व्यंग्य - मजबूरी है - गांधी को जिंदा रखना

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हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन व्याकुल गांधी जी स्वर्ग में टहल रहे थे। किसी काम में मन नहीं लग रहा था आज। किसी भारतीय से मुलाकात की तमन्न...

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन

व्याकुल गांधी जी स्वर्ग में टहल रहे थे। किसी काम में मन नहीं लग रहा था आज। किसी भारतीय से मुलाकात की तमन्ना थी। भारत का हाल जानने की उत्कंठा थी। वैसे भी इन छैंसठ बरस में कोई भी भारतीय उनके करीब पहुंचने के काबिल नहीं हो सका था। शायद इसी वजह से किसी भारतीय से मुलाकात नहीं हो सकी थी। जीते जी जो तड़प थी उनके मन में , आज फिर उसी ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था। चित्रगुप्त से रहा नहीं गया। वह हर हाल में किसी ऐसे भारतीय को इनसे मिलाना चाहता है , जिसका अंत समय निकट आ गया हो और जो गांधी के निकट बैठने एवं उनसे मिलने के काबिल हो। तत्काल किसी दुर्घटना के शिकार व्यक्ति को छोड़ दिया आश्रम में।

जैसे ही गांधी जी ने भारत वंशी को देखा , दौड़कर गले लगा लिया। इच्छापूर्ति के लिए चित्रगुप्त का मन ही मन धन्यवाद कर , उस व्यक्ति को कमरे में आसन देकर बिठाया। गांधीजी लगातार पूछते रहे , बतियाते रहे , पर वह व्यक्ति कुछ नहीं बोला। ध्यान से देखा तब पता चला , वह अंधा है , कुछ बोल नहीं रहा , मतलब यह गूंगा भी है , सुन भी नहीं सकता तभी तो इशारों में भी जवाब नहीं दे रहा है। गांधी जी ने सिर पकड़ लिया। तभी आकाशवाणी हुई। तुमने किसी भारतीय से मिलने की व्यग्रता दिखाई , इसलिये इसे तुम्हारे पास भेज दिया हूं। गांधी जी ने कहा – मैंने किसी ऐसे व्यक्ति से मिलने की इच्छा की थी , जो मेरे देश का हाल बताए। इसे यहां से ले जाइये , यह मेरे किसी काम का नहीं। चित्रगुप्त ने गांधी जी को समझाते हुए कहा – आपके लिए ऐसे भारतीय कहां से लाऊं – जो बोल सके , सुन सके और देख सके। जिनकी ये इंद्रियां चतुरतापूर्वक काम करती हैं , वे यहां आने के काबिल नहीं हैं। जिनकी ये इंद्रियों निस्तेज है , केवल वे ही स्वर्ग के दहलीज पर कदम रख सकते हैं। गांधी जी समझे नहीं। तब चित्रगुप्त ने बताया – अंधे , गूंगे और बहरों का देश हो चुका है भारत। वैसे इस देश में कुछ ऐसे भी लोग रहते हैं – जो बोल तो सकते हैं , पर उनकी कोई सुनता नहीं। वे देख सकते हैं , पर उन्हें अच्छे - बुरे की पहचान नहीं। वे सुन सकते हैं – पर समझ नहीं सकते। गांधी जी ने कहा – कम से कम ऐसे ही व्यक्ति को भेजना था मेरे पास , मैं उसकी सुन लेता , उसे अच्छे बुरे की पहचान करा देता , उन्हें समझा देता। तब चित्रगुप्त ने बताया कि – मैंने उसे ही भेजा है , जिस तरह के मनुज से मिलने की चाहत रखते हो तुम। परंतु , मुझे अभी अभी पता चला कि – यह जो बात कहता था , उसे सुना जाने लगा था। यह अच्छा बुरा पहचानने लगा था। किसी के बात को सुनकर समझने लगा था। और इसी वजह से आपके ही कथित अनुनायियों ने इसे भारत में रहने लायक नहीं समझा। और तुरंत स्वर्ग का रास्ता दिखा दिया। यह इस देश की जनता है गांधी जी , जो जानने समझने योग्य हो जाने पर , यहां रहने की पात्रता खो देती है। क्या ? गांधी जी प्रश्नवाचक मुंह बनाकर स्वर्ग को ताक रहे थे। इसके लिये तुम ही जिम्मेदार हो। “ बुरा मत देखो , बुरा मत सुनो , बुरा मत बोलो “ के नारों ने इनका सत्यानाश किया हुआ है। काश ! बुरा मत करो का नारा और जोड़ दिया होता। खैर , देश का हाल सुनाने के लिए , इनकी तीनों शक्तियां वापस लौटा रहा हूं। आकाशवाणी बंद हो गयी।

