प्राची अप्रैल 2016 : व्यंग्य / मेरी हजामत / अन्नपूर्णानन्द

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व्यंग्य मेरी हजामत अन्नपूर्णानन्द आ पने सुना होगा कि कुछ लोग भाड़ झोंकने दिल्ली जाते हैं, कोयला ढोने कलकत्ता जाते हैं और बीड़ी बेचने बम्ब...

व्यंग्य

मेरी हजामत

अन्नपूर्णानन्द

पने सुना होगा कि कुछ लोग भाड़ झोंकने दिल्ली जाते हैं, कोयला ढोने कलकत्ता जाते हैं और बीड़ी बेचने बम्बई जाते हैं. मैं अपनी हजामत बनवाने लखनऊ गया था.

लखनऊ पहले सिर्फ अवध की राजधानी थी, अब महात्मा बटलर की कृपा से सारे संयुक्त प्रान्त की राजधानी है. कई सुविधाओं का खयाल करते हुए यह मानना पड़ता है कि राजधानी होने के योग्य यह है भी. पहले तो रेवड़ियां अच्छी मिलती हैं, जो आसानी से जेब में भरकर कौंसिल चेम्बर में खायी जा सकती हैं; दूसरे नवाबजादियों का भाव सस्ता है जो बाहर से आये हुए कौंसिल के मेम्बरों का गृहस्थाश्रम बनाये रखने में मदद पहुंचाती हैं; तीसरे पार्कों की बहुतायत है जिनमें कौंसिल की ताती-ताती स्पीचों के बाद माथा ठंडा करने की जगह मिल जाती है. तब भला बताइये कि इन सुभीतों के आगे इलाहाबाद को कौन पूछेगा? वहां सिवाय अक्षयवट के धरा ही क्या है? गवर्नमेंट की यह शर्त थी कि यदि अक्षयवट का नाम बदलकर बटलर-वट रख दिया जाए, तो इलाहाबाद को तलाक न दिया जाए; पर हिन्दुओं की धर्मान्धता के कारण ऐसा नहीं हो सका. हैली साहब के आने पर इलाहाबादियों ने उनके पास भी अपनी दुःख-गाथा पहुंचायी, पर उन्होंने कहा कि

अधिक-से-अधिक मैं यही वादा कर सकता हूं कि साल में एक बार इलाहाबाद आकर त्रिवेणी-संगम पर सिर मुंड़वा जाऊं. खैर, जाने दीजिये, अपने राम को क्या, एक

राजधानी से मतलब, चाहे कहीं भी हो. इन्हीं सब झगड़ों से अलग रहने के लिए मैं बाबा विश्वनाथ की राजधानी काशी में रहता हूं. मैं तो इलाहाबाद का नाम भी न लेता, पर क्या करूं, उसका रंडापा देखकर दया आ ही जाती है.

सच बात यह है कि लखनऊ मेरे ऊपर फिदा है और न मैं लखनऊ पर. जब से सिर गंजा होने लगा, तब से मैंने फिदा होने की आदत ही छोड़ दी. लखनऊ मैं कई बार गया हूं. नगर ऐसा कोई बुरा नहीं है. सड़कें बहुत चौड़ी हैं, जिन पर मोटरों को लड़ने में कोई बाधा नहीं पहुंचती. हिंदू होटल कई हैं, जहां हिंदू लोग कुशासन पर बैठकर हिंदू बिस्कुट और हिंदू कलिया खाते हैं. स्कूल और कॉलेजों की भरभार है, जहां देश के नवयुवक दिन-दहाड़े अपना भविष्य सुधारते हैं. तांगो और इक्के बेशुमार हैं, जिन्हें अधिकतर नवाबजादे ही हांकते हैं. भांड़ों की पैदावर यहां अच्छी हो जाती है. ‘जनानी दुकानें’ हर गली-कूचे में दिन-रात खुली रहती हैं, जहां प्रमेह का विनिमय बड़े धड़ल्ले से होता रहता है. शादी-विवाह के अवसर पर यहां के निवासी कचालू और ककड़ी का भोज देते हैं. अण्डा यहां की साग-भाजी है, जिसे उबालने के लिए हरिद्वार से गंगाजल मंगाया जाता है. सुना है कि यहां सीधी टोपी देखकर सड़क पर निकलना मना है. मकड़ी के जाले की पोशाक यहां के शौकीन अधिक पसंद करते हैं. पर्दे की रस्म सबको बहुत प्रिय है, यहां तक कि हवाई जहाज अगर शहर के ऊपर से उड़कर जाता है, तो उड़ानेवाले को आंख पर पट्टी बांध लेनी होती है.

