शशिकांत सिंह 'शशि' का व्यंग्य - रामराज्य के आसान नुस्खे

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रामराज्य के आसान नुस्खे व्यंग्य              सरकार चिंतित थी । ऐसा क्या करे जिससे देश में जल्दी आधुनिक रामराज्य आ जाये। रामराज्य से उनका ...

रामराज्य के आसान नुस्खे
व्यंग्य

             सरकार चिंतित थी । ऐसा क्या करे जिससे देश में जल्दी आधुनिक रामराज्य आ जाये। रामराज्य से उनका आशय था कि जी डी पी तीव्र गति से आसमान की ओर भागे। सेन्सेक्स जिस तेजी से उछल रहा है उससे दुगुने रफ्तार से तिगुनी ऊंचाई तक कूदे। कानूनों का जंगल साफ हो जाये तकि पूंजीपतियों को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो। दैहिक, दैविक, भौतिक किसी भी प्रकार की पीड़ा किसी उद्योगपति, व्यापारी, या पूंजी निवेशक को न हो। जनता आंखें बंद करके विश्वास करे और दूसरी किसी भी पार्टी को वोट न दे। फिर कोई शम्बुक जाकर तपस्या न करने लगे। उन्होंने श्रीमान तुलसीकुमार की अध्यक्षता में एक कमिटी का गठन किया जिसने तीन महीने तक पांच सितारा होटलों में मीटिंग और दो बार यु एस ए की एकेडमिक विजिट करने के उपरांत निम्नलिखित सिफारिशें कीं।


             रामराज्य जैसा कि जाहिर है कि राम का ही राज्य था। रामराज्य के संदर्भ में तुलसीदास जी के ग्रंथों का हमने घनघोर अध्ययन किया और पाया कि देश के विकास के लिए उनके मॉडल को ही लागू करना श्रेयस्कर होगा। हमने उनकी कविताओं का पाठ किया और विद्वानों से वार्त्ताएं कीं। स्पष्ट है कि विद्वानों से वार्त्ताएं करने के उपरांत हम और अधिक कनफ्युज्ड हो गये। गुरत्वकर्षण के सिद्धांत की तरह यह भी अटल सत्य है कि एक विद्वान दूसरे के मत को नहीं मानता। कनफूजन की स्थिति में हमने अपने निष्कर्ष निकाले और तय समय सीमा के भीतर ही अपनी रिपोर्ट सबमिट कर रहे हैं।
तुलसीदास जी लिखते हैं-
                        दैहिक, दैविक, भौतिक तापा,
                        रामराज्य काहू नहीं व्यापा ।


