रूपा की आजी / कहानी / रामवृक्ष वेणीपुरी

SHARE:

कुछ दिन चढ़े, मैं स्कूल से आकर, आंगन में पलथी मारे चिउरा-दही का कौर-पर-कौर निगल रहा था कि अकस्मात मामी ने मेरी थाली उठा ली, उसे घर में ले आई...

yashodak

कुछ दिन चढ़े, मैं स्कूल से आकर, आंगन में पलथी मारे चिउरा-दही का कौर-पर-कौर निगल रहा था कि अकस्मात मामी ने मेरी थाली उठा ली, उसे घर में ले आई । पीछे-पीछे मैं अवाक् उनके साथ लगा था; थाली रखा मुझ से बोली-' 'बस, यहीं खा, बाहर मत निकलना, रूपा की आजी आ. रही है, नजर लगा देंगी! समझे न? ''

मैं समझता क्या खाक? हाँ, रूपा की आजी से कौन बच्चा नहीं डरता? उनकी बड़ी-बड़ी आँखें देखकर न सिहर उठता? वह डायन हैं गांव भर में_ यह बात प्रसिद्ध है । वह जिस को चाहें, -जादू की फूँक में मार सकती हैं, बच्चों पर उनकी खास नजरे इनायत रहती हैं । कितने बच्चों को, हंसते-खेलते शिशुओं को, उनकी ये बड़ी-बड़ी आंखें निगल चुकी हैं

बड़ी-बड़ी आँखें!

रूपा की आजी की यह है सूरत-शकल-लम्बी गोरी औरत; भरा-पूरा- बदन । हमेशा साफ, सफेद बगाबग कपड़ा पहने रहतीं । उस सफेद कपड़े के घेरे से उनका चेहरा रोब बरसाता । फिर, उनकी बड़ी-बड़ी आँखें जिन पर लाली की एक, हलकी छाया! पूरे बदन का ढाँचा मर्दों के ऐसा, मानों धोखे से औरत हो गई हों ' । जिस गांव से यह आई है, वहाँ, लोग कहते हैं, औरतों का ही राज है । लोगों ने मना किया उनके ससुर को, वहाँ बेटी की शादी मत कीजिए । किन्तु, वह भी पूरे अखाड़िया थे-जिद कर गये, देखें, कैसी होती है वहां की लड़की ।

रूपा की आजी ब्याह के आईं । आने के थोड़े ही दिनों बाद ससुरजी चल बसे । कुछ दिनों के बाद रूपा के दादाजी भी । इन दोनों की मौत अजीब हुई । ससुरजी दोपहर में खेत से आये, रूपा की आजी ने थाली परोस कर उनके सामने रखी । दो कौर खा पाये थे कि पेट में खोंचा मारा, दर्द हुआ, खाना छोड्‌कर उठ गये । शाम होते-होते उसी दर्द से चल बसे ।

रूपा के दादाजी एक बरात से लौटे, थके-मांदे; नवोढ़ा पत्नी-रूपा की आजी- ने, हँस' कर, एक गिलास पानी पीने को दिया । पानी पीते ही सिर धमका, ज्वर आया, उसी ज्वर से तीन दिनों के अन्दर स्वर्ग सिधारे ।

पहली घटना से ही कानाफूसी शुरू हो गई थी; दूसरी घटना ने बिल्कुल सिद्ध कर दिया--रूपा की आजी डायन है, दोनों को जादू के जोर से खा गई है ।

रूपा के पिताजी का जन्म उसके तीन-चार महीने बाद हुआ । रूपा की आजी की गोद भरी-आखिर इस डायन ने अपना खानदान बचा लिया, लोगों ने कहना शुरू किया । बेटे को इस डायन ने बडे नाज से पाला, पोसा, बड़ा किया; उसकी शादी की-धूमधाम से । 'किन्तु, कैसी है यह चुड़ैल । शादी का बरस लगते-लगते बेटे को भी खा गई-मुँछउठान जवान बेटे को! कितना सुन्दर, गठीला जवान था वह! कुश्ती खेलकर आया, इस के हाथ से दूध पीया । खून के दस्त होने लगे । कुछ ही घंटों में चल बसा । उसके मरने के बाद इस 'रूपा' का जन्म हुआ और रूपा अभी प्रसूतिगृह में ही .कें-कें कर रही थी कि उसकी माँ चल बसी! बाप रे, रूपा की ' आजी कैसी बड़ी डायन हैं! डायन पहले अपने ही घर को स्वाहा करती है ।

