकी तेज को देख लगे नारीत्‍व आज भी जिंदा है
जब चले तो ऐसा लगता है पुरूषत्‍व आज शर्मिंदा है

अब नारी के नेतृत्‍व में कोई नारी नहीं जलेगी
इनकी ही गोदों में अब ममता सदा पलेगी

 


राजेश कुमार पाठक
पॉवर हाउस के नजदीक, गिरिडीह-815301
झारखंड
       lsy Qksu&9470177888] 7091574338


*************.

निधि जैन


वो बचपन लौट आये
वो माँ का आँचल फिर मिल जाए
कहीं खो गयी जो अठखेलियां
वो जीवन में फिर लौट आएं

वो माँ का दुलार
वो माँ की फटकार
वो डाँट डपटकर भी पेट भर देना मेरा
वो हरदम मेरी ही फ़िक्र करना
वो मुझे अपनी गोद में सुलाना
वो सर पे उंगलियां फिराकर प्यार से उठाना

सब कुछ छूट गया ज़िन्दगी में
मैं कुछ लिख नहीं पाती तेरी बंदगी में
कलम और शब्द साथ नहीं देते
माँ माँ है इससे ज्यादा कुछ और नहीं कहते

पर तेरी ये बेटी आज तुझको तरसती है
तेरी याद में मेरी अँखियाँ बरसती हैं

काश मैं फिर छोटी हो जाऊं
फिर से तेरे आँगन में खिलखिलाऊँ

काश ये काश सच हो जाए
कहीं से फिर मेरा बचपन लौट आये

जो गलतियां करी मैंने वो फिर न दोहराउंगी
अबकी बार तेरी अच्छी बेटी बन जाउंगी

करती हूँ वादा कभी न तुझे रुलाउंगी
बस माँ फिर मैं तुझे छोड़कर कहीं नहीं जाउंगी
फिर कहीं नहीं जाउंगी


***********.

सागर यादव

   गजलें


1 देखो कितना तन्‍हा मैं


नभ में सूरज जैसा मैं

देखो कितना तन्‍हा मैं


दुश्‍मन को गले लगाऊँ

देखो कितना भोला मैं


पागल बन भटक रहा हूँ

देखो लव 1 में सच्‍चा मैं


जब भी मॉ से बिछुड़ गया

देखो आधा-आधा मैं


दुनिया कितनी सतरंगी
देखो सादा-सादा मैं  ।   (लव - प्‍यार)


2 गैरों की महफिल गये थे


हजारों फूल खिल गये थे
जब वो हमसे मिल गये थे


वे घर पल में ही ढह गए
जो जड़ से ही हिल गए थे


काँटों की क्‍या बातें करें
पाँव गुलों से छिल गये थे


सभी के मन से उतर गए
जो पानी1 से गिर गए थे


आज बड़ी खुशी से ‘सागर‘
गैंरों की महफिल गए थे।      (पानी - चरित्र)


3 सारी दुनिया पत्‍थर हैं।


सामने से तो बेहतर हैं
जो पीछे देखो खंजर है


यहाँ हर कोई छुपा रूस्‍तम
जो दिखे वो नही अन्‍दर हैं


सब देखते ही रो पड़ेगे
ऐसा भारत का मंजर हैं


तुमने तो धरती कब की बांटी
अब तो अम्‍बर का नम्‍बर हैं


शीशे का तन्‍हा दिल ‘सागर‘
पर सारी दुनिया पत्‍थर हैं।


4 दुश्‍मन से दिल लगाया हूँ।


दुश्‍मन से दिल लगाया हूँ
पथ में कॉटे बिछाया हूँ


जो कोई भीन कर पाया
मैं वो करके दिखाया हूँ


अपनी मंजिल को भूलकर
सभी को राह दिखाया हूँ


गैरों का दुःख बॉट करके
सुख का पौधा उगाया हूँ


जो ख्‍वाब भूल नहीं पाया
मैं पलकों पे सजाया हूँ ।

 

5 मुहब्‍बत है तो बया कर ।


सभी के दिल में रहता है
क्‍योंकि शीशा सच कहता है


अपना दिल बचाकर रखना
टूट जाने पर चुभता है


रिश्‍ते की कोई कीमत नहीं
पर बाजार में बिकता है


झूठ के साद़गी का नूर
बेईमां से टपकता है


मुहब्‍बत हैं तो बयां कर
बेवजह ही क्‍यों डरता है।


6 गजल का दिवाना ‘सागर‘


घर में कोई रो रहा है
वो भूखा ही सो रहा है।


उसका सब कुछ दांव पर है
फिर क्‍यों सच को ढो रहा है।


वो कैसे खुश रह सकेगा
जो कांटे ही बो रहा है।


जीवन है इक नाव टूटी
फिर क्‍यों नाविक सो रहा है।


गजल का दिवाना ‘सागर‘
अब रूक्‍नों में खो रहा है।


7 मुश्‍किलें आयी तो क्‍या हुआ


मुश्‍किलें आयी तो क्‍या हुआ
फिर तो और भी हौसला हुआ।


ये कैसा वक्‍त आ गया है
अब नाखुदा शख्‍स खुदा हुआ।


अंधेरा होते ही मित्रों
काया से साया जुदा हुआ।


घर का गुलशन उजड़ ही गया
जब  भी रिश्‍ता बेरिदा हुआ।


‘सागर‘ दिल तो पागल ही था
जो बेवफा पे फिदा हुआ।

 

