प्राची - जून 2016 / लघुकथाएँ

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विश्वास राजेश माहेश्वरी ए क बहुत ही सज्जन व दयालु स्वभाव के व्यक्ति थे. उनके पड़ोस में एक महात्मा जी रहते थे. मोहनलाल जी के यहां से उन्हें...

विश्वास

राजेश माहेश्वरी

क बहुत ही सज्जन व दयालु स्वभाव के व्यक्ति थे. उनके पड़ोस में एक महात्मा जी रहते थे. मोहनलाल जी के यहां से उन्हें प्रतिदिन रात का भोजन प्रदान किया जाता था. एक दिन महात्मा जी ने मोहनलाल को याद किया. वह तत्काल उनके पास पहुंचे.

महात्मा जी ने कहा, ‘‘मुझे आप पर आने वाली विपत्ति का संकेत प्रतीत हो रहा है. क्या आप कोई बहुत बड़ा निर्णय निकट भविष्य में लेने वाले हैं?’’ मोहनलाल जी ने बताया-‘‘मैं अपने दोनों पुत्रों के बीच अपनी संपत्ति का बंटवारा करना चाहता हूं.’’ महात्मा जी ने यह सुनकर कहा- ‘‘आप अपनी संपत्ति के दो नहीं, तीन भाग कीजिये और एक भाग अपने लिये बचाकर रख लीजिये. इससे आप को जीवन में किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा.’’

मोहनलाल जी ने महात्मा जी की बात पर ध्यान न देते हुये संपत्ति का वितरण किया तो उसके दो ही हिस्से किए.

धीरे-धीरे मोहनलाल जी को अनुभव होने लगा कि उनके बच्चे उद्योग-व्यापार और पारिवारिक मामलों में उनकी दखलन्दाजी पसन्द नहीं करते हैं. कुछ माह में उनकी उपेक्षा प्रारम्भ हो गयी और जब स्थिति मर्यादा को पार करने लगी तो एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी के साथ दुखी मन से अनजाने गन्तव्य की ओर प्रस्थान करने हेतु घर छोड़ दिया.

जाने के पहले वह महात्मा जी के पास मिलने गए. उन्होंने पूछा, ‘‘आज बहुत समय बाद कैसे आए?’’ मोहनलाल जी ने उत्तर दिया, ‘‘मैं प्रकाश से अंधकार की ओर चला गया था और अब वापस प्रकाश लाने के लिये जा रहा हूं. मैं अपना भविष्य नहीं जानता, किंतु प्रयासरत रहूंगा कि सम्मान की दो रोटी प्राप्त कर सकूं.’’ महात्मा जी ने उनकी बात सुनी और मुस्कराकर कहा, ‘‘मैंने तो तुम्हें पहले ही आगाह किया था. खैर, मेरे पास काफी धन पड़ा है, जो मेरे लिये किसी काम का नहीं है. तुम इसका समुचित उपयोग करके जीवन में आगे बढ़ो और समाज में एक उदाहरण प्रस्तुत करो.’’

महात्माजी के रुपयों से मोहनलाल जी ने पुनः व्यापार प्रारम्भ किया. वे अनुभवी एवं बुद्धिमान तो थे ही, बाजार में उनकी साख भी थी. उनका व्यापार चल पड़ा.

इस बीच उनके दोनों लड़कों की आपस में नहीं पटी और उन्होंने अपने व्यापार को चौपट कर लिया. व्यापार चौपट होने के कारण भारी आर्थिक संकट का सामना कर रहे दोनों पुत्र उनके पास पहुंचे और सहायता मांगने लगे.

मोहनलाल जी ने स्पष्ट कहा, ‘‘इस धन पर मेरा कोई

अधिकार नहीं है. मैं तो एक ट्रस्टी हूं जो इसे संभाल रहा हूं. तुम लोग अगर सहायता चाहते हो तो उन्हीं महात्मा जी के पास जाकर निवेदन करो.’’ जब वे वहां पहुंचे तो महात्मा जी ने उनकी सहायता करने से साफ इन्कार करते हुए कहा, ‘‘जैसे कर्म तुमने किये हैं उनका परिणाम तो तुम्हें भोगना ही होगा.’’

सम्पर्कः 106, नया गांव, रामपुर (म.प्र.)

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मां : दो दृश्य

ममता बनर्जी

मां, आज मेरे कॉलेज के चार-पांच दोस्त आएंगे घर पर. तुम उनके लिए कोई अच्छी सी डिश बना देना...मेरा काला वाला बुर्शट धो देना जरा...आज मेरी इंटरव्यू है नौकरी के लिए, तुम मन्दिर जाकर मेरे नाम पर चढ़ावा चढ़ा आना...तुम्हारे पास कुछ रुपये हैं तो दे दो मुझे, पापा को इसके बारे में मत बताना...मेरी शादी की सारी तैयारियां तुम्हें ही करनी हैं....मैं सिर्फ दुल्हन लाऊंगा.

