ईबुक - सरहदों की कहानियाँ -4 / मुलाक़ात - रशीदा हिजाब / अनुवाद व संकलन - देवी नागरानी

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  मुलाक़ात रशीदा हिजाब आज फिर ज़ोया का फ़ोन आया। गुज़रे एक महीने से वह कई बार फ़ोन कर चुकी है। एक दो बार आकर भी कह गई है, उसकी इल्तिजा ह...

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मुलाक़ात
रशीदा हिजाब
आज फिर ज़ोया का फ़ोन आया। गुज़रे एक महीने से वह कई बार फ़ोन कर चुकी है। एक दो बार आकर भी कह गई है, उसकी इल्तिजा है कि मैं शीबा से मिलूँ। वैसे भी शीबा से मिले बरसों हो गए थे। उससे कैसे मिलूँ? किस मुँह से मिलूँ? हक़ीक़त तो यही है कि मेरी ही हिम्मत नहीं हो रही थी। एक लम्बे अरसे से न तो उसका हाल ही जाना था, न ही कभी उसे अपने पास बुलाया था। अभी तो उसके पदचिन्ह भी यादों के कैनवस पर धुँधले से होने लगे थे।
शीबा वह हस्ती थी जिसे मैं एक पल भी ख़ुद से जुदा करने की बात सोच ही नहीं सकती थी। वह मेरे ही वजूद का एक अहम अंग बन गई थी। सही सही तो याद नहीं पर इतना ज़रूर याद है कि उसके साथ मेरी पहली मुलाक़ात एक छोटे शहर में हुई थी। हम दोनों एक बड़े घर के आंगन में खेलते-खेलते, एक दूसरे की हमराज़ और साथी बन गई थीं। वह एक सेहतमंद और लुभावनी शक्ल की लड़की थी, पर उसके बावजूद वजूद की कभी न भूल पाने वाली बात थी उसकी प्रतिभा और भरपूर ज़िंदगी की चमक से रोशन आँखें और उसके गालों पर बनने वाले दो खूबसूरत कपोल भंग (कपउचसमे)ण् अजीब बात यह थी कि वह हँसमुख और ज़हीन लड़की एक घड़ी में बैठे-बैठे अचानक गौतम बुद्ध की तरह ख़़ामोश हो जाती थी। फ़लसफ़े और ज्ञान का संगम उसे एक और शख्सियत का स्वरूप प्रदान करते थे। उन दिनों में ही उसने लिखना शुरू किया और थोड़े ही समय में बाल-साहित्य के अदब में उसका नाम हो गया। कभी-कभी उसे बात करते सुनकर यह यक़ीन ही नहीं होता था कि जो लड़की पत्थरों के टुकड़ों को पाँव से ठोकरें लगाकर कूदा करती थी वह अदीबा बन जाएगी! काफ़ी अरसे तक वह मुझसे दूर चली गई।
एक लम्बे अंतराल के बाद उससे मुलाक़ात हुई तो वह पहले वाली उत्पाती, अस्त-व्यस्त रहने वाली शीबा न थी। उसकी चाल में हिरणी वाली मस्ती तो अब भी थी, आँखों की चमक भी हीरों को मात दे रही थी, गालों के सुंदर कपोल भंग छुपाए नहीं छिप रहे थे और सबसे बड़ी बात अब उसकी जवानी में ख़ूबसूरती भी शामिल हो गई थी। उसके बेहद घने बाल अस्त- व्यस्त न होकर दो मोटी चोटियों में बंधे काले नाग की तरह उसके गले में झूल रहे थे।
"अरे शीबा, तुम इतनी बड़ी कैसे हो गई?" (वह न सिर्फ़ क़द में, पर दर्जे और सम्मान में भी बहुत बड़ी हो गई थी।)
"तुमसे तो मिलने के लिये भी अब सोचना पड़ता है।" मैंने फीकी सी हँसी हंसते हुए बात की तो वह हमेशा की तरह बेझिझक होकर मेरी बाँहों में अपनी बाँह डालकर ठहाका भरते हुए कहने लगी -
"अरी, पागल हो गई हो क्या? दुनिया के लिये कुछ भी रहूँ, तुम्हारे लिये तो वही छुटपन वाली शीबा हूँ। मैं तुम्हें क्या बताऊँ कि मेरे लिये सबसे ज़्यादा खुशनुमा लम्हा वही होता है जब मैं तुम्हारे साथ होती हूँ।"
वह ग़लत नहीं कह रही थी पर मुझे ऐसा महसूस होने लगा कि वह एक उत्तेजनाहीन अंदाज़ में मुझसे दूर होती जा रही है। अब उससे मिलने के वक़्त वह जोश, जज़्बा और उमंग महसूस न होती थी। उसको औरों से घिरी हुई देख, मैंने ख़ुद अपने क़दम पीछे कर लिये। अखबारों में, रसालों, टी.वी. और रेडियो के माध्यम से उसके बारे में मालूम होता रहता था। कभी-कभी उसकी तस्वीरें भी अखबारों में आ जाती थीं। एक लम्बे अरसे के बाद उसकी तस्वीर एक रसाले में देखी तो चौंक उठी। रसाला फिर फिर उठाकर देखा। नाम उसका ही था पर सूरत इतनी बदली हुई थी कि ख़ुद को यक़ीन दिलाने की कोशिश में मैं नाक़ामयाब रही कि यह वही शीबा है। वह एक बड़ी संस्था की व्यस्थापक व निर्वाहक थी। टेलीफ़ोन नम्बर हासिल करके उसे फ़ोन किया तो पहला शब्द सुनकर ही वह चिल्ला उठी-
 
