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प्रमोद यादव का व्यंग्य - मामला वन वे वाला

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‘ गुरूजी..क्या खराब ज़माना आ गया...’ गजोधर ने पान चबाते कहा. ‘ क्या हुआ गजोधर ? अचानक जमाने को क्यों कोसने लगे भई ? अब तक तो मंत्री-संत्री.....

‘ गुरूजी..क्या खराब ज़माना आ गया...’ गजोधर ने पान चबाते कहा.

‘ क्या हुआ गजोधर ? अचानक जमाने को क्यों कोसने लगे भई ? अब तक तो मंत्री-संत्री..नेता-अभिनेता..अफसर-बाबू..ठेकेदार-थानेदार...शासन-प्रशासन.. को ही कोसते रहे.. ये एकाएक..’

‘ नहीं गुरूजी...ऐसी बात नहीं..मेरी क्या औकात कि किसी को कोसूँ ? वो तो बस.. किसी बात पर मन दुखता है तो उल्टी-सीधी कह भड़ास निकाल लेता हूँ ..और करें भी तो क्या ? निकालने को अपने पास कुछ है भी नहीं.. ’

‘ मतलब ? ’

‘ मतलब ये गुरूजी कि न हम किसी को पार्टी से निकाल सकते हैं..न नौकरी से न ही घर से..क्योंकि न अपना कोई घर है न कारोबार..ना कोई पार्टी..बस एक अदद दिल है अपने पास ..वो भी भड़ास भरा..अब तो इसे ही बाहर निकाल फेंकने को मन करता है..’

‘ अरे क्यूँ भई ? दिल के साथ ऐसा मत करना..कहते हैं दिल में दिलवर रहता है..’गुरूजी ने मजाक किया.

‘आप भी गुरूजी..किस दिलवर की बात करते है..वो तो भरी जवानी के दिनों ही घर (दिल) खाली कर “ पिया के घर ” जाकर बस गई..अब तो नाती-पोतों के साथ दिल लगाकर “अक्कड़-बक्कड़” खेल रही होगी..’

‘ यार गजोधर ..अब समझ में आया कि तुमने शादी क्यों नहीं की..आज तक ये दिलवाली बात तुमने नहीं बताई ? ‘

‘ क्या बताता गुरूजी..वो मेरे दिल में जरुर बसती थी पर मैं उसके दिल में नहीं ..वन वे वाला मामला था..’

‘ फिर भी मामला कुछ गंभीर लगता है गजोधर..तभी तो तुमने शादी नहीं की..’ गुरूजी ने कहा.

‘ नहीं गुरूजी..इतना गंभीर भी नहीं ..दरअसल कोई मन-माफिक लड़की ही नहीं मिली..मैं उसी कद-काठी, उसी शक्लो-सूरत को खोजता-फिरता रहा इसलिए कुंवारा रह गया..अब भला रीयल लाइफ में सीता और गीता कहाँ मिले ? ‘ गजोधर ने अपनी व्यथा बताई.

‘ पर गजोधर तुम्हें सीता पर ही अच्छी तरह ट्राई करना था.. गीता ढूँढने का लफड़ा ही नहीं रहता..वन-वे को टू वे करने में भला क्या समय लगता ? शायद तुमने शिद्दत से कोशिश नहीं की.. ‘ गुरूजी ने उलाहना दी.

‘ कोशिश तो की थी गुरूजी..पर एक दिन एक ही झटके में प्यार का पटाक्षेप हो गया..’

‘ कैसे भई ? ‘

‘ मैं तो रोज प्रपोज करने को सोचता..पर वो मुझे घास तक नहीं डालती थी..हमेशा लक-दक कपड़े पहने बड़े-बड़े घर के रईसजादों को वो महत्त्व देती..उनके साथ उठती-बैठती..हालांकि क्लास में होशियार होने के कारण मैं भी उसी मंडली में हुआ करता..मुझसे भी बोलती-बताती थी..पर मुझसे हमेशा आदेशात्मक लहजे में बोलती थी..’

‘ जैसे ? ‘ गुरूजी ने पूछा.

‘ जैसे कभी कहती- गज्जू..एक गिलास पानी पिलाओगे क्या ? कभी कहती- गज्जू..जरा मीना से मेरी प्रक्टिकल कापी ला दो न..तो कभी कहती- गज्जू..मेरे अमुक सवाल हल कर देना..आदि-आदि..’

‘ और तुम उल्लू के पट्ठे सब हल करते रहे सिवा उसको हल करने के..अरे यार जब इतना बोलना-बतियाना था तो कभी दिल की बात भी बक देते..कभी न कभी तो ऐसा अवसर आया ही होगा..’

