हिंदी में हाइकु – हाइकु 2002 / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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हिंदी में हाइकु-लेखन इधर काफी मात्रा में हुआ है. इसमें बहुत-कुछ निरर्थक और कविता विहीन भी है. पर इसका यह अर्थ नहीं है कि हिंदी हाइकु का सम्...

हिंदी में हाइकु-लेखन इधर काफी मात्रा में हुआ है. इसमें बहुत-कुछ निरर्थक और कविता विहीन भी है. पर इसका यह अर्थ नहीं है कि हिंदी हाइकु का सम्पूर्ण लेखन ही खारिज कर दिया जाए. हिंदी की हाइकु रचनाओं में नए प्रयोग, नए विषय और नई शैलियां भी विकसित हुई हैं. उदाहरण के लिए हाइकु मूल रूप से एक अतुकांत कविता है, किंतु हिंदी में अधिकतर हाइकु तुकांत हैं. कभी यह तुक प्रथम और द्वितीय पंक्ति में होती है तो कभी द्वितीय और त्रितीय में. कभी-कभी प्रथम और त्रितीय पंक्ति को तुकांत किया जाता है. इसी प्रकार हाइकु के मान्य विषय प्रकृति–चित्रण और दार्शनिक-सोच हैं. हिंदी में भी प्रकृति-चित्रण हुआ है और हाइकु रचनाओं में दार्शनिक विचारों को भी अभिव्यक्ति मिली है. अनेक हाइकु निश्चित ही विचारोत्तेजक हैं. यदि जापानी हाइकु ज़ेन दर्शन को उद्घाटित करते हैं तो हिंदी में वेदांत, बौद्ध और यहां तक कि जैन-दर्शन को भी अभिव्यक्त्ति मिली है. इंदौर से प्रकाशित होने वाले ‘तीर्थंकर’ में जैन-सूक्तियां (श्रमण हाइकु) धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुए हैं. पर हिंदी हाइकुकार मुलतः अपने सामाजिक परिवेश और उसकी विडम्बनाओं से निकट से जुड़ा हुआ है और इसलिए उसने अपनी रचनाओं में राजनीति के विरोधाभासों को उजागर करने का प्रयत्न किया है. इसके अतिरिक्त हिंदी में हाइकु-लेखन की अनेक शैलियॉ देखने को मिलती हैं. हाइकुकारों ने अपनी अनुभूतियों को लेकर लय, अनुप्रास, बिम्ब, अनेकार्थी गूंजों, चित्रात्मकता और प्रतीक-प्रयोग जैसे उपायों से अलंकृत किया है और इस प्रकार काव्यात्मकता को बल मिला है.

सन् 2002 में हिंदी हाइकु की अनेक पुस्तिकाएं प्रकाशित हुईं हैं. इन संग्रहों में अनेक हाइकु रचनाएं बहुत सुंदर बन पड़ी हैं. इनमें हमें प्रकृति चित्रण मिलता है और गहन चिंतन भी. इनमें सामाजिक टिप्पणियां कभी व्यंग्य का रूप लेतीं हैं जो विडम्बनाओं को प्रकाश में लाती हैं. बहुत से हाइकु यदि सद्विचारों से ओतप्रोत हैं तो बहुत से बाल- मनोविज्ञान पर केंद्रित हैं. वे बच्चों की वर्तमान नियति पर संवेगात्मक अभिव्यक्तियां हैं.