अब वह बोलने लगा था। आप कौन हैं ? पूछने लगा। मैं बताऊंगा अपने बारे में। पहले , आपसे देश का हाल जान लूं। कैसा है मेरा अखंड भारत ? वह व्यक्ति गांधी जी को पंडित समझने लगा और बताने लगा – आप किस अखंड भारत की बात कर रहें हैं पंडित जी। सिर्फ नक्शे में अखंड है भारत , वरना जहां , जिधर जब देखो केवल खंड खंड नजर आता है भारत। कहीं धर्म , कहीं जाति , सम्प्रदाय तो कहीं भाषा के नाम पर विभाजित है भारत। और देश को चलाने वाले ? गांधी जी के इस प्रश्न के लिये तो वह पहले से तैयार बैठा था। कहने लगा – वही तो है इस पूरे विघटन का जिम्मेदार। उसी की कुत्सित विचारों की वजह से छिन्न भिन्न नजर आता है देश। देश को चला नहीं रहे , बल्कि उसकी छाती पर मूंग दल रहे हैं वे। तो क्या गांधी का सपना आकार नहीं ले रहा है वहां ? गांधी ....... वह हंसने लगा। गांधी केवल नाम लेने की वस्तु है वहां पर। राजनीति के तिकड़मों की ढाल है वह। सत्ता प्राप्ति का साधन है वह। कैसे जी रहे हैं लोग वहां ? घुट घुट कर जीने को मजबूर हैं लोग। गोरों के कोड़ों की मार का दर्द , इनके फूलों की सेज की चुभन से अच्छी मानते हैं लोग। उनकी गुलामी को आज की आजादी से बेहतर मानते हैं। क्योंकि , जो लोग पहले चरखा चलाते थे , वे अब केवल जुबान चलाते हैं। जो पहले पसीना बहाते थे , वे अब खून बहाते हैं। कभी सेवानिमित्त मरने वाले लोग , सेवा कराने मरते है‌। पहले भ्रम से बचते थे , वे आज धर्म से बचते हैं। कलात्मक रचने वाले हाथ कलह रचते हैं। कभी जी नहीं चुराते थे कोई , अब जी नहीं पाते हैं। पहले चिरंजीवी बनाते थे , अब सिर्फ जयंतियां मनाते हैं। और मेरा लोकतंत्र ? कौन लोकतंत्र , उसे आज तक नहीं देखा हमने। हां सुना जरूर है कि भारत में लोकतंत्र है , पर वह कहां रहता है , मुझे नहीं मालूम। हां कुछ लोग जरूर बताते हैं कि लोकतंत्र जिंदा है , पर उसको न आंख , न कान , न नाक , न ही हाथ पैर है। वह सांस कैसे लेता है , वह रहता कहां है और इन सब के बावजूद भी वह जिंदा कैसे है , मुझे नहीं मालूम। पर यह बात जरूर मालूम है कि जो भी सत्ता की दहलीज को पार करता है वह इसके गला घोंटने आतुर रहता है।

