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चन्द्रकुमार जैन का आलेख - महिला अस्मिता के चुनिंदा मुखर और बिखर रहे सवाल !

महिला अस्मिता के चुनिंदा मुखर और बिखर रहे सवाल !

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

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हमारे समय में महिला विमर्श और स्त्री-साहित्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमारी जानी-मानी लेखिकाएँ भी स्त्रीवाद, स्त्री-लेखन जैसी कोटियों और अवधारणाओं पर न तो अडिग विश्वास करती हैं न ही खुलकर बात करना चाहती हैं। आश्चर्य है कि इसके प्रति अमूमन इनका रवैया प्रतिगामी और अवहेलना से पूर्ण होता है। मैं यह मानता हूँ कि 21वीं सदी में यह भी एक तरह का पिछड़ापन है जहाँ आप स्त्री-विमर्श के अस्तित्व, आवश्यकता और सरोकारों को एकसिरे से नकारने से गुरेज़ नहीं कर पाते। वरिष्ठ रचनाकार ममता कालिया जी ने एक साक्षात्कार में कहा है - वैसे मैंने पुरुष लेखन और महिला लेखन के विभाजन को मानने से हमेशा इंकार किया है। लेखन, लेखन होता है। स्त्री-पुरुष दोनों की समस्याएँ, संघर्ष और स्वप्न एक-से होते हैं। हाँ, अभिव्यक्ति का तेवर हर रचनाकार का अपना होता है

 

अपनी मिसाल आप है नारी 

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समझने की जरूरत यह है कि स्त्री और पुरुष को मात्र मनुष्य के रूप में सामान्यीकृत करके देखना अन्ततः पुंस मानकों में औरत को खड़ा करना है। ऐसे में बराबरी के नाम पर ऐसा घालमेल तैयार होता है जहाँ स्त्री अपनी सारी दिक्कतों और लड़ाइयों के साथ हाशिए पर ढकेल दी जाती है। असलियत यह है कि स्त्री  पुरुष से भिन्न मनुष्य है। उसका होना भिन्न और आवश्यक मनुष्य का होना है। उसकी अनुभूति और प्रभाव भी इसी अहम अलगाव को दिखाते हैं। इसी प्रकार लेखन भी हमेशा और केवल लेखन नहीं होता बल्कि उसके अनेकानेक जटिल सूत्र रचनाकार के व्यक्तित्व, चेतना, सरोकारों और जद्दोजहद से जुड़े होते हैं।  याद रहे कि स्त्री होना पुरुष होना नहीं होता। सफल औरत होना भी पुरुष होना नहीं होता। अतः जिस तेवर की बात ममता जी कर रही हैं वह भी स्त्री के निज से होकर ही सामाजिक और राजनीतिक अर्थों में विस्तृत हो जाता है। उसकी समस्याएँ, संघर्ष व सपने मर्दों से न केवल भिन्न होते हैं वरन् घरेलू, शारीरिक, सामाजिक और अब तो पेशेवराना जरूरतों तथा जिम्मेवारियों में उसे कहीं गहरे तक तोड़ते रहते हैं। सँवारते भी हैं। 

 

भाषा,बर्ताव और पहल में अंतर 

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इसी अर्थ में बदलती औरत की भाषा,रवैये और पहलकदमी में काफी अन्तर नज़र आता है, जिसे दरकिनार करना सम्भव नहीं है। छवि के बने बनाये फ्रेम को तोड़कर बाहर निकलने की तड़प स्त्री के अन्दर युगों-युगों से मौजूद है। पहले भी,मुक्ति की कामना और कसमसाहट स्त्री के अन्दर गहरे बैठी हुयी थी, वह आज कहीं अधिक वेगवती हो गई है । लेकिन, मैं यह मानता हूँ कि लोकतन्त्र के आगमन और संचार तंत्र के असीम प्रसार ने अनेक अस्मिता विमर्शों को पनपने के लिये उर्वर जमीन दी है। दलित, दलित महिला, स्त्री, आदिवासी जैसे दबे कुचले लोगों ने सामने आकर अपने हक और स्वायत्ता के मुद्दे को बार-बार उठाया है। इसे एकबारगी हाशिये में नहीं रखा जा सकता। 

 

वर्चस्व के सवाल के रूबरू 

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सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह कि स्त्री विमर्श को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा है तो यह इसके प्रति उसी पुंसवादी तदर्थ रवैये को दिखाता है जो बार-बार देहवाद के सवाल को उठाकर नैतिक फतवे जारी करने में लगा रहता है। इसमें दिक्कत क्या है यदि औरत अपनी देह, भूमिका, भविष्य स्वयम् तय करना चाहती है। जरूरत इस बात की है कि उसकी पहल को सृजनात्मक दिशा मिले।

बेशक यह वैचारिक हिंसा ही है कि 

हम 21 वीं सदी में भी औरतों के लिये

‘क्या-क्या करें‘ और ‘क्या-क्या न करें‘ 

तय करने में ही सारा वक्त और पूरा दम लगाए बैठे हैं।

कथित मर्यादाओं की आड़ में ऐसा क्यां है कि 

स्त्रियों पर विश्वास नहीं किया जा सकता?

क्यों उनके चुनाव के प्रति आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता? 

क्यों बार-बार तथाकथित की बेड़ियों में उन्हें पंगु बनाया जाता है? 

उसकी नितांत निजी नैतिक पहल के प्रति 

हम घबराए हुए से क्यों रहते हैं? 

क्यों .... क्योँ .... आखिर क्यों ?

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लेखक छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण से 

सम्मानित और शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय 

राजनांदगांव के प्राध्यापक हैं।

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