जवान बेटे की मृत्यु के बाद, रूपा की आजी में अजीब परिवर्त्तन हुआ । आँखें हमेशा लाल रहतीं; छोटी-छोटी बातों से भी आँसू की धारा बह निकलती; होंठों-होंठ कुछ बुदबुदाती रहतीं; दोनों जून स्नान कर भगवती का पिंड लीपतीं, धूप देती बहुत साफ कपड़ा पहनतीं; .जिस जवान को देखती, देखती ही रह जातीं; जिस बच्चे पर नजर डालतीं; मानों आखों में पी जायँगी । लोगो ने शोर किया-अब इसका डायनपन 'बिल्कुल प्रगट हो गया । डरो भागो-रूपा की आजी से बचो!

रूपा की आजी से बचो-लेकिन, बचोगे कैसे? भर-दिन रूपा को गोद लिए, कंधे चढाये, या उसकी छोटी उँगलियाँ पकड़े यह इस गली से उस डाली, इस घर से उस धर आती-जाती ही रहती है । न एक व्रत छोड़ती है, न एक तीरथ । और, हर व्रत और तीरथ के बाद गांव-भर का चक्कर! उत्सवों में बिना बुलाये हाजिर! उफ, यह डायन कब मरेगी? कब गाँव- को इससे नजात मिलेगी ।

मन-ही-मन यह मनाया जाता, किन्तु ज्योंही रूपा की आजी सामने आईं नहीं कि उनकी खुशामदें होतीं । कहीं वह नाराज न हो जायँ । अपने ससुर, पति, बेटे और पतोहू को खाते जिसे देर न लगी, वह दूसरे के बाल- बच्चों पर क्यों तरस खायगी? स्त्रियाँ उन्हें देखते काँप उठतीं, किन्तु, ज्योंही वह उनके सामने आईं कि दादीजी कहकर उनका आदर-सत्कार रना शुरू किया । इस आसन पर बैठिए, जरा हुक्का पी लीजिए, सुपारी खा लीजिए, यह सौगात आई है, जरा चख लीजिए, आदि आदि । रूपा की- आजी कुछ सत्कार स्वीकार करतीं, कुछ अस्वीकार । उनकी अस्वीकृति आग्रह नहीं मानती थी । अस्वीकृति! और, लोगों में थरथरी लग गई । फिर, परिवार ही ठहरा; अगर बरस-छ: महीने में किसी को कुछ हुआ, तो रूपा की आजी के सिर पर दोष गिरा!

' कितने ओझे बुलाये गये इस डायन को सर करने के लिए । उनके बड़े-बड़े दावे थे-डायन मेरे आगे नंगी नाचने लगेगी; डायन के कोचे से आप-ही-आप आग जल उठेगी; डायन खून उगलने लगेगी; डायन पागल होकर आप-ही आप बकने लगेगी । ओझा आये, तांत्रिक आये । टोटके हुए, तंतर हुए । तेली के मसान की लकड़ी, बेमौसम के ओड्‌हुल के फूल, उलटी सरसों का तेल, मेंढक की खाल, बाघ के दाँत-क्या-क्या न इकट्ठे किये गये! ढोल बजे, झांझ बजी, गीत हुए; देव आये, भूत आये, देवीजी आई! किन्तु रूपा की आजी न पागल हुईं, न नंगी नाचीं, न उनकी देह पर फफोले उठे । ओझा गये, तांत्रिक गये, कहते हुए-उफ यह बड़ी घाघ है। बिना कारूकमच्छा गये, इसका जादू हटाया नहीं जा सकता । कई ओझे इसके लिए रुपये भी ऐंठते गये; किन्तु रूपा की आजी जस-की-तस रहीं ।

मैं बड़ा हुआ, लिखा-पढ़ा, नयेज्ञान ने भूत-प्रेत पर से विश्वास हटाया, जादू-टोने पर से आस्था हटाई । मैंने कहना शुरू किया-यह गलत- बात, रूपा की आजी पर झूठी तुहमत लगाई जाती है! बेचारी के घर में एक के बाद एक आकस्मिक मृत्युएँ हुईं, उसका दिमाग ठीक नहीं । आंखों की लाली या पानी डायनपन की नहीं, उसकी करुणाजनक स्थिति की निशानी हे । बच्चों के देखकर, दुलारकर जवानों को मूर-घूरकर वह अपने जवान बच्चे की याद करती या उसे भूलने की कोशिश करती है । पूजापाठ सब उसी की प्रतिक्रिया हैं । दुनिया में भूत कोई चीज नहीं, जादू-टोना सब गलत चीज! लेकिन मेरी बात कौन सुनता है? एक दिन मामी मेरी इस बकझक से व्याकुल होकर बोली-

