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खुद अपने लिए समस्याएँ पैदा न करें, अपनी औकात में रहें

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डॉ0 दीपक आचार्य   सारी समस्याओं की जड़ यदि कुछ है तो वह है कि अपनी औकात से ज्यादा दिखना-दिखाना, अतिरंजित प्रदर्शन, बेवजह पसरना और एलास्टिक...

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

सारी समस्याओं की जड़ यदि कुछ है तो वह है कि अपनी औकात से ज्यादा दिखना-दिखाना, अतिरंजित प्रदर्शन, बेवजह पसरना और एलास्टिक की तरह खींचते रहकर अपने आपकी परिधियों को कृत्रिम रूप से ज्यादा दिखाना। 

मनुष्य के रूप में इकाई से लेकर विश्व समुदाय तक सारी समस्याओं, अशांति, आपदाओं, तनावों, बीमारियों, भय और हिंसा का यही एकमात्र कारण है जिसकी वजह से जनमानस में अशांति की लहरों का दावानल निरन्तर प्रसार पाता जा रहा है।

इसी एकमात्र वजह से हर कोई दुःखी और संतप्त है। हो सकता है किसी को थोड़ी देर के लिए कोई खुशी मिल भी जाए मगर वह भी खुश होने से कहीं ज्यादा तनाव में रहता है। अशांति और तनाव का मूल कारण अपनी खुशी और अपने ही अपने लाभ के लिए औरों की खुशियों को छीनना तथा उन्हें तनाव देते रहना है।

गलाकाट प्रतिस्पर्धा की वजह से आजकल सर्वत्र यही सब हो रहा है। न कहीं मन निर्मल हैं, न मस्तिष्क विकृतियों से मुक्त। औरों के मुकाबले अपने को बड़ा, मेधावी और प्रभावशाली दिखाने के लिए दुनिया के अधिकांश लोग झूठ-फरेब और भ्रमों का सहारा लेते हैं, हकीकत में जितने हैं उससे कई गुना अपने आपको दिखाते हैं और जिन्दगी भर उन तमाम हथकण्डों का सहारा लेते रहते हैं जिनसे वे खुद को औरों के मुकाबले अधिक प्रतिष्ठित, सुखी, समृद्ध और प्रभावशाली साबित करते रह सकें।

तमाम प्रकार के बाड़े आजकल इसी मर्यादाहीनता के भंवर में फंसे हुए हैं जहाँ हर हर कोई अपने आपको सर्वश्रेष्ठ और अन्यतम मानने-मनवाने के फेर में लगा हुआ किसी न किसी प्रकार के षड़यंत्रों, गुटबाजी और विघटनवादी प्रवृत्ति को अपनाता हुआ पाप कर्मों में रत रहता हुआ खुद को वैभवशाली बनाने के लिए दिन-रात सोच में डूबा हुआ भी रहता है और नई-नई खुराफातों के साथ कभी तीर और कभी तुक्के चलाता रहता है।

हर किसी को अपनी मर्यादा में रहना चाहिए अन्यथा अनर्थ अवश्यंभावी है। चाहे जड़ हो या चेतन, सभी के लिए किसी न किसी प्रकार की सीमा रेखाओं का निर्धारण किया हुआ है। यह अलग बात है कि सभी लोग जानते-बूझते हुए भी इसका व्यतिक्रम करने का शौक या दुस्साहस पाले हुए हैं और उन्हें इसमें मजा भी आता है।

असल में पूर्वाग्रही और दुराग्रही लोगों की सबसे बड़ी ख़ासियत यही होती है कि वे मर्यादाओं को तोड़ने और परंपराओं को अपने हक में मोड़ने में अपने आपको सिद्धहस्त समझते हैं और अपनी लाट साहबी दिखाने के लिए वे ऎसे-ऎसे कर्म करते ही रहते हैं जो अप्राकृतिक और अमर्यादित हुआ करते हैं।

बहुत सारे लोग जिन्दगी भर मर्यादाहीनता का आचरण करते हुए अपने आपको सर्वसमर्थ मानकर चलते हैं और अन्त में पछताने के सिवा वे कुछ भी नहीं कर पाते हैं।  पशु-पक्षियों से लेकर तमाम जड़-चेतन तत्वों की अपनी मर्यादाएं निर्धारित हैं पर आदमी इनमें ऎसा अपवाद है जो मर्यादाओं को तोड़ने में भी आनंद का अनुभव करता है।