नजाकत की तो यहां हद हो गयी है. रोज ही अखबारों में खबर आती है कि अमुक बाग में रात के समय कोई कली चटकी, जिसका परिणाम यह हुआ कि आसपास की औरतों के कानों की झिल्लियां फट गयीं. जब ऐसी घटनाएं अकसर होने लगीं, तो सरकार को लाचार होकर यह घोषणा करानी पड़ी कि शहर के भीतर रात में कोई ‘गुल’ न खिला करे.

एक बार मेरे एक मित्र रेल से सफर कर रहे थे. उनके बगल में एक मुसलमान सज्जन भी बैठे हुए थे जो लखनऊ के रहनेवाले थे-और इसीलिए अवश्य ही कोई नवाब रहे होंगे. लखनऊ स्टेशन पर दोनों आदमियों ने ककड़ियां खरीदीं. मुसलमान सज्जन ने नफासत से ककड़ियों को छीलकर छोटे-छोटे टुकड़े किये और फिर एक-एक टुकड़े को सूंघकर बाहर फेंकने लगे. मित्र से न देखा गया. उन्होंने पूछा कि आप इन्हें खाते क्यों नहीं, सूंघ-सूंघ कर बाहर क्यों फेंक रहे हैं? उन्होंने उत्तर दिया कि ककड़ियों के खाने में कोई मजा नहीं, उनकी खुशबू ही असल चीज है. इसके बाद मेरे मित्र ने भी मुसलमान सज्जन का अनुकरण किया. अन्तर इतना था कि वे खिड़की के रास्ते बाहर फेंक रह थे और मेरे मित्र मुंह के रास्ते अंन्दर.

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए कि लखनऊ के दो दलों में एक अच्छी भिड़न्त हो गयी. दोनों भाइयों ने प्रेम से एक-दूसरे का फस्त खोल दिया, आपस में कुछ पटा-बनेठी का अभ्यास कर लिया गया और कंकड़ों के कुमकुमे भी छोड़े गये. मेरे एक मित्र को ठीक इसी अवसर पर किसी बड़े जरूरी काम का स्मरण हो आया और वे घर की रक्षा अपनी स्त्री पर छोड़कर डाकगाड़ी से हांफते हुए बनारस चले आये. मैंने उनसे कुल ब्यौरा पूछना चाहा, पर दंगे को उन्होंने अपनी खिड़की की चिक में से देखा था, इसलिए ठीक हाल न बता सके. तब मैंने लखनऊ-स्थित निज सवांददाता को लिखा जो वहां के एक गण्यमान्य सज्जन हैं और अखिल भारतवर्षीय अहिफेलन-मण्डल के संस्थापक भी हैं. उन्होंने तार द्वारा मुझे सूचित किया कि अखबार वाले झगड़े की तह तक नहीं पहुंच पाये हैं. वास्तविक कारण झगड़े का यह था कि नित्य शाम को कुछ लोग गोमती के किनारे जाया करते थे और आटे की रामनामी गोलियां मछलियों को खिलाते थे. मुसलमानों ने कहा कि ऐसा करना अप्रत्यक्ष रूप से मुसलमानों को हिंदू बनाने का प्रयत्न करना है; क्योंकि मछलियां रामनामी गोलियां खाएंगी और फिर उन मछलियों को मुसलमान भी खायेंगे और इसी तरह धीरे-धीरे उनमें राम-नाम का प्रचार बढ़ेगा. बिलकुल ठीक है. इस संबंध में मुसलमानों की दूरदर्शिता सराहनीय है. लोग उड़ती चिड़िया पहचानते हैं, ये तैरती मछली पहचान गये. हिंदू सदा के घोंघा हैं, सबसे हारे तो मछलियों द्वारा शुद्घि का पैगाम भेजने चले.

करीब तीन सौ वर्ष हुए, बेनी नाम के प्रसिद्घ कवि घुड़दौड़ देखने लखनऊ गये थे. उस समय वहां म्युनिसिपैलिटी का इंतजाम अच्छा नहीं था. उन्होंने एक शिकायत म्युनिसिपैलिटी की उस समय के समाचारपत्रों में छपवायी, जो इस प्रकार है-

गड़ि जात बाजी और गयन्दगन अड़ि जात

सुतुर अकड़ि जात मुसकिल गऊक.

दामन उठाय पांय धोखे से धरत, होत

आप गरकाप रहि जात पाग मऊ की.

बेनि कवि कहें देखि थरथर कांपै गात

रथन के पथ ना विपद बरदऊकी.

बार-बार कहत पुकार करतार तो सों

मीच है कबूल पै न कीच लखनऊ की.

