नोबल पुरस्कार विजेता - विलियम फॉकनर की कहानी - एमेली के लिए एक गुलाब

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अनुवाद - अनुराधा महेन्द्र मिस एमेली का जब निधन हुआ तो समूचा शहर उसके जनाजे में शामिल हुआ। एक जोर जहाँ पुरुषों में इसके पीछे एक ' स्तंभ...

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अनुवाद - अनुराधा महेन्द्र

मिस एमेली का जब निधन हुआ तो समूचा शहर उसके जनाजे में शामिल हुआ। एक जोर जहाँ पुरुषों में इसके पीछे एक ' स्तंभ ' के ढह जाने पर सम्मान- भरे स्नेह की भावना थी, वहीं स्त्रियों में उसके घर को भीतर से देखने कीं जिज्ञासा थी। क्योंकि पिछले तकरीबन दस बरसों से एक बूढ़े नौकर के सिवाय उसके घर के भीतर कोई आया-गया नहीं था। यह नौकर ही उसका माली और रसोईया भी था।

विशाल चौकोर फ्रेमवाला उसका मकान, अठारहवीं सदी की अतिशय खूबसूरत शैली में ऊंचा गुंबदाकार तथा कुंडलीनुमा बाल्कनियों से सजा मकान था। यह किसी जमाने में सफेद. रहा होगा, जो उस जमाने के सबसे विशिष्ट इलाके में स्थित था, पर गराजों और रुई ओटने की मशीनों ने वहाँ अनधिकार प्रवेश कर इस इलाके और आसपास की भव्यता व खूबसूरती को नष्ट कर दिया था, बस मिस एमेली का मकान ही बचा था- माल डिब्बों और गैसोलिन पंपों के बीच इस हठीली और नखरेबाज सँड़ाँध के ऊपर- जो सबकी आँखों में कटि की तरह चुभता था और अब मिस एमेली भी नहीं रही। वह भी अपने उन्हीं नामी-गिरामी प्रतिनिधियों में शामिल हो चुकी थी, जो जेफरसन के युद्ध में शहीद सैनिकों व समाज के खास और अज्ञात व्यक्तियो' की कब्रों के बीच देवदार के वृक्षों से ढके इस समाधिस्थल में चिरनिद्रा में लीन हैं।

जब तक मिस एमेली जीवित थी, वह पूरे नगर के लिए एक परंपरा, एक कर्तव्य व एक जिम्मेदारी थी- यानी पूरे कस्बे के ऊपर तक एक पुश्तैनी दायित्व! और यह दायित्व काफी अरसे, यानी 1894 से चला आ रहा था, जब एक दिन कस्बे के मेयर कर्नल सरटोरिस ने फरमान जारी कर उसको टैक्स अदा करने से छूट दे दी। यह छूट उसके पिता की मृत्यु के वक्त से .अब तक चली आ रही थी। ऐसा न था कि मिस एमेली खैरात लेना पसंद करती। पर कर्नल सरटोरिस ने एक किस्सा गढ़ रखा था कि मिस एमेली के पिता ने इस शहर को कर्जा दिया था, जिसे कारोबारी उसूलों के तहत यह शहर इस रूप में चुकाना बेहतर समझता है। कर्नल सरटोरिस की पीढ़ी और विचारधारा का ही कोई व्यक्ति इस तरह की बात गढ़ सकता था और महज स्त्रियाँ ही ऐसी. बात पर यकीन कर सकती थीं। जब आधुनिक विचारधारा वाली नई पीढ़ी ने मेयर और नगरपालक का दायित्व संभाला तो यह व्यवस्था देखकर उन्हें असंतुष्टि हुई। नए साल की पहली तारीख को उन्होंने उसे एक टैक्स नोटिस डाक से जारी किया। फरवरी तक कोई जवाब न आया। फिर उसे एक औपचारिक पत्र लिखकर किसी सुविधाजनक दिन मेयर के दफ्तर में आकर मिलने का अनुरोध किया गया। हफ्ते- भर बाद खुद मेयर ने उसे पत्र लिखा और उससे आकर खुद मिलने या कार भेजकर उसे बुलवाने की पेशकश की। जवाब में उन्हें पुराकालीन आकार के कागज के टुकड़े पर एक नोट मिला- जिस पर बारीक व बेहद सुंदर लिखावट में धुँधली स्याही से लिखा था कि उसने एक अरसे से बाहर जाना छोड़ दिया है। नोटिस को भी बिना किसी टिप्पणी के लौटा दिया था।

