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सुशील यादव इश्तिहार निकाले नहीं २१२  २१२ २१२  २१२ जर्द से ख़त किताब में सम्हाले नहीं ता- उम्र परिंदे यूँ  ही   पाले नहीं याद में  वो बसा ...

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सुशील यादव

इश्तिहार निकाले नहीं
२१२  २१२ २१२  २१२


जर्द से ख़त किताब में सम्हाले नहीं
ता- उम्र परिंदे यूँ  ही   पाले नहीं

याद में  वो बसा  चार दिन के लिए
ताकयामत चले , शक्ल ढाले नहीं

हो कहाँ जिरह या बहस किससे करें
कोशिशे- बंदिशे कल पे टाले नहीं

जिस्म का जख्म पेश्तर कि भरा करे
इश्तिहार अखबार में निकाले नहीं

जिगर से खूं यहाँ, बेसबब रिस रहा
कहने को उधर पांवों में छाले नहीं

हम जियें या मरे, गरज किसको 'सुशील'
किस्मत किया किसी के हवाले नहीं

हो के हैरान सा अब जमाना दिखा
सादगी , बेडियां पाँव डाले नहीं

 

गजल /घनाक्षरी 
सहूलियत की खबर.....
तेरी उचाई देख के,  कांपने लगे हम
अपना कद फिर से, नापने लगे हम

हम थे बेबस यही, हमको रहा मलाल 
आइने को  बेवजह, ढांपने लगे हम

बाजार है  तो बिकेगा ,ईमान हो या वजूद
  सहूलियत की खबर ,छापने लगे हम

दे कोई किसी को,मंजिल का क्यूँ पता
थोडा सा  अलाव वही ,  तापने लगे हम 

वो अच्छे दिनों की ,माला सा जपा करता
आसन्न खतरों को ,भांपने लगे हम

स  1०.५.१५

 

गजल -घनाक्षरी 

बस ख्याले  बुनता रहूँ.....
अँधेरे में दुआ करू ,ऐ खुदा परछाई दे
बेख्याली में निकले ,जो नाम सुनाई दे

करवट  न बदलू,कोई ख़्वाब न देखूं
नींद से उठते तेरी ,याद जुम्हाई दे

कसमों का कसीदा हो,कहीं वादों का हो ताना
ख्याले  बुनता रहूँ ,बस यूँ  तन्हाई दे

उजड़े गुलशन में ,सब्ज-शजर देखूं
हो तब्दील  किस्मत,जन्नत खुदाई दे

रिश्तों की अदालत ,बेजान हलफनामे
या मुझे ज़िंदा रख ,या मेरी रिहाई दे

--


 

सीता राम पटेल


चौका छक्का: पहला ओव्हर
1:-
खाओ बघार
चटनी भ्रष्टाचार
अनोखा स्वाद
रसना ललचाए
2:-
पढ़ो विदेशी
अपनाओ विदेशी
खाओ विदेशी
दूर भगाओ देशी
लाओ विदेशी
भाग्य अपना मेटी
3:-
प्यार हमारा
दुनिया से है न्यारा
दिल में रहते
साथ नहीं रहते

4:-
प्रेम है पीड़ा
प्रेम सब करते
प्रेम है पूजा
प्रेम नहीं जानते
प्रेम है आत्मा
प्रेम परमेश्वर
5:-
भूखा पिपासा
तरसते जीवन
धूप में बैठा
चावल की तलाश
6ः-
सरिता सूखी
अतृप्त है मानव
सागर खारा
रवि का चढ़ा पारा
अतृप्त चाह
सब कुछ है पाना
--.