सागर यादव
                               ग्राम नरायनपुर पो0 बदलापुर
                                      जि0 जौनपुर उ0 प्र0

 


*****************.

संजय वर्मा "दृष्टि "


बेटी

बेटी हाथ बंटाती
घर के कामों में
माँ से ही सिखा था
ससुराल जाने का पाठ
ताकि काम के न आने पर
ताना देने के बाणों से
वो मुक्त हो सके।

कहा गया की
माँ के चरणों में स्वर्ग होता
आशीष में होते
आशीर्वाद के मीठे फल
इन्हे कैसे पाया जाता
ये भी सिखा था माँ से ।

मैं  भी माँ से सीखी
बातों को अपनों में
बाट कर खुशहाली का माहौल
पैदा करना चाहती और
घर को स्वर्ग बनाना चाहती हूँ

क्रूर इंसानों द्वारा
भ्रूण -हत्या किये जाने की
खबरें सुनती तो हो जाते मेरे
शरीर पर रोंगटे खड़े
रोकना होगा भ्रूण हत्या

क्योंकि कई माँ
अपनी बेटियों को
घर का काम और शिक्षा को
सीख देने के लिए
आस लगाये बैठी है
अपने -अपने द्वार ।

संजय वर्मा "दृष्टि "
125 भगत सिंग मार्ग
मनावर जिला -धार (म .प्र )

**************.

अंजली अग्रवाल


आयी हूँ मैं․․․․․․․․․․
आयी हूँ मैं ․․․․․․ अपने परिवार से बिछड़कर․․․․․․․
पूरी यादों का बसेरा समेट कर․․․․․․․․․․․․․
थोड़ा सा एतबार करना․․․․
माँ से कम ही प्‍यार करना․․․․․पर
इन हाथों को हमेशा थाम कर रखना․․․․․․․․
बड़ा दुखी है मन अपनों से बिछड़कर․․․․․․
अब अकेले रहने की तुम बात न करना․․․․․․
ढेरों सपने सजा कर आयी हूँ, पूरा न कर सको तो
पूरा करने की उम्‍मीद ही दे देना․․․․․․
अपने दिल के किसी कोने में इन्‍हें जगह दे देना․․․․․․․․
कच्‍ची मिट्‌टी नहीं हूँ मैं जो तुम्‍हारे आकार में ढल जाऊँगी․․
मुझे इंसान समझ कर थोड़ा सा वक्‍त दे देना․․․․․
बहुत विश्वास करके आयी हूँ मैं․․․․․․․
सारे विधाता को मना कर आयी हूँ मैं․․․․․․․
कम से कम तुम तो मुझे पराया धन न समझाना․․․․․
मैं  खुशियों से तुम्‍हारा आँगन भर दूँगी․․․․․․
बस मुझे इस आँगन का हिस्‍सा बनाकर रखना․․․․․․
न दो चाहे खुशियाँ मुझे पर मेरे गमों की वजह न बनना․․․․․․․
बहुत सहमी हुयी हूँ मैं․․․․ लाखों सावालों से घिरी हूँ मैं․․
क्‍या बताऊँ तुम्‍हें कि आज एहसास हुआ कि लड़की हूँ मैं․․․․․
लड़की हूँ मैं․․․․․
        ------