नगरपालकों के बोर्ड की एक विशेष बैठक बुलाई गई। एक प्रतिनिधि दल को उसके घर भेजा गया। उन्होंने दरवाजे पर दस्तक दी, जहाँ से पिछले आठ-दस बरसों से कोई भी शख्स भीतर नहीं गया था। यह तब की बात है, जब से उसने चाइना पेंटिंग की कक्षाएँ लेना बंद कर दिया था। एक बूढ़ा अश्वेत उन्हें रोशनी वाले हॉल में ले गया, जहाँ ऊपर की ओर एक जीना जाता था, ऊपर और घना अँधेरा था। पूरे घर में धूल व बदबू भरी थी- घुटन व सीलन- भरी बदबू! अश्वेत उन्हें बैठक में ले गया, यह चमड़े के महँगे और भारी फर्नीचर से सज्जित था। जब अश्वेत ने खिड़की के पट खोले तो चमड़ा चरमरा उठा और उनके बैठते ही मूल का हलका-सा भभका हवा में तैरते हुए सूरज की किरणों के साथ घुलमिल गया।

अँगीठी के पास बदरंग पड़ चुके सुनहरे चित्रफलक में मिस एमेली के पिता का खड़िया से बना एक रेखाचित्र रखा था। जब मिस एमेली भीतर आई तो सब खडे हो गए। काले लिबास में वह छोटी नाटी स्त्री थी- पतली सोने की चेन उसकी कमर से बेल्ट के भीतर कहीं लुप्त हो गई थी। मलिन पड़ चुकी सोने के मुट्ठी वाली आबनूस की छड़ी पर वह टिककर खड़ी थी।

उसकी देह दुबली और कमजोर थी; शायद इसलिए गोलमटोल दिखने की बजाय वह मोटी दिख रही थी। लंबे समय तक स्थिर जल में डूबी देह की मानिंद उसका शरीर फूला-फूला-सा था। उसकी आँखें चेहरे पर गीले आटे के किसी गोले में धँसे कोयले के दो टुकड़ों की तरह दिख रही थीं। जब हम अपनी शिकायत बयाँ कर रहे थे तो उसकी निगाहें तेजी से एक चेहरे से दूसरे चेहरे की ओर घूमती।

उसने बैठने के लिए नहीं कहा। वह दरवाजे पर बस खामोश खड़ी तब तक सुनती रही, जब तक हमारा साथी अपनी बात पूरी कर चुप नहीं हो गया। अचानक सोने की चेन के सिरे पर लटकी अदृश्य घड़ी की टिकटिक सुनाई देने लगी।

उसकी आवाज शुष्क और सर्द थी- '' जेफरसन में मेरा कोई कर बकाया नहीं है। कर्नल सरटोरिस ने मुझे समझा दिया था। आप चाहें तो शहर के रिकॉर्ड की जाँच कर खुद को आश्वस्त कर सकते हैं। ''

'' पर हमने जाँच की है। हम शहर के प्राधिकारी हैं, मिस एमेली क्या आपको शेरिफ के हस्ताक्षर से नोटिस नहीं मिला। '' '

'' हाँ एक कागज मिला था, '' मिस एमेली बोली, '' शायद वह खुद को शेरिफ मानता हो, पर मेरा कोई कर बकाया नहीं है। ''

'' पर बहियों में तो ऐसा ही दर्ज है। देखिए हमें रिकॉर्ड से ही चलना पड़ेगा। '' '' देखिए कर्नल सरटोरिस, जेफरसन में मेरा कोई कर बकाया नहीं है। ''

'' पर मिस एमेली

'' देखिए कर्नल सरटोरिस ( हालाँकि कर्नल सरटोरिस का निधन हुए दस बरस गुजर चुके थे) मेरा कोई कर नहीं है, टोबे उसने ऊँची आवाज में पुकारा, वह अश्वेत हाजिर हो गया।