1- व्यंग्य और विडम्बनाएं –जैसा पहले ही कहा जा चुका है, हिंदी हाइकुकार अपने

सामाजिक वातावरण के बहुत क़रीब है. उसका परिवेश उसे सहज प्रभावित करता है. इसलिए परिवेश सम्बंधी टिप्पणियां उसकी हाइकु रचनाओं में भी बहुलता से देखी जा सकती हैं. साहित्य संगम, इंदौर, द्वारा प्रकाशित दो हाइकु-संग्रहों ‘नकेल’ और ‘अंकुश’ (रचनाकार क्रमशः, सदाशिव कौशिक और श्याम खरे) ने मुख्यत: अपने परिवेश को ही केंद्र में रखा है. इनमें जहां एक ओर सामाजिक विडम्बनाएं उद्घाटित की गईं हैं वहीं व्यंग्यात्मक शैली का भी भरपूर प्रयोग किया गया है. कौशिक का कटाक्ष –

जनता गूंगी /

राजा बहरे कान /

जै सिया राम

आज की राजनीति पर कड़ा प्रहार है. वे अर्थतंत्र और धर्म को भी अपना निशाना बनाते हैं |

आज तो,

‘बस्ती जलाकर /

धरम की कढाई /

वोट तलती’ है, तो ऐसे में धर्म धर्म कहां रहता है! वह राजनैतिक लाभ का एक उपकरण मात्र बन गया है. गांव का आदमी बड़े अरमान लेकर शहर आता है, लेकिन उसे तो,

बड़ा शहर /

धीमे धीमे परोसे /

मीठा ज़हर

कारण स्पष्ट है. आज नगरों में आत्मीयता पूरी तरह समाप्त हो गई है और यहां सम्बंध केवल आर्थिक लाभ के लिए बनते हैं – ‘बाज़ारवाद /

हवा में घुल गया /

रिश्ते ग़ायब’.

चारों ओर भ्रष्टाचार है. बिना रिश्वत के कोई फाइल हिलती नहीं, और यदि पैसा मिल जाए तो आलम यह है कि – ‘नोट को देख /

घूसखोर टेबल/

कत्थक करे’. सभी अवसर का लाभ उठाने में व्यस्त हैं, यहां तक कि- मृदु कलियां /

पवन झोंके संग /

कत्थक करती - देखी जा सकती हैं. ज़ाहिर है कि मृदु कलियों से तात्पर्य अबोध बालाओं से भी है जो जैसी हवा बह रही है उसके अनुरूप नृत्य करने की मजबूरी भी है.

यदि सदाशिव कौशिक ने व्यंग्य और कटाक्ष की शैली अपनाई है तो श्याम खरे ने मुख्यतः सामाजिक विडम्बनाओं को उद्घाटित करने में अपनी प्रतिभा दिखाई है. यह सचमुच विडम्बना ही कही जाएगी कि कहने को तो सभी उसे मनुष्य कहते है, पर मनुष्य

होते हुए भी मनुष्य ने अपनी मनुष्यता खो दी है.-

मै मानव हूं /

हां, सभी जानते हैं /

मै ही भूला हूं

आज आदमी अपने को, अपनी असलियत को, अपनी पहचान को, (जो निस्संदेह उसकी अपनी इंसानियत है) छिपाने के लिए बाध्य हो गया है- ‘जीते है लोग/

मुखौटों के अन्दर /

गुमनाम से’. -यह कैसी विडम्बना है कि विज्ञापन और बाज़ार ने सारे मानवीय मूल्यों को तहस-नहस कर दिया है. न तो अब दरिद्र के लिए करुणा बची है, न ही नारी के लिए सम्मान शेष है-

अट्टालिकाएं /

चुराती है उजाला /

कुटियाओं का

 

नारी बिकती /

हर चौराहे पर /

विज्ञापन में.

आदमी की यह दशा देखकर वन-प्राणी तक शरमा जाते हैं क्योंकि अब तो मनुष्य स्वयं ही जंगली हो गया है. – मानव आया /

जंगली पशु भागे /

जंगल छोड़, - ये सारी की सारी विडम्बनाएं श्याम खरे को दुःखी करती हैं. –

स्पर्श मात्र ही /

कभी जगा देता है /

मौन कविता

 

मन का दुःख /

न देखा न सुना /

आंखों से बहा.

श्याम खरे समाज में बदलाव के आकांक्षी हैं. वे चाहते हैं सड़ी-गली रूढियां समाप्त हों और जिस तरह, - पीले पत्तों ने /

रिक्त किया वृक्ष को/

कोपल आएं, - उसी तरह क्रांति प्रज्ज्वलित हो क्योंकि – एक चिंगारी/

परास्त करती है /

तम का दम्भ.