मेरी पुकार
ऊपर वाले ने भी अजीब सी दुनिया बनाई है....
मेरी जिन्‍दगी आँसुओं से सजाई है.......
नयी जिन्‍दगी को जन्‍म मैं देती हूँ....
और अपनी ही जिन्‍दगी की तुझसे भीख माँगती हूँ....
कोठे में बैठने वाला तो सेठ है .....
और मैं वेश्या बन जाती हूँ....
शाम होते ही आवारा ये इंसान बनकर घूमता है...
और घर से बाहर निकलना मेरा बन्‍द हो जाता है...
गन्‍दी निगाहों से वो देखता है.....
और नजरें मुझे झुकाना पड़ता है....
ये कैसा इंसाफ है तेरा...
जहाँ सब मुझे ही सहना पड़ता है....
लड़की पैदा हो जाए तो भी दोष मेरा ही होता है...
यहाँ तो न मायका और न ससुराल मेरा होता है....
कहाँ जाऊँ मैं ....
यहाँ का तो कानून भी अंधा होता है.....
मुझे पढाया नहीं जाता क्‍योंकि...
मुझे दूसरे घर जाना होता है.....
ससुराल में मैं कुछ कर नहीं सकती क्‍योंकि...
यहाँ मुझे बच्‍चे सम्‍भालना होता है.....
देख मेरी हालत को....
मैं इंसान नहीं दीपक हूँ....
जिसे बस जलना होता है....
बस जलना होता है।
--
कन्‍या भ्रूण हत्‍या भाग-2
मेरा ही हिस्‍सा है तू.......
कैसे अपने से दूर कर दूँ तुझे.......
कितने ही मंदिर में दीपक जलाया हूँ........
तब तुझे पाया हूँ........
क्‍या बताँऊ तुझे........तू बोझ नहीं मुझ पर.....
तेरे लिये कितनी रात अकेले में आँसू बहाया हूँ..........
मैं भी तुझे अपनी गोद में खिलाना चाहता हूँ.......
ऊँगली पकड़ कर तेरे साथ चलना चाहता हूँ.......
तुझे तो मैं अपना बेटा बनाना चाहता हूँ.......
अन्‍तिम अग्‍नि भी तेरी हाथों की चाहता हूँ.......
डेरों सपने बुन चुका हूँ मैं.....
तेरी डोली अरमानों से सजा चुका हूँ मैं.....
पर डरता हूँ मैं..... इस बदलती दुनिया से........
जहाँ लड़कियों को कभी दहेज के लालच में जला दिया जाता है..
तो कभी लड़कों द्वारा अपनी हवस का शिकार बना लिया जाता है..
कभी शिक्षा देने वाला शिक्षक ही भक्षक बन जाता है....
तो कभी न करने पर उन्‍हें तेजाब से मिटा दिया जाता है..
रूह काँप जाती है मेरी....
कैसे लाऊँ तुझे इस दुनिया में......
जहाँ कदम कदम पर डर का साया है....
कैसे महफूज रख पाऊँगा मैं तुझे.......
बस यही सवाल मन में उठता है...
मुझे माफ करना मेरी बेटी....
मुझमें हिम्‍मत नहीं तुझे इस दुनिया में लाने की.....
मैं निसंतान ही रह जाऊँगा .......
पर तेरे दर्द को न सहन कर पाऊँगा........
मुझे माफ करना मेरी बेटी....
मुझे माफ करना मेरी बेटी....तेरे आँसुओं को में न पी पाऊँगा....
----
हमारे देश में कन्‍याभ्रूण हत्‍या तब बन्‍द होगी जब
देश का कानून सशक्त होगा जब देश की हर लड़की
अपने आप को यहाँ सुरक्षित महसूस करेगी....
     उस दिन हर पिता अपनी बेटी को जन्‍म देगा......
                            


*********************

देवेंद्र सुथार

भ्रूण हत्या

आज के इस संसार मेँ ये क्या हो गया,
लड़कियोँ का प्यार कहाँ खो गया?

कैसी ये मनहुस घडी है।
भ्रूण हत्या की लगी झडी है।
लड़के की सब करते है इच्छा
लड़की से सब करते है उपेक्षा
कहां गयी वो माँ की ममता,
लड़का-लड़की मेँ फर्क जो समझा
बुरे कर्म करते रहते ये माता-पिता
ओढ़ते जो भ्रूण हत्या का ये छाता

लड़कियोँ पे क्यूँ जुल्म ये करते
जन्म से पहले इसे कुचलते
डाँक्टर भी है बराबर दोषी
जिनको हम भगवान समझते
कौन महान जो इसे रोकेगा
कब ये सोया समाज जगेगा
आज सभी मिलकर संकल्प लेना है
भ्रूण हत्या के पाप को आज मिटाना है।

लड़कों को तो खूब पढाया
लड़की को धन समझा पराया
लड़कों को ये समझे सितारे
लड़की जात को ठोकर मारे
फिर भी दुनिया नहीँ समझती
लड़की दो घर रोशन करती
भ्रूण हत्या के पाप को आज मिटाना है
लड़का-लड़की मेँ चल रहे भेद मिटाना है।

पढा लिखाया वसुंधरा को
प्रदेश चल रहा इनके हाथोँ
पढी लिखी कल्पना चावला
जिसने नभ को है छू डाला
पढ़ती रही प्रतिभा पाटील
राष्ट्रपति का पद किया हासिल
शिक्षा से जीवन उज्ज्वल बनता है
महिला के हाथोँ ये शासन चलता है।

--
-देवेन्द्र सुथार,'स्वयंसेवक',बागरा,जालौर।
devendrasuthar196@gmail.com

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