हां, तुम्हें क्या, तुम्हारे लिए जरूर जादू-टोना गलत है । भगवान तुम्हें चिरंजीवी करें । किन्तु, उनसे पूछो, जिनकी कोख इस डायन ने सूनी कर दी; जिनके बच्चों को यह जिन्दा चबा गई; जिनके हंसते-खेलते घर को इसने मसान बना दिया ।

कहते-कहते उनकी आँखें भर आई; कुछ गरम-गरम बूंदें आँखों से' निकलकर जमीन पर हुलक रहीं । फिर बोलीं- उस पड़ोसिन की बात है । उसकी बेटी सुसराल से लौटी थी- गोद भरकर! एक दिन उसका छ: वर्ष का नाती गिन में किलक रहा था ।'' कितना सुन्दर था वह बच्चा! जैसे विधना ने अपने हाथों सँवारा हो । जो देखता, मोह जाता । कई दिन मेरे घर आया था-जबरदस्ती मेरे कंधे पर चढ़ गया, दही मांगकर खाया । तुतली-तुतली बोली, चिकने-चिकने दुध- मूँहे दाँत । हँसता तो इँजोरिया हो जाती । किलकिलाता, तो हरसिंगार झड़ने लगते । और, वैसे बच्चे को......

हाँ, एक दिन वह बच्चा अपने ऑगन में था, कि यह भूतनी पहुँची । यह भूतनी-हाँ, इसी तरह आंसू बहाती, होंठ हिलाती, रूपा का हाथ पकड़े ।' इसे देखते ही' उसकी मां का मुंह सूख गया; नानी डर गई; चाहा, बच्चे को छिपा दें । किन्तु वह बच्चा छिपाने लायक भी तो नहीं था! ऊधमी, नटखट! झटपट दौड़ा आया, इस चुडैल के कंधे पर चढ़ गया । चढ़कर इसके बालों को नोचने, गरदन को हिलाने और अपने छोटे-छोटे पैरों से इसे एंडियाने लगा । बच्चे की इस हरकत से भूतनी हँस पड़ी-पहली बार लोगों ने इसे हंसते देखा । फिर खुद घोड़ा बनी, बच्चे को सवार बनाया और बहुत देर तक घुड़दौड़ करती, बच्चे को हंसाती खेलाती रही । बार-बार उसे छाती से लगाती, कहती, ऐसा बच्चा दूसरा .न देखा । आह मेरा.. ०... 'किन्तु, बात बीच ही में काटकर फुट-फूटकर रो पड़ी । उसे रोते देख, बच्चे ने ही गुदगुदी लगाकर, रिझाकर, भुलाकर उसे चुप कराया । चुडैल घर चली, आशीर्वाद देती हुई-युग-युग जीए यह बच्चा, तुम्हारी गोद हमेशा भरी रहे बेटी; भरी रहे, इसी तरह सोने की मुरत उगलती रहे । उसकी मां भौंचक, नानी के जैसे जी में जी आया ।

किन्तु, जानते हो, इसके बाद क्या हुआ? मामी कहे जा रही थीं । कुछ ही दिनों के बाद लड़के को सूखा रोग लग गया । कहाँ गया उसका वह रूप, वह रंग, वह चुहल, वह हंसी। सूखकर काँटा हो गया, दिन-रात चेंचें किये रहता । जो उसे देखते, आँसू बहाते और एक दिन आंसुओं की बाढ़ लाकर वह.. उफ ।

उस दिन उसकी माँ को तुम देखते । पागल हो गई थी बेचारी! 'बच्चे की लाश को पकड़े थी, छोड़ती नहीं थी । किसकी हिम्मत जो उससे .बच्चा मांगे? आँसू सूखकर ज्वाला बन गये थे-उसकी आंखों से चिनगारी निकल रही .थी! बच्चे को छाती से चिपकाये थी, जैसे वह दूध-पीता बच्चा हो । अंट-संट बोलती, बच्चे के मुँह में छाती देने की कोशिश करती! उसे चुप देख, कभी-कभी चिल्ला उठती- जब चिल्लाती, मालूम होता, उसका -कलेजा फट रहा है, सुननेवालों के भी कलेजे फटते... .