"अरे, आज कैसे तुम्हें मैं याद आ गई?"
"याद नहीं आई, अब तुम याद उन्हीं को आओगी जो तुम्हारे आस-पास मज़बूत क़िले बनाकर खड़े हैं।"
"पक्के नहीं, कच्चे क़िले.... अरे यह तो कच्ची मिट्टी की कच्ची दीवारें हैं, मेरा मज़बूत पक्का किला, मेरा पुख़्ता आश्रय तो तुम हो।" उसने कमज़ोर आवाज़ में कहा।
"शीबा, तुम ठीक तो हो? तस्वीर में इतनी कमज़ोर और आवाज़ इतनी टूटी और बिखरी-बिखरी, हमारी शीबा तो ऐसी न थी।"
उसने जवाब क्या दिया, मैं समझ नहीं पाई। शायद उसके आस-पास काफ़ी लोग थे, या वह कोई समस्या सुलझा रही थी।
"मैं तुमसे बाद में बात करूँगी।" फिर फ़ोन बंद कर दिया। पहले मैं कुछ खफ़ा हुई पर बाद में बेइन्तहा दुख हुआ। उसी दिन ज़ोया का फोन आया। मैंने उसे सुबह वाली बात सुनाई तो वह थोड़ी देर के लिये चुप हो गई, फिर कहा- "तुम कब से उससे नहीं मिली हो?"
जवाब देने के लिये होंठ हिले तो शर्मिंदगी से उन्हें फिर खोल न पाई।
"यक़ीनन, तुमने अरसे से उसे देखा नहीं है। वह बहुत कमज़ोर, क्षीण है और उसका दिल भी टूटा हुआ है। वह हम सबसे बहुत दूर चली गई है। तुम्हारे और मेरे जैसे दोस्त और प्यार के दावेदार उसे मुश्किल और दुश्वार राहों पर अकेला छोड़ आए हैं। तुम्हें तो याद है, वह गली में छोटे बच्चे को रोता हुआ देखती थी तो किताब के बीच में रखा अपनी खर्ची वाला एक रुपये वाला नोट बच्चे के हाथ में देकर आती थी। ईद पर पड़ोस में रहने वाली ग़रीब छोकरी रहीमाँ नए कपड़े न पा सकी तो अपना नया क़ीमती जोड़ा मोतियों के हार समेत ज़मीन पर फेंककर माँ के साथ लड़ने लगी।
"क्यों बनवाया आपने यह फीरोज़ी जोड़ा? आपको पता है कि यह रंग मुझे ज़रा नहीं भाता। नहीं चाहिये मुझे यह जोड़ा जाकर रहीमाँ को दे दो, तो वही पहन ले।" गुस्से का गुस्सा और रहीमाँ की ईद की ईद! उस की इस ख़ामोश हमदर्दी को सब समझते थे इसलिये उसकी माँ पहले से ही बंदोबस्त कर रखती थी, फ़ीरोज़ी के साथ नीला जोड़ा भी तैयार रहता था।
पढ़ाई में होशियार होने के कारण हमारे सारे ग्रुप को स्कालरशिप मिलती थी। सत्ताइस रुपये महीने के हिसाब से साल भर में अच्छा ख़ासा पैसा मिलता था। हम जान बूझकर छिपकर जाकर स्कालरशिप लेते थे कि कोई सोने की अंगूठी या कोई अच्छा जोड़ा ले सकें। वह बार-बार वादा करके ईद बाज़ार जाने के समय गुम हो जाया करती थी। एक बार उसकी चोरी पकड़ी गई। बर्फ़ की कुलफ़ियाँ बेचने वाला पड़ोसी रफ़ीक़ जल्दी-जल्दी जा रहा था, ज़ोया ने जाकर हाथ पकड़ा, "ये क्या छिपाकर भाग रहे हो?प्रेचारा बच्चा डर गया, एक ही डाँट में सच स्वीकार कर लिया- "बहन दो बार मैट्रिक में फेल हुआ हूँ.... कुलफियों के धंधे पर घर चल रहा है। फिज़िक्स और मैथ में ट्यूशन की ज़रूरत है। दीदी ने कहा तुम ज़रूर पढ़ो। ट्यूशन फ़ीस उसने दी है। लड़के ने मुट्ठी खोली- सौ सौ के चार कड़क नोट खड़-खड़ करने लगे। हम दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा वह शर्मिंदा होकर यहाँ वहाँ देखने लगी, जैसे उसने नेकी नहीं बल्कि चोरी का काम किया हो।
ऐसी सचेतन संवेदनशील मन वाली, इतना प्यार करने और प्यार देने वाली शीबा अब अफ़सरी के पद पर, प्रभुत्व-प्रतिभा, नियमों, फ़ैसलों के जाल में, क़ायदे-क़ानूनों की ज़ंजीरों में जकड़ी हुई, अपनी तबीयत की अवहेलना कर रही है।