1ः- दीपदान
मैं गगन का दोना बनाउं
उसमें जलाउं सूरज का दीप
और सागर में करूं दीपदान
पर सोचता हूँ एकाएक
कहीं सूरज के प्रचण्ड ताप
सागर को सूखा न दे
जीवन क्रम थम न जाए
सृष्टि सृजन रूक न जाए
इसीलिए हे प्रभु
जो जो जहाँ जहाँ है
उसी जगह करता हूँ दीपदान
2ः- मिट्टी का लड्डू
एक नन्ही बालिका
नन्हा से बालक को दिया
एक अनोखा उपहार
मिट्टी का लड्डू
बालक भी उसे
लड्डू समझकर खा गया
और उसे खाकर
अद्भुत आनंद पा गया
3ः- नयनों की नशा
मैं पीता नहीं हूँ शराब
फिर भी ना जाने क्यों
लोग मुझे शराबी कहते हैं
है ये तेरी नयनों की नशा
तो क्या वे खराबी कहते हैं
लोग कहते हैं होता है शराब में नशा
एक बार देख लेंगे वे तेरी नयनों को
नशा क्या होता है जान जाएंगे
और वे शराबी कहना भूल जाएंगे
4ः- संगम
एक ऐसी रचना जिसे आप कभी न भुलाएं
जिसे सुनकर आपके मन मस्तिष्क में आनंद की लहर छा जाए
एक गुदगुदी, एक सिहरन आपके तन बदन में आग लगाए
एक शहर के हृदय प्रदेश में था एक रस सराय
जहाँ विभिन्न क्षेत्रों के लोग हैं आते
और अपना रात्रि विश्राम यहां बिताते
एक निम्नवर्ग का नवदम्पत्ति हनीमून के लिए यहाँ आए
खिलौनेवाला का एक भी नहीं बिका खिलौना
वो भी थक हारकर रात बिताने यहाँ आया
एक बदनसीब बाप को उसकी बेटी कालिख लगाई
किसी लड़के के साथ शहर भाग आई
उसे खोजते खोजते हो गया हलकान
यामिनी काटने के लिए वो भी यहाँ चला आया
सभी मुंह ढांपकर सो रहे हैं
पर उनकी नयनों में थी नींद गायब
इधर नवदम्पत्ति का हिलने लगा चद्दर
होने लगी फुसफुसाहट अंदर से बाहर
पूछ रही है पत्नी अपनी पति से
कितना आनंद मिल रहा है वो मिस्टर
आनंद का नहीं पा रहा है पारावार
आनंद नहीं है कोई व्यापार
करने को आनंद का बखान
छोटे पड़ रहे हैं मेरी जबान
पर कहना तो पड़ेगा ही
वरना हो जाओगी तुम नाराज
सुन्दरी त्रिलोक दिखाई दे रहा है आज
बदनसीब बाप पूछता है
मेरी बेटी दे रही है कहीं दिखाई
निकालो निकालो जल्दी
बाप मेरा बोल रहा है पत्नी कान के पास बोली
मत निकालना भाई गिना हुआ है मेरा खिलौना
आज एक भी खिलौना नहीं बिका था
मेरा भाई पड़ किसी लड़की के चक्कर
निकल गया है वो हमारा घर
उसी को मैं आज खोज रहा था
पर तेरी आवाज इतनी जानी पहचानी कैसी है
कहीं घर से भागा मेरा भाई तो नहीं है
बदनसीब बाप बोलता है
कहीं घर से भागी मेरी बेटी तो नहीं है
हाँ मैं ही हूँ तेरा अभागा भाई
हाँ मैं ही हूँ तेरी अभागन बेटी
आज ही हमने कोर्ट में शादी रचाई
तो बेटी क्यों मेरे मुख में कालिख पोताई
भैया क्यों की हमारी जग हंसाई
वे दोनों उत्तर दे नहीं पाए भाई
हैप्पी इंडिग हुआ अब तो घर जाओ भाई

-------------.

