ई-बुक : प्राची, जुलाई 2015 : कहानी - अलाव

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अलाव ओमप्रकाश मेहरा अ लाव को घेरकर तीनों बाप-बेटे बैठे थे. उजेला पाख. चांद आसमान में ऊपर उठ आया था. दूर-दूर तक फैले हुए थे खेत, जिनमें...

अलाव

ओमप्रकाश मेहरा

लाव को घेरकर तीनों बाप-बेटे बैठे थे. उजेला पाख. चांद आसमान में ऊपर उठ आया था. दूर-दूर तक फैले हुए थे खेत, जिनमें कहीं सरसों फूल रही थी और कहीं गेहूं और चना लहलहा रहा था. फसल की रखवाली के लिए मचानों पर किसान रात गुजारने लगे थे. रात अभी अधिक नहीं गुजरी थी, लेकिन गांव जैसे सो गया था. कोई हलचल नहीं-कोई शोर नहीं. दूर-दूर खेतों में अलाव जल रहे थे, जिन्हें घेर कर खेतोें के रखवाले बैठे हुए थे. हवा के हल्के झोंकों में फसल सरसरा उठती थी. कभी-कभी किसी मचान से हो हो, हू हू का शोर उठकर सन्नाटे को तोड़ देता था.

चिलम में तम्बाकू भरते हुए हरखू बोला-‘‘गजब की ठंड पर रही है. ईसुर जाने का हुइहे?’’

यह बात जैसे उसने अपने आपसे कही हो. उसके दोनों बेटे चुपचाप बैठे रहे. अलाव की दहकती हुई आग के प्रकाश में तीनों के चेहरे तपे हुए तांबे की तरह दिखाई पड़ रहे थे. कभी एकाध लकड़ी चटखती तो क्षण भर के लिए आग तेज पड़ जाती. उस क्षण भर के उजेले में हरखू की चिंताकुल, गढ़ों में धंसी हुई आंखें, उसके चेहरे की परेशान सलवटें स्पष्ट हो आतीं. क्षण भर के लिए उसके बेटे मोहन और रामजस के चेहरों पर से भी धुंधलाहट दूर हो जाती. उनके चेहरों पर अजीब-सा बुझापन, अजीब-सी थकन थी. अभाव और विपन्नता के अंधेरे ने जैसे ग्रस लिया था उनके चेहरों की दीप्ति को.

‘‘हो !हो !हो! हो! लगै लगै.’’

दूर किसी खेत के मचान पर से शोर उभरा. सन्नाटा टूट गया. ठंडी हवा का एक झोंका आया और सरसों के पौधों में अजीब-सी कानाफूसी शुरू हो गई. अलाव के अंगारे दहक उठे.

‘‘बप्पा रे...!’’ छोटा लड़का रामजस एकाएक कांपती आवाज में कह उठा.

चिलम का एक खूब गहरा दम खींच लेने से हरखू की आंखों में पानी निकल आया था, क्षण भर वह जोर-जोर से खांसता रहा, फिर दम साधकर बोला-‘‘का है?’’

रामजस कुछ नहीं बोला, वह आग के और पास सिमट आया. हरखू ने एक बार आंखें भर कर उसे देखा. उसकी स्मृति में जमना के चेहरे की आकृति घूम गई. रामजस बिलकुल उसी पर गया है, उसने सोचा.

उसका मन पीछे लौट गया. पहली पत्नी मथुरा की मृत्यु के समय मोहन मुश्किल से छः बरस का था. गांव वालों ने उसे समझाया था कि वह दूसरा ब्याह कर ले, तो उसे भी तकलीफ नहीं होगी और मोहन किसी तरह पल जायेगा. पहले तो उसे यह लगता रहा कि यह ठीक नहीं होगा. इसी सोच-विचार में एक साल यों ही निकल गया. घर और खेत दो-दो जगहों की जिम्मेंदारी संभालना उस अकेली जान के लिए बड़ा तकलीफदेह था. न वक्त पर खाना हो पाता, न वक्त पर सोना. तब खेत में हाड़-जांगेर खपाने की ताकत कहां से आती? उस साल जब खेत का एक बड़ा टुकड़ा पड़ती रह गया, तो उसे निर्णय लेना ही पड़ा. वह दूसरा ब्याह कर लाया.

जमुना ने आकर हरखू की उजड़ती हुई जिंदगी संवार दिया. एक बार फिर हरखू के टूटे हुए हौसले जुड़ गये. उसके होठों पर मुस्कुराहटें वापिस आ गई. फिर जमुना के जीते जी उसे कोई तकलीफ नहीं होने पाई. अलबत्ता मोहन को लेकर घर की शांति कभी-कभार भंग हो जाती थी, लेकिन ऐसा किस घर में नहीं होता?