‘ हाँ गुरूजी..आया था...एक दिन हम सब दोस्तों की मंडली लंच के समय फुटबाल मैदान के किनारे पेड़ के नीचे बैठ लंच ले रहे थे कि वह दौड़ती आई और मुझे संबोधित करते बोली- ‘ ‘ ‘गज्जू, कल सुबह मेरे घर आ सकते हो क्या ? बहुत जरुरी काम है.. मैं इन्तजार करुँगी..’

‘फिर ?’

‘ फिर क्या ? मेरी तो बांछें खिल गई.. ख़ुशी से मैं पागल हो गया..दोस्त-यार जलते-भूनते राख हुए और मेरे नसीब की दुहाई देने लगे.. बधाई देने लगे..सबने एक बड़ी पार्टी की मांग भी रख दी जिसे मैंने जोश-जोश में अविलम्ब “एप्रूव” कर दिया..’

‘ फिर ? ‘ गुरूजी ने फिर पूछा.

‘ फिर क्या गुरूजी..पूरी रात मैं सोया नहीं..एक से एक खयाली पुलाव बनाता रहा कि उससे ये बोलूंगा..वो बोलूंगा..रात को आईने में अपनी शक्लो-सूरत देख बार-बार सोचता - ये मुंह और मसूर की दाल..? विश्वास ही नहीं हो रहा था अपनी किस्मत पर...कहाँ वो सुन्दर बिल्लोरी आंखोंवाली गोल-मटोल शोख लैला और कहाँ पतंग के माफिक हल्का-फुल्का झोल खाता मैं सांवला छैला.. ’

‘ आगे बताओ गजोधर.. दूसरे दिन क्या हुआ ? ‘ गुरूजी बोले.

‘ बहुत ही डरते-कांपते उसके घर तक गया..वो गेट पर ही खड़ी थी..उसे देख घबराहट थोड़ी कम हुई..उसने देखते ही अन्दर आने का इशारा किया..ड्राईंग रूम के सोफे पर बैठने को हुआ कि बोली- “‘ यहाँ नहीं..अन्दर चलो..” मैंने पूछा- “तुम्हारे मम्मी-पापा ?’’ वो बोली- ‘‘बाहर गए हैं...कोई नहीं है..’’ सुनकर मैं एकदम ही सहज और निडर हो गया ..माथे के पसीने को पोंछा और पूछा- “ बताओ ? क्यों बुलाई हो ? “ उसने कहा- “ गज्जू..दरअसल तुम्हें मैं नहीं बल्कि पापा ने बुलाया है..कई दिनों से उन्हें तलाश है किसी ऐसे व्यक्ति की जिसकी हैण्ड राईटिंग एकदम साफ़-सुथरी हो.. वो डाक्टरेट कर रहे हैं तो कुछ फाइल कापी करने हैं..बेहद परेशान थे पापा कि एकाएक मुझे तुम्हारा ख्याल आया..मैंने पापा को बताया तो बोले घर बुला लो और काम समझा दो..हाँ बदले में वे मेहनताना भी देंगे... ठीक है न ? ” सुनकर मैं अवाक् रह गया..’

‘ फिर ? ‘ गुरूजी बोले.

‘ अरे और क्या फिर गुरूजी..मैं मेहनताना वाली बात से तो मुकर गया लेकिन काम करने को राजी हो गया ये सोचकर कि इसी बहाने मिलना-जुलना होता रहेगा तो मौका देख किसी दिन दिल की बात कह दूंगा..’

‘ तो कही तुमने दिल की बात ? ‘ गुरूजी पूछे.

‘ क्या बताऊँ गुरूजी..आज-कल ..आज-कल... करते दिन बीत रहे थे और दोस्त थे कि मुझसे पार्टी पर पार्टी लिए जा रहे थे.. और मैं कंगाल हुए जा रहा था.. वे प्यार-मुहब्बत के बारे में पूछते कि कैसे चल रहा तो मैं काम के विषय में बताता कि बढ़िया चल रहा है..वे काम पूछते कि वहां घंटे भर करता क्या हूँ तो उन्हें बताता कि केवल प्यार-मुहब्बत..नोक-झोंक..हंसी-मजाक...’

‘ अब मुझे बताओ सच्ची बात कि क्या करते थे ? ‘ गुरूजी बोले.