मैं देख रहा था, मामी का कलेजा आज भी फटा जा रहा है । किस्से का अंत शब्द से नहीं, आंसुओं के ज्वार से हुआ ।

' और, मामी के बच्चे को भी तो इसी ने खाया- वह बोलती नहीं हैं, किन्तु उनके करुण चेहरे की एकाएक भावभंगी-आंसू की एक-एक बूँद- -यह कह रही है । कम्बख्त को बच्चे खाकर भी संतोष न हुआ, मामी की कोख में जैसे इसने राख भर दी । तब से एक भी बेटा न हुआ; बहुत् जंत्र- मंत्र के बाद हुई तो दो बेटियां

मामी को क्या बात; एक दिन मामाजी भी मेरे उपर्युक्त तर्कों पर नाराज हुए और अपनी आंखों-देखी घटना सुनाई-

वह ऊँची जगह देखते हो न? वहाँ एक दुसाध आ बसा था । बूढ़ा था, दो नौजवान लड़के थे उसके; घर में बीवी, पतोहुएँ । दोनों ही बेटे बड़े ही कमाऊ पूत । गठीले जवान । बूढ़ा भी काफी हुनरमंद । थोड़े ही दिनों में गांव में उनकी पूछ हो गई । बाहु का बल था । कमाते, खाते । नेक स्वभाव के - न किसी से झगड़ा, न झमेला । सबको खुश रखने की कोशिश करते; सबके काम आते ।

एक दिन वह बुढ़िया--तुम्हारी रूपा की आजी,-पहुँची और बोली, जरा मेरा काम कर दो । बूढ़े ने देखते ही सलाम किया, बैठने को कुश की चटाई रख दी । बुढ़िया नहीं बैठी-दुसाध से हड्डी छुला जाती है; फिर, .मैं बाभनी । बूढ़ा न बोला, सिर्फ अर्ज किया-आज तो दूसरे बाबू को बचन दे चुका हूँ, कल आपका काम हो जायगा। बुढ़िया ने जिद की – नहीं, आज ही मेरा काम होना चाहिए। बीच ही में बड़ा लड़का बोल उठा-दुसाध .से हड्‌डी छुलाती है तो क्या घर नहीं छुलायगा बुढ़िया तमक उठी! - तुम मेरा अपमान करते हो? इसलिए न कि मैं निपूती हूं, मुझसे तुम्हें क्या डर, मेरा लड़का होता... । बुढिया पहले गरजी, अब बरस रही थी! बूढ़ा दुसाध भौंचक । हाथ जोड़कर आरजू-मिन्नत करता रहा-अभी चलता .हूँ, हम अभी चलते हैं, बाबू का काम कल होगा, आज आप ही का । किन्तु, बुढ़िया वहाँ जरा भी क्यों ठहरती? घर लौटी ।

इसी रास्ते वह जा रही थी, मामा जी ने कहा, मैंने देखा, उसके होंठ .जल्द-जल्द हिल रहे 'थे, आँखें लाल थी, ऑचल से आँसू पोंछती जाती । पीछे-पीछे बूढा दौड़ा जा रहा था । बूढ़े को रोककर मैंने दरियाफ्त किया, उसने सारी बातें सुनाईं । वह कांप रहा था-बाबू, बाल-बच्चेवाला हूँ, न जाने क्या हो जाय?

और, विश्वास करोगे, तुम्हारी रँगरेजी विद्या इसका क्या माने- बतायगी, कि उसी रात में बूढ़े के बड़े बेटे को सांप ने काट लिया ।