इसका मतलब गांधी का सपना पूरी तरह बिखर चुका है ? क्या उसका कोई सिद्धांत अब किसी को झकझोरता नहीं ? हूं . .. . .. ..। गांधी का सपना ..... . . .। वह तो उसकी चिता के साथ दफन हो चुका है। राम राज्य का सपना देखा था न उसने , पंडित जी। अब देश के लिये राम राज्य सपना हो चुका है। रही बात उनके सिद्धांतों की , तो वह जरूर आकार ले रहा है पर कुछ इस तरह। वे देश में छायी गरीबी की वजह से कम कपड़े पहनने के पक्षधर थे। बड़ी शहर की अमीर बेटियों ने , इस जिम्मेदारी का निर्वहन करने का बीड़ा उठाया है। उनके कथित अनुयायी भी तन से तो नहीं पर मन के कपड़े उतार कर हरेक जगह अपनी नंगई का प्रदर्शन कर रहे हैं। इस नंगई में तो कई साधु महात्मा और धर्मगुरू भी शामिल हो चुके हैं। पंचायत से संसद तक देश को बरबाद कर देने वालों के हौसले बुलंद है। देश हित को परे रख सारे कार्य निपटाये जा रहे हैं। चूंकि गांधीजी ने ही बुरा देखने सुनने और बोलने से मना किया था। इसलिये इन बुरे कार्यों की बुराई को न कोई देखता , न सुनता , न ही इस पर कोई बोलता। जो बोलता है उसकी जुबां कुरसी देकर काट दी जाती है। जो सुनता है उसे धमकी देकर रोका जाता है , और जो देखता है उसे पैसों के चकाचौंध से अंधा कर दिया जाता है।

गांधी जी ही कहा करते थे – श्रम बगैर सम्पदा , आत्मा बगैर आनंद , मानवता बगैर विज्ञान , चरित्र बगैर ज्ञान , सिद्धांत बगैर राजनीति , नैतिकता बगैर व्यापार और त्याग बलिदान बगैर पूजा व्यर्थ है। इन बातों को मानते हुये लोगों ने बिना श्रम काले धन की व्यवस्था कर ली। आत्मा छद्म आनंद से प्रफुल्लित हो रही है। विज्ञान विनाशकारी रूप धर मानवता को लीलने में व्यस्त है। सिद्धांत राजनीति का मूल नहीं , फुनगी बनकर लटक रहा है। और त्याग बलिदान देकर व्यक्ति पूजा शुरू हो चुकी है।

गांधी ने सोंचा था देश बहुत आगे निकल चुका होगा। उसने कल्पना भी नहीं की थी , कि जिस हालात में वे छोड़कर गए थे , उससे बदतर स्थिति पैदा कर ली है लोगों ने। फिर भी सवाल दागे जा रहे थे वे। इसका मतलब गांधी अप्रासांगिक हो चुका है भारत में आज ? नहीं , गांधी और उनके विचार कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकते। वे जो छद्म भौतिक विकास से कोसों दूर हैं , जो भूख गरीबी , बेकारी से आज भी लड़ रहे हैं , ऐसे ही लोगों ने जिंदा रखा है गांधी जी को। धर्म , न्याय , अहिंसा , सत्य के पालन का पूरा जिम्मा उन्हीं मजबूत कंधों पर आज भी है , जो अपने अधिकारों से महफूज , केवल कर्तव्यों के प्रति जागरूक हैं। ऐसे लोग भले , गांधी की जयंती या पुण्यतिथि याद नहीं रखते , पर वे मानते हैं कि , गांधी कभी मरता नहीं। वास्तव में , रोज उनकी हत्या कर देने वाले लोगों ने ही , उनकी तिथियों को मनाने का ठेका ले रखा है।