खेत की मेंड़ वाले आम के पेड़ पर कोई पक्षी चीखा.

उधर दक्षिण की तरफ से आवाज आई-‘‘टिट्टवी, टिट्टवी.’’ टिटहरी की करुण आवाज चुप्पी को तोड़ गई.

हरखू ने रामजस की ओर देखा, जिसे चार बरस का छोड़कर ही जमुना परलोकवासिनी हो गई थी. उसे वह प्लेग याद आई, वे यंत्रणायें याद आईं जो जमुना ने सही थीं. उसकी आंखों की कोर गीली हो आई.

रामजस अब आठ-नौ बरस का है. मां के प्यार से वंचित रह गया है, अभागा. करुणामयी दृष्टि से उसकी ओर देखने लगा, हरखू.

रामजस ने एक बार अपने पिता की ओर देखा और रुदन करती-सी आवाज में बोल उठा-‘‘सभ्यार जुड़ाय गओ, बप्पा.’’

हरखू ने कंधों पर पड़ी हुई धोती निकालकर उसे उढ़ा दी. उसके सिर पर हाथ फेरते हुए उसे अपने पास खींच लिया.

बड़े लड़के मोहन ने एक बार सिर उठाकर ऊपर देखा. उसकी दृष्टि अपने बाप और उसकी गोद की उष्णता में सुरक्षित चादर ओढ़े हुए रामजस पर थी. उसकी आंखों की पुतलियां सिकुड़ी और वहां एक इस्पाती शीतल कठोरता आकर बैठ गई. शायद वह सोच रहा था-हां यही रामजस तो है उसका सबसे बड़ा दुश्मन. इसी के कारण नई मां ने उसे कभी नहीं चाहा और यही उसके पिता का प्यार भी उससे छीन बैठा है. मोहन अब छोटा नहीं रहा. पंद्रह बरस की उम्र हो चली है उसकी. शरीर के चारों तरफ एक फटा-सा कम्बल लपेटे बैठा था वह.

जब-जब अलाव की लपटें तेज होतीं उसका मिंचा हुआ चेहरा दिखाई पड़ जाता. उसके चेहरे पर भीतर उमड़ते हुए रोष की प्रतिछाया थी. एक विद्रोह-सा उसके मन में सिर उठा रहा था. वह विद्रोह था, ममता और प्यार के भूखे मन का. जब से उसकी मां मरी थी उसे प्यार नहीं मिला. उसकी मां की मृत्यु के साल भर बाद ही आ गई थी उसकी नई मां, जिसने शायद उसे कभी नहीं चाहा.

तब वह बहुत छोटा था. उसके मन की सतहें कोमल थीं. उन कोमल सतहों को मीठे और ममता वाले स्पर्श नहीं मिले, तो वे सतहें चोटें सह-सह कर टूटती गईं. उसके नन्हें मन ने छोटी सी उम्र में ही बहुत कुछ सीख लिया था. वह धीरे-धीरे सख्त होता गया. शायद वह इस तरह उपेक्षित हो कर भी जी लेता, लेकिन ज्यों-ज्यों दिन गुजरते गये, नई मां की कठोरता भी बढ़ती गई. रामजस का जन्म होने के बाद तो एक तरह से जैसे उसका अस्तित्व ही भुला दिया गया. उसे महसूस होता कि पिता की दृष्टि भी उसकी ओर से फिर गई है. नन्हीं उम्र में ही उसके ऊपर ढेर से काम लाद दिये गये. वह काम करता रहता और रामजस के ऊपर स्नेह की वर्षा होते देखता रहता. रामजस के प्रति यह पक्षपात देख-देख कर उसमें धीरे-धीरे ईर्ष्या की भावना घर करती गई. रामजस उसे दुश्मन जैसा लगता, जिसके कारण उसे कोई प्यार नहीं करता था-यहां तक कि पिता ने भी उसे उपेक्षित कर दिया था.

अलाव की लकड़ियां सुलग-सुलग कर टूटती गईं और घुटनों पर मुंह टिकाए बैठा मोहन अपनी जिंदगी की कहानी के पन्ने उलटता रहा. मां की धुंधली याद उसकी स्मृति में चिनगारी की तरह जलती-बुझती रही. उसे हल्की-सी याद है मां की गोद में बैठकर वह ढेर-सी कहानियां सुना करता और मां की थपकियां उसे नींद की राजकुमारी के देश में भेज देतीं. जब गांव का बाजार भरता अपने पिता की अंगुली थामे वह पूरे बाजार में यहां से वहां घूमता. कभी खिलौनों की दुकान पर ठिनकता और कभी मिठाई की दूकान पर बिलखता. लौटता तब उसके नन्हें-नन्हें हाथ ढेर सारी चीजों से लदे रहते. त्योहार आते तो उसके लिये नए कपड़े जरूर आते. मां के मरने के बाद उसकी ममता का संसार छिन गया. फिर सूने घर के ओसारे में वह अकेला चक्कर काटा करता और रोया करता.