'' इन्हें बाहर का रास्ता दिखाओ। ''

इस तरह उसने उन्हें निकाल दिया, बिलकुल जैसे तीस बरस पहले उनके पूर्वजों को बदबू की बात को लेकर किया था।

यह उसके पिता के गुजरने के दो बरस बाद और प्रेमी के उसे छोड्‌कर चले जाने के कुछ अरसे बाद की बात है। हमें लगता था कि वह उससे ब्याह करेगा, पर वह चला गया। पिता के गुजरने के बाद यह बहुत कम घर से बाहर निकलती। प्रेमी के जाने के बाद तो उसने घर से निकलना ही बंद कर दिया। कुछ स्त्रियों ने उससे संपर्क करने का दुःसाहस किया पर उन्हें बेइज्जत होना पड़ा। उसके घर में वह अश्वेत ही जीवन का एकमात्र संकेत था।. तब वह युवा था- अकसर थैला उठाए बाजार आते-जाते दिखाई दे जाता।

'' क्या कोई पुरुष रसोई को ढंग से चला सकता है!'' स्त्रियाँ आपस में खुसर-पुसर करतीं। इसलिए जब उसके घर से बदबू आने लगी तो उन्हें रत्ती- भर भी अचरज नहीं हुआ। इस विशाल भरे-पूरे संसार और श्रेष्ठ व महान् ग्रियरसन परिवार के बीच यह एक और संपर्क सूत्र था।

उसकी एक पड़ोसी महिला ने अस्सी वर्षीय मेयर जज स्टीवन से बदबू की शिकायत की।

'' क्यों, क्या आप उसे बदबू रोकने के लिए नहीं कह सकते, क्या कोई कानून वगैरह नहीं है?''

'' मुझे यकीन है, उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी, '' जज स्टीवन बोला, ' संभवत : कोई साँप या चूहा होगा, जिसे उसके नौकर ने मारकर बाहर फेंक दिया होगा। मैं उससे बात करूँगा।

अगले दिन उन्हें दो और शिकायतें मिलीं, एक शिकायत पुरुष ने की जो उसके प्रति निंदा से भरा था, '' हमें इसके बारे में कुछ तो करना होगा। जज, मेरा मिस एमेली को परेशान करने का कोई इरादा नहीं, पर हमें कुछ करना ही होगा। '' उसी रात नगरपालकों के बोर्ड की बैठक हुई- तीन खेर बुजुर्ग और एक युवक जो नई पीढ़ी का सदस्य था।

'' यह कौन-सी बड़ी बात है, '' वह बोला, '' बस उसे कह देते हैं कि अपना घर साफ करवाए। उसे कुछ वक्त दिया जाए और फिर भी यदि वह ऐसा नहीं करती तो... ''

'' छोड़ो भी, '' जज स्टीवन बोला, '' क्या आप किसी महिला को सीधे उसके मुँह पर बदबू आने की बात कह सकते हैं?''

इसलिए अगले दिन आधी रात के बाद चार व्यक्ति मिस एमेली के लॉन में चोरों की तरह घुसे और लॉन का कोना-कोना सूँघते हुए बदबू का सुराग तलाशने लगे। उनमें से एक कंधे पर टँगे बैग में से छिड़काव करता गया। उन्होंने तहखाने का दरवाजा तोड़कर अंदर और आसपास की सभी जगहों पर चूने का छिड़काव किया। जब वे दोबारा लॉन से गुजरने लगे तो पहले जिस खिड़की में अँधेरा था, अब बत्ती जल रही थी और मिस एमेली वहाँ बैठी थी। रोशनी में उसकी सीधी, निश्चल व स्पंदनरहित काया किसी प्रतिमा की मानिंद दिख रही थी। वे लॉन में से रेंगते हुए धुँधली सड़क पर निकल आए। एकाध हफ्ते बाद बदबू चली गई।