अक्सर देखा जाता है कि कोई कितना ही बड़ा और अधिक पढ़ा-लिखा क्यों न हो, संस्कारहीनता और अमर्यादित आचरण उसकी भी जिन्दगी में प्रायःतर देखा जा सकता है। इस मर्यादाहीनता का मूल कारण परंपरागत संस्कृति और संस्कारों, ऎतिहासिक पौराणिक गाथाओं और श्रेष्ठतम परंपराओं के प्रति जानकारी का अभाव तो है ही, समुदाय और क्षेत्र को गौण समझ कर अपनी ही अपनी तरक्की और अपने लिए ही सब कुछ प्राप्त करने की भावना ज्यादा असर डालती है।

जब किसी इंसान को हर तरफ अपना ही अक्स नज़र आने लगता है अथवा वह चारों तरफ अपने आपको ही देखने को उतावला बना रहता है उस स्थिति में उसका अहंकार, उन्मुक्ताचार और लोभ-लालच सब कुछ चरम अवस्था प्राप्त कर लेता है और यह मान लिया जाना चाहिए कि उसके दिल और दिमाग में स्वार्थ की घनी परत बिछ गई है जिसे शायद ही कोई उतार सके।

इंसान जिन कामों के लिए बनाया गया है, जिन कामों के लिए उसे मेहनताना मिलता है, सुविधाएं प्राप्त होती हैं, या  जो काम उसे सौंपे जाते हैं, उन सभी में वह समुदाय या देश की बजाय अपने स्वार्थ और कद को तलाशता है और यही वजह है कि उसके लिए सामाजिक और राष्ट्रीय सरोकार गौण हो जाते हैं।

जिस इंसान के लिए अपने स्व के आगे समाज और देश का कोई वजूद नहीं होता वह इंसान अपने स्वार्थ के लिए समाज और देश तक किसी को भी गिरवी रखने में किसी भी प्रकार की लज्जा का अनुभव नहीं करता। कारण यही है कि आदमी अपने स्वार्थ में अंधा होता है। फिर आजकल अंधों की खूब सारी नई-नई प्रजातियां अस्तित्व में हैं जिनके लिए धर्म, न्याय और सत्य जैसे शब्द कोई मायने नहीं रखते।  इनमें मोहांध, मुद्रान्ध और कामांध से लेकर सभी प्रकार के अंधे सब तरफ हाजिर हैं।

फिर बहुत सारे लोग ऎसे हैं जो जिन बाड़ों में रहते या काम करते हैं उनके प्रति बेपरवाह रहते हैं और इस बेपरवाही का आलम यह है कि हम अपने से ऊपर किसी को न मानते हैं, न कुछ समझते हैं बल्कि अपने से ऊपर के कद वालों के बराबर रहना, दिखना और सुविधाओं का अनधिकृत उपभोग करना चाहते हैं।

हमारी इस दुस्साहस भरी श्रृंखला में कोई बाधक बनने की कोशिश करता है तब हम और हमारे जैसे दूसरे सारे आरामतलबी और सुविधाभोगी लोग मिलकर पीछे पड़ जाते हैं। हमारी स्थिति ऎसी हो गई है कि हम कर्तव्य के मामले में अपनी तुलना नीचे वालों या कामचोरों से करने लगते हैं और सुविधाओं के उपभोग तथा सामथ्र्य पाने के मामले में अपने से ऊपर वालों के साथ बराबरी की होड़ करने को उतावले बने रहते हैं।

इस उद्विग्नता भरी पूरी यात्रा में हम यह भूल जाते हैं कि हम किस मुकाम पर  हैं और हमारी लक्ष्मण रेखाएं क्या कहती हैं। अपने से ज्यादा प्रभाव, प्रतिभा और कद पाए इंसानों को लांघकर आगे बढ़ना और हमेशा अपने को ही आगे दिखाने की मनोवृत्ति ही है कि जिसने सज्जनों का जीना हराम कर रखा है।

हम सभी को चाहिए कि अपनी औकात में रहें और उसे कभी नहीं भूलें। उसी को प्राप्त करने के प्रति सजग रहें जो हमारे लिए निर्धारित है। सारे के सारे लोग मर्यादाहीनता और संस्कारशून्यता को छोड़कर पूरी विनम्रता, गांभीर्य और शालीनता का परिचय देते हुए यदि अपनी-अपनी औकात को जान लें, उसी में बने रहें तो विश्व की सारी समस्याएं अपने आप समाप्त हो जाएं।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

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