साल बीतते न बीतते आ गई उसकी नई मां. मोहन ने उसकी ओर आश्चर्य से देखा. वह उसे अपनी मां जैसी नहीं लगी थी. उमर में भी कितनी छोटी थी वह. उसके पिता ने जब उससे कहा था कि वह उसकी मां थी तो न जाने क्यों उसकी आंखों में पानी भर आया था. उसी दिन नन्हें मोहन के मन में एक आवाज उभरी थी कि शायद उसके सुख के दिन अब खत्म हुए. और सचमुच हुआ भी यही. नई मां ने उसे कभी प्यार नहीं किया. उल्टे उसके सिर पर कामों का बोझ बढ़ता रहा. उसके सब नाजुक स्वप्न जैसे धूल में मिलते गए...उसकी बाल सुलभ चंचलता गायब होती गई और एक असामयिक प्रौढ़ता-सी उसका स्थान लेती गई. मुस्कुराहटें अब उसे बहुत कम आतीं. वह अक्सर उदास और गंभीर रहता. उसकी आंखोें में एक दबा हुआ-सा हाहाकार छाया रहता. वह सब सुन लेता...कहता कुछ नहीं, लेकिन एकांत मिलने पर रो लेता.

रामजस पर बरसता था नई मां का प्यार. उसमें उसका कोई हिस्सा नहीं था. मां-बाप की सारी ममता रामजस के लिए थी. सब खिलौने, कपड़े और मिठाइयां उसके लिए थीं. उसके भाग्य में सिर्फ उन्हें हसरत से देखना था. उसके हिस्से में तो गाय-भैसों की सानी करना, दूध दोहना, कुट्टी काटना और खेत पर जाना था. वह छोटी सी उम्र में ही एक जिम्मेदार आदमी बना दिया गया था. उसकी जिंदगी से सब मासूम चीजें छीन ली गई थीं. वह देखता रहता था रामजस को हंसते-खेलते.

‘‘मोहनवा’’

उसके विचारों की कड़ियां टूट गईं. चौक कर उसने पिता की ओर देखा. ठंड बढ़ गई थी. चादर में लिपटे होने के बावजूद रामजस अब तेजी से कांप रहा था.

‘‘का है बप्पा?’’

‘‘ओही कम्बल दे दे.’’

मोहन ने एक बार अपने शरीर पर लिपटे हुए कम्बल को देखा. उसका मन एक किस्म की घृणा जैसे भाव से भर उठा अपने पिता के प्रति. आखिर उसके मन में रामजस के प्रति इतना पक्षपात क्यों है? क्या वह स्वयं मिट्टी का बना हुआ है? क्या उसे ठंड नहीं लगती? क्या रामजस ही सब कुछ है और वह कुछ नहीं?

नहीं, नहीं देगा वह कम्बल.

उसने पिता के कथन की अवहेलना कर दी. एक कठोरता-सी उसके मुख पर फैल आई. आंखों में एक निश्चय-सा चमक उठा. रामजस याचना करती-सी दृष्टि से उसकी ओर देखता हुआ उसके पास सिमट आने की कोशिश करने लगा. कम्बल को और सावधानी से शरीर के चारों ओर लपेट कर रामजस की ओर तिरस्कारपूर्ण दृष्टि से देखते हुए उसने मुंह फेर लिया.

‘‘भैया, मोहूं का कम्बल उढ़ाय दे.’’ कांपती हुई आवाज में रामजस बोल उठा.

मोहन ने जैसे सुना ही नहीं. चुपचाप बैठा रहा. जैसे पत्थर हो. खीझ और कष्ट से रामजस की आंखों में आंसू भर आए. उसने घुटनों में सिर छिपा लिया. आग लपलप करके जलती रही. कुछ देर के लिए वातावरण निस्तब्ध हो उठा. चांद और ऊपर उठ आया था. हवा और अधिक ठंडी हो गई थी. चुप्पी को अगर कोई चीज तोड़ रही थी, तो हवा में खेतों की सरसराहट. घुटनों में मुंह छिपाए हुए ही रामजस सिसकने लगा.

‘‘का है रे?’’ चौंक कर हरखू ने पूछा.

‘‘ठंडी लगत है बप्पा.’’ उसकी सिसकियां बढ़ गईं. हरखू ने जलती सी दृष्टि से मोहन की ओर देखा.

‘‘मोहनवा, सुनत नाहीं? कम्बल उढ़ाय दे ओही.’’