व्यंग्य और कटाक्ष का जो तेवर हमें श्याम खरे के यहां मिलता है, वह राजेंद्र मोहन त्रिवेदी बंधु में भी अनुपस्थित नहीं है. (देखें ‘मन की बात’, राय बरेली) आज का मनुष्य, उनके अनुसार, बस अपने शिकार की ही तलाश में रहता है – ‘वेश बनाए /

जटाजूट रखाए/

ढूंढते शिकार,’ -क्या विडम्बना है कि जिन्हें स्वयं कल का पता नहीं ऐसे-ऐसे

भविष्य वक्ता /

बताते हैं भविष्य /

खुद अंजान

लोगों को अपनी सीमाओं का अंदाज़ नहीं है पर महत्वाकांक्षाएं बढती चली जाती हैं,

उंगलियों से /

आकाश को नापती /

आज की पीढी.

लगता है लोग सिर्फ हिंसा में ही विश्वास करने लगे हैं और ईश्वर को भी नहीं बक्शते,

यदि न होते /

देवता पत्थर के /

लोग पीटते.

सभी की पहचान मिटा दी गई है. कोई किसी का नहीं रहा – मेरा है कौन /

खो गई पहचान /

लगे मुखौटे. -आज हाल यह है कि अखबार तक सच से मुंह चुराते हैं,

कभी मशाल /

बनकर जले थे /

ये अखबार

आज हिंसा और अंधेरा परोस रहे हैं.

2, सद्विचार और दार्शनिकता – हिंदी हाइकु में जहां वर्तमान समाज की समीक्षा हुई है, सूर्य देव पाठक का स्वर (देखें, ‘वामन पग’, गोरखपुर) सद्विचारो का वाहक है. भारतीय मनीषा हमेशा से ही विचारशील रही है. यहां का दर्शन इतना आकर्षक है कि लोग उसकी बारीकियों में न जाकर उसके व्यावहारिक पक्ष को अपनी स्मृतियों में संजोए रखते हैं. गीता का निष्कामकर्म तो मानों भारत की मिट्टी में ही घुल-मिल गया है, और निष्काम-कर्म के बिना समत्व भाव असंभव है. इसी समत्व योग को जैन दर्शन ने स्वीकार किया है और गांधी की निष्ठा भी सर्व-धर्म समभाव में रही है. सूर्यदेव राम के उपासक हैं –

सुख-दुःख में /

समभाव रखे जो /

राम वहीं हैं.

भारतीय चिंतन अंधकार को मिटा कर प्रकाश का आह्वान करता है. प्रकाश के लिए बेशक आग ज़रूरी है लेकिन जब यही आग चिराग़ जलाती है तो वह जलाती नहीं, प्रकाश की वाहक होती है –

जले चिराग़ /

प्रकाश करे पर /

लगे न आग

 

निष्कम्प शिखा /

जलते दीपक की /

रश्मि बिखेरे

भारतीय चिंतन में ‘अर्थ’ कभी साध्य नहीं रहा. यह धर्म के अनुशासन में केवल साधन-पुरुषार्थ रहा है. पर धन-दौलत पूरी तरह बेकार भी नहीं है. ‘फूलों में कांटे /

व्यवसाय में घाटे /

तो क्या डर जाएं!’ लेकिन ध्यान में रखना ज़रूरी है कि, ‘धन-दौलत /

साधन है जीने का /

साध्य भिन्न है.’