"तुम उससे ज़रूर मिलो। उसे हमारे प्यार की जितनी अब ज़रूरत है पहले कभी भी न थी। उसका ग़म, उसकी तन्हाई है। इतनी भीड़ में रहते भी वह अकेली है, दिल शिकस्ता है।"
जितनी देर ज़ोया बतियाती रही मेरे तस्व्वुर में तरो-ताज़ा गुलाब के फूल जैसी निखरी-निखरी आँखों वाली शीबा फिरती रही। उसके लम्बे बालों के बिखरे हुए स्याह-स्याह बादल मेरी आँखों में उतर आए। अगले पल मेरे क़दम उसके ऑफ़िस की ओर बढ़ गए। ऑफ़िस के बाहर गार्ड बंदूक लिये बैठा था। उसके कमरे के पहले, उसकी सेक्रेटरी का कमरा था। मुलाक़ात के पहले उनसे इजाज़त लेनी ज़रूरी थी। मैं मन ही मन में हँसी। शीबा जैसी निरुपद्रव, निष्पाप, सदाचारी और अमन पंसद, बल्कि किसी हद तक बुज़दिल शख़्सियत को इस दिमाग़ी फ़ौज की क्या ज़रूरत पड़ी!
मैं दोनों कमरे पार करके उसके ऑफ़िस में आई। वह अपने शानदार ऑफ़िस में हमेशा की तरह गहन विचारों से घिरी हुई थी। एक पल के लिये मेरा दिल गर्व से भर गया। इतनी इज़्ज़त, इतनी शान, ऐसा मुक़ाम उस छोटी सी कमज़ोर लड़की को सिर्फ़ व सिर्फ़ उसकी नेकदिली और मेहनत के बदले मिला था। वह कोई और नहीं हमारी शीबा थी। पर दूसरे पल जब उसके चेहरे पर नज़र पड़ी तो ज़ोया का रोना याद आ गया। वक़्त और कई सालों की मेहनत ने शायद अब उसकी हड्डियों को निचोड़ डाला था। आँखों में प्रतिभा की नमी तो आज भी झलक रही थी पर जवानी की लौ दम तोड़ती नज़र आ रही थी। चेहरे का गुलाब जाने कब कुम्हाला गया था। घने काले बालों में चांदी की तारें लिपटी हुई थीं। मुझे देखकर वह बे-इख़्तियार हो उठी। मुस्कान उसके चेहरे पर छा गई। उसके गालों में पड़ते सुंदर कपोल भंग जाने कहाँ ग़ायब हो गए थे? वही तो थे जो हर किसी को उसके आकर्षण में डूबने को मजबूर करते। वह अपने दोनों हाथ और बाँहों फैलाकर बे-अख़्तियार मुझसे मिलने के लिये आगे बढ़ी पर उसी समय टेलीफोन की घंटी ज़ोर-ज़ोर से बजने लगी। पास में रखा हुआ लाल बल्ब भी जल्दी-जल्दी जलने लगा वह रुक गई। रिसीवर उठाकर कुछ देर फ़ोन पर बात करती रही। उसके चेहरे पर फ़िक्रमंदी की लकीरें उभरने लगीं। रिसीवर रखकर वह तुरन्त बाहर निकलने लगी। मेरे स्वागत के लिये उठे हुए उसके हाथ और बाँहें नीचे की ओर लुढ़कीं।
"माफ़ करना, मैं तुमसे आज मिल न सकूँगी। एक एमर्जेंसी है। मुझे इसी वक़्त ही एक अहम मीटिंग में भाग लेना है।"
वह तेज़ी के साथ चली गई और मैं दरवाज़े पर खड़ी सोचती रही- ‘तुम कब मिलोगी? कब अपने वजूद के इस बिछड़े हुए हिस्से को मुलाक़ात का मौक़ा दोगी? क्या तुम और मैं हमेशा के लिये अलग हो गए हैं? तुम्हारे संवेदनशील दिल का यह नर्म कोना, तुम्हारे कागज़ और क़लम, तपती दोपहरी की मिट्टी उड़ाती गर्म मगर ज़िंदगी से भरपूर हवाएँ और सर्दी की लंबी सर्द व जटिल रातें, बहार में नरगिसी ख़ुशबू से भरी हवाओं के काफ़िले, सभी मेरी तरह तक अरसे से तुमसे मिलने के लिये बेक़रार खड़े हैं यह मुलाक़ात ख़ुद से तुम्हारी कब होगी? 
 
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Devi Nangrani
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(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)































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रचनाकार: ईबुक - सरहदों की कहानियाँ -4 / मुलाक़ात - रशीदा हिजाब / अनुवाद व संकलन - देवी नागरानी
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