कुमार, अरविन्‍द

हासिये की समस्‍याएं

बंद करो
नाटक-नौटंकी
मत करो छलावा
बस करो
बहुत हो गया
बूढ़े हो गये
खेल तुम्‍हारे
आंखों पर छाने लगा धुंधलका
कुछ तो नया करो
बंद करो ‘राग-रागनी'
‘जनता' का पेट है खाली
बूढ़ी हड्डी सिसक रही हैं
तन पर नहीं है लत्ता ।
‘पोल' तुम्‍हारी धुल गयी है
झांसे में
नहीं आने वाले,
कही ‘धर्म' की राजनीति
कही ‘प्रांतवाद' है हावी
‘दलीय राजनीति' का बदला मुखौटा
‘जातिनीति' हो गयी भारी
‘मुद्दे' सारे
धरे रह गये
उनका पेट हो गया भारी
जादू नहीं
आइना है ये
जनता बन गयी
‘बछिया का ताऊ' ।
सड़क खुदी की खुदी रह गयी
पत्‍थर आये थे
पता नहीं कहां चले गए
‘शुभ मुहुर्त' हुए । वषोंर् गुजर गए
‘पांच वर्षों' में
कई बार नया ‘गालियारा'
पर अब तक बना नहीं
कई ‘पंचवर्षी योजनाएं'
बीत गयी
पर उनका कोई ख्‍याल नहीं ।
‘बुधुआ' का ‘दुवार'
राह के चौड़ीकरण में मिला लिया
पर ‘ठाकुर ‘साहब' का वैसा ही बना रहा
न्‍याय का ‘हनन' हुआ
‘अन्‍याय' पर चढ़कर बोला
राजनीति का चेहरा देखो
‘प्रांतवाद' में पढ़ी हुई
हाशिये पर पढ़ी समस्‍याएं
‘हाशिये' पर बनी रह गयी ।
-------.
नारी की खोती अस्‍मिता

इस शहर से लेकर
उस शहर तक
इस गाँव से
उस गाँव तक
एक ही बात
हैवानियत का नंगा-नाच
सरे आम लुटती
नारी की बे आबरू
कहीं भी सुरक्षित नहीं
दहेज की घुटन से घुटती
अपनी अस्‍मिता की पहचान
खोती नारी
विश्‍व स्‍तर पर नारी विमर्श
फिर भी
नारी सत्ता का वर्चस्‍व
पुरुष के हाथ
आधुनिकता का डोल-पीटते
जीते पुरातनता,
रूढ़िवादिता के मक्‍कड़ जाल में फंसे
जिसकी छांव तले
पलते-बढ़ते
उसका जन्‍म होने से
पहले ही गला घोट देते हैं ।
जहाँ पूजते नर-नारी को
उस धरती पर है हैवानियत का
का नंगा नाच
राक्षसों का बढ़ावा
अपने को मिटाने का
शुभ संकेत
-----

वे मासूम हाथ

दुर्गन्‍ध युक्‍त कूड़े के ढेर पर
दूर से आती हुई बदबू
खींच ले जाती है उन्‍हें
अपने पास
कूड़े के ढेर पर मंड़राती
भिनभिनाती मक्‍खियां
प्रतिस्‍पर्धा का तरोताजा उदाहरण
देखकर टूट पड़ते हैं
वे मासूम हाथ
जिनके हाथों में कलम दवात नहीं
एक लोहे की अंगुसी
जिसके सहारे वे अपनी किस्‍मत
को तय करते चलते जाते
वो भी किसी दूसरे के सहारे
वह उनका अपना भी नहीं ।
महज पेट की भूख और
शरीर पर एक कपड़े के लिए
वह ताउम्र इसी नादानी में
अपने जीवन को
होम कर देते हैं.............

सम्‍पर्क ः द्वारा एस0 के0 पाल
7,436ए वृन्‍दावन योजना-2,
रायबरेली रोड़, लखनऊ

 

--------

शालिनी श्रीवास्‍तव,

-ःतुमः-

मेरी नव चेतना की नव संवेदना
हो तुम।
चांद से चांदी के रथ पर
होकर सवार मेरे लिए आये
हो तुम।
मेरी सूनी सी जिंदगी को
सात सुरों का ताज पहना गये
हो तुम।
करीब होते हुये भी करीब लगते
करीब न होते हुये भी जाने क्‍यों करीब लगते
हो तुम।
पडा तुम्‍हारे इश्‍क का मुझ पर कुछ ऐसा साया
कि अब अपनी ही छाया में नजर आते
हो तुम

पता-चिनार फोरच्‍युन सिटी ,होशंगाबाद रोड, भोपाल।

------------------.

मनीष सिंह


मेरा हिन्दुस्तान कहाँ है?