अब लखनऊ की सड़कों की यह दशा नहीं रही. जब से लखनऊ यूनिवर्सिटी बन गयी है, तब से सड़कों पर धूल रहने ही नहीं पाती, कीचड़ होगा कहां से? हर साल सैकड़ों वकील और ग्रेजुएट पास होते हैं, जो आरंभ में ख्वाहमख्वाह थोड़े दिनों तक धूल फांकते हैं. इसी से अपने-आप सड़कें साफ होती रहती हैं, म्यूनिसिपैलिटी को विशेष परिश्रम नहीं करना पड़ता. वर्तमान नगर तो वास्तव में अतीव सुंदर है, और जब से प्रांतीय सरकार का अखाड़ा यहां आ गया है, तब से तो सोने में सुगंध आ गयी है.

इधर मुझे एक विशेष काम से लखनऊ जाना पड़ा. वहां मेरा एक बड़ा आवश्यक काम अटका हुआ है. मैंने मन्नत मानी है कि यदि मेरा काम हो गया तो देश-भर के पण्डों को एक-एक लंगोट उपहार स्वरूप भेंट करूंगा. भाग्य ने यदि इस बार मेरे साथ आंख-मिचौनी न खेली तो शायद काम हो भी जाए. यों तो भाग्य से मेरी पैदायशी दुश्मनी है, मैं उसे छछूंदर की तरह महकता हूं. महात्मा गांधी ने अछूतोद्घार के लिए इतना प्रयत्न किया, पर भाग्य ने मुझे अभी तक अछूत ही समझ रखा है. मुझे ‘शॉक’ इस बात का रहता है कि किस्मत मुझे देखकर न जाने क्यों धूंधट काढ़ लेती है, मैं यद्यपि न तो उसका ससुर हैं, न जेठ. यह नहीं होता कि घूंघट के भीतर ही से कभी-कभी मुसकरा दिया करे, खैर.

आप जानते होंगे कि पारसाल अवध में एक बहुत बड़े तालुकेदार राजा गावदीसिंह का लखनऊ में ‘काशीवास’ हो गया. राजा साहब मरे थे लखनऊ में, पर देश के कई दिग्गज पंडितों ने यह व्यवस्था दी कि चूंकि मरते समय उनके मुख से ‘काशी’ शब्द निकला था, इसलिए उनके मरने को साधारण मरना न कहकर ‘काशीवास’ ही कहना उचित है. पता लगाने पर मालूम हुआ कि राजा साहब ने मरते समय अपनी अंतिम सांस बटोरकर काशी नामक अपने पुराने खिदमतगार को पुकारा था-‘अरे कशिया, उल्लू का पट्टा.’

खैर, राजा साहब को लेने के लिए जो यमदूत उस समय आये थे, वे कुछ ऐसे उजड्ड थे कि उन्होंने राजा साहब को फुरसत के साथ मरने का मौका नहीं दिया. इतनी जल्दी मचायी कि वे अपनी स्टेट का कोई उचित प्रबंध भी न कर सके और चल बसे. लड़का नाबालिग था और जमींदारी के जरूरी कामों में सिर्फ गाली बकना अभी तक सीख पाया था. ऐसी अवस्था में यह आवश्यक हो गया कि स्टेट के सुप्रबंध के लिए एक अच्छा मैनेजर नियुक्त किया जाए. फलतः कमिश्नर साहब की आज्ञा से, कलेक्टर साहब की मर्जी से, जण्ट साहब की सलाह से, डिप्टी साहब की राय से और बैरिस्टर साहब की मदद से एक विज्ञापन का मसविदा तैयार कराया गया कि अमुक स्टेट के लिए एक मैनेजर की आवश्यकता है. विज्ञापन अखबारों में छाप दिया गया. सिर्फ ऐसे लोगों की अर्जियां मांगी थीं, जिन्हें नाच-मुजरे का शौक हो और छठे-छमासे इलाकों के काम को देख लेने की फुरसत. विज्ञापन पढ़ते ही मैंने निश्चय कर लिया कि यही मौका है अपने कर्म की रेख पर मेख मारने का. मैं इस स्थान के लिए सर्वथा उपयुक्त हूं, मेरे अस्तित्व में यदि यह स्थान रिक्त रहे तो उस स्टेट का दुर्भाग्य.

विज्ञापन में फुरसत की आवश्यकता बतायी गयी थी. भला फुरसत की कौन-सी कभी मुझे है! मेरे पास फुरसत के सिवा और है ही क्या? मेरी पढ़ायी-लिखायी भी निहायत फुरसत के साथ हुई थी और जब से कॉलेज छोड़ा है, तब से फुरसत के अथाह समुद्र में गोते लगा रहा हूं. यों कहिये कि इस समय फुरसत ही मेरी चौहद्दी है.

