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दीपक आचार्य का आलेख - प्रकृति उतर आयी है अपनी पर

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कितनी  बड़ी मजाक होने लगी है हमारे साथ।

हमारे पुरखों ने भी नहीं देखा और हमने भी अब तक ऎसा नहीं देखा।

भीषण गर्मी, लू के थपेड़ों और पसीने से तरबतर होकर रहने वाले दिनों में भारी बारिश, ओलावृष्टि और शीत का कहर।

तेज धूप निकलती है, पसीना आना शुरू हो जाता है और थोड़ी देर में सूरज छिप जाता है, बादलों का साम्राज्य छा जाता है, फिर थोड़ा अंधियारा घिर आता है और बारिश का दौर शुरू। फिर बारिश भी ऎसी-वैसी नहीं पूरे वेग के साथ। बंदूक की गोलियों की तरह दनदनाकर जिस्म पर पर पड़ती हैं बूँदें।

और बारिश तक ही मामला रूका हुआ क्यों रहे, धड़ाधड़ ओलावृष्टि का दौर जम जाता है। ओले भी कोई मामूली नहीं। लगता है ऊपर वाला तोपों से गोले बरसाने की तर्ज पर या ओलावर्षक विमानों से ओले गिरा रहा हो।

कोई पक्के तौर पर यह कहने की स्थिति में नहीं है कि आखिर कौन सा मौसम है। बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने पंचांगों और कैलेण्डरों के पूरे गणित को ही मटियामेट करके रख दिया है। 

अब महीनों के मुताबिक मौसम नहीं चलता। घण्टों में मौसम बदल जाता है। उसने अपनी सारी मर्यादाएं छोड़ दी हैं, दया, सहनशीलता और करुणा के सारे दायरों को एक तरफ रख दिया है।

पिछले कई सालों से एक पर एक मामूली संकेत देने के बावजूद जब मोटी खाल वाले इंसान पर कोई असर नहीं होता देखा तो प्रकृति अब अपनी पर उतर आयी है।

इससे पहले तो कभी ऎसा नहीं हुआ कि मौसम ने अपनी मर्यादा रेखाओं और अवधि को लांघा हो, आखिर हाल के कुछ समय में ऎसा क्या हो गया कि प्रकृति पूरी दया, वात्सल्य, स्नेह और ममत्व छोड़कर हमारे पीछे हाथ धोकर ही पड़ गई है।

अर्से से हम प्रकृति का दोहन-शोषण कर रहे हैं, पंच तत्वों का व्यापार करने लगे हैं, विकास के नाम पर पृथ्वी और पर्यावरण के साथ जो कुछ व्यवहार कर रहे हैं उससे प्रकृति का कुपित होना स्वाभाविक ही है।

हालांकि प्रकृति अपनी नाराजगी को पिछले दशकों में किश्तों-किश्तों में व्यक्त भी कर चुकी है लेकिन हम इंसानों की खाल ही ऎसी है कि हम पर कोई फरक नहीं पड़ता।

अपने स्वार्थों में हम इतने डूब गए हैं कि हमें न कोई संकेत सुनने या समझने की फुर्सत है, न हम संकेतों का गंभीरता से लेते हैं।

हम सभी को अपने आप से सरोकार है और अपने आपको समृद्ध बनाने के लिए हम प्रकृति के शोषण की सारी सीमाएं पार कर चुके हैं। तभी तो प्रकृति को अपनी सारी मर्यादाएं एक तरफ रखकर हम पर कुपित होना पड़ा है।

इंसान ने पृथ्वी, प्रकृति और पर्यावरण का अब तक इतना कबाड़ा कर लिया है कि अब प्रकृति पीछे हटने वाली नहीं है, कोई रहम नहीं करने वाली। वह पूरी तरह अपनी पर उतर आयी है और जब प्रकृति अपनी वाली पर आ जाती है तब किसी को नहीं छोड़ती, चाहे कितना ही बड़ा आदमी हो या कोई सा क्षेत्र।

हमने अपने क्षुद्र स्वार्थों में डूबकर प्रकृति का कबाडपा करके रख दिया है। प्रकृति और पिण्ड से लेकर पंच तत्वों तक का संतुलन बिगाड़ कर रख दिया है। 

पहाड़ों और कंदराओं से लेकर हर तरफ की जमीन को खोद कर खुर्द-बुर्द कर दिया है, हरे-भरे जंगलों की जगह सीमेंट-कंक्रीट की बस्तियों के बड़े-बड़े गगनचुम्बी जंगल बसा दिए हैं, कहीं कोई आकाश भाग अर्थात खाली जगह छोड़ी तक नही है।

अग्नि तत्व यानि की सूर्य की रोशनी के हम तक पहुंचने के सारे द्वार और रास्ते बंद कर रखे हैं, पृथ्वी तत्व को भारी से भारी कर दिया है। वायु तत्व इतना क्षीण हो गया है कि हवा आने के सारे मार्ग जाम हो गए हैं।

जल तत्व के मामले में हमने इतना गंभीर कहर बरपाया है कि हर तरफ परंपरागत जलाशयों, नदी-नालों, कूओं-बावड़ियों का खात्मा कर दिया है और जल मार्गों पर पानी की बूंदोें की बजाय हम बस गए हैं। 

हमने प्रकृति के पंच तत्वों को हमारे करीब आने के सारे रास्तों को बन्द कर दिया है। ऎसे में प्रकृति इतनी जबर्दस्त रूठी हुई है कि उसने अब ठान ही लिया है कि हमें सबक सिखा कर ही रहेगी।

जब तक प्रकृति की पूजा का दौर बना रहा, तब तक प्रकृति हमारे अनुकूल बनी रही। जबसे हमने उसका निरादर शुरू कर दिया है तब से हमें खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।

पहले हम यज्ञ-यागादिकों के माध्यम से प्रकृति की पूजा, पर्यावरण में दिव्यता लाने और रसों को परिपुष्ट करने का काम पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ करते थे।

आज सब बंद कर दिया है हमने। जो कुछ कर रहे हैं वह या तो चंदा इकट्ठा करने का प्रयास भर है अथवा पब्लिसिटी के फण्डे। या फिर औरों को दिखाने भर के लिए।

यज्ञ भी कर रहे हैं तो उसमेंं न गोबर है, न गौघृत या और कोई शुद्ध औषधियां, समिधाएं या द्रव्य। सब कुछ अशुद्ध और मिलावटी हवन हो रहे हैं। इस स्थिति में हमारे यज्ञ सिर्फ दिखावा ही हैं और पण्डितों, धर्म के ठेकेदारों, मठाधीशों, महंतों, बाबों और यज्ञाचार्यों की कमाई के साधन भर।

प्रकृति अब पीछे नहीं हटने वाली। पीछे हमें ही हटना होगा, प्रकृति को मान-सम्मान देना होगा, अपनी शोषणपरक आदतों को त्यागना होगा।

चेतावनी भरा शंखनाद हो चुका है, संभलना हमें ही है, नहीं संभले तो आने वाले पाँच वर्ष ही हमारी बरबादी के लिए काफी होंगे।

वर्तमान हालातों को देखकर यह भविष्यवाणी की ही जा सकती है कि हमने प्रकृति को लेकर अपनी मानसिकता में बदलाव नहीं किया तो आने वाले कुछ ही वर्ष में दुनिया की आबादी 30 फीसदी ही रह जाने वाली है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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