भोर में देखा, हाय, वह पट्‌ठा बेहोश पड़ा है । समूचा शरीर पीला पड़- गया है, मुँह से झाग निकल रहा है । गाँव-गाँव से साँप का विष उतारनेवाले- पहुँचे हैं । कोई जोर-जोर से मंत्र पढ़ रहा है, कोई उसको फटकार रहा है, कोई जड़ी पीसकर पिलाने की कोशिश में है, कोई उसकी नाक में कुछ सुधा रहा है १ जब-तक वह आंखें खोलता है, रह-रहकर हाथ-पैर फटकारता है, फिर निस्तब्ध हो रहता है । निस्तब्धता निस्पंदता में और निस्पंदता निर्जीवता में बदलती जाती है । बूढ़ा बाप छाती पीट रहा है, छोटा भाई दाढू मारकर रो- रहा है । माँ और स्त्री की गत का क्या कहना! विष उतारने वाले कहते हैं, हम क्या करें! साँप का विष उतरता है न? यह तो आदमी का विष है! सीधा जादू, ठीक आधी रात को लगाया गया है, उतर जाय, तो भाग । बूढ़े का वैसा भाग्य नहीं था । धीरे-धीरे हमलोगों के देखते-देखते उसके जवान बेटे की अर्थी उठ कर रही! दूसरे ही दिन उसका सारा परिवार गांव छोड्‌कर चला गया!

अरे, यह बुढ़िया नहीं, काल है! आदमी नहीं, सांपिन है । चलती-- फिरती चुड़ैल बाभनी है, नहीं तो, इसे जिन्दा गाड़ देने में कोई पाप नहीं लगता!

मामा की आँखें अब अँगारे उगल रही थीं । मैं चुप था! भावना पर- दलील का क्या असर हो सकता हैँ भला ........

शिवरात्रि का यह मेला । लोगों की अपार भीड़ । बच्चे, जवान, बूढ़े लड्‌कियां, युवतियाँ, बूढ़ियां । शिवजी पर पानी, अक्षत, बेलपत्र, धूल, फल? फिर, एक ही दिन के लिए लगे इस मेले में घूम फिर; खरीद फरोख्त । धक्के-पर- धक्के । चलने की जरूरत नहीं. अपने को भीड़ में डाल दीजिए. आप ही-आप किसी छोर पर लग जाइयेगा । बच्चों और स्त्रियों की अधिकता! उन्हीं के लायक ज्यादा सौदे । खंजड़ी पिपही, झुनझुने, मिट्टी की मूरतें,. रबर के खिलौने, कपड़े के गुड्डे, रंगीन मिठाइयाँ, बिस्कुट, लेमनचूस । टिकुली, सेंदूर, चूड़ियाँ रेशम के लच्छे, नकली गोट, चकमक के पत्ते; आईना, कंघी, साबुन, सस्ते एसेंस और रंगीन पाउडर । भावसाव की छूट, हल्ला-गुल्ला । गहनों के झमझम में चूड़ियों की झनझन । साडियों के सरसर में हँसी की खिलखिल ।

कहीं नाच हो रहा; कहीं बहुरुपिये स्वांग दिखा रहे; घिरनी और चरखी पर बच्चे झूले का मजा लूट रहे ।

अकस्मात् एक ओर से शोर । ' 'पगली-पगली-पगली ।'' छोडो-छोडो- छोड़ो ।'' ''डायन, डायन, डायन ।'' ''मारो, मारो-मारो ।''

एक औरत भागी जा रही है, अधनंगी, अधमरी । लोग उसका पीछा कर रहे हैं । बात क्या है?

मेले में आई एक युवती अपने बच्चे को एक सखी के सुपुर्द कर सौदा करने गई थी । सखी जरा चंचल स्वभाव की थी । बच्चे चंचल होते ही हैं । सखी 'लाल छड़ी' की रंगीन मिठाई बेचनेवाले की बोली पर भूल गई-मेरी लाल खड़ी अलबत्ता; मैं तो बेचूंगा कलकत्ता! इधर बच्चा उसकी अंगुली छुड़ाकर, धीरे से ' वहां से निकलकर झुनझुनेवाले के पास पहुँच गया । जब सखी का ध्यान लाल छड़ी से हटा, तो वह व्याकुल होकर बच्चे को खोजने निकली । देखती क्या है, एक बुढ़िया उस बच्चे को गोद में लिये झुनझुने दे रही और मिठाइयां खिला रही है! कैसी उसकी सूरत-फटाचिटा कपड़ा, हल से भरा शरीर, बिखरे बाल, लाल-लाल आँखे, बड़ी-बड़ी टाँग, बड़ी-बड़ी बांह! उसे देखते ही, वह चीख पड़ी--डायन! बुढिया चौंकी, गुर्राई-ऐं, क्या बोलती है? किन्तु वह तो चिल्लाए जा रही थी-डायन, डायन, डायन! हल्ला देख बच्चा चीखने लगा। बुढ़िया ने बच्चे को कंधे पर लिया! वह बुढिया के नजदीक पहुंचकर बच्चे को उससे छीनने की कोशिश करने लगी । एक हल्ला एक शोर, एक गौगा । अब बच्चा सखी की गोद में, और बुढ़िया को लोग पीट रहे हैं । बच्चा बार-बार उसकी ओर देखकर बुदिया बुदिया' कह उठता है,. मानो उसकी मार पर तरस खाता हो, उसकी गोद को ललक रहा हो । किन्तु कौन उसपर ध्यान देता है?

