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कविवर श्रीकांत त्रिपाठी की दो रचनाएँ

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दीपशिखा सा सिहर सिहर कर ……

दीपशिखा सा सिहर सिहर कर
आज सुलगता है मन मेरा |
परमिति पर निर्मल प्रकाश, पर-
अंतर में है गहन अन्धेरा |

मृगतृष्णा की धूप छाँव में,
बीत गयी मेरी तरुणाई |
बिखर गयी सपनों की दुनिया
आशा की कलियाँ मुरझाईं |

स्वाती की बूंदों का कब से,
प्यासा है चातक मन मेरा | ....दीपशिखा सा ...

हाय दुरंगे व्यक्तित्वों ने
मुझको नहीं कहीं का छोड़ा |
झटक नेह का दामन मुझसे
अपनों ने अपना मुंह मोड़ा |

मैं हूँ ऐसा उपवन जिसका
माली ही बन गया लुटेरा |  ...दीपशिखा सा...

सघन निराशा की बदली से
मात्र व्यथा की बूँद टपकती |
कुंठाओं के ध्वस्त नगर में,
सहमी सी आत्मा भटकती |

आशा के बंधन से बंधकर
ठहर गया है जीवन मेरा |...दीपशिखा सा ...

मेरे जीवन की साँसों में
विधि को यदि पीड़ा भरनी थी |
संवेदनमय उर के बदले
पत्थर की रचना करनी थी |

पतझर के पातों सा हर पल
क्यों भटका करता मन मेरा |  ..दीपशिखा सा...

किसे सुनाऊँ व्यथा ह्रदय की,
सुनने वाला आज कौन है |
मुझसे मेरी प्रतिध्वनियों से-
ऊब, विज़न भी आज मौन है |

क्रूर प्रकृति ने अपने हाथों
बीथी में व्यवधान बिखेरा |   ...दीपशिखा सा....

ऊंचे ऊंचे इन महलों तक,
सीमित ही रह गया है वैभव |
ठिठुर रही ज़र्ज़र अभिलाषा ,
रहा सिसकता भूखा कौशल |

ये हैं इस युग के निर्माता,
इन के बल पर चले सवेरा |  ..दीपशिखा सा....

छेड़ो मत सोये तारों को ,
विफर उठेंगे साँसों के स्वर |
चिर पीड़ित जग के संत्रासित
डस लेंगे भावों के विषधर |

लावा बनकर उबल पडेगा,
ज्वालामुखी बना उर मेरा |  ...दीपशिखा सा...

तुमने शूलों की पीड़ा दी
आँचल में भी शूल सजाये |
सुहृद तुम्हारे उपकारों के
बदले में कुछ दे न पाए |

मेरा सब सुख तुम्हें समर्पित,
दर्द तुम्हारा है अब मेरा |  ...दीपशिखा सा ..||

 

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    तुम्हारी सौगात
हमने इस उम्र की रग रग में सजाये कांटे ,
इसकी शाखों में कोइ फूल नहीं पात नहीं |
सिर्फ गुजरे हुए लम्हों की चन्द यादें हैं ,
सर्द आहों के सिवा कोइ भी ज़ज्वात नहीं |

कुछ कदम राह में हम साथ चलेंगे तेरे
इसी उम्मीद में छोड़ा था हंसते सावन को |
न मिला प्यार तेरा चाह तेरी साथ तेरा ,
चैन से काटी हो ऐसी कोइ रात नहीं |

टीस उठती है जब, बजती है कहीं शहनाई,
देखता रहता हूँ ख्यालों में सजी दुल्हन को |
आज तक याद हैं भूले नहीं वादे तेरे ,
दिल बहल जाता, ऐसी तो कोइ बात नहीं | 

बहुत करीब से देखा है मैंने हर शह को,
तुम से हो और हसीं, ऐसी कोइ मात नहीं |
सूनी आँखों में जो तडपे हैं निकल जाने को,
सूखे आंसू के सिवा कोइ भी सौगात नहीं ||

                   ---- श्री कान्त त्रिपाठी

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