रहा नाच-गुजरे का शौक. कुछ तो यह है भी, बाकी राज-काज के सिलसिले में हो ही जायेगा. मेरा यह सदा से विश्वास है कि नाच-मुजरा कोई बुरी चीज नहीं हैं. रईसों के धन के लिए यह एक बहुत जरूरी जुलाब है. कोषबद्घ भी कोष्टबद्घ की तरह एक भयानक रोग है. आखिर इतने रईस जो नाच-मुजरे से प्रेम रखते हैं, वे सब-के-सब क्या जहन्नुम की सड़क पीट रहे हैं? देश के प्रायः सभी बड़े-बूढ़े सेठ-साहूकार, राजे-महराजे और संत-मंहत जिस प्रथा को अभिनन्दनीय समझें, उसकी तरफ हम-आप कौन होते हैं कि अंगुली उठाएं? एक मठाधीश ने मुझसे कहा कि यदि मंगलामुखी का नाच न हो, तो कृष्णाष्टमी के दिन ठाकुरजी का जन्म कैसे हो? ठीक ही है, नवजात ठाकुरजी के कर्कश ‘केहांव, केहांव’ को कर्ण-मधुर बनाने के लिए आवश्यक है कि उसके साथ दो-चार कोकिल-कंठ वालियों की गिरकिरी का पुट दे दिया जाए.

पहले तो नाच-मुजरा किसी हालत से पाप नहीं कहा जा सकता और यदि पाप है भी, तो क्या हम हिंदू ऐसे डरपोक हैं कि पाप के डर से परपंरा की प्रथा छोड़ देंगे? परमात्मा भी कितना अन्यायी है! मुसलमानों के लिए मरने के बाद भी हूरों का प्रबंध है; पर हम हिंदू जीते-जी जो कुछ कर लें वही बहुत है. उस पर कुछ अप्सराएं हैं जरूर, पर देवताओं ने पहले ही से उन्हें अपने हत्थे चढ़ा रखा है.

सबसे बड़ी बात इस संबंध में सोचने की यह है कि जिन बेचारियों ने नाचना-गाना सीख लिया है, वे अब कंठी लेकर कहां जाएं? काबुल जाकर सुर्खी कूटें-या लंका जाकर रावण के वंशजों का पता लगाएं-या बंगाल की खाड़ी में डुबकी मारें-या गले में रस्सी बांधकर झूला झूलें-या क्या करें? आप इनको लेकर अपने घर बसाने पर राजी हों तो ये आज आप के साथ पानी में मिसरी की तरह धुल-मिल जाएं. आखिर इनके शरीर में भी तो वही पेट-रूपी ‘भूतों की हवेली’ बनी हुई है! आपके फरहरी उपदेश से तो वह भरेगा नहीं. उसके लिए कोई प्रबंध कीजिये. जैसे लाखों रुपये देवालय, चिकित्सालय, विद्यालय और अनाथालय बनवाने में लगाते हैं, वैसे ही दस-पांच लाख पतुलियालय बनवाने में खर्च कर डालिये. ईश्वर ने अगर मुझे धन दिया तो मैं अवश्य एक ‘पतुरियालय’ खोलकर समाज-सेवा करूंगा. उसका पता मैं प्रकाशित कर दूंगा.

हां, तो इस विज्ञापन को देखकर कितने फुरसत के सताये हुए नवयुवकों के मुंह में लार के चश्मे फूट पड़े. नियुक्ति न जाने कैसे लखनऊ के कमिश्नर साहब के हाथ में थी. विज्ञापन निकलने के कुछ ही घंटों बाद से कमिश्नर साहब के ऊपर अर्जियों के ओले बरसने लगे. मैंने भी झट से बारह पेज की अर्जी लिखकर बैरंग रवाना कर दी.

अर्जी भेज देने के बाद हृदय में इस बात की खलबली पड़ी कि देखें कोई उत्तर आता है या नहीं. चार-पांच दिन तक तो मारे चिंता के नींद नहीं आयी, मुश्किल से दो घंटे दिन में और सात घंटे रात में सो सका. जब कभी डाकिये को देख पाता तो उसके गले से लिपटकर पूछता कि ‘प्यारे! कोई मेरी भी चिट्ठी है?’ देर होते देखकर मुझे यह भी चिंता हुई कि कहीं कमिश्नर साहब को लंगड़े बुखार ने तो नहीं धर दबाया. एक बार इरादा हुआ कि उनको लिखें कि आशा करता हूं, आप सपरिवार कुशल से होंगे; पर इसी बीच में उनका एक खत आ ही गया. इस पत्र को मैंने बड़े यत्न से रख छोड़ा है. यदि काम हो गया तो ठीक ही है, नहीं दिखाने के लिए रहेगा कि मुझे ऐसी अच्छी जगह मिल रही थी पर मैंने ली नहीं.