मां, तुम अपना काम करो न, बेवजह अपनी बहू की हर बात पर अपनी टांग क्यों अड़ाती हो? ओह! गिरा दिया न दवा की शीशी आज फिर जमीन पर...पता है मुझे कि तुम फिर कहोगी कि तुम्हें ठीक से दिखाई नहीं देता...अब बताओ मैं क्या करूं? चाहे जैसे भी हो, इतनी महंगी दवा फिर से खरीदनी पड़ेगी मुझे. ओह!

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धर्म भ्रष्ट

किशनलाल शर्मा

‘‘इधर क्यों चला गया? उधर से आ.’’ दूध लेने आये लड़के की फटकारते हुए दुलीचंद्र बोला.

दुलीचंद्र के दुत्कारने पर लड़का डरा सहमा-सा काऊंटर के बांयी तरफ लगी बेंच के पीछे चला आया. वह गिलास आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘‘पांच रुपये का दूध देना.’’

‘‘गिलास मुझे क्यों दे रहा है? वहां रख.’’ दुलीचंद्र हाथ से बेंच की तरफ इशारा करते हुए बोला. लड़के ने गिलास बेंच पर रख दिया था. दुलीचंद्र ने भगोने में से

दूध नापकर हाथ बढ़ाकर काफी ऊपर से गिलास में डाला था. फिर हाथ आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘‘ला पैसे दे’’

लड़के ने हाथ में पकड़ा पांच का सिक्खा हाथ ऊपर करके दुलीचंद्र की हथेली में टपका दिया था.

‘‘तुमने उस लड़के को उधर क्यों बुलाया?’’ मैं दुकान पर बैठा चाय पीते हुए सब देख रहा था. उस लड़के के जाने के बाद मैंने दुलीचंद्र से पूछा था. ‘‘और गिलास हाथ में लेकर दूध क्यों नहीं दिया?’’

‘‘बाबूजी आप इस गांव के नहीं है. इसलिए उसे नहीं जानते! वह हरिजन है.’’ दुलीचंद्र बोला, ‘‘अगर उसका गिलास हाथ में ले लेता, तो मेरा धर्म भ्रष्ट हो जाता.’’ दुलीचंद्र की बात सुनकर मैं बोला, ‘‘लेकिन उसके हाथ में पकड़े सिक्के को हाथ में लेने पर तुम्हारा धर्म भ्रष्ट नहीं हुआ?’’

मेरी बात का जवाब दुलीचंद्र के पास नहीं था.

सम्पर्कः 103, राम स्वरूप कालोनी

शाहगंज, आगरा-282010

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मां

ममता बनर्जी

‘‘म म म म म म म....

‘‘ऊं आं ऊं आं ऊं आं आ. आ......’’

‘‘अरी कहां हो तुम, मुन्ना रो रहा है. जल्दी से आकर दूध पिलाओ उसे...मुन्ना इतना रो क्यों रहा है? कहीं पेट-वेट दर्द तो नहीं कर रहा है उसका? कितनी बार मना किया है तुझे कि मटर-कटहल वगैरह मत खाया करो... सुनो, अपनी जीभ पर थोड़ी लगाम दो और अब से और कुछ महीनों के लिए दही-लस्सी भी पीना छोड़ दो. मुन्ने को ठण्ड लग जाएगी. आज कितनी बार तेल-मालिश की है तुमने मुन्ने की? और हां, लो यह दवा रख लो...मुन्ना को हर दो घंटे पर पिलाती रहना...रात को थर्मामीटर पास ही रखना...जल्दी-जल्दी घर के काम निपटा लो, आज हम मुन्ना को डॉक्टर के पास ले चलेंगे.

‘‘क्या कहा? तुम खाना खा रही हो...ठीक है, ठीक है, खाना कुछ देर बाद में खा लेना, पहले यहां आकर मुन्ना का बदन साफ करो...उसने अपना पखाना समूचे बदन में लेप रखा है...हूंह! मुन्ने को मैं क्यों साफ करूं? मां बनी हो तो अपने बच्चे की देखभाल तो तुम्हें ही करनी पड़ेगी न.’’

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भारत माता की जय

राकेश भ्रमर

देशद्रोह और राष्ट्रप्रेम के बीच युद्ध छिड़ा हुआ था. राष्ट्रप्रेम वाले कह रहे थे कि भारत में रहनेवाले हर नागरिक को ‘वन्दे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ बोलनी होगी. जो लोग इसे नहीं बोलना चाहते थे, उनको देशद्रोही करार दे दिया गया था. रोज सभाएं होतीं, टी.वी. चैनलों पर बहसें होती, परन्तु कोई किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहा था कि राष्ट्रप्रेम की परिभाषा क्या है, और देशद्रोह की सीमा क्या है?

वह एक जवान और जोशीला व्यक्ति था. राजनीति में दखल रखता था. देशप्रेम उसकी रग-रग में भरा था. जाने-अनजाने वह भी राष्ट्रप्रेम और देशद्रोह के बीच चल रहे युद्ध में कूद पड़ा. वह राष्ट्रप्रेमियों के पक्ष में था और जगह-जगह सभाओं में जाकर ‘वन्दे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे पूरे जोशो-खरोश के साथ लगाता.

