कुछ सीखें-समझें वासन्ती हवाओं से / डॉ. दीपक आचार्य

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डॉ. दीपक आचार्य 9413306077 dr.deepakaacharya@gmail.com लो ही आ ही गया वसन्त। हम साल यों ही आता है, हम इसका नाम भर लेते हैं, कुछ आयोजन कर ड...

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डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

लो ही आ ही गया वसन्त।

हम साल यों ही आता है, हम इसका नाम भर लेते हैं, कुछ आयोजन कर डालते हैं लेकिन वसन्त की उतनी आवभगत नहीं करते जितनी होनी चाहिए।

और कामना करते हैं कि तन-मन वासन्ती हो, जीवन में वसन्त-दर-वसन्त आता रहे, वासन्ती उल्लास और आनंद का अहसास कराता रहे।

पहले प्रकृति हमारी हर बात मानती थी, हमारी इच्छाओं को पूरी करने के लिए वह नियम से चलती थी और सुकून देती थी।

ऋतुओं के बारे में पुरातन काल से यही धारणा रही है कि ये समय पर आती हैं, समय पर जाती हैं ।

जानें ऎसा क्या हो गया पिछले कुछ समय से कि ऋतुएं भी हमसे बगावत करने लगी हैं, समय को लेकर धोखा देने लगी हैं।

जब से हमने अपनी मर्यादाओं, धर्म और सत्य को छोड़ा, तभी से ऋतुओं ने हमें भी ठगना शुरू कर ही दिया है।

अब कोई सी ऋतु का मंजर किसी भी दूसरी ऋतु में अचानक आ धमकता है और अपना वजूुद दिखाते हुए हमें छलने लगता है।

हम सारे परेशान हैं ऋतुओं की इन करतूतों पर।

प्रकृति को हमने ठगना आरंभ किया, उसने कुछ समय तो चुपचाप सब देखा, सहन किया और हमारी ओर देखती रही।

फिर उसे लग ही गया कि यह इंसान अपनी औकात पर आ गया है, वह बदलने वाला नहीं, बदचलनी पर उतर आया है, तभी से ऋतुओं ने दगा देना शुरू कर दिया है।

दें भी क्यों न, जैसे को तैसा हम भी सिखाते हैं औरों को, प्रकृति क्यों न अपनाए इसे।

लो भुगतो अब अपनी करनी। बीज ही बो रहे हैं बबूल का, और आम खाने की तीव्र लालसा हर क्षण बनी रहती है।

इतना अधिक प्रदूषण कर रखा है हमने दिल और दिमाग से लेकर शरीर तक में, हर धमनी और शिरा पराये विजातीय द्रव्यों के मारे परेशान है।

आदमी का अपना कहने को कुछ नहीं रहा। खान-पान, व्यवहार, जीवननिर्वाह सब कुछ परायों के भरोसे हो गया, परायों के लिए जीना हो गया, सब कुछ गड्डमड्ड हो गया।

इंसान की अपनी कोई ऋतु नहीं रही। वह हर ऋतु के सारे काम सभी ऋतुओं में करने की स्वच्छन्दता पा चुका है।

ऋतुओं ने इसी निष्ठाहीनता को देखकर अब अपनी चाल बदल दी है। रह-रहकर हर ऋतु अपने खेल दिखाती है और चली जाती है।

कोई अब पक्के दावे से नहीं कह सकता कि जो कालचक्र में जो ऋतु निर्धारित है वही अपने समय में बनी रहेगी।

आदमी की तरह ऋतुओं का भी कोई भरोसा नहीं रहा। ऋतुओं ने आदमी को उसी की भाषा में चिढ़ाना शुरू कर दिया है।

खासकर वसन्त को इंसान से लेकर सभी जीवों के लिए सुकून वाली ऋतु माना जाता है जिसमें सब कुछ संतुलित रहता है।

मगर अब ऎसा नहीं रहा। हम वसन्त की उतनी आवभगत नहीं कर पा रहे हैं जितनी जरूरी है। केवल नाम ही लेते हैं वसन्त का।

वासन्ती हवाओं और माहौल के बावजूद हम अपने तन-मन और मस्तिष्क को वासन्ती नहीं बना पाए हैं। हमारी कामना यही रहती है कि जीवन भर वसन्त बना रहे। लेकिन इसके लिए हम कुछ कर नहीं पा रहे।

वासन्ती जीवन के लिए समत्व, समरसता और माधुर्य भावों का होना जरूरी है और इसका अभाव आज की सबसे बड़ी समस्या है।

वासन्ती हवाओं का दौर शुरू हो चुका है। इन हवाआें से कुछ सीखें और अपने जीवन को वासन्ती बनाने की दिशा में कुछ करें।

बरसों से हम वसन्त आने की उम्मीद रखते हैं मगर अपनी ओर से कुछ करते नहीं। वासन्ती जीवन की आकांक्षा रखने वालों के लिए जरूरी है कि अपने मन-मस्तिष्क और शरीर को विकारों से मुक्ति दिलाएं, पवित्रता के भाव रखें तभी हममें से हरेक की जिन्दगी में वसन्त खिलाया जा सकता है।

हर दिन वासन्ती महक से परिपूर्ण हो सकता है यदि हम सचमुच में अपने जीवन में कुछ बदलाव ले आएं। वसन्त को चाहता ही है कि वह हमारे भीतर साल भर बना रहे।

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रचनाकार: कुछ सीखें-समझें वासन्ती हवाओं से / डॉ. दीपक आचार्य
कुछ सीखें-समझें वासन्ती हवाओं से / डॉ. दीपक आचार्य
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