इस वक्त तक लोगों को उससे सहानुभूति हो चली थी। कस्बे के लोग उन दिनों की याद करने लगे, जब उसकी नानी की बहन बुढ़ापे में अपना संतुलन खो बैठी थी। उन्हें लगता था कि ग्रियरसन परिवार दरअसल हैसियत से कुछ ज्यादा ही खुद को श्रेष्ठ समझता है। उन्हें कोई भी नवयुवक मिस एमेली के योग्य नहीं दिखता। हम अकसर उसके विवाह की कल्पना करते, जिसमेँ पृष्ठभूमि में मिस एमेली सफेद लिबास में पिता के पीछे खड़ी दिखाई देती। इसलिए जब वह तीस के करीब आई फिर भी अविवाहित थी तो हम दरअसल खुश नहीं थे, हमें यकीन था कि परिवार वालों की सारी बेवकूफियों के बावजूद मिस एमिली योग्य वर के प्रस्ताव पर अवश्य राजी हो जाती।

जब उसके पिता का निधन हुआ, तब सबको पता चल गया कि अब उसके पास संपत्ति के नाम पर बस वह मकान ही था। लोग खुश थे कि आखिर उन्हें मिस एमेली पर दया दिखाने का मौका मिल गया था। अब वह पूरी तरह अकेली रह गई थी- उस नौकर के सिवाय कोई न था। अब उसे कुछ हद तक पैसे का महत्त्व समझ में आ जाएगा। रिवाज के मुताबिक पिता की मृत्यु के अगले दिन सभी औरतें इकट्ठी होकर शोक व्यक्त करने पहुँची। वे उसकी कुछ मदद भी करना चाहती थीं। हमेशा की तरह सजी सँवरी मिस एमेली उन्हें दरवाजे पर मिली। उसके चेहरे पर दुःख या शोक का नामोनिशान न था। उसने कहा कि उसके पिता की मृत्यु नहीं हुई है। तीन दिनों तक वह लगातार यही कहती रही। उसके घर आने वाले सभी सरकारी अधिकारी और डॉक्टर उसे समझाते रहे कि उन्हें शव का क्रियाकर्म करने दें। आखिर जब वे कानून व जोर-जबर्दस्ती पर उतर आए तब वह जोर-जोर से बिलखने लगी। उन्होंने झटपट उसके पिता को दफना दिया। उस वक्त किसी ने नहीं कहा कि वह पगला गई है। हमें लगा यह .स्वाभाविक था। हमें उन तमाम नवयुवकों की याद आई?र जिन्हें उसके पिता ने भगा दिया था। हम जानते थे कि अब जब उसके पास कुछ नहीं बचा था तो वह पिता को ही जकड़कर रख .लेना चाहती थी, जिन्होंने उसका सब कुछ छीन लिया था।

लंबे अरसे तक वह बीमार रही। जब हमने दोबारा उसे देखा तो उसने. अपने बाल छोटे कर लिए थे, जिससे वह एक किशोरी-सी दिखती- गिरजाघर की रंग-बिरंगी खिड़कियों में बने देवतुल्य फरिश्तों की तरह- शोकमग्न और शांत!

नगर मैं पटरी बनाने का ठेका किसी कांट्रेक्टर को दिया गया था और उसके पिता के गुजरने के कुछ अरसे बाद गर्मियों में पटरी बनाने का काम शुरू हो गया। निर्माण कंपनी द्वारा इस काम के लिए कई हब्शी, खच्चर व मशीनें लाई गईं। होमर-बेरॉन नाम का एक अमेरिकी फॉरमेन भी आया था- लंबा-चौड़ा, साँवला, निपुण, फुर्तीला, भारी आवाज और चेहरे की तुलना में उसकी आँखों का रंग हल्का था। नन्हे-मुन्ने लड़के झुंड बनाकर उसके पीछे जाते। उन्हें हब्शियों को ईंट-गारे उठाते-गिराते हुए लय में काम करते देखना अच्छा लगता था। जल्द ही वह कस्बे के हर व्यक्ति को जानने लगा था। जब कभी किसी नुक्कड़ या चौराहे से ठहाकों की आवाज गूँजती तो समझ लो. होमर बैरन यकीनन उस झुंड में मौजूद होगा। आजकल मिस एमेली और वह इतवार की दोपहर अकसर पीले पहियों वाली बग्घी में जाते दिखाई देते।