सूर्यदेव पाठक के यहां इस प्रकार के दार्शनिक विचार भरे पड़े हैं. वे मूलतः सद्- विचारों के कवि हैं, वे प्रकृति के भी काफी निकट हैं और बसंत उन्हें कभी-कभी घायल करके चंचल और मदमस्त बना देता है. वे कहते हैं –

अमराई में /

कूक उठी कोयल /

मन घायल

 

मदमस्त/

मादक ऋतुपति /

मन घायल

 

मुखर हुआ /

पसरा सन्नाटा /

मन चंचल

 

कभी-कभी ही /

जीवन बगिया में /

आता बसंत

3,- बच्चों से जुड़ाव – रचनाकार का मन बाल-सुलभ होता है. स्वच्छंद और ग़ैर-दुनियादार. शायद यही बात है कि विश्व के लगभग सभी कवियों/

साहित्यकारों ने बच्चों पर कुछ न कुछ लिखा है. अंगरेज़ी कवि वर्डसवर्थ ने तो बच्चों को ‘मनुष्य का पिता’ तक कह दिया है. बाल मन का यह गुणगान तथा बच्चों के प्रति लगाव हाइकु कविताओं में भी देखने को मिलता है. हाइकु सृजन और सम्वाद की पत्रिका हाइकु-दर्पण ने अपने प्रवेशांक में ही यह घोषणा कर दी थी कि उसका अगला अंक वात्सल्य पर केंद्रित होगा. यह अंक 2002 में प्रकाशित हुआ. शायद इसी से प्रेरित होकर हाइकुकारों ने बच्चों से जुड़ी रचनाएं खूब लिखीं. वरिष्ठ रचनाकार रमाकांत श्रीवास्तव ने तो 110 हाइकु इसी विषय पर लिखकर ‘बाल श्री’ नाम से एक पुस्तिका ही प्रकाशित करवा डाली. इसी प्रकार एक अन्य प्रसिद्ध हाइकुकार सुधा गुप्ता ने भी अपने संकलन, ‘धूप से गपशप’ में अनेक बहतरीन बाल केंद्रित हाइकु दिए हैं.

रमाकांत जी ने तो आरम्भ ही इस आह्वान के साथ किया है कि

बच्चों से जुड़ो /

छोड़ो हैवानियत /

आदमी बनो

 

शैशव जहां /

बस देवता वहां /

स्नेह अर्घ्य दो

 

वे अच्छी तरह जानते हैं कि मासूम बच्चों में असीम सम्भावनाएं छिपी होती हैं, बस आवश्यकता है कि हम – ‘मार्क्स मेज़िनी /

लिंकन औ लेलिन /

खोजें बच्चों में’ लेकिन वस्तुस्थिति तो कुछ और ही है. हम बच्चों की तरफ से पूरी तरह उदासीन हो गए हैं, और उनके श्रम को एक सस्ते जिंस की तरह खरीदते हैं – ‘किस्मत फूटी /

बच्चे बने श्रमिक /

व्यवस्था अंधी’ – हमारी व्यवस्था अंधी ही नहीं नितांत जड़ हो गई है. बच्चों के प्रति जो संवेदनशीलता होनी चाहिए, वह पूरी तरह अनुपस्थित है - पंगु व्यवस्था /

बेचे जाते हैं बच्चे /

निर्ममता से.

रमाकांत जी की ही तरह डॉ. सुधा गुप्ता भी वात्सल्य से भरपूर हैं. दोनो ही वरिष्ठ हैं. रमाकांत जी जहां अपना संकलन अपने सुपौत्र और सुपौत्रियों को समर्पित करते हैं वहीं डॉ. सुधा गुप्ता दादी रूप में स्वयं गौरवान्वित अनुभव करती हैं,

फूलों का गुच्छा/

मेरी गोद में पड़ा/

बेटे की बेटी.

श्रीमती गुप्ता ने बच्चों की उजली आंखों में -‘आम बौर सी गंध’- पाई है. ठुमकता हुआ शिशु उन्हें -बतासा सा- मीठा लगता है और गोद में बैठी परियों की कहानी सुनती बेटी उनके लिए स्वयं परी बन जाती है. लेकिन अपने समाज के बच्चों के प्रति क्रूरता से उनका भी दिल भर आता है.