कभी जो रहता दिल में सबके,
जोश का वो तूफ़ान कहाँ है।
पूछ रहा मन मेरा मुझसे,
मेरा हिन्दुस्तान कहाँ है?

लेकर शपथ ये इश्वर की,
करते हैं सिर्फ घोटाला ये।
घर में रबड़ी होती है,
खाते हैं फिर भी चारा ये।

जेल तो ससुराल है इनकी,
वहां भी चलती मनमानी है।
देख सुन कर भी हैं चुप,
ये कैसे हिन्दुस्तानी हैं।

जहाँ पे कलियाँ खिलती थीं,
मौत वहां अब हँसती है।
जहाँ अमन की बस्ती थी,
वहाँ आज ज़िन्दगी सस्ती है।

सबका मालिक एक है जब,
तो मज़हब के नाम पे जंग है क्यों।
हर धर्म सिखलाता भाईचारा,
तो इंसा का दिल तंग है क्यों।

समय ने करवट ऐसी बदली,
लोग भूल गए हैं सब संस्कार।
सत्य अहिंसा बह गए दरिया में,
रह गया तो बस ये भ्रष्टाचार।

वीर मरते हैं सीमाओं पे,
और दरिन्दे बिरयानी खाते हैं।
सत्ता के मद में चूर कुछ लोग,
सोती जनता पे लाठियां चलवाते हैं।

रक्षक ही भक्षक बन बैठे,
अब किसपे करें विश्वास यहाँ।
सपना तो राम राज्य का था,
पर राम को  मिला फिर वनवास यहाँ।

हे मालिक ये विनती है,
देश की फिर से वो शान लौटा दो।
गाँधी सुभाष के सपनो का,
मुझे मेरा हिन्दुस्तान लौटा दो।


कवि परिचय

नाम: मनीष सिंह
ईमेल : immanish4u@gmail.com
वेबसाइट : http://www.immanish4u.com
वर्तमान पता: 017, प्रिस्टिन पैराडाइस अपार्टमेंट ,
शान्ति निकेतन स्कूल के पास ,
अनुग्रह लेआउट , बिलेकाहल्ली , बैंगलोर ( कर्नाटक ) – 560076
--------------------.

स्नेहा


राह
एक राह जो मंज़िल तक पहुँचा दे,
एक चाह जो अपनों से मिला दे,
मिलती है मंज़िल उसको जो सपनों को जगा ले
सपनों की इस दुनिया में कोई खो ना जाना
राहें भी होंगी पर तुम लौट आना,
मिलेगी मंज़िल तुम्हें उसी राह पर,
बस उन राहो में हमें भूल ना जाना,
चाहना हमें तुम परदेश में भी
मेरे साथिया बस मेरा साथ निभाना,
उम्मीदें बड़ी है तुमसे सबको दूर रहकर भी तुम अपना फ़र्ज़ निभाना,
ना भूलना इस देश को कभी, बेटा बनके माटी का क़र्ज़ चुकाना,
आना जब पास मेरे तो फख्र से तुम मेरा शीश उठाना,
कभी साथी बनकर, कभी राही बनकर, तो कभी बेटा बनकर
तुम जीवन नया दे जाना,


---------------.

जय प्रकाश भाटिया


वही कुछ 'ख़ास' हैं
जो दूर है वह पास है, जो पास है वह दूर है,
अजब है यह मोहब्बत, अजब इसका दस्तूर है,
वह सामने है ,फिर भी पास नहीं,
वह पास नहीं, फिर भी  दूर नहीं ,
जो सामने है उसकी परवाह नहीं,
जो दूर है क्यों उसी की आस है,
यह आँख का धोखा है, या मन का विश्वास है,
या केवल एक अनुभूति है, मिथ्या आभास है,
जो पास है वही प्रभु की कृपा है,
जो दूर है वह केवल तृष्णा है,
'संतोष' में ही व्यापक सुख समाया है,
जो नहीं वह केवल एक सपना है,
जिसका आधार आपकी 'कल्पना' है,
सपने भी पूरे होंगे साकार ,अगर प्रेम में पावनता है,  
अपनों से मधुर संचार है, ह्रदय में बसी मानवता है,
प्रभु की करनी पर विश्वास है, न कोई झूठी आस है,
समय का चक्र अविरल चलता है, उम्र सभी की गुजरती है,
पर जो 'जीते' हैं किसी मकसद से , वही कुछ 'ख़ास' हैं, 
०९/०४/२०१५      --------


