मनोज कुमार श्रीवास्तव का आलेख - 21 वीं सदी का साहित्य और सांस्कृतिक चेतना

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                                                          यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो समाज भी साहित्य का दर्पण होता है। दोनों एक-दूसरे क...

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          यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो समाज भी साहित्य का दर्पण होता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। अनेक ऐतिहासिक ज्वार-भाटा को पार करते हुए आज साहित्य ने 21 वीं सदी के घर में प्रवेश किया है। साहित्य हृदय की भावनाओं के प्रकटीकरण का उत्तम और सशक्त माध्यम है। प्रत्येक साहित्यकार अपनी भावनाओं को व्यंग्य और चिंतन अथवा सम-सामयिक विषयों के माध्यम से उजागर करता है


        अब दूसरी बात यहां पर यह आती है कि मौजूदा साहित्य का उपयोग कितना और किस तरह हो रहा है? क्या वह साहित्य जनोपयोगी, राष्ट्रोपयोगी अथवा विश्वोपयोगी है? अच्छे साहित्य में इन बातों का होना अनिवार्य शर्त होती है तथा ऐसा साहित्य सांस्कृतिक चेतना और प्रेरणा का जगाने का कार्य भी करता है। जब हम किसी रचना या आलेख को गौर से पढ़ते हैं तब हम उस रचना पर चिंतन करते हुए लेखक या कवि की मनःस्थिति का आंकलन करते हैं तदुपरांत हम इस निश्चय पर पहुँचते हैं कि यह लेख या कविता जनोपयोगी अथवा सांस्कृतिक चेतना हेतु उपयुक्त है अथवा नहीं।


        21 वीं सदी आधुनिकता का आकाश है। एक ओर हम चंद्रमा और अंतरिक्ष के मर्मों के निकट पहुंच चुके हैं तो दूसरी ओर हमारे जीवन, समाज और राष्ट्र में अनेक ज्वलंत समस्याएं भी उपस्थित हैं जिनसे हमारा साक्षात्कार अनवरत् होता है। ऐसी समस्याओं और कुंठाग्रस्त विचारधाराओं को 21 वीं सदी का साहित्य किस हद तक सांस्कृतिक चेतना प्रदान करने में सफल हुआ है, यह चिंतन का विषय है।


        समाज में साहित्य के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना जगाने का कार्य तो आदिकाल से ही होता आ रहा है। फिर चाहे वह आदिकाल के चंदवरदायी हो, भक्तिकाल के कबीरदास हों, रीतिकाल के घनानंद हों या 21 वीं सदी के निराला, दिनकर या माखनलाल चतुर्वेदी हों। सभी ने अपने साहित्यिक प्रयासों से समाज को दिशा देने का प्रयास किया है।
        अन्य कालों की अपेक्षा 21 वीं सदी की समस्याएं, व्यापकताओं के साथ-साथ बलशाली भी हो गयी हैं। इसलिए साहित्यकार भी इन्हीं परिस्थितियों को आधार मानकर अपनी बातों को सांस्कृतिक चेतना का रूप देने का प्रयास करता है। इस दिषा में अनेक उदाहरण भी उल्लेखनीय हैं। श्री महेन्द्र श्रीवास्तव की कृति ' सलवटें चादर की' में दृष्टव्य है-
            '' घर में पत्नी, पुत्र एवं पुत्री,
              तथा स्वयं के लिए,
              पर्याप्त खुशनुमा स्थान है,
              पर माँ के निवास के लिए,
              अपरिहार्य एवं परिहार्य कारण
              जाहिर कर............क्या खूब,
              विवेकशीलता का परिचय देते हैं। ''