शुरू में हम खुश थे कि मिस एमेली उसमें दिलचस्पी दिखा रही है। सभी स्त्रियाँ कहतीं, '' ग्रियरसन परिवार किसी उत्तर देशवासी के दिहाड़ी मजदूर के बारे में गंभीरतापूर्वक सोच ही नहीं सकता? पर कई बड़े बुजुर्गों का मानना था कि दु ख की इस घड़ी में संभवत : वह अपने अभिजात्य या कुलीन वंश को भुला देगी। उनके मुँह से निकल पड़ता, '' बेचारी एमेली उसके नाते-रिश्तेदारों को आना चाहिए। '' अलबामा में उसके कुछ रिश्तेदार थे भी, पर बरसों पहले उसके पिता ने उनसे नाता तोड़ लिया था। दरअसल बुढ़ापे में मानसिक संतुलन खो बैठी नानी की बहन न्यार की संपत्ति को लेकर उनसे झगड़ा हो गया था। तब से दोनों परिवारों के बीच कोई सँपर्क नहीं रहा। वे उनकी शव- यात्रा में भी शामिल नहीं हुए थे।

बूढ़े बुजुर्गों द्वारा सहानुभूति दिखाने पर पूरे कस्बे में खुसर-पुसर शुरू हो गई। '' क्या वाकई यह सच है से '' वे एक-दूसरे से कहने लगे, '' हाँ बिलकुल और भला क्या बात हो सकती है?'' ज्यों ही इतवार की दोपहर बची कस्बे से गुजरती, फुसफुसाहट शुरू हो जाती, ' बेचारी एमेली, वह अब भी उसी गर्व से भरी: रहती चाहे हमें लगता कि वह गिर चुकी है, ऐसा लगता मानो ग्रियरसन परिवार की अंतिम सदस्य के नाते वह सबसे अधिक मान सम्मान की दरकार रख रही थी। जैसे एक मर्तबा वह चूहे मारने. की दवा-संखिया खरीद लाई। यह उसके एक बरस बाद की बात है, जब लोग उस पर तरस खाकर ' बेचारी एमेली ' कहने लगे थे। इस वक्त तक उसकी चचेरी बहनें भी कभी-कभार उसके पास आने लगी थीं।

'' मुझे जहर चाहिए '' वह दुकानदार से बोली, तब वह तीस को पार कर चुकी थी, हालाँकि वह. अब भी जवाँ दिखती थी। पहले से दुबली हो गई. थी। चेहरे पर सर्द, मोटी काली आँखें, जिसकी त्वचा अस्त्रों के गोले से कनपटी तक विकृत-सी हो गईं थी। '' मुझे जहर चाहिए '' वह फिर बोली।

'' हाँ मिस एमेली, किस प्रकार का जहर? क्या चूहे वगैरह मारने के लिए? तो मैं सिफारिश करूँगा कि.. ''

'' जो सबसे बढ़िया हो, मुझे वही चाहिए किस प्रकार का, इसकी मुझे परवाह नहीं।

दवाई विक्रेता ने कई नाम गिनाए। इनसे किसी को भी, यहाँ तक कि हाथी तक को मारा जा सकता है, पर आपको- '' संखिया ही चाहिए ''

मिस एमेली बोली, '' क्या वह ठीक रहेगा?''

'' हाँ मैडम, पर आपको किसलिए चाहिए?''

'' मुझे संखिया चाहिए। ''

दुकानदार ने झुककर उसे देखा। एमेली ने भी पलटकर उसे देखा, उसका चेहरा बिलकुल सपाट व मुरझाया-सा था। दुकानदार बोला, '' ठीक है, यदि आपको यही चाहिए तो दिए देता हूँ पर कानूनन आपको बताना होगा कि किस काम के लिए आप इसका इस्तेमाल करेंगी?''