KOHINOOR WOOLLEN MILLS
238, INDUSTRIAL AREA - A
LUDHIANA - PUNJAB - INDIA-141003
Mob. 09855022670
0161- 2601789,
E Mail-jp.bhatia@kohinoorwoollenmills.com
            jpbhatia2@gmail.com,

----------------.

कुमार अनिल पारा,


भूल गये सत्‍कर्मों को
--------------------------------------------------------------
कौन बनाया ईश्‍वर अल्‍लाह, कौन बनाया धर्मों को,
इंसानों को बांट दिए हैं, बांट दिए वो कर्मों को,
ऊंच-नीच का भेद बनाया, और बनाया धर्मों को,
जातिभेद का पाठ पढ़ाकर, भूल गये सत्‍कर्मों को,
कौन बनाया गिरजाघर को कौन बनाया मंदिर को,
कौन बनाया गुरूद्वारे को कौन बनाया मस्‍जिद को,
हाथ लगे इंसानों के और भूल गये उन कर्मों को,
पाठ पढा़कर पूजा का और भूल गये सत्‍कर्मों को,
कौन बनाया भक्‍तों को और कौन बनाया संतों को,
संत, मौलवी, सन्‍यासी सब भूल गये सत्‍कर्मों को,
कौन बनाया धरती मां को कौन बनाया अंबर को,
कौन बनाया दिनकर को और बनाया तारों को,
कौन बनाया ईश्‍वर अल्‍लाह, कौन बनाया धर्मों को,
इंसानों को बांट दिए हैं, बांट दिए वो कर्मो को,
ऊंच-नीच का भेद बनाया, और बनाया धर्मों को,
जातिभेद का पाठ पढ़ाकर, भूल गये सत्‍कर्मों को,
मिट्टी बेचा, पानी बेचा, बेच दिया भगवानों को,
सौदा करना कौन सिखाया कफनों के इंसानों को,
कौन बनाया ईश्‍वर अल्‍लाह, कौन बनाया धर्मों को,
इंसानों को बांट दिए हैं, बांट दिए वो कर्मों को,
घर का ऑगन बांट दिए हैं बांट दिए हैं खेतों को,
खेतों की सीमा को छोड़ो बांट दिए हैं देशों को,
इंसानों में भेद बनाकर बांट दिए इंसानों को,
कौन बनाया ईश्‍वर अल्‍लाह, कौन बनाया धर्मों को,
इंसानों को बांट दिए हैं, बांट दिए वो कर्मों को,
ऊंच-नीच का भेद बनाया, और बनाया धर्मों को,
जातिभेद का पाठ पढ़ाकर, भूल गये सत्‍कर्मों को,
जातिभेद का भेद बनाया छोड़ो उन दरवाजों को,
मिट्टी बेची, पानी बेचा, बेचा है भगवानों को,
सौदा करना कौन सिखाया कफनों के इंसानों को,
कौन बनाया ईश्‍वर अल्‍लाह, कौन बनाया धर्मों को,
बांट दिए हैं इंसानों को छोड़ो उन शैतानों को,
ऊंच-नीच का भेद बनाया, और बनाया धर्मों को,
जातिभेद का पाठ पढ़ाकर, भूल गये सत्‍कर्मों को,
--
अब तो सम्‍हल जा समय के मुसाफिर
हैं बेजुबां बहुत से मुसाफिर, जहां पैर रखकर तू जाता है काफिर,
कदम को जमीं पर सम्‍हल के है रखना,
जहां पैर रखकर तू जाता है काफिर,
चींटी नहीं है बताने की आदी, ना ही है हल्‍ला मचाने की आदी,
मगर बेजुबां के इशारों को समझो,
कदम पर जमीं के सितारों को समझो,
हे बेजुबां बहुत से मुसाफिर,
कदम को जमीं पर सम्‍हल के है रखना, जहां पैर रखकर तू जाता है काफिर,
नहीं रास्‍ते पर तुम्‍हारे वो आती,
सुन्‍दर लकीरों सी राहें बनाती, कभी भूल ऐसी नहीं है वो खाती,
मुसाफिर है छोटी, मगर वो बड़ी,
मुश्किल भरी राह पर वो खड़ी,
मासूम है वो मगर फुलझड़ी है, हाथी, की राहों में मुश्किल बड़ी है,
मगर बेजुबां  वो सताती नहीं है, घड़ी दो घड़ी भी बताती नहीं है,
हैं बेजुबां बहुत से मुसाफिर, जहां पैर रखकर तू जाता है काफिर,
कदम को जमीं पर सम्‍हल के है रखना,
जहां पैर रखकर तू जाता है काफिर,
सद्भावना के वो किस्‍से दिखाती, सहयोग की है वो ज्‍वाला जलाती,
सहयोग से ही वो अपने वजन से है दुगना उठाती,
है बेजुबां वो मगर हमसे बड़ी है,
इरादों की महफिल में भी अकेली खड़ी है,
किस्‍से कहानी सभी सुनाती,
मगर रास्‍ते पर कभी भी न आती,
सीखो जरा तुम उसकी कहानी,
ताजा है ये तो नहीं है पुरानी,
अब तो सम्‍हल जा समय के मुसाफिर, जहां पैर रखकर तू जाता है काफिर,
कदम को जमीं पर सम्‍हल के है रखना,
जहां पैर रखकर तू जाता है काफिर,
---.

