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1. नेताजी की महिमा गाथा (आल्हा छंद) नेताजी की महिमा गाथा, लोग भजन जैसे है गाय । लोकतंत्र के नायक वह तो, भाव रंग रंग के दिखाय ।। नटनागर के...

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1. नेताजी की महिमा गाथा (आल्हा छंद)

नेताजी की महिमा गाथा, लोग भजन जैसे है गाय ।
लोकतंत्र के नायक वह तो, भाव रंग रंग के दिखाय ।।

नटनागर के माया जैसे, इनके माया समझ न आय ।
पल में तोला पल में मासा, कैसे कैसे रूप बनाय ।।

कभी कभी जनता संग खड़े, जन जन के मसीहा कहाय ।
मुफ्त बांटते राशन पानी, लेपटाप बिजली भरमाय ।।

कभी मंहगाई पैदा कर, दीन दुखीयों को तड़पाय ।।
बांट बेरोजगारी भत्ता, युवा शक्ति को ही भटकाय ।।

भस्मासुर बन करे तपस्या, जनता पर निज ध्यान लगाय ।
भांति भांति से करते पूजा, वह जनता को देव बनाय ।।

जनता जर्नादन बन भोले, उनको शासन डोर थमाय ।
सत्ता बल पाकर हाथों में, भोले जन को ही दौड़ाय ।

मंहगाई भ्रद्यचार सा, जैसे घातक अस्त्र बनाय ।

गली गली भाग रही जनता, अपने तो निज प्राण बचाय ।
भाग्य विधाता जनता जिनके, नेताजी अब भाग्य बनाय ।

काम चाहिये हर हाथों में, अपनी एक नई पहचान ।
हाथ कटोरा देते क्यों हो, हमें चाहिये निज सम्मान ।।

जात पात में बाट बाट कर, खेलो मत शकुनी का खेल ।
हम सब पहले भारत वंषी, हर मजहब में रखते मेल ।।

छद्म संप्रदायवाद बुनकर, रचे महाभारत क्यों और ।
जग उपदेशक भारत अपना, कृष्ण बुद्ध गांधी का ठौर ।।

जनता जर्नादन भी सुन लो, सभी दोश नेता का नाय ।
हृदय हाथ रखकर सोचो तुम, नेता तुम को क्यो भरमाय ।।

जमीर खो गया कहां जग में, लोभ स्वार्थ का लेप लगाय ।
फोकट में पाने को कैसे, नेता के चम्मच बन जाय ।।

2. वतन के (कवित्त)
मां भारती के शान को, अस्मिता स्वाभिमान को,
अक्षुण सदा रखते, सिपाही कलम के ।
सीमा पर छाती तान, हथेली में रखे प्राण,
चैकस हो सदा डटे, प्रहरी वतन के ।
चांद पग धर कर, माॅस यान भेज कर,
जय हिन्द गान लिखे, विज्ञानी वतन के ।
खेल के मैदान पर, राष्ट्र ध्वज धर कर,
लहराये नभ पर, खिलाड़ी वतन के ।

हाथ कूदाल लिये, श्रम-स्वेद भाल लिये,
श्रम के गीत गा रहे, श्रमिक वतन के ।
कंधो पर हल धर, मन में उमंग भर,
अन्न-धन्न पैदा करे, कृषक वतन के ।
व्यपारी बड़े काम के, निपुण साम दाम के,
उन्नत करते माथा, उद्यमी वतन के ।
खास आम लोग सब, राष् प्रेम उर धर,
नित्य-नित्य पखारते, चरण वतन के ।

3.कह मुकरियां
1.    श्याम, रंग मुझे है लुभाये ।
रखू नैन मे उसे छुपाये ।
नयनन पर छाये जस बादल ।
क्या सखि साजन ? ना सखि काजल


2.    मेरे सिर पर हाथ पसारे
प्रेम दिखा वह बाल सवारे ।
कभी करे ना वह तो पंगा ।
क्या सखि साजन ? ना सखि कंघा


3.    उनके वादे सारे झूठे ।
बोल बोलते कितनेे मीठे ।
इसी बल पर बनते विजेता ।
क्या सखि साजन ? ना सखि नेता ।।


4.    बाहर से सदा रूखा दिखता ।
भीतर मुलायम हृदय रखता ।।
ईश्वर भी हो जाये कायल ।
क्या सखि साजन ? न सखि नारियल ।।


5.    हमेशा मेरे साथ रहते ।
बात सदा करने को कहते ।
उनसे बाते कर करू स्माइल ।
क्या सखि साजन ? ना मोबाइल ।।


6.    सदा सदा वह साथ निभाये ।
अंधेरा देख मुझमे समाये ।
उजाला में नाकरे वह माया ।
क्या सखि साजन ? न सखि प्रतिबिंब ।।


7.    मेरे तन वह घुल मिल जाये ।
अपने रंग मुझे रंगाये ।।
मुखड़ा देख करूं मेै मलाल ।
क्या सखि साजन ? ना सखि गुलाल ।।