अब मैं इस उधेड़-बुन में लगा कि राह-खर्च के वास्ते कुछ रोकड़ा जुटाना चाहिए. जब से रुपयों ने मेरी जेब में हड़ताल डाल दी, तब से मैं अपने पास छदाम रखना भी हराम समझता हूं; और जरूरत तो क्या है? पान-पत्ता दोस्तों के यहां, नाश्ता-पानी ससुराल में और भोजन सन्नों में कर लेता हूं. यदि आपने पुराणों के पन्ने उलटे होंगे तो अवश्य जानते होंगे कि मेरी जेब की ऐसी सोचनीय दशा क्यों, कैसे और कब से हुई. भगवान् ने वामन-रूप धारण करके दानवराज बलि से तीन पग भूमि मांगी. बलि ने बिना वकीलों की राय लिये उन्हें तीन पग भूमि संकल्प कर दी. परिणाम यह हुआ कि दो ही पग में वामन भगवान् ने स्वर्ग और मर्त्यलोक नाप डाला; तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान ही नहीं बचा. जब बलि ने देखा कि किसी प्रकार छुटकारा नहीं है, तब चुपके से उन्होंने मेरी जेब की ओर इशारा कर दिया और वामन भगवान् तीसरे पग से उसे नापकर चलते हुए.

बहुत दिनों के बाद यह एक ऐसी परिस्थिति आ पड़ी थी, जो बिना कुछ रुपयों के हल होती नहीं दीख पड़ती थी. बहुत सोच-विचार के बाद मैंने कुछ कर्ज लेने का निश्चय किया. अर्थशास्त्र का कई मन्वन्तर लगातार अध्ययन करके मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि कर्ज लेना सभ्य समाज की अनुकरणीय सुव्यवस्थाओं में है. खाना-पीना, सोना और कर्ज लेना शरीर के धर्म हैं. जब इतनी बड़ी गवर्नमेंट कर्ज लेती है तो हम-आप उसकी प्रजा होकर क्यों न लें? यूरोप में लोग ऋण के बल पर महासमर छेड़ देते हैं. मैं अपने देश में ऋण के बल पर सफर भी न करूं.

पर कहीं कर्ज मिले तब तो! कितने ही दोस्त और साथियों के दरवाजे खटखटाये, पर सब व्यर्थ. किसी का कोई मर गया था, किसी का कोई मरनेवाला था, किसी के सेफ की ताली खो गयी थी और कोई बड़े लाट की जमानत मांगता था. एक मित्र ने कहा कि रुपये तुम्हें जरूर देता, पर कल ही मेरी बिरादरी की पंचायत हुई जिसमें यह तय पाया कि अगर कोई किसी को उधार देगा तो जाति से बाहर कर दिया जायेगा. क्या ऐन वक्त से पंचायत हुई थी.

कहा जाता है कि आवश्यकता आविष्कारों की जननी है. जब मैंने देखा कि ऋण उधार पाने की कोई आशा नहीं है तब एक उपाय सोच निकाला जो अंत में अचूक साबित हुआ. रात में स्त्री को सोती हुई पाकर उसके एक हाथ का पेंचदार कड़ा उतार लाया. पुराने जमाने में राजा नल ने इस तरकीब की रजिस्ट्री कराई थी-दमयन्ती को सोई हुई पाकर उसकी आधी साड़ी फाड़कर चंपत हो गये थे.

कड़े को बंधक रखकर मैंने कुछ रुपये खड़े कर लिये और झट टिकट कटाकर रेल पर सवार हो गया. रास्ते में कोई भी उल्लेखनीय घटना नहीं हुई, यहां तक कि एक बार भी मेरी गाड़ी ने किसी दूसरी गाड़ी से टक्कर नहीं ली. हां, एक बात मैंने बड़ी विचित्र देखी, वह यह कि जब गाड़ी जोर से चलती थी तो ऐसा जान पड़ता था कि आस-पास के मकान और पेड़ भी एक ओर दौड़ते जा रहे हैं. इसका कारण मैंने प्रमुख विज्ञानवेत्ता प्रो. रामदास गौड़ से पूछा. उन्होंने उत्तर दिया कि आपका प्रश्न टेढ़ा है. मैं स्वयं भी इस विषय पर बहुत दिनों से गौर कर रहा हूं. इसका उत्तर पाने के लिए आपको वैज्ञानिक अद्वैतवाद का सहारा लेना पड़ेगा. सुनिए-

जिस प्रकार माया-ब्रह्म के संश्लेष-जन्म अन्योन्याश्रय की अनावच्छित्र शक्यता के संबद्घघर्ष और समवायीकरण से हेतु-हेतु-मद्भूतत्व का आविर्भाव होकर, विधेय-प्राधान्य और अनुभवगम्य द्वंद्व-रूपता तथा उपबृंहण विकल्पाभासों में अस्मद्यु-मद् का भ्रम होता है, ठीक उसी प्रकार रेल की सवारी में आस-पास की स्थावर चीजें जंगम प्रतीत होती हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उत्तर ने मेरे मस्तिष्क के लिए ब्राह्मीघृत का काम किया.