‘ अरे गुरूजी.. करता क्या ? जाते ही लिखने बैठ जाता..वो तो कभी आस-पास फटकती भी न थी..रोज एक घंटे लिखकर लौट आता..इस बीच कभी-कभार उसकी मम्मी मेहनताने के तौर पर चाय दे देती..कभी उसके पापा साथ में बैठ फ़ाइल समझा देते .. उधर मैं दोस्तों को रौब झाड़ने कई उलटी-सीधी प्यार की झूठ-मूठ की कहानी गढ़ देता ..और यार-दोस्त कुढ़ते-चिढ़ते “उफ़-उफ़” करने लगते तो मुझे आनंद आ जाता..’

‘ फिर ? ‘

‘ फिर गुरूजी.. एक दिन उसके घर पहुंचा तो वहां भारी गहमा-गहमी दिखाई दी....ढेर सारे नए-नए मेहमान जैसे लोग वहां दिखे..जैसे कोई कार्यक्रम हो रहा हो..मैं अचंभित हो द्वार पर इधर-उधर देखते माजरा समझने की कोशिश कर रहा था कि एकाएक उसके पापा प्रकट हुए और बोले- ‘ गज्जू..आज लिखने-पढने का कोई कार्यक्रम नहीं,,आज बिटिया की सगाई का कार्यक्रम है..चलो थोडा हाथ बटाओ..’

‘ और तुम हाथ मांगने की जगह हाथ बटाने लग गए..’ गुरूजी बेरुखी से बोले.

‘ और करता भी क्या गुरूजी..इधर “दिल के टूकडे हजार हुए..कोई यहाँ गिरा कोई वहां गिरा “ जैसी बात हो रही थी और कोई देखने वाला भी न था..उधर उसकी सगाई हो रही थी.. और सारे लोग उसे देख रहे थे...मैं सोच नहीं पा रहा था कि क्या करूँ ? ‘

‘ तो फिर तुमने क्या किया ? ‘गुरूजी बोले.

‘ क्या करता गुरूजी.. सगाई के होते-होते एक दृढ संकल्प ले लिया.. दूसरे दिन से कालेज जाना बंद कर दिया और मामा के घर चला गया.. वहीं एडमिशन ले लिया..पर वहां भी उसकी यादों ने पीछा नहीं छोड़ा..तो चार-छः महीने बाद मैंने कालेज ही छोड़ दिया.. और दो साल के लिए अज्ञातवास में चला गया.. ’ गजोधर अतीत में डूबता-उतराता बोला.

‘ लेकिन गजोधर..यूं भागकर नहीं जाना था..थोडा हिम्मत दिखाते तो पासा पलट भी सकता था..’ गुरूजी ने संभावना व्यक्त की.

‘ अरे पासा क्या पलटता गुरूजी और ठहरता तो मैं ही पलट जाता..दोस्त-यार से बेइज्जती का डर नहीं था ..डर था कि कहीं उसका बाप शादी के वक्त मुझसे कहीं “साला-जांवर” का नेग न करवा दे.. उसके कोई भाई न था न ..इसलिए भाग आया..’

‘ समझा.. तो इस तरह तुम्हारे इकलौते और इकतरफे प्यार का अंत हो गया... आमीन.. चलो यार अब पॉइंट पर आओ और बताओ कि जमाने को क्यों कोस रहे थे ? क्या हुआ ? ‘

‘ कुछ नहीं गुरूजी.. आप भी न ..कहाँ की बात कहाँ ले जाते हो.. हमेशा विषयांतर कर भटका देते हो..अब इस सब्जेक्ट से आगे और कहीं जाने का मन नहीं कर रहा.. जमाने की बातें फिर कभी कर लेंगे... अब दिल के तारों को छेड़ दिया है तो प्यार के तराने बजने भी दीजिये..कुछ तो सुकून मिलेगा..आप एक पान और खाईये और मुझे मेरे हाल पे छोड़ दीजिये..नमस्ते..फिर मिलेंगे..’

इतना कह गजोधर देवदास की तरह सीरियस सूरत बना एकाएक पानठेले से रुखसत कर गया. गुरूजी इकतरफे प्यार के मारे आशिक को जाते देख सोचता रहा- इकतरफ़ा में ये हाल...दोतरफ़ा होता तो न जाने क्या होता ? वैसे गजोधर ठीक कहता है- खराब ज़माना आ गया ..लोग बेवजह ही दिल में शूल लिए फिर रहे....मजनू और रांझे का नाम खराब कर रहे..

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प्रमोद यादव

गया नगर , दुर्ग , छत्तीसगढ़

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रचनाकार: प्रमोद यादव का व्यंग्य - मामला वन वे वाला
प्रमोद यादव का व्यंग्य - मामला वन वे वाला
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