8.    नाच रहे धरे रंग गुलाल ।
मेरे मुख का करते  हलाल ।।
वर्श एक बार आते बहोरी ।
क्या सखि साजन ? ना सखि होरी ।।


9.    मुख पर इंद्रधनुष की शोभा ।
जो देखे उनके मन लोभा ।।
बच्चे करते है खूब तंग
क्या सखि साजन ? ना नसखि रंग ।।


10.  श्याम रंग पगड़ी सोहे है ।
लाल रंग कलगी मोहे हैं ।
उसे देख मेरे मन हराश ।
क्या सखि साजन ? ना सखि पलाश ।।

 

4.कहे दो रंगी तस्वीर (कज्जल छंद )
मानस पटल अंकित चित्र ।
रोते हॅसते कुछ विचित्र ।।
ओठ मुस्कान हृदय पीर
कहे दो रंगी तस्वीर ।

कदम पड़े हमारे चांद ।
देखे कौन निर्धन मांद ।।
अब तक बदले न तकदीर ।
कहे दो रंगी तस्वीर ।

साधु चोला सादा वेश ।
अंदर मुखरित राग द्वेश ।
सन्यासी है काम वीर ।
कहे दो रंगी तस्वीर ।।

मां बेटी बहना पुकार ।
पौरूश दैत्य करे शिकार ।।
नारी नयन बहते नीर ।
कहे दो रंगी तस्वीर ।

अबला भई सबला आज ।
करती सारे मर्द काज ।।
परिवार लग रहे अधीर ।
कहे दो रंगी तस्वीर ।

 

5. मनुज मानवता बचे कैसे (ललित छंद )

मनुज मानवता बचे कैसे, दिखे न कोई आसा ।
मानव होने लगे जहां रे, मनुज रक्त का प्यासा ।।

मनुज मानवता बचे कैसे, मनुज भये व्यभिचारी ।
बच्ची लगे ना अब दुलारी, कैसे जीये नारी ।।

मनुज मानवता बचे कैसे, मानव दैत्याचारी ।
धार्मिक उन्माद वो मचाते, फिरते लिये कटारी ।।

मनुज मानवता बचे कैसे, अपने को तुम तौलो ।
सहते  अत्याचार हमेशा, अब तो थोड़ा खौलो ।।

मनुज मानवता बचे कैसे, कुछ तो उपाय तानो ।
मानवता जब शेष रहे ना, मानव को शव मानो ।।

6. पेड़ पीपल का खड़ा है (गीतिका छंद )

पेड़ पीपल का खड़ा है, एक मेरे गांव में ।
शांति पाते लोग सारे , बैठ जिसके छांव में ।।
शाख उन्नत माथ जिसका, पर्ण चंचल षान है ।
हर्ष दुख में साथ रहते, गांव का अभिमान है ।।

पर्ण जिसके गीत गाते, नाचती है डालियां ।
कोपले धानीय जिसके, है बजाती तालियां ।।
मंद षीतल वायु देते, दे रहे औषध कई ।
पूज्य दादा सम हमारे, सीख देते जो नई।

नीर डाले मूल उनके, भक्त आस्थावान जो ।
कामना वह पूर्ण करते, चक्रधारी बिष्णु हो ।।
सर्वव्यापी सा उगे जो, हो जहां मिट्टी नमी ।।
कृष्ण गीता में कहें हैं, पेड़ में पीपल हमी ।

7.बेटी होना पाप (उल्लाला छंद )

बेटी होना पाप, त्रास में जीवन सारा ।
जन्म पूर्व ही घात, उसे कितनों ने मारा ।।
कंपित होती सांस, वायु है दूषित सारी ।
छेड़ छाड़ हर पाद, नगर गांव बलात्कारी ।।
गली गली में भेडि़या, नोचें बेटी मांस को ।
जीवित होकर लाश हैं, बेटी सह इस त्रास को ।।

8. कुण्डलियां

1.    आस्था से सरोबर है, अपना भारत देश ।
कण कण ईश्वर पूजते, पूजते साधु वेष ।।
पूजते साधु वेश, छला क्यो ना वह जावे ।
कोठी कुटिया साधु, भगत को ले भरमावे ।।
स्वयं माया लिप्त, सुनावे माया गाथा ।
सहे वार पर वार, बचे कैसे अब आस्था ।।


2.इन्द्रधनुष की ले छटा, आये राज बसंत ।
कामदेव के पुष्प सर, व्यापे सृरिूट अनंत।।
व्यापे सृष्टि अनंत, झूमती डाली कहुवा।
टेसू लाल गुलाल, आम्र पित मादक महुवा ।।
वितरित करे प्रसाद, समेटे बूंद पियुश की ।
सुमन खिले बहुरंग, छटा यह इन्द्रधनुष की ।

3.तितली पर  बहुरंग है, रंग रंग के फूल ।
झूमे तितली फूल पर, मेटे सबके शूल ।।
मेटे सबके शूल, हृदय तल ऊर्जा भरती ।
आबद्ध प्रेम पाष, सुधा रस घोले जगती ।।   
तितली रंग बिरंग, सुकुन मन कितनी भरती ।
बच्चो की भी चाह, हाथ में आये तितली ।।