        यह विडम्बना ही है कि इस संसार में मातृसत्ता ही है जो सृष्टिकर्ता का रूप है किंतु सबसे अधिक दुख 'माँ' को ही दिया जाता है, ऐसे में श्री महेन्द्र श्रीवास्तव की उपर्युक्त पंक्तियां मूढ़ों में चेतना जागृत करने का सफल प्रयास है।
        महेन्द्र श्रीवास्तव की ही कुछ पंक्तियां जो शासन के पल्स पोलियो अभियान को एक यज्ञ की उपमा प्रदान करती हैं जिसमें जनता का सहयोग रूपी हवन अपेक्षित है-
            ''  पल्स पोलियो के यज्ञ में,
               नौनिहालों को दो बूंद पिलाकर,
               याज्ञीय हवन अर्पित करें।  ''
        इसी तरह सामाजिक कुरीति का सबसे बड़ा धब्बा 'दहेज' पर भी महेन्द्र श्रीवास्तव अपनी रचना के माध्यम से करारा प्रहार करते हुए दिखायी देते हैं-
             ''  दर्द भरा एक सा प्रलय,
                भाग्यविधाता क्यों कर लाता,
                अबलाओं पर यह भय?
                सच है जली थी लंका,    
                लेकिन कब तक कितनी सीताएं,
                देंगी अग्नि परीक्षा।
                नीर बहाकर नारी
                हर क्षण सहकर भीषण पतझड़
                लिखती है मौन कहानी।  ''


        सामाजिक समस्याओं से रूबरू कराते हुए श्री रमेश कुमार सिंह चौहान हमें नक्सली समस्या की रणभूमि में ले चलते हैं। अपनी छत्तीसगढ़ी कृति 'सुरता' में उन्होंने नक्सलियों की 'मानवता' को ललकारा है जो कि शायद उन आतंकियों के भीतर नहीं है-
              ''  मोर हरियर भुंइया के रंग,
     लाल होवत काबर हे,
     मोर सोनचिरइया कस ये धरती,
     रोवत काबर हे,
     हमर मन के विकास इंखर आंखी म,
     गड़त काबर हे,
     जब पाथें तब एमन,
     लाल सलाम देवत काबर हें।  ''


साहित्य की अथाह शक्ति मनुष्य को सकारात्मक मार्ग के लिए प्रेरित करती है। 21 वीं सदी के साहित्यसागर में ऐसे-ऐसे मोती हैं जो हमें सच्चाई की चमक देखने पर विवश कर देते हैं। रमेश कुमार सिंह चौहान की कृति 'दो रंगी तस्वीर ' की यह पंक्तियाँ उक्त विचारों को पुष्ट करती हैं-
        ''  फैशन के चक्कर में,
           पश्चिम के चक्कर में,
           भूले निज संस्कारों को,
           हिन्द नर-नारियाँं,
           अश्लील गीत-गान को,
           नंगाय परिधान को,
           शर्म-हया के देश में,
           मिलती क्यों तालियाँ।  ''
    उपर्युक्त पंक्तियां 21 वीं सदी की ही व्यंग्य रचनाएं हैं जो व्यवस्था पर कटाक्ष के साथ-साथ सांस्कृतिक चेतना जागृत करने का प्रयास करते हैं।


        चेतना जागृत करने की इसी कड़ी में प्रसिद्व व्यंग्यकार श्री सुरजीत नवदीप ने अपनी कृति 'रावण कब मरेगा' में विभिन्न सामाजिक समस्याओं पर चेतना जागृत करने का मारक प्रयास किया है। उन्होंने वर्तमान में लगातार हो रहे धार्मिक आयोजनों के बाद भी व्यक्तियों के मन परिवर्तन नहीं होने पर लिखते हैं-
              ''  गाँंव-गाँंव में,
                धार्मिक आयोजन हो रहे हैं,
                अपने अंदर के कलुष को,
                धो रहे हैं।
                राम की कथा सुन रहे हैं,
                पवित्रता कैसे आयेगी,
                गुन रहे हैं।  ''


        सुरजीत नवदीप वर्तमान की बेरोजगारी के साथ-साथ बदलते परिवेश में पढ़े-लिखे युवाओं की मानसिकता का चित्र भी खींचते हैं-
              ''  अब
                 पढ़-लिखकर बच्चे
                 पैकेज हो गये हैं,
                 विदेषों में नौकरी करनी है
                 इसलिए
                 हर क्षेत्र में
                 तेज हो गये हैं।  ''


        विवाहों के अवसर पर बाराती प्रथा के मनमाने ढंग से चलन में बरती जाने वाली असावधानियाँ और दुर्घटनाओं पर भी वे बेबाकी से लिखते हैं-
               ''  गाँव-गाँव
                  शहर-शहर शोर है,
                मेटाडोर, जीप
                बस ट्रेक्टर में
                बाराती भरे जा रहे हैं,
                दुर्घटनाएं रोज हो रही हैं,
                फिर भी लोग
                बारात के लिए मरे जा रहे हैं।  ''


