उन्मादी व उत्पाती होते हैं शक्की, झक्की और सनकी / डॉ. दीपक आचार्य

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उन्मादी व उत्पाती  होते हैं शक्की , झक्की और सनकी - डॉ. दीपक आचार्य 9413306077 dr.deepakaacharya@gmail.com सामान्यतया इंसान अपनी पटरी ...

उन्मादी व उत्पाती  होते हैं

शक्की, झक्की और सनकी

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

सामान्यतया इंसान अपनी पटरी पर रहता है और मर्यादित जीवन जीता है। लेकिन जीवन की कुछ घटनाएं ऎसी हो जाती हैं जिनकी वजह से उसका दिमागी संतुलन बिगड़ जाता है और उस पर पागलपन सवार हो जाता है जिसे शिष्ट भाषा में उन्माद कहा जाता है।

इसीलिए इस किस्म के लोगों द्वारा प्रकट उन्माद के प्रतिशत को देखकर मामूली पागल, आधा पागल, पौन पागल और पूरा पागल कहा जाता है, कुछ को पागलों का सरदार तक भी कह सकते हैं।

इन सभी प्रजातियों के लोग हमारे आरा-पास भी विद्यमान हैं। कुछ को हम जानते हैं, कुछ से हमारा पाला नहीं पड़ा होता है इसलिए हम उन्हें बहुत अच्छा आदमी स्वीकारते रहते हैं। जैसे ही कलई खुल जाती है तब हमें अपनी गलती का अहसास होने लगता है।

पागलपन किसी की बपौती नहीं है यह बुद्धिहीनों में भी हो सकता है और श्रेष्ठस्तर के बुद्धिजीवियों में भी। इसका सीधा संबंध संवेदनाओं से होता है। जो जितना अधिक संवेदनशील होता है वह हर प्रकार की घटना से शीघ्र और गहरे तक प्रभावित होता है।

नासमझों और अनपढ़ों का पागलपन अलग किस्म का होता है और बौद्धिक क्षमताओं वालों का अलग। इनकी प्रकृति और व्यवहार सभी भिन्न होते हैं। समाज और देश को जितना खतरा नासमझ और अशिक्षित उन्मादियों से नहीं है उससे कई गुना ज्यादा खतरा उनसे है जो बहुत अधिक पढ़े-लिखे और महा-बुद्धिजीवी माने जाते हैं, बड़े ओहदों पर विराजमान हैं और आधुनिक तकनीकों में माहिर हैं।

इनकी संवेदनशीलता आम लोगों, समाज और देश के प्रति भले न हो, अपनी स्वार्थपूर्ति और कामों, अपनी जमीन-जायदाद, भोग-विलासी वैभव तथा अपनी प्रतिष्ठा को हमेशा बरकरार रखे रहने के लिए ही जगती है और जब अपेक्षा के अनुरूप सफलता हासिल नहीं हो पाती है तब ये लोग उद्विग्न, अशांत, अस्थिर और उन्मादी हो जाते हैं और यह अवस्था इनके स्वयं के लिए आत्मघाती तो होती ही है, ये उन लोगों के लिए सर्वाधिक खराब क्षण होते हैं जो इनके मातहत या साथ काम करने वाले होते हैं, परिचित या व्यवहारी होते हैं तथा  जिन्हें इनके अधीन रहकर काम करना होता है।

बहुत प्रतिष्ठित और बड़े ओहदों पर बिराजमान खूब सारे लोग ऎसे हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि नाम बड़े और दर्शन खोटे। खूब सारे लोग इनके आगे-पीछे घूमते हैं, परिक्रमा, जी हूजूरी और जयगान करते हैं, स्तुति-प्रशस्ति करते हुए तारीफों के पुल बाँधते रहते हैं, इन्हें जरूरत से ज्यादा आदर, सम्मान और श्रद्धा देते हुए  इतना अधिक चढ़ाये रखते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता।

इसी अप्रत्याशित और उम्मीद से अधिक सम्मान और श्रद्धा पाने वाले ये बड़े लोग अक्सर अपना आपा खो देते हैं। इन लोगों को अपने बारे में हमेशा यह भ्रम बना होता है कि वे महान और लोकप्रिय हैं, अधीश्वर हैं, सब लोग उनकी बातों को मानते हैं। इन्हें यह पता नहीं होता कि लोग उनके किसी गुण या खासियत को लेकर उन्हें नहीं पूछ रहे है। बल्कि भय के मारे आगे-पीछे  घूमने के आदी हो गए हैं।

भ्रम को बढ़ाने में संवादहीनता भी बहुत बड़े उत्प्रेरक का काम करती है क्योंकि दोनों ही पक्षों के बीच परस्पर आत्मीय और खुली बातचीत का कोई अवसर सामने नहीं आता। बड़े और महान लोग अपने भ्रमों मे जीते रहते हैं और नीचे वाले लोग सही बात कहने में हिचकते हैं।