4.जुगनू चमके रात में, तारा का आभास ।
तारा काफी दूर है, जुगनू अपने पास ।।
जुगनू अपने पास, रोशनी नभ तो भरता ।
अंधियारा है घूप, उसे कुछ ना कुछ हरता ।।
अपने निज उर ज्ञान, रखो जस प्रकाश जुगनू ।
टिम टिम करते रोज, रात में चमके जुगनू ।।

5.बेटी भाती है मुझे, जस हो चंदन भाल ।
पाकर बेटी मै तुझे, हो गया हूं निहाल ।।
हो गया हूं निहाल, परी सी पंख लगाऊ ।
दे शिक्षा व संस्कार, सारा गगन घूमाऊ ।
तू करना सब काम, दुलार दामन लपेटी ।
दुनिया कहे ‘रमेश‘, बेटा बन गया बेटी ।।


9. रहना तुम सचेत ....(रोला छंद)

मेरे अजीज दोस्त, अमर मै अकबर है तू ।
मै तो तेरे साथ, साथ तो हरपल है तू ।।
रहना तुम सचेत, लोग कुछ हमें न भाये ।
हिन्दू मुस्लिम राग, छेड़ हम को भरमाये ।।

मेरे घर के खीर, सिवइयां तेरे घर के ।
खाते हैं हम साथ, बैठकर तो जी भर के ।।
इस भोजन का स्वाद, लोग वो जान न पाये ।
बैर बीज जो रोप, पेड़ दुश्मनी का लगाये ।। रहना तुम सचेत ....

यह तो भारत देश, लगे उपवन फूलों का ।
माली न बने चोर, कष्ट दे जो शूलों का ।।
रखना हमको ध्यान, बांट वो हमें न पावे ।
वो तो अपने स्वार्थ, आज तो आग लगावे ।। रहना तुम सचेत ....

तू जो करे अजान, करूं मै ईश्वर पूजा ।
ईश्वर अल्ला नाम, नही हो सकते दूजा ।।
करते हम सम्मान, एक दूजे को भाये ।
हमें मिले जो षांति, और जन जान न पाये ।। रहना तुम सचेत ....


हाड़ मांस का देह, रक्त में भी है लाली ।
हिन्दू मुस्लिम पूर्व, रहे हम मानव खुशहाली ।।
दिये हमारे बाप, सीख जो उसे निभायें ।
अब कौमी के गीत, साथ मिलकर हम गायें । रहना तुम सचेत ....

10. कुछ दोहे

मानव मानव एक हैं, कहे धर्म हरएक।
भिन्न-भिन्न पथ है सही, पर मंजिल है एक ।

बढ़े चलो निज राह पर, हिम्मत भरकर बांह ।
तेज धूप को देख कर, ढूंढ़ों मत जी छांह ।।

कर्म कर्म सतकर्म कर, कर्म रचे व्यवहार ।
पैसों से व्यवहार तो, मिले नही संसार ।।

आप और मैं एक है, ना चाकर ना कंत ।
बहरा बनकर तू सुने, आंख मूंद मैं संत ।।

प्रिये तुझे मैं क्या दूं , नित नूतन उपहार ।
सौंप दिया मैं तो तुझे, निज जीवन पतवार ।।

मूरत प्यारी चांद सम, श्याम मेघ सम केश ।
अधर पुष्प की पंखुड़ी, आंखों पर संदेश ।

मुफ्त मुफ्त में बांट कर, बनाते मुफ्तखोर ।
स्वाभिमान को नष्ट कर, मचा रहे वो शोर ।।

बसंत सरसों खेत में, झूम रहा मदहोश ।
महुवा टेसू आम भी, दिखा रहें हैं जोश ।।

प्यार और संबंध में, पहले आया कौन ।
मां बेटे को चाहती, नयन मूंद रह मौन ।।

प्यार नही होता कभी, किसी से अनायास ।
आत्मसात कर किसी को, करें हैं एहसास ।।

यहां वहां देखें जहां, इक जैसे है लोग ।
स्वार्थ लोभ अरू मोह का, लगा सभी को रोग ।

मेरा मेरा कह मरे, मेरा हुये न कोय ।
मगरमच्छ के अश्रु ले, सारी दुनिया रोय ।।

चित चंचल मन बावरा, बंधे ना इक डोर ।।
बंधन माया मोह के, होते ना कमजोर ।।

जग में आकर जीव तो, बंध गया इक डोर ।
मेरा मेरा कह फसे, प्रभु का सुमरन छोड़ ।।

मृत्युलोक में सार है, पाप पुण्य का काज ।
साथ बंध कर जो चले, लिये जीव का राज ।।

हम कठपुतली श्याम के, बंधे उसके डोर ।
खींचे धागा जब कभी, जाते जग को छोड़ ।।

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रचनाकार: रमेश कुमार सिंह चौहान की कविताएँ
रमेश कुमार सिंह चौहान की कविताएँ
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