पर आप ये सब क्यों जानना चाहते हैं ? क्या आप उनके करीबी हैं ? गांधीजी की आंखों में आंसू आ गये। थोड़ी देर बाद अपने आप को सम्हालते हुये उन्होने कहा – मै ही वह अभागा गांधी हूं , जिनके विचारों को अक्षरस: उलटकर पालन कर रहे हैं और देश को गर्त में ढकेल रहे हैं। क्या .......? मैं नहीं जानता था कि आप गांधी जी हो , मैं आप को पहचान नहीं पाया , अन्यथा अनर्गल बातें नहीं कहता। अब रोने की पारी इनकी थी। गांधी जी के पैरों पर गिरकर क्षमा मांगने लगा वह। गले लगा लिया गांधी जी ने और कहने लगे – जो सच सुन सकता है , सच बोल सकता है , सच देख सकता है – वही तो गांधी है बेटा। मैं भारत में पुनर्जन्म लेना चाहता था किंतु , तुमसे मिलने के बाद , मुझे यही लग रहा है बेटे , आज भी गांधी चिंगारी जिन्दा है वहां पर। मुझे पहचानते जरूर नहीं , पर जानते तो हैं। तुम सच के साथी हो , इसलिये मुझ तक पहुंच सके। मेरा विश्वास है कि तुम्हारी तरह अनेक भारतीयों के विचारों की हवा एक दिन तूफान जरूर लाएगी , गांधी चिंगारी को दावानल बनाएगी और सारे पाप को समूल उखाड़ फेंकेगी , तब वह दिन जरूर आएगा जब गांधी भारत होगा और भारत पूरी तरह गांधी।

वह भारतीय खूब जोर जोर से हंसने लगा। आप भारत में पुनर्जन्म की परिकल्पना को त्याग दीजिये। वहां आपकी लाश को जिंदा रखने वाले लोग , आपको नये रूप में स्वीकार नहीं करेंगे। आप खुश मत होइए कि आप जिंदा हैं वहां। लोगों की मजबूरी है आपको जिंदा रखना। क्योंकि दूसरा गांधी आकर जीने का तरीका फिर न बदल दे इसलिए लोगों ने आपको जिंदा रखा है। वहां गांधी अब केवल मरने के लिए पैदा होता है , कुछ कर दिखाने के लिये नहीं। गांधी पैदा होने के बाद बहुत दिनों तक उसका जी पाना सम्भव नहीं है अब। हां कुछ लोग , गांधी नाम बनने का प्रयास जरूर करते रहे हैं यहां , पर ये तक वहां आपको आने नहीं देंगे। क्योंकि आपका नाम इनमें से , किसी को नोटों से भर रहा है , किसी को वोटों से। कोई किसी पर चोट भी करता है तो आपका नाम चिपका देता है। किसी के लिये झूठ भी हैं आप , तो किसी के लिये लूट भी। पर तुमने तो कहा था कि वहां की जनता ने जीवित रखा है मुझे ? हां मैंने ही कहा है कि जनता जीवित रखे हुये है आपको। पर वह बता नहीं सकती कि यह गांधी है। जिस दिन पता चलेगा कि यह गांधी है , उसे मार दिया जाएगा। वास्तव में गांधी को जीने वाले को भूख गरीबी बेकारी का साथ मिला है , जो अपने मेहनत और ईमान के बल पर किसी तरह अपनी बदहाली पर फतह प्राप्त कर लेते हैं तो उन्हे , मेरी तरह स्वर्ग का रास्ता दिखा दिया जाता है। फिर भी ये गरीब आपको इसलिये जिंदा रखना चाहते हैं क्योंकि ये देश बचाना चाहते हैं। इनके सामने देश बचाने की मजबूरी नहीं होती , तो शायद ये भी ...........। पर मैं तो उन लोगों की बात कर रहा हूं जिनने आपको जिंदा रखने की कसम खायी है। वे सिर्फ आपकी लाश दिखाकर , आपको जिंदा रखने का भ्रम पैदा कर अपनी दुकान निर्बाध चलाना चाहते हैं। आपको जीकर कोई अपने प्राण संकट में डालना नहीं चाहता। आपको जिंदा रखने को सभी फायदे का सौदा मानते हैं। किसी की तिजोरी भरती है आपके नाम से। कोई वोट कमाकर राज चलाता है। कोई सारी सुख सुविधाओं का उपभोगी बन जाता है , आपके ही नाम के सहारे। तब भला क्यों कोई आपको मरा घोषित कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेगा। सिर्फ और सिर्फ इसीलिये मजबूरी है गांधी को जिंदा रखना

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हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन

 

छुरा , जि. गरियाबंद (छ.ग.) , ४९३९९६

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रचनाकार: व्यंग्य - मजबूरी है - गांधी को जिंदा रखना
व्यंग्य - मजबूरी है - गांधी को जिंदा रखना
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