मिस एमेली उसे घूरने लगी। सिर टेढ़ा कर वह एकटक घूरती रही, जब तक दुकानदार नजरें हटा संखिया लेने न चला गया। पैकेट दुकान में काम करने वाला एक अश्वेत छोकरा ले आया। दुकानदार दोबारा बाहर नहीं आया। घर आकर जब उसने पैकेट खोला तो उस पर छड़ी और खोपड़ी के चित्र के नीचे लिखा था, '' चूहों के लिए। ''

अगले दिन हम सब कहने लगे कि ' वह खुदकुशी कर लेगी ' और शायद यह मुनासिब भी होगा। जब पहले-पहल हमने उसे होमर बैरन के साथ घूमते देखा था तो हमें लगा कि वह उससे ब्याह करेगी। फिर सब कहने लगे कि ' वह उस पर जोर जबर्दस्ती करेगी ' क्योंकि खुद होमर ने ही हमें बताया था कि उसे पुरुष पसंद हैं। सभी जानते थे कि वह कस्बे के क्लब में नवयुवकों के साथ बैठ पीना पसंद करता है, वह विवाह करने वाले पुरुषों में से नहीं है। बाद में जब भी चमकदार बग्घी में गर्व से सिर ताने बैठी एमेली और तिरछी टोपी लगाए दाँतों में सिगार दबाए पीले दस्ताने वाले हाथों में लगाम व चाबुक थामे होमर बैरन इतवार की दोपहर सामने से गुजरते तो हम सब ईर्ष्या से कहते ' बेचारी एमेली!'

बाद में कुछ स्त्रियों ने कहना शुरू कर दिया कि यह इस कस्बे के लिए बड़े शर्म और बदनामी की बात है और इसका हमारे युवा बच्चों पर गलत असर पड़ सकता है। पुरुष इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहते थे पर आखिरकार स्त्रियों ने दीक्षा देने वाले पादरी को मजबूर कर दिया कि वह मिस एमेली को सीख दे। पादरी ने किसी को नहीं बताया कि एमेली के साथ बातचीत के दौरान क्या घटा? पर उन्होंने दोबारा जाने से इनकार कर दिया। अगले इतवार वे फिर सड़कों पर घूमते दिखाई दिए और दूसरे ही दिन पादरी की बीवी ने अलाबामा में मिस एमेली के रिश्तेदारों को चिट्‌ठी लिखी।

इस तरह एक बार फिर करीबी रिश्तेदार उसके घर आकर रहने लगे। हम सब इसी इंतजार में थे कि देखें अब क्या होता है? शुरू में कुछ भी नहीं घटा। हमें यकीन था कि वे दोनों ब्याह करने वाले हैं। हमें पता चला कि मिस एमेली सुनार के पास भी गई थी। जहाँ उसने पुरुषों के लिए चाँदी के एक सिंगारदान का ऑर्डर दिया और उसके हर कोने में एच ०बी० अक्षर खुदवाए। दो दिन बाद हमें पता चला कि वह नाइट सूट समेत पुरुषों द्वारा पहनी जाने वाली हर चीज खरीदकर लाई है। सब कहने लगे कि ' वे विवाहित हैं। ' हम वाकई खुश थे।

हमें रत्ती- भर भी अचरज नहीं हुआ, जब सड़क का काम पूरा होने पर होमर बैरन शहर छोड्‌कर चला गया। हमें हल्की-सी निराशा जरूर हुई कि इस बात का कोई हो- हल्ला नहीं हुआ। हमें यकीन था कि वह मिस एमेली को अपने घर ले जाने की तैयारी करने गया है या फिर उसे अपनी चचेरी बहनों से छुटकारा पाने का मौका देना चाहता है। हमारा अंदाजा सही निकला, क्योंकि एक हफ्ते बाद ही वे चली गईं और जैसा हमें पूरा भरोसा था, तीन दिन बाद होमर बैरन शहर में मौजूद था। एक पड़ोसी ने शाम के पहर झुटपुटे में रसोई के दरवाजे से अश्वेत द्वारा उसे. भीतर छोड़ते हुए देखा।

उसके बाद किसी ने होमर बैरन को फिर कभी नहीं देखा,।? मिस एमेली भी बहुत कम दिखाई देती। अलबत्ता अश्वेत यदा-कदा पोटली उठाए बाजार आते-जाते दिख जाता, पर मुख्य द्वार हमेशा बंद ही रहता। एमेली कभी-कभार पल- भर के लिए खिड़की में खड़ी दिखाई दे जाती। जैसे, उस रात. उन लोगों ने उसे देखा; जो चूना छिड़क रहे थे। पर तकरीबन छह महीनों से वह कभी बाहर नहीं निकली थी। हम जानते थे कि यह तो होना ही था, क्योंकि उसके पिता ने अपनी आदतों की वजह से उसके जीवन को नष्ट कर जहर घोल दिया था।