मैं मुसाफिर था समय का शाम डलते सो गया, शाम डलते सो गया,
रात की किलकारियों से अनजान में तो रह गया, अनजान में तो रह गया,
चीखते थे रास्ते और चीखती थी रात वो,
पर अधूरे ख्वाब की उस रात से में डर गया,
में मुसाफिर था समय का शाम डलते सो गया, शाम डलते सो गया,
काफिले उस रात के जो थे नशे में चूर वो,
रात की किलकारियों में थे मगर मगरूर वो,
जान आफत में समझ चादर लपेटे सो गया,
मासूम की किलकारियों को देख में तो रो गया,
मैं मुसाफिर था समय का शाम डलते सो गया, शाम डलते सो गया,
रात की किलकारियों से अनजान में तो रह गया, अनजान में तो रह गया,
डरपोक ना कह मुझको जालिम तू कहां तब सो रहा,
देख कर उन आंसुओं को तू भी तो तब छुप गया,
बेटी , बहन और मां किसी की लुट रही उस रात को,
देख कर भी हरकतों को तू नशे में सो गया,
जिंदगी ओर मौत से जो लड़ रही मासूम है,
जान आफत में पढ़ी है जो रो रही मासूम है,
जख्म ऐसे हैं दिये बहसी दरिन्दों ने उसे,
जान जोखिम में पढ़ी अब सोच के में रह गया,
रात की उस मात को देख में तो रह गया,
था समय का खेल वो इस नासमझ की जिंदगी में दाग कैसे रह गया,
मैं मुसाफिर था समय का शाम डलते सो गया, शाम डलते सो गया,
रात की किलकारियों से अनजान में तो रह गया, अनजान में तो रह गया,
-----.
मां के आँचल की छांव में

मां के आँचल की छांव में बचपन के दिनों का सूरज रोज निकलकर शाम डलते ही डूब जाता था।
आसुओं की क्या हिम्मत है, गमों के साये भी आसपास भटकने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे।
तेज धूप की तपन भी मां के आँचल की छांव के सामने टिक नहीं पाती थी।
रोते बिलखते  बचपन को जरूर देखा होगा आपने, पर भूख से बेहाल बचपन मां के दूध से खिलखिला जाता था।

ना धरती से ही हम परिचित थे और ना ही आसमान से ही हम परिचित थे

मां की भूख और मां के गमों से अनजान बचपन बस मां की ममता और दुलार से ही हम परिचित थे।
हौसले बहुत थे जमीं पर चलने के, पर बेकार हो गये सारे बगैर मां के सहारे के।
गिरते लुढकते जमीं को नापा था, पर बेकार थे हौसले बिन मां के सहारे के।