नन्हा सा फूल /

नियति की क्रूरता /

ईंटें ढो रहा

 

रोड़ी कूटे मां /

सोया लाल छांव में /

भीगे आंचल

4.प्रकृति चित्रण - यों तो लगभग सभी हाइकुकार प्रकृति चित्रण में रुचि लेते हैं, लेकिन जिस शिद्दत के साथ श्रीमती गुप्ता प्रकृति को अपनी रचनाओं में देखती, सुनती और गुनती हैं, वह अद्वितीय है. प्रकृति चित्रण सदाशिव कौशिक और सूर्यदेव पाठक में भी है, लेकिन सुधा गुप्ता ने इस आयाम को अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘धूप में गपशप’ में बड़े सहेज कर प्रस्तुत किया है. प्रकृति चित्रण तो उन्होंने किया ही है, पर इसके बहाने वे प्रायः अपने परिवार और समाज पर टिप्पणी करना भी नहीं भूलतीं. वे कभी प्रकृति का मानवीकरण करती हैं तो कभी मनुष्य के भावों को प्रकृति पर आरोपित करती हैं-

बैठी है प्यास /

पपड़ाए होठों पर /

धरना दिए

 

लड़ीं-झगड़ीं /

झमाझम रो रहीं /

हैं बदलियां

 

उगाई मैंने /

गुलाब की फसल /

हाथ घायल

प्रकृति वर्णन में चित्रात्मकता डॉ गुप्ता की पहचान बन गई है. स्वयं चित्रकार के नाते (उनके एक हाइकु संग्रह में रेखाचित्र भी अंकित हैं) वे शब्दों में भी चित्र उकेरती हैं.

शोख़ गौरैया /

मुंडेर पर धूप /

फुदक चढी

 

धानी दुपट्टा/

खेतों में लहरा के /

वर्षा ठुमकी

 

उछल-कूद /

चंचल हिरनौटा /

छोटा झरना

 

डॉ. गुप्ता का एक प्रसिद्ध हाइकु देखें

-चिड़िया रानी/

चार कनी बाजरा/

दो घूंट पानी.

-कितने ही भाव इस हाइकु में झलकते हैं. इसमें जहां चिड़िया की छोटी ज़रूरतें उसे तृप्त करती हैं वहीं वे उसे जीने का हक़ भी देती हैं. इसमें परोक्षतः मनुष्य की क्रूरता भी झलकती है जो चार कनी बाजरा खानेवाली चिड़िया को अपना भोजन बना लेता है. बेशक यह बात इतने विस्तार से नहीं कही गई है, लेकिन सोचने की बात है कि जो कहा गया है क्यों कहा गया है! यह एक ऐसा हाइकु है जो हमें एक साथ ही कई परम्परागत बाल-खेल के गीतों की याद दिलाता है. तभी संकलन में इसे पूरे एक पृष्ठ-भर स्पेस मिली तो आश्चर्य नहीं हुआ.

डॉ. सुधा गुप्ता ने प्रकृति के कई रूपों से तादात्म्य किया है. उनके यहां क्रुद्ध प्रकृति जहां एक ओर बिजलियों का कोड़ा सटकाती है और घायल नभ सहमकर कांपने लगता है, बेमौसम बरस कर लुटेरे मेघ बौर उड़ा ले जाते हैं, माघ डाकिया चौक में आंसू भीगी चिट्ठियां डाल जाता है, गरमियों में निढाल दोपहरी पेड़ों तले हांपती है, वहीं दूसरी ओर प्रेम की झील में समर्पण के फूल खिलते हैं. रंग-बिरंगे मेघ बांधनी साड़ी लपेटते हैं. मेघ-खंडों से मिलकर फाख्ता अलोप हो जाती है. मौल्सिरी के पेड़ पर धूप शैतान बच्ची सी चढती है और नन्हा बिरवा हरे पंख लगाए तन कर खड़ा हो जाता है

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक 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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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रचनाकार: हिंदी में हाइकु – हाइकु 2002 / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा
हिंदी में हाइकु – हाइकु 2002 / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा
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