फिर बिल्ली और बिल्लों के गले में घण्टी बांधकर आफत कौन मोल ले। इसलिए भी लोग इन महानों को महान ही रहने देना चाहते हैं, सार्वजनीन तौर पर महानता स्वीकार कर लिया करते हैं।

यही सब वजह है जिसके कारण से बड़े-बड़े लोग चिल्लाते, झल्लाते हैं, गुस्सैल होकर क्रोध का सागर उमड़ाते हैं, अनाप-शनाप बकवास करते हुए अपने अधिकारों का भरपूर उपयोग करते हैं और अपने उन्मादी  स्वभाव का प्रकटीकरण करते रहते हैं।

अहंकार में डूबे हुए और आसमान की ऊँचाइयों को पाने के लिए लपकते रहने वाले ये लोग किसी को कुछ भी कह सकते हैं। इन्हें अपने अधिकारों और शक्तियों को इस्तेमाल करने की खुली छूट हुआ करती है क्योंकि इन पर लगाम कसने का जिम्मा रखने वाले भी इन्हीं जैसे ही होते हैं।

इस स्थिति में गधे को गधा और उल्लू को उल्लू या कि उल्लू का पट्ठा कौन कहे। आजकल इन्हीं नालायकों के कारण समाज में असहिष्णुता बढ़ती जा रही है। बर्दाश्तगी की एक हद होती है जिसके टूटने के बाद कोई भी सहिष्णु नहीं बना रह सकता, उसे सामने आकर नालायकों को औकात दिखानी ही पड़ती है।

आजकल ऎसे उन्मादियों को सब जगह देखा जा सकता है। और यही उन्माद आगे चलकर उत्पात मचाता है। इस तरह के उन्माद और उत्पात को देखना कोई कठिन नहीं है। खूब लोग हैं जो अपने आपको बड़ा मानकर चल रहे हैं लेकिन उनके भीतर  मानवता और संवेदनशीलता की बजाय उन्माद और उत्पात भरे हुए हैं जिसका प्रकटीकरण वे अपने श्रीमुख, कार्य और व्यवहार से करते रहते हैं।

कुछ लोगों के बारे में यह कहा जाता है कि वे अपने ओहदे और कामों से बड़े तो हो गए हैं मगर उनका व्यवहार,स्वभाव और चरित्र जाहिल लोगों से कम नहीं होता जिनकी कोई मर्यादा नहीं होती।

ये किसी को इंसान नहीं समझते, किसी को भी सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित कर सकते हैं और बेशर्मी की सारी हदें भी पार कर सकते हैं। बहुत से हैं जिनसे उनके मातहत और सम्पर्कित परेशान हैं, पर कहें तो किससे।

इन लोगाें को खुद समझ में आ जाना चाहिए कि उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए और अभी कैसा है। यह देखा गया है कि पति-पत्नी या किसी भी प्रकार के रिश्तों में शक करने वाले शक्की, झक्की और सनकी लोगों का व्यवहार कुछ समय बाद उन्मादी हो जाता है और वे ऎसी हरकतें करने लगते हैं जो इन्हें अघोषित पागल कहने को मजबूर कर देती हैं।

कभी किसी को बेवजह डाँट देंगे, कभी गुस्सा निकालेंगे, कभी बिगाड़ा कर डालने की धमकियां देते रहेंगे और कभी ऎसी हीन हरकत पर उतर आएंगे कि कहने में भी लाज आती है।

सामाजिक और परिवेशीय प्रदूषण के लिए ऎसे शक्की, झक्की और सनकी लोगों को ठीक करने के लिए सामाजिक एवं क्षेत्रीय स्तर पर सामूहिक जागृति संचार की आवश्यकता है ताकि हाथी-घोड़ों और पालकियों से लेकर पॉवर ब्रेक वाली गाड़ियों में बिराजमान इन महान और बड़े लोगों को जमीन दिखाई जाए, जमीनी हकीकत से रूबरू कराया जाए और फिर भी अक्ल न आए तो बहुत सारे रास्ते हैं जो इन्हें ठिकाने लगा सकते हैं, उनका इस्तेमाल करें।

आखिर सम्पूर्ण स्वच्छता का मतलब केवल कचरा साफ करना ही नहीं है,  इससे भी आगे खूब सारे कर्तव्य हैं हमारे।

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रचनाकार: उन्मादी व उत्पाती होते हैं शक्की, झक्की और सनकी / डॉ. दीपक आचार्य
उन्मादी व उत्पाती होते हैं शक्की, झक्की और सनकी / डॉ. दीपक आचार्य
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