एक दिन जब वह भारत माता की जय के नारे लगाकर खुशी-खुशी अपने घर लौटा, तो घर में उसकी पत्नी और मां के बीच वाक्युद्ध चल रहा था. उसने मामले की तहकीकात किए बिना अपनी मां को डांटना शुरू कर दिया, ‘‘अम्मा, आप रोज-रोज बहू से झगड़ा करती रहती हो. कभी चैन से नहीं बैठती. जब देखो, तब झगड़ा...इतनी सीधी बहू के साथ भी आपका निबाह नहीं होता. एक मिनट भी बिना लड़े नहीं रह सकती. अब मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकता. रोज-रोज की खिच-खिच से छुटकारा चाहता हूं. आप अपना ठौर-ठिकाना ढूंढ़ लीजिए और मुझे मेरी पत्नी के साथ सुख से रहने दीजिए.’’

विधवा बूढ़ी मां रोने लगी, ‘‘बेटा, मैंने तो तेरी बहू को कुछ नहीं कहा. वहीं मुझसे लड़ रही थी कि मैं काम की न काज, दुश्मन अनाज की. ताने मारती रहती है कि मैं मर क्यों नहीं जाती. परात भर खाती हूं, और मुटिया रही हूं. बेटा मैं तो खुद ही दूसरों के घर में काम करके अपने पेट भर के लिए कमा लाती हूं. मैंने तो कभी शिकायत भी नहीं कि बहू मुझे सूखी रोटियां और बासी सब्जी खाने को देती है.’’

बेटा और ज्यादा भड़क गया, ‘‘अम्मा, बेकार की बात करके मुझे गुस्सा मत दिलाओ, वरना मेरा हाथ उठ जाएगा. बहू पर झूठा इल्जाम लगाते आपको शर्म नहीं आती. मैं क्या जानता नहीं कि वह कितनी सीधी है और आपका कितना ख्याल रखती है. अब मैं कुछ सुनने वाला नहीं. आप अपना ठौर-ठिकाना ढूंढ़ लीजिए और हमें शांति से रहने दीजिए.’’ उसने अंतिम फैसला सुनाते हुए मां को खींचकर घर से बाहर कर दिया.

दूसरे दिन वह फिर उसी जोश से एक सभा में ‘भारत माता की जय’ के नारे लगा रहा था.

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फासले

अल्पना हर्ष

आज काफी प्रयासों के बाद भी अपने बेटों के परिवारों के बीच सामंजस्य टूटता देख दुर्गा ने निर्णय लिया कि अब इस समस्या का समाधान वह अपने बहू-बेटों पर ही छोड़ देगी.

निर्णय सुनते ही बड़ी बहू के कमरे में आवाजें सुनाई देने लगी, ‘‘सुनो जी, ये रसोईघर तो हमारा बनवाया हुआ है. देवर जी से कहो अपने लिये बरामदे मे नया बनवा लें.’’ दुर्गा को अपने बच्चों के स्वार्थ ओर बढ़ते फासले स्पष्ट दिखाई दे रहे थे. ‘‘फासले मन के बढ़े हैं, पर मैं अपने बच्चों को अपनी आखों से दूर न जाने दूंगी, मैं हमेशा इसी प्रयास में रहूंगी कि एक आंगन से जुड़े रहें.’’ दुर्गा अपनी बेटी से कह रही थी.

एक मां का दिल अभी भी इस आस में था कि सब फासले, दूरियां वक्त कम कर देगा.

सम्पर्कः पत्नी डॉ. मनोज हर्ष, डी-599, हर्ष निवास, एमडीवी नगर, बीकानेर-334001 (राजस्थान)

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ममता बनर्जी

मदर्स डे

मां आज ‘मदर्स डे’ है, चलो आज तुम्हें मन्दिर लेकर चलता हूं...अरे! तुम्हें तो तेज बुखार है! अभी डॉक्टर बुलाता हूं मैं. तुम तब तक चुपचाप यूं ही लेटी रहो.

मां, आंखें खोलो...? आंखें खोलो न मां...अपनी आंखें क्यों नहीं खोल रही हो तुम? मां, पानी पियो न दो घूंट. मां...मां...मत जाओ मुझे छोड़ कर मां. मां...मां...मां...मां...!!

मां और मां

मां, भूख लगी है. जल्दी से खाना दो...आज मैं रोटी नहीं खाऊंगा, आलू के परांठे बना दो मेरे लिए...मां, मेरा होम-वर्क करवा दो न जरा...आज मुझे एक सुन्दर सी लोरी सुना दो...मेरी कमीज की बटन भी टांकनी पड़ेगी तुम्हें...कल नाश्ते में क्या दोगी मुझे? जाओ, मैं तुमसे बात नहीं करता. मां, चलो हम दोनों लूडो खेलेंगे.

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: प्राची - जून 2016 / लघुकथाएँ
प्राची - जून 2016 / लघुकथाएँ
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