अगली मर्तबा जब हमने एमेली को. देखा तो वह मोटी हो गई थी। उसके बाल पकने लगे थे। अगले कुछ बरसों में ही उसके बाल पूरी तरह भूरे हो गए। चौहत्तर बरस की आयु में उसकी मृत्यु तक किसी सक्रिय आदमी कीं तरह गहरे भूरे ही थे।

इन तमाम बरसों में उसका मुख्य द्वार हमेशा बंद ही रहा। बस, केवल उन छह-सात बरसों को छोड्‌कर, जब वह करीबन चालीस बरस की थी और चाइना पैंटिंग की कक्षाएँ चलाती थी। नीचे के कमरों में से एक कमरे में उसने स्टृडियो बना रखा था, जहाँ कर्नल सरटोरिस के समकालीनों की बेटियाँ व पोतियाँ नियमित रूप से उससे पेंटिंग सीखने आती बिलकुल उसी नियम व श्रद्धा से जैसे वह हर इतवार को गिरजाघर जाया करती थी। इसी बीच उसके कर को माफ कर दिया गया।

फिर नई पीढ़ी ने नगर का जिम्मा सँभाला और पेंटिंग सीखने वाले बच्चे भी बड़े हो गए और यहाँ-वहाँ बिखर गए। उन्होंने अपने बच्चों को रंगों की डिब्बियों तूलिकाओं और महिलाओं की पत्रिकाओं में से कटी तस्वीरों के साथ पेंटिंग सीखने नहीं भेजा। आखिरी बच्चे के कक्षा छोड़ने के बाद मुख्य दरवाजा सदा के लिए बंद हो गया। जब नगर में मुफ्त डाक प्रणाली शुरू हुई तब भी मिस एमेली ने अपने घर के ऊपर लोहे का नंबर और डाकपेटी लगवाने से इनकार कर दिया। वह किसी तरह इसके लिए राजी न हुई।

दिन ब दिन, माह दर माह और साल दर साल हम उस अश्वेत को बूढ़े होते और उसकी कमर को लगातार झुकते देखते रहे- जो झोला उठाए बाजार आता-जाता रहता। हर साल दिसंबर माह में हम उसे टैक्स नोटिस भिजवाते, जो सप्ताह- भर में लौट आता। कभी-कभार हम उसे नीचे की किसी खिड़की में देखते- आले में रखी, तराशी प्रतिमा की मानिंद! उसने जानबूझकर घर की ऊपरी मंजिल बंद कर रखी थी। इस तरह पीढ़ी दर पीढ़ी वह मौजूद रही। उसकी मौजूदगी को नकारना नामुमकिन था- प्रिय, अनिवार्य, अभेद्य, प्रशांत, अड़ियल।

और वह मर गई। धूल और अंधकार से भरे घर में वह बीमार पड़ी रही। पास था तो केवल वह लड़खड़ाता बूढ़ा अश्वेत। वह बीमार है, इसकी किसी को भनक तक नहीं मिली। अरसा पहले हमने अश्वेत से उसकी खोज-खबर लेना छोड़ दिया था। वह किसी से बात नहीं करता था, एमेली से - भी नहीं। दरअसल इस्तेमाल न करने की वजह से उसके गले को मानो जंग लग गया था। उसकी आवाज कर्कश और फट गई थी।

निचले हिस्से के एक कमरे में ही उसकी मृत्यु हो गई। परदे से ढके भारी भरकम बिस्तरे पर पके भूरे बालों वाला सिर तकिए में धँसा हुआ था- जो बेहद पुराना होने और धूप न मिलने के कारण मैला और पीला पड़ चुका था।

अश्वेत ने स्त्रियों के लिए दरवाजा खोला और उन्हें अंदर जाने दिया। ताक-झाँक और खुसुर-पुसुर करती स्त्रियाँ जैसे ही भीतर आई, वह अश्वेत गायब हो गया। वह घर के भीतर से होते हुए सीधे बाहर निकल गया और फिर कभी दिखाई नहीं दिया।