           दैहिक ताप का अर्थ है कि उन दिनों स्वाइन फ्लू जैसे बुखार नहीं हुआ करते थे। मुर्गे-मुर्गियां होती थीं या नहीं इन पर तो कवि ने प्रकाश नहीं डाला है। स्वाइन फ्लु नहीं होने से सरकारें बदनाम नहीं होती थीं। सरकारी अस्पतालों पर ताला लगे तो लगे प्रश्न चिन्ह नहीं लगते थे। सरकारी दवाइयों की पोल नहीं खुलती थी। डेंगू बुखार भी उन दिनों नहीं पाया जाता था क्योंकि लोगों के पास फ्रिज नहीं थे। उनमें साफ पानी नहीं जमा होता था। साफ पानी भी कई अथरें में बीमारी के कारण है। चूंकि उन दिनों गणेश जी चूहे की सवारी किया करते थे इसलिए संसार भर के चूहे सभ्य और सुसंस्कृत थे। प्लेग इन्हीं कारणों से नहीं फैलता था। सरकार की वाहवाही होती रहती थी। जनता चूहों की पूजा किया करती थी। चूहे प्रसन्न रहते थे। आज लोग सांप की पूजा तो करते हैं चूहों की अनदेखी हो रही है। अतः प्लेग जैसी बीमारियों फैल रही हैं। आवश्यक है कि चूहों का सरंक्षण किया जाये। उन्हें कुतरने और खाने की आजादी दी जाये। नागपंचमी की तर्ज पर एक चूहा सप्तमी भी हो ताकि चूहे संतुष्ट हो जायें और प्लेग न फैले। रामराज्य में दैविक प्रकोप नहीं होते थे। सरकार को मुआवजे नहीं बांटने पड़ते थे। खजाने पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ता था। केदारनाथ घाटी जैसी घटनाएं तो हो ही नहीं सकती थी। उन दिनों भगवान भोलेशंकर स्वयं घाटी की रक्षा करते थे। बाद में प्रदूषण के कारण पीछे हट गये। जब पहाड़ों पर व्यापरियों का कब्जा हो गया। कोल्ड ड्रिंक बनाये जाने लगे भगवन ने भी पहाड़ का साथ छोड़ दिया। दैविक प्रकोपों का एक कारण और है स्कूल के सिलेबस में भगवान की जीवनी होनी चाहिए। प्राथनाओं में आरती-वंदना तो अनिवार्य कर ही देना चाहिए। वैचारिक विरोध करने वालों को ठीक करने की एजेंसी को और मजबूत करने की जरूरत है। सम्पूर्ण भारत में संस्कृत भाषा और वेद को अनिवार्य किये जाने की जरूरत है ताकि दैविक प्रकोप किसी पर न हो। रही बात भौतिक की तो वह कभी नहीं होगी यदि विदेशी पूंजी आये। भारत में ही वस्तुओं का निर्माण हो। वस्तुओं के निर्माण से जो लाभ हो वह पूंजीपति और उद्योगपति के साथ-साथ सरकार को हो। आम जनता की जमीन लेकर पूंजीपतियों को दी जाये ताकि रामराज्य जल्दी से जल्दी आ सके। किसान तो सदियों से खेती करते आ रहे हैं। देश का विकास नहीं हो रहा है। अतः आधुनिक रामराज्य में किसानों की जमीनें छीन कर उद्योगपतियों को दे दी जायें। मालिकाना हक भी उनका न रहे। किसान चाहे तो आत्महत्या करके आवागमन के चक्करों से मुक्त हो सकता है। आम आदमी को दो जून की रोटी और एक वस्त्र चाहिए। उनके लिए भौतिक विकास के कोई मायने नहीं हैं लेकिन नेता, अभिनेता, मंत्री, व्यापारी, अधिकारी और खिलाड़ी इन लोगों को तो बात की बात में हवाई सफर करना पड़ता है। दिन में दस ड्रेस बदलने पड़ते हैं। उनको तीव्र भौतिक विकास की जरूरत है।


    तुलसीदास जी ने रामराज्य का वर्णन करते हुये लिखा है-
           रामराज राजत सकल धरम निरत नर-नारि।
           राग न रोष न दोष दुख सुलभ पदारथ चारि।।


स्पष्ट है रामराज्य तभी आयेगा जब धर्म को राष्ट्र का प्रधान काम घोषित कर दिया जाये। नागरिकों के लिए धरम का महत्व सबसे बड़ा होना चाहिए। सभी नागरिक धरम में लीन रहें। यही कारण है कि आज के संदर्भ में आवश्यकता अनुसार धर्म परिवर्त्तन अनिवार्य कर देना चाहिए। विधर्मी समुदाय के लोगों को भी हिन्दू घोषित कर देना चाहिए ताकि अपने मन में यह भरोसा हो जाये कि समस्त भारत में हिन्दू के अलावा दूसरे धर्म वाले नहीं हैं। एक धर्म परिवर्त्तन मंत्रालय बनाकर बाबाओं को मंत्री बना देना चाहिए ताकि समय-समय पर हिन्दू धर्म वालों को बताते रहें कि उनका परम कर्त्तव्य क्या है। उन्हें कितने बच्चे पैदा करना चाहिए। चार या आठ। इससे देश में धर्म-कर्म बढ़ेगा। राग और रोष तो बिल्कुल ही नहीं रहेगा। राग तो इसलिए नहीं रहेगा क्योंकि जो लोग दूसरे धर्म को मानते हैं उन्हें लगेगा कि यह मेरा देश नहीं है। राग इन परिस्थितियों में उत्पन्न ही नहीं होगा। रोष भी नहीं उपजेगा क्योंकि रोष करने वालों के घर पर पत्थर चलेंगे। उनकी टांग तोड़ दी जायेगी। उनके ऑफिस में घुसकर उनको थप्पड़ मारा जायेगा। इससे भी नहीं सुधरे तो घर के आगे गोली मारी जायेगी। कानून अपना काम करेगा। पुलिस को कभी अपराधी मिलेंगे नहीं। हमारा न्यायालय पर भरोसा कायम रहेगा। इस प्रकार चारों पदारथ जनता को उपलब्ध रहेंगे- अर्थ, धर्म , काम और मोक्ष । कम से कम मोक्ष की तो गारंटी रहेगी।