बुढ़िया भागी जा रही है; स्त्रियाँ, बच्चे, मर्द उसके पीछे लगे हैं १ -थोड़ी-थोड़ी देर पर वह रुकती है, दाँत दिखाती है, हाथ जोड़ती है: कभी-कभी गुस्सा होकर ढेले उठाती है । वह सिर्फ ढेले उठाती है, लोग 'उसपर ढेले फेंकते हैं । इसी भगाभगी में वह एक ऐसी जगह पहुँचती है, जहां पहले एक कुँआ था । अब उसकी गच खराब हो गई थी, वह भथ रहा था । भागने में व्याकुल, उसका ध्यान उस ओर न रहा; धड़ाम से उस कुँए में जा रही!

भीड़ रुकती है! कोई कहता है-मरने दो । कोई कहता है-निकालो । जब तक निर्दयता पर करुणा की विजय हो, तब तक वह जल-समाधि ले चुकती है!

यह उसकी लाश है! किसकी लाश? बुढ़िया की लाश-रूपा की आजी की लाश! रूपा की आजी की लाश? वह यहां कहां?

रूपा की शादी बड़ी धूम से की उसने । सारी जायदाद बेचकर । जिस भोर में रूपा की पालकी ससुराल चली, उसी शाम को वह घर छोड्‌कर चल दी । कहां? कौन जाने? इतने दिनों तक वह कहां-कहां की धूल छानती ' आज पहुँची थी इस मेले में! क्यों? क्या रूपा को देखने? उसके बच्चे को देखने,! क्या वह रूपा का बच्चा था? उसने परिचय क्यों न दिया?

छोड़िए उस चर्चा को ।

. बहुत दिन हुए, रविबाबू की एक कहानी पड़ी थी । एक भद्र परिवार की महिला हैजे से मर गई । लोग जलाने को श्मशान ले गये । चिता सजाई जा रही थी कि वर्षा होने लगी । चिता छोड्‌कर लोग बगल की अमराई की मैड़ैया में छिप रहे । काली रात थी । जब वर्षा खतम हुई, उन्होंने पाया, चिता से मुर्दा गायब! क्या सिंयार खा गये? खोज-ढूँढ फिजूल गई ।। किन्तु', किस तरह बाबूसाहब से कहा जायगा कि उनकी असावधानी से मुर्दा गायब, हुआ? झूठमूठ चिता में आग लगाकर चले आये । इधर बेचारी महिला पानी की बूंद से जीवन पा चिता से उठी । दिनभर खेतों में छिपी रही, भद्रकुल की महिला थी । रात में जब घर पहुँची, दरवाजा खटखटाया । उसकी बोली सुन, लोग दौड़े-अरे, भूत, भूत! - नैहर पहुँची, वहाँ भी भूत-भूत; बहन के घर पहुँची, वहाँ भी भूत-भूत । जहां जाय, वहीं भूत, भूत, भूत! आखिर उसने अपने को गंगा की गोद में सिपुर्द कर दिया ।

क्या 'रूपा की आजी' भी कुछ इसी तरह लोकापवाद की शिकार नहीं हुई ? धटनाओं ने उसके साथ साजिशें कीं; लोगों ने जल्लाद का काम किया!

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: रूपा की आजी / कहानी / रामवृक्ष वेणीपुरी
रूपा की आजी / कहानी / रामवृक्ष वेणीपुरी
https://lh3.googleusercontent.com/-wzrZ3504oLA/V4OLBF4weXI/AAAAAAAAu6E/DkvwMAFrTtc/yashodak_thumb.jpg?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-wzrZ3504oLA/V4OLBF4weXI/AAAAAAAAu6E/DkvwMAFrTtc/s72-c/yashodak_thumb.jpg?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2016/07/blog-post_11.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2016/07/blog-post_11.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content