तीसरे पहर रेल ने मुझे लखनऊ स्टेशन पर उतार दिया. कुली और तांगेवालों की छाती पर मूंग दलता हुआ मैं पैदल ही, गठरी बगल में दबाकर, वहां से चलता हुआ. मैं आजकल के छड़ी के सहारे चलनेवाले नौजवानों-सा नहीं हूं कि एक छोटी-सी गठरी ले चलने में कमर की तौलियां खिसक जातीं. मैं अब यह सोच रहा था कि ठहरूं कहां? शहर में किसी से भी परिचित नहीं था. होटल में ठहरता तो टोटल कहां से चुकाता, इतने रुपये पास थे नहीं. कुछ निश्चय नहीं कर पाया. घूमते-घूमते संध्या हो गयी और थोड़ी देर में समस्त नगर बिजली की रोशनी से ‘चमकायमान’ हो उठा. कुछ भूख-मिश्रित नींद भी मालूम पड़ने लगी; पेट को कुछ दे-दिलाकर शांत किया और एक निर्जन सड़क के किनारे पड़कर ‘जहैं पड़े मुसल, तहैं छेम कुसल’ को चरितार्थ करने लगा.

सुबह मेरी नींद खुली तो देखा कि छह बजा है. कमिश्नर साहब से मुझे नौ बजे मिलना था. मैंने सोचा कि अभी समय काफी है, दाढ़ी बनवा लूं; क्योंकि अफसर-गण ऐसे लोगों से नहीं मिलना चाहते जो अपने मुंह पर कांटों की खेती करते हैं. मुझे दाढ़ी बनवाने का खयाल भी न आता, पर एक मक्खी ने बार-बार मेरे चेहरे पर बैठकर मुझे याद दिलायी. उसे मारने के लिए झुंझलाकर ज्यों ही मैंने अपने मुंह पर एक तमाचा लगाया, त्यों ही ऐसा जान पड़ा कि हथेली में कांटे चुभ गए, दाढ़ी इस कदर बढ़ आयी थी. जब खुद अपने हाथों को इतनी तकलीफ हुई तब अगर किसी वजह से कमिश्नर साहब एक चपत मार बैठे तो उनकी कोमल हथेलियां छिदकर छलनी हो जाएंगी. यह खयाल एक राजभक्त को व्यग्र कर देने के लिए काफी था. मैंने तत्क्षण निश्चय किया कि दाढ़ी साफ कराकर ही साहब से मिलूंगा.

लखनऊ में गली-गली नाई हैं. मैं एक ऐसी दुकान में पिल पड़ा और नाई की प्रतीक्षा करने लगा जो संभवतः थोड़ी देर के लिए किसी काम से बाहर गया था. कमरे में एक शुभ्र वस्त्रधारी सज्जन भी बैठे थे जो शायद मेरी ही तरह दुकान के मालिक की प्रतीक्षा कर रहे थे. जब मुझे करीब आधा घंटा इंतजार करते हो गया और नाई के दर्शन न हुए, तो मैंने घबराकर इन्हीं सज्जन से पूछा कि आप बता सकते हैं कि इस दुकान का मालिक कहां मर गया है? आधा घंटे से उसके इंतजार में बैठा हूं, पर उस कमबख्त का पता नहीं है. उस शुभ्र वस्त्रधारी सज्जन ने इसका जो उत्तर दिया उससे मैं बड़ा लज्जित हुआ. उन्होंने कहा-महाशय! मैं ही इस दुकान का मालिक हूं और आपकी दाढ़ी बनाऊंगा तो मैं ही बनाऊंगा. आपने आते ही अपना अभिप्राय तो बताया नहीं, चुपके से बैठ रहे, मैंने जाना कि आप रास्ते की थकावट दूर कर रहे हैं, अब आपकी दाढ़ी उसी हालत में बन सकती है जब आप उन बेजा अलफाज को वापस लें, जिन्हें आपने अभी मेरी शान में कह डाले हैं.

सुभान तेरी कुदरत! भला मैं ख्वाब देख रहा था कि ऐसे सुन्दर वस्त्रों से आच्छादित, कुर्सी पर आसीन, देखने में मुअज्जिज जेन्टलमैन पेशे से इज्जाम हैं. हमारी काशी में हज्जाम हैं, पर वे बेचारे तो कांख में किसबत और हाथ में लुटिया लिये घूमते रहते हैं. मैंने अपनी गलती के लिए उनसे केवल क्षमा ही नहीं मांगी बल्कि यह भी वायदा किया कि अब किसी शुभ्र वस्त्रधारी को देखूंगा तो पहले उन्हें हज्जाम समझकर तब दूसरा कुछ समझूंगा.

इसके बाद नापितवर ने प्रसन्न होकर कहा-‘‘यहां आइए.’’

मैं उनके पास गया.