           दोहावाली में तुलसीदास लिखते हैं -' राम राज संतोष सुख, घर-,बन , सकल सुपास ।।


     राम राज में या तो मीडिया था नहीं या था तो पूरी तरह से कंट्रोल्ड था। यह भी संभव है कि पेड न्युज होते हों। राम राज में हर वर्ग संतुष्ट हो। सबको लगे कि अच्छे दिन आने वाले हैं। घर में रहें या जंगल में सारी सुविधाएं मिलती रहेंगी। यहां दोहे के गुढ़ अर्थ को खोलने की जरूरत है। आम आदमी यदि घर में भी है तो उसे जंगल वाली सुविधाएं मिलेंगी। वह नदी का पानी पियेगा। तालाब का पानी भी छान कर  पी सकता है। जाड़े,गर्मी ,बरसात तीनों मौसम का मजा वह प्राकृतिक रूप से अपने प्लास्टिक के बने घर में लेगा। रही बात खाने की तो एक टाईम खाने के लिए क्या सोचना। चना-चबेना, आम की गुठली, साक-पात कुछ भी खाकर घर में जंगल का सुख लिया जा सकता है। दूसरी ओर जो नेता, अभिनेता, अधिकारी और व्यापारी हैं। उन्हें जंगल में भी घर का सुख मिलेगा। पीने के लिए व्हिसलरी की बोलतें। खाने के लिए चाइनिज,इंडियन,अमेरिकन जो चाहे डिश जंगल के मध्य में उपलब्ध रहेगा। क्या मजाल की ठंडी हवा छू ले। गर्म हवा स्पर्श कर सके। इस प्रकार नाना प्रकार की सुविधाएं दोनों वर्गों को मिलेंगी तो सभी संतुष्ट रहेंगे। अखबार वाले वही कहेंगे जो राजा चाहेगा। वह किसी न किसी सेलिब्रेटी की दुम में तेल लगाकर टी आर पी बनायेगा। देश के प्रति उसकी जिम्मेवारी बाद में बनती है पहले तो टी वी चैनल के मालिक को खुश करे।


      अंत में तुलसीदास जी रामराज्य का निचोड़ लिखते हैं- तुलसी अद्भुत देवता, आासादेवी नाम।।


आसादेवी जो हैं उनको प्रबल बनाये रखने से ही रामराज आता है। जनता को हमेशा यह लगे कि अच्छे दिन आये और आये। कांग्रेस ने जब तक राज किया हमेशा यह लगा कि समाजवाद आया कि आया। चीन में आ गया अब एक छलांग में भारत में घुसना चाहता है। गरीबी हट जायेगी। जमीन जोतने वालों को मिल जायेगी। हर विभाग का सरकारीकरण हो जायेगी। लोग वोट देते गये। आस नहीं मिटी । पूरी भी नहीं हुई। अब भाजपा की बारी है। अंदर ही अंदर सारा खेल व्यापारियों और उद्योगपतियों के लिए और बाहर के नारे किसानों के लिए। लोग बाग हाथ में झाड़ू लिए स्वच्छ इंडिया करते रहें। पिछले दरवाजे से उनपर टैक्स लाद दिये जायें। महंगाई हटेगी , काला धन आयेगा, भ्रष्टाचार मिटेगा, इत्यदि-इत्यादि सपने दिखाकर बार-बार वोट लिये जा सकते है। जब तक ये सपने जिंदा हैं। लोग वोट देते रहेंगे। पूंजीपतियों का रामराज्य कायम रहेगा लेकिन यदि टूट गये तो....................................।
        

  सरकार ने उनकी सिफरिशें मान लीं।

 

                                          शशिकांत सिंह 'शशि'
                                                             जवाहर नवोदय विद्यालय
                                                          शंकरनगर, नांदेड़ महाराष्ट्र 431736

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रचनाकार: शशिकांत सिंह 'शशि' का व्यंग्य - रामराज्य के आसान नुस्खे
शशिकांत सिंह 'शशि' का व्यंग्य - रामराज्य के आसान नुस्खे
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