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स्वावलंबन से जीवन में सुंदरता का सृजन

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स्वावलंबन से जीवन में सुंदरता का सृजन

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

कहा गया है कि अप्प दीपो भव। लेकिन हर व्यक्ति अपना दीपक अथवा गुरु नहीं बन सकता। स्वयं दीपक अथवा प्रकाश बनने के लिए भी उचित मार्गदर्शन अनिवार्य है। और यह एक गुरु के बिना, उसकी संगति के बिना कठिन हो जाता है। लेकिन क्या एक योग्य गुरु की तलाश या चुनाव सरल है? यदि हममें योग्य गुरु की तलाश करने की योग्यता हो तो फिर परेशान होने की बात ही क्या है? जो व्यक्ति एक अच्छे गुरु की तलाश करने की योग्यता रखता है, वह तो स्वयं अपना गुरु बन सकता है। व्यक्ति को जहां तक संभव हो स्वावलंबी बनने का प्रयास करना चाहिए।

सेवन हैबिट्स वाले मशहूर स्टीफन आर.कवी बिलकुल ठीक कहते हैं कि एक मकान बनाने के दौरान, मिटटी का पहला बेलचा उठाने से पहले ही हम अपने दिमाग में उस मकान के आखिरी पहलू तक की योजना बना लेते हैं। फिर इसका ब्लू प्रिंट तैयार किया जाता है। इसीलिए, मैं ये सवाल उठाता हूँ - हम हर दिन, हर सप्ताह या हर वर्ष को वास्तविक रूप में जीने के पहले उन्हें अपने दिमाग में निर्मित क्यों नहीं करते ? मुझे लगता है हर स्वावलम्बी जीवन अपने जीवन के लक्ष्यों और कार्यों का ब्लू प्रिंट जरूर तैयार करता है, करना चाहिए। यह भी कि जो चीज़ें सर्वाधिक महत्व रखती हैं, उन्हें उन चीज़ों पर कदापि निर्भर नहीं रहना चाहिए जो न्यूनतम महत्व रखती हैं। 

इकबाल ने क्या खूब कहा है -

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले,

खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है?

अज्ञेय लिखते हैं, 'वास्तव में कोई भी किसी को सिखाता नहीं है। जो सिखाता है, अपने ही भीतर के किसी उन्मेष से, प्रस्फुटन से सीख जाता है। जिन्हें गुरुत्व का श्रेय मिलता है, वे वास्तव में केवल इस उन्मेष के निमित्त होते हैं और निमित्त होने के लिए किसी गुरु अथवा व्यक्ति की क्या आवश्यकता है? सृष्टि में कोई भी वस्तु उन्मेष का निमित्त बन सकती है।' लोग कहते हैं कि गुरु के बिना पूर्णता नहीं मिलती, उत्कर्ष को नहीं पा सकते। लेकिन आज के तथाकथित गुरु ज्ञान कहां दे रहे हैं? आपको मुक्त कहां कर रहे हैं? आपको अपने आपको जानने का अवसर कहां उपलब्ध करा रहे हैं? आज के अधिकांश गुरु तो अपनी महत्ता सिद्ध करके पैसा कूटने में लगे हुए हैं। 

रामकृष्ण परमहंस नहीं मिलते तो नरेंद्रनाथ दत्त विवेकानंद नहीं बन सकते थे। नेत्रहीन स्वामी विरजानंद ने मूलशंकर को स्वामी दयानंद सरस्वती बना दिया। जब मूलशंकर ने स्वामी विरजानंद की कुटिया का द्वार खटखटाया तो उन्होंने पूछा था, 'कौन है?' मूलशंकर ने कहा था, 'यही तो जानने आया हूं।' जिज्ञासा मूलशंकर में थी। उसी जिज्ञासा, उसी ज्ञानलिप्सा ने उन्हें दयानंद सरस्वती बना दिया। 

हमारी सबसे बड़ी विडंबना है कि हम साधन को लक्ष्य/साध्य मान लेते हैं। चाहे गुरु हो या तीर्थस्थल हो, ये सब साधन हैं, उत्प्रेरक हैं। इनका अपना महत्व है, लेकिन मात्र साधन से, उत्प्रेरक से आप अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकते। गुरु का महत्व है। उसको हम मानें। उसके बताए मार्ग पर चलें, लेकिन खुद चलें, अपना मार्ग खुद तय करें। जब तक खुद स्वयं को जानने का प्रयास नहीं करेंगे, हम प्रगति नहीं कर सकते। स्वयं को जानने के लिए बाह्य नहीं अपितु अंतर्यात्रा करनी अनिवार्य है। इस सब की सामर्थ्य हमारे अंदर है। बस उसे पहचानना है। यहीं गुरु का काम प्रारंभ होता है। गुरु हमें हमारी क्षमताओं से परिचित करवाता है। उसके बाद उसका काम समाप्त। खोज हमें स्वयं करनी है जारी रखनी है। यह खोज दूसरा कोई नहीं कर सकता। ऑलिवर वेंडेल होम्ज़ के ये शब्द हमेशा अपने सामने रखें - जो हमारे पीछे है और जो हमारे आगे है, वह उसकी तुलना में बहुत ही छोटा है जो हमारी भीतर है। तभी तो कहा गया है - 

गैरों से कहा तो क्या,गैरों से सुना तो क्या,

कुछ खुद से कहा होता, कुछ खुद से सुना होता !


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प्राध्यापक,शासकीय दिग्विजय पीजी

ऑटोनॉमस कालेज राजनांदगाँव।

संपर्क - 9301054300

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