मोहन ने कोई उत्तर नहीं दिया. हरखू के कथन की कोई प्रतिक्रिया उस पर नहीं हुई. पत्थर की मूरत की तरह बिना हिले-डुले बैठा रहा वह. हरखू को सहन नहीं हुई यह अवहेलना. चिलम की आग अलाव में उलटकर वह उठ खड़ा हुआ.

मोहन के सामने जाकर वह कह उठा-‘‘आज तोही सनीचर चढ़िस है का? मार-मार बिलटाय देहों. चुपचाप कम्बल उतार दे.’’

मोहन ने फिर अवज्ञा कर दी.

हरखू क्रोधित हो उठा. उसका क्रोध लात-घूसों के रूप में मोहन पर बरस उठा-‘‘ले, अउर ले. बित्ता भर जान, टेस दिखाउत है.’’ वह मारता गया और चीखता गया.

मोहन बैठा-बैठा ही जमीन पर लुढ़क गया, लेकिन कम्बल को वह कस कर पकड़े रहा. वह घुटने नहीं टेकेगा, कम्बल नहीं देगा...नहीं देगा. उस पर घूंसे बरसते रहे, लेकिन उसके मुंह से एक सिसकारी तक नहीं निकली. रामजस घबरा कर पिता की ओर देखने लगा था.

वह पुकार उठा...‘‘बप्पा.’’

हरखू हांफने लगा था. गठरी की तरह धूल में पड़े हुए मोहन को एक लात और जड़ कर वह भुनभुनाता हुआ रामजस की तरफ बढ़ आया. उसे डांटते हुए बोला-‘‘काहे रिरियात है रे? महतारी का खाय गइस अब का मोही खई हैं?’’

रामजस सहम गया. बड़बड़ाता हुआ हरखू मचान की तरफ चला गया.

मोहन काफी देर तक वैसे ही पड़ा रहा. फिर वह धीरे-

धीरे उठा और हाथ उसने आग पर फैला दिये. उसको चेहरा

धूल से भर गया था. कम्बल में मिट्टी सन गई थी. इतना पिट लेने के बाद भी उसकी आंखों में आंसू की एक बूंद भी नहीं थी. उसका चेहरा फौलाद की तरह सख्त था. आंखों में जरा भी कोमलता नहीं थी. ...अंगारों की तरह जैसे लाल हो उठी थीं उसकी आंखें. उसने रामजस की ओर देखा. वह थककर धरती पर ही लेट गया था, उसकी आंखें मुंदी थीं, मगर उनमें से ढल-ढल कर बहे हुए आंसुओं का गीलापन अब भी शेष था. रह-रह कर सिसकियां उसे आती थीं. क्षण भर मोहन के मन की प्रतिहिंसा को तृप्ति मिली. वह खुश हो उठा, जैसे रामजस की पीड़ा देखकर, लेकिन फिर उसे लगा जैसे वह देर तक रामजस की ओर नहीं देख सकेगा. हल्की-हल्की आंच की रोशनी में कांपता हुआ रामजस का मासूम चेहरा और पलकों से उलझे हुए आंसू.

एक बार फिर उसकी ओर देखकर उसने अपने मन की प्रतिहिंसा को तुष्ट करना चाहा, लेकिन उसके मन में कुछ और ही भाव उग आया. वह रामजस की तकलीफ देखकर खुश होना चाहता था, लेकिन उसे लग रहा था कि वह कभी खुश नहीं हो सकेगा. इसके विपरीत न जाने क्यों उसके मन में एक तीखा शूल सा चुभने लगा. उसे याद आया कि उसकी मां की मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद वह भी पिता के साथ खेत में आया करता था. अलाव के बगल में इसी तरह सोते-सोते उसे कई बार सपने में मां दिखाई पड़़ी थीं. वह चौंक उठता था और कई बार रोया भी था.

रामजस को भी मां याद आती होगी उसी तरह और उसे भी बुरा लगता होगा मां के बिना. यह एक बात बार-बार मोहन के दिमाग में घूमने लगी. उसे लगा कि शायद वह रामजस से नफरत नहीं कर सकता. यदि चाहे तो भी नहीं. रामजस छोटा है उसकी मां नहीं है. उसे प्यार की जरूरत है, क्योंकि मोहन जानता है कि बिना प्यार और ममता के आदमी क्या से क्या हो जाता है.

मोहन के चेहरे का सख्त खिंचाव अपने आप खुलता गया, उसकी शिकनें नर्म पड़ती गईं और उसकी आंखों में एक मासूम उजलाहट बिखरती गई.

एक झटके से वह उठ खड़ा हुआ. उसने कम्बल उतार कर आहिस्ता से रामजस को उढ़ा दिया. कुछ देर तक उसके चेहरे की ओर वह प्यार से देखता रहा. फिर आकर आग के पास बैठ गया और चुपचाप तापने लगा.

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रचनाकार: ई-बुक : प्राची, जुलाई 2015 : कहानी - अलाव
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