कुर्सी की ओर इशारा करके-‘‘बैठ जाइए.’’

मैं कुर्सी पर बैठ गया.

‘‘सिर उठाइए.’’

मैंने सिर उठाया.

‘‘आंखें बंद कीजिए.’’

मैंने आंखें बंद कीं.

‘‘ईश्वर का ध्यान कीजिए.’’

मैंने ईश्वर का ध्यान किया.

‘‘परमात्मा से अपने गुनाहों की माफी मांग लीजिए.’’

मैंने ऐसा ही किया, गो अपने गुनाहों की फेहरिस्त मैं मकान ही पर भूल आया था. यह सब किया तो, पर समझ में न आया कि क्यों. ईश्वर का ध्यान करना और अपने गुनाहों की माफी मांगना बहुत अच्छे काम हैं, लेकिन मौके से. दाढ़ी बनवाने के पूर्व इन कार्रवाइयों का क्या मौका था-यह मेरी समझ में नहीं समाया. आखिर मैंने दबी जबान पूछा कि आपने यह जो धार्मिक कवायद मुझसे करायी, उसका क्या अर्थ है? उत्तर मिला-‘‘दाढ़ी बनवाना आग से खेलना है; मेरा तेज उस्तरा बराबर आपके चेहरे पर नाचता रहेगा; कहीं बहककर आपके गले में लग गया तो निश्चय जानिए कि आपका काम तमाम हो जाएगा. इसलिए आपकी आत्मा को हर तरह से तैयार रहना चाहिए कि कौन जाने संसार से कूच करना ही पड़े.’’

नाहक पूछने गया. अनजाने जो कुछ हो जाता वह तो सहन करना ही पड़ता. पूछकर मुफ्त में जड़ैया-बुखार मोल लेने गया. घरवालों और घरवाली की सुध से आंखें डबडबा उठीं. सोचने लगा कि देखूं, अब इन आंखों से काशी के ‘बन बाग-तड़ाग’ निहारता हूं या नहीं.

नापिता-कुल-कमल-दिवाकर ने छप-छप ध्वनि के साथ दो चुल्लू पानी से मेरे मुख पर तर्पण किया. इसका अर्थ मैंने यह लगाया कि अब मेरी दाढ़ी भिगोयी जा रही है. इसके बाद उन्होंने एक छोटा-सा झाड़ और एक बट्टी साबुन कहीं से बरामद किया. हिन्दी व्याकरण के जाननेवाले छोटे से झाड़ू को झड़ुआइन कहेंगे-जैसे साढ़ू, सढ़ुआइन-पर अंग्रेजी जाननेवाले उसी के नाम से पुकारेंगे. खैर, साबुन और शेविंग ब्रुश के संयुक्त उद्योग से मेरा मुंह थोड़ी देर में क्षीरसागर का मानचित्र बन गया. नापितवर ने कृपा करके थोड़ा साबुन मेरी आंखों में भी चले जाने दिया, जिससे मुझे दिव्य दृष्टि का आनन्द मिलने लगा.

यह सब तो हो रहा था, पर बीच-बीच में नापितवर बड़ी कुरुचिपूर्ण निगाहों से मेरी ओर देखते जाते थे. उन्होंने ऐसा कहा तो नहीं, पर अन्य तरीकों से यह भाव प्रकट कर दिया कि मेरे मुख की बनावट उनको बिलकुल नापसन्द थी. मुझे स्वयं भी अपने मुख की बनावट के दुरुस्त होने में सन्देह है; पर अब तो चाहे भला है या बुरा, है तो अपना मुंह.

नापितवर ने अब उस्तरे का प्रयोग आरम्भ किया. उस्तरे की सूरत से यह साफ जाहिर होता था कि कभी उसने किसी आरी से आशनाई कर ली थी. उसे देखकर मेरे शरीर में भूकम्प-सा आने लगा. यदि थोड़ी देर के लिए मेरा मुख चन्द्रमा मान लिया जाए तो यह कहा जा सकता है कि यह उस्तरा राहु बनकर मेरे मुखचन्द्र को ग्रसने आ रहा था.

नापितवर ने पूछा-‘कहिये, क्या साफ करूं और क्या छोड़ दूं?’

मैंने अत्यन्त नम्रता के साथ उत्तर दिया कि दाढ़ी तो साफ ही कर दीजिये, भौं और बरौनी यदि कोई अड़चन न डालें तो उन्हें छोड़ दीजिये. और मूंछों के बारे में जैसी आपकी राय हो वैसा ही करिये.

इसके बाद जो कुछ हुआ उसका ब्यौरेवार वर्णन मैं नहीं कर सकता. अपनी जान की पड़ी थी, ब्यौरा कहां मैं नोट करता. इतना याद है कि उस्तरे ने वह-वह पैंतरे दिखलाये कि मैं काठ बन गया. चेहरे पर खर-खर-खरर-खरर-खर-खर-खर का संगीत हो रहा थाा और मैं अपने सी-सी-उफ-सी-सी-उफ से ठेक भर रहा था. जब कभी इससे छुट्टी मिलती तो हनुमान चालीसा का पाठ करने लगता.