अपनी भूख प्यास से भी अनजान होकर तेज धूप और तपन से बचाया था।
ये मां तूने अपने आंचल को फैलाकर अपने आँचल की छांव का बगीचा लगाया था।

मेरे हौसलों को वारिस की बूंदों ने भी नहीं डिगा पाया था, ये मां जब मेरे सर पर तेरा साया था।
मुझे याद है मां तेरी वो लोरियां और मीठी कहानियां जो मुझे नींद में गुमनाम कर देतीं थीं।
रास्ते की दूरियों भी मुझे गोदी में बैठाकर कम कर देती थी।

मुझे अब शर्म आती है,जब तेरी बात का जवाब हर कोई झुंझलाकर देने में शुमार हो चुका है,
विडम्बना इस बात की है कि जिस मां के खून और पसीना से यह शरीर बना है

आज वहीं शरीर मां को सहारा देने के बजाय उसकी समझदारी भरी बातों से अनजान हो चुका है।

मुझे फर्क है कि में उस मां के बैठा हूं जिसने कभी मुझे गीले बिस्तर का एहसास भी नहीं होने दिया।

खुद दुखों की नगरी में रहती थी, पर मुझे कभी दुखों का एहसास भी नहीं होने दिया।
मुझे नींद में सुलाने की खातिर मां तूने रात भर अपनी नींद को गुमनाम कर दिया।
हर मां की कहानी बस यही होती है, बच्चे को सुलाने की खातिर खुद नहीं सोती है।
हमारे देश में मां तू दूसरा रूप है सरस्वती का, फर्क इतना है कि उसे कंठ की देवी कहा जाता है।
और तुझे जगत जननी कहा जाता है।

anilpara123@gmail.com

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देवेन्द्र सुथार

यह नदियों का मुल्क है,
पानी भी भरपूर है ।
बोतल में बिकता है,
पन्द्रह रू शुल्क है।

यह शिक्षकों का मुल्क है,
स्कूल भी खूब हैं।
बच्चे पढ़ने जाते नहीं,
पाठशालाएं नि:शुल्क है।

यह गरीबों का मुल्क है,
जनसंख्या भी भरपूर है।
परिवार नियोजन मानते नहीं,
नसबन्दी नि:शुल्क है।

यह अजीब मुल्क है,
निर्बलों पर हर शुल्क है।
अगर आप हो बाहुबली,
हर सुविधा नि:शुल्क है।

यह अपना ही मुल्क है,
कर कुछ सकते नहीं।
कह कुछ सकते नहीं,
बोलना नि:शुल्क है।

यह शादियों का मुल्क है,
दान दहेज भी खूब है।
शादी करने को पैसा नहीं,
कोर्ट मैरिज नि:शुल्क है।

यह पर्यटन मुल्क है,
रेलें भी खूब हैं।
बिना टिकट पकडे गये,
रोटी कपड़ा नि:शुल्क है।

यह अजीब मुल्क है,
हर जरूरत पर शुल्क है।
ढूंढ कर देते है लोग,
सलाह नि:शुल्क है।

यह आवाम का मुल्क है,
रहबर चुनने का हक है।
वोट देने जाते नहीं,
मतदान नि:शुल्क है।

 


लौट आये बचपन

जीवन का अनमोल पल
हो गया आज वो बीता कल
मन को घेरता झूठ-छल
गुम हुई सादगी मासूमियत
अब नहीँ जिँदगी मेँ अहमियत
वो मेरी दंतुरित मुस्कान
डालती जो मृतक मेँ जान
अब उसमेँ वह नहीं रहा मजा
बचपन के सिवाए जिँदगी सजा
लौट आये स्वर्णिम हर्षित क्षण
पूरा हो अधूरा मेरा स्वप्न
फिर से हाथोँ मेँ कागज की कशती
फिर लौट आये वह शरारत व मस्ती॥ 

-devendrasuthar196@gmail.com

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