        समस्याओं की ओर इंगित करना ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि उसका समुचित समाधान बताना ही साहित्यिक  गतिविधियों को पूर्ण एवं सफल करता है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार अनुपम वर्मा ने अपनी कृति 'दस्तक' में देष में भड़कने वाले दंगों का उल्लेख किया है जिसमें बेकसूरों के घर बर्बाद हो जाते हैं-
              ''   दंगे में हजारों लोग मारे गये,
                बस्तियां लुट गईं,
                जलते चूल्हे जलकर,
                खाक हो गये।  ''


        एक साहित्यकार जब सामाजिक समस्याओं को अपनी दृष्टि से देखता है तो वह उसका हल भी खोजने का प्रयास करता है। उसकी लेखनी चल पड़ती है, जब तक उसे उसके उस मुकाम का अंतिम लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।


        साहित्य में समाज को प्रभावित करने की अपार शक्ति होती है। इसीलिए समाज में सांस्कृतिक चेतना जागृत होती है। मुझे स्मरण हो रहा है कि बेमेतरा जिले के नवागढ़ क्षेत्र के मुरता नामक ग्राम में छोटे से कवि सम्मेलन में गाँंवों में चल रहे 'शराबखोरी' पर मैंने रचना सुनायी। उस कवि सम्मेलन के दो माह पश्चात उसी गाँव के एक युवक से मुलाकात हुई जिसने कविता की उन पंक्तियों को सुनकर शराब छोड़ दिया था। 'गम्मत' नामक कृति की यह पंक्तियां छत्तीसगढ़ी में हैं-
            ''  रात-दिन के पियई,
               कूकुर कस जियई,
               एके पइत मर न,
               घेरी-बेरी के काय मरई।  ''


        जब एक साहित्यकार को समाज में सांस्कृतिक चेतना जगाने में इस तरह की सफलता मिलती है तो वहाँ दुगुने उत्साह से समस्याओं से साक्षात्कार के लिए तैयार हो जाता है। समस्याएं समाप्त हो न हो किंतु साहित्यकारों के कदम इस दिषा में निरंतर चलते रहते हैं। समस्याएं चाहे परिवार की हों, समाज की या शासन की हों, साहित्यकार पूरी ईमानदारी से उनके विरूद्ध खड़़ा होता है। 'गम्मत' कृति से ही शर्तें लागू शीर्षक में मैंने यही बताने का प्रयास किया है कि निम्न तबके के या असहाय लोग जब शासन की ही योजनाओं का लाभ लेने का प्रयास करते हैं तब वे योजना के निर्धारित शर्तों को पूर्ण करने में असमर्थ हो जाते हैं और उनके हित में बनायी जाने वाली योजना एक व्यावहारिकता बनकर रह जाती हैं, इस बात को मैंने अपनी कृति 'गम्मत' में दर्शाने का प्रयास किया है-
              ''   आनी-बानी के सरकारी योजना,
                भोरहा म डार के गड्ढा म बोजना,
                सबो जगहा छागे योजना के जादू,
                अउ बुटांची अक्षर म लिखाहे-'शर्तें लागू'।  ''


        21 वीं सदी के साहित्य में निश्चित रूप से सांस्कृतिक चेतना का समावेश है। उनकी हर पंक्तियों में समाज के प्रति सजगता का समावेश होता है। साहित्यकार समाज के प्रति स्वाभाविक रूप में उत्तरदायी होता है और इसीलिए उनकी रचना समय के साथ निखरती जाती है और उनमें सांस्कृतिक चेतना का विकास होता है।

                                शंकरनगर नवागढ़,
                                जिला- बेमेतरा, छ.ग.
                                पिन- 491337
                          

 
               
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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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रचनाकार: मनोज कुमार श्रीवास्तव का आलेख - 21 वीं सदी का साहित्य और सांस्कृतिक चेतना
मनोज कुमार श्रीवास्तव का आलेख - 21 वीं सदी का साहित्य और सांस्कृतिक चेतना
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