दोनों चचेरी बहनें भी तत्काल वहाँ पहुँच गईं। अगले दिन ही उन्होंने अंतिम संस्कार रखा, जिसमें पूरा का पूरा कस्बा मिस एमेली को अंतिम विदाई देने 'आया। उसकी अरथी खरीदे गए फूलों के अंबार के नीचे थी, पास ही चिंतन में लीन पिता का रेखाचित्र रखा था। स्त्रियों की सिसकारियाँ गँज् रही थी। बूढ़े -बुजुर्ग, जिनमें से कई चमकदार संघीय वर्दियों में थे, मैदान और दालान में खडे मिस एमेली के बारे में ऐसे बतिया रहे थे, -मानो वह उनकी समकालीन रही हो। कुछ तो यहाँ तक कहने से नहीं चूके कि उन्होंने उसके साथ नृत्य भी किया है और इश्क तक लड़ाया है। वे शायद गुजरे वक्त के गणितीय हिसाब को भूल रहे थे, जैसे अकसर इस उम्र में बूढ़े करते हैं, जिनके लिए गुजरा वक्त खत्म होती सड़क न होकर मानो घास का मैदान है, जिसे कोई मौसम छू नहीं सकता।

अब तक हम जान चुके थे कि सीढ़ियों से ऊपर एक कमरा है, जिसे चालीस बरसों से किसी ने नहीं देखा था और जिसे तोड़कर खोलना पड़ेगा। खोलने से पहले उन्होंने मिस एमेली को पूरी मर्यादा के साथ दफनाने का इंतजार किया।

जिस आक्रामकता के साथ दरवाजे को तोड़ा गया, उससे पूरा कमरा धूल से भर उठा। कमरे में ताबूत पर बिछाने जैसा एक झीना आवरण फैला रखा था, मानो कोई कब हो। कमरा दुल्हन की तरह सजा था। गुलाबी रंग के मखमली परदे, गुलाबी श्रृंगार मेज पर क्रिस्टल की तमाम नाजुक वस्तुओं के साथ चाँदी से बने पुरुषों के प्रसाधन सामान भी रखे थे। वे इतने मेले हो चुके थे कि उन पर खुदे .अक्षर धुँधले पड़ चुके थे। सामान के बीच एक कॉलर 'और टाई भी रखी थी, बिल्कुल जैसे अभी निकालकर रखी हो, कुर्सी पर सलीके से तह किया एक सूट टँगा था; और वहीं एक जोड़ी जूते जुराबों के साथ रखे थे। आदमी खुद भी बिस्तर पर पड़ा था।

काफी देर हम यूँ ही खड़े रहे, उस गंभीर और साँसरहित मुस्कराहट को देखते हुए। साफ दिख रहा था कि देह पहले आलिंगन की मुद्रा में रही होगी, पर अब गहरी चिरनिद्रा में थी, जो प्रेम से कहीं परे की चीज है, जो प्रेम के डरावने व विकृत रूप पर भी जीत हासिल कर लेती है, पर उसने उसे व्यभिचारी स्त्री की गुलामी की अवस्था मैं ला छोड़ा था। कुछ भी नहीं बचा था, शरीर का निचला हिस्सा इतनी बुरी तरह सड़ चुका था कि पहने गए नाइटसूट समेत उसके धड़ को बिस्तर से अलग करना नामुमकिन-सा था। उसके ऊपर और तकिए के आसपास धूल की मोटी तह जम चुकी थी।

फिर हमने देखा कि दूसरे तकिए पर सिर के आकार का गड्‌ढा-सा बन गया था।

हममें से एक ने जब उसे झुककर उठाया तो धुँधली, शुष्क और अदृश्य धूल हमारी नासिकाओं मैं भर गई। वहाँ पके भूरे बालों की एक लट सबने देखी

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(नोबर पुरस्कार विजेताओं की 51 कहानियाँ, संपादक सुरेन्द्र तिवारी, प्रकाशक आर्य प्रकाशन मंडल , दिल्ली से साभार)

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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक 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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: नोबल पुरस्कार विजेता - विलियम फॉकनर की कहानी - एमेली के लिए एक गुलाब
नोबल पुरस्कार विजेता - विलियम फॉकनर की कहानी - एमेली के लिए एक गुलाब
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