इतना मुझे अच्छी तरह याद है कि नापितवार को जब-जब मेरा मुंह दाहिने-बाएं घुमाना होता था, तो मेरी नाक पकड़कर घुमा देते थे. यद्यपि उनका ऐसा करना प्रकृति के नियमों के विरुद्घ नहीं था, क्योंकि मुंह का यह स्वाभाविक धर्म है कि जिधर-जिधर नाक जाए, उधर-उधर वह भी जाए; पर इस प्रकार की धर-पकड़ से मेरी नाक चुटैली हो चली और मैंने नापितवर से कहा-‘‘आपको मेरा मुंह दाहिने-बाएं घुमाना हो तो या तो आप मुझसे कह दिया करिये, मैं स्वयं अपना मुंह घुमा लिया करूंगा, नहीं तो मेरे दोनों कान हाजिर हैं जिनको बचपन से पकड़े जाने की आदत है. नाक के बजाय इनको पकड़कर दाहिने-बाएं जैसे चाहिए, घुमा लीजिये, पर मेरी इकलौती नाक से यदि आप मुंह घुमाने का काम न लें तो मैं आपका बड़ा एहसान मानूं.’’

मुझे अपनी नाक ही की पड़ी थी, पर यहीं तो उस्तरे के दुर्दांन्त प्रलयचक्र से मेरी मौखिक आकृति का सर्वांशतः संहार होता दिखायी पड़ता था, और उसके रोकने का कोई उपाय भी न था. यदि नापितवर ने अपना काम अधूरे पर ही छोड़ दिया होता तो मैं उन्हें हार्दिक धन्यवाद देता और अपने बचे-खुचे मुख से ही अपनी जिंदगी काट लेता, पर इतने सस्ते छूटना भाग्य में नहीं लिखा था. उस्तरे की लपलपाती जिह्वा सारे मुख को चाटती चली जा रही थी. देखते-देखते मुंह का एक परत चमड़ा छील डाला गया. एक बार प्राणभिक्षा मांगने के लिए मैंने मुंह खोलना चाहा, पर उस्तरे ने मुख-विवर में घुसने की इच्छा प्रकट करके मुझे फौरन मुंह बन्द करने के लिए बाध्य किया.

अधिक क्या कहूं, यही समझिये कि बड़े संकट में प्राण पड़ा हुआ था. सोचने लगा कि इतनी अकारथ गयी. कुछ परमार्थ नहीं कमाया, अब चला-चली के समय हाथ मलना हाथ लगा. एक ज्योतिषी ने मुझे बताया कि तुम्हारी मृत्यु किसी सुन्दर देव-स्थान में होगी, पर मुझे यह नहीं मालूम था कि देव-स्थान का अर्थ हजामत की दुकान है.

एक बार मेरी स्त्री ने मुझे अपने पैर के नाखून बनाने के लिए कहा था, पर मैंने मारे शान के नहीं बनाये. सम्भवतः आज उसी पाप का फल भोग रहा था.

इसमें तो कोई संदेह नहीं कि जितने जख्म इस समय मुंह पर लगे थे, उतने गत यूरोपियन महासमर में लगे होते तो मैं अब तक भारत का सिपहसालार बना दिया गया होता. इन विचारों ने मुझे और भी दुःखित कर दिया और मैं आंख बन्द करके सोचने लगा कि वैतरणी का पाट कुल कितना चौड़ा है.

आखिर इस कृत्य का भी अन्त हुआ और नापितवार ने मुझे कुर्सी से उठने की अनुमति दी. इसमें कोई शक नहीं कि मेरी नयी जिन्दगी हुई. उठकर मैंने अपनी नाक टटोली. देखकर खुशी हुई कि नाक करीब-करीब ज्यों-की-त्यों थी; पर जब मैंने अपने मुंह पर हाथ रखा तो ऐसा जान पड़ा कि मुंह पर खून की क्यारियां बन गयी हैं. नापितवर से मैंने आईना मांगा, पर उन्होंने देने से इनकार किया और कहा-‘आपका मुंह इस काबिल नहीं है कि आप आईना देखें.’

मेरा अनुमान है कि किसी ऐसे ही नाई से काम पड़ने पर कबीर साहब ने लिखा था-‘मुखड़ा क्या देखे दरपन में.’

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रचनाकार: प्राची अप्रैल 2016 : व्यंग्य / मेरी हजामत / अन्नपूर्णानन्द
प्राची अप्रैल 2016 : व्यंग्य / मेरी हजामत / अन्नपूर्णानन्द
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