पुरंजनोपाख्यान / एक पौराणिक कथा-रूपक

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पुरंजनोपाख्यान हजारों वर्ष पहले की बात है, राजा पृथु की वंश-परम्परा में प्राचीन- बर्हि नाम के एक बडे यशस्वी राजा हुए हैं । उन्होंने यज्ञादि...

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पुरंजनोपाख्यान

हजारों वर्ष पहले की बात है, राजा पृथु की वंश-परम्परा में प्राचीन- बर्हि नाम के एक बडे यशस्वी राजा हुए हैं । उन्होंने यज्ञादि कर्मकाण्ड, योगाभ्यास तथा बल-पराक्रम से प्रजापति का पद प्राप्त कर लिया था । वह बाहरी 'कर्मकाण्ड और यज्ञों में पशु-बलि आदि को ही सब कुछ समझने लगा था । ऐश्वर्य और भोग-विलास का जीवन व्यतीत करने में वह इन्द्र से स्पर्द्धा रखने लगा था ।

एक बार महर्षि नारद राजा के पास आए, और कहने लगे-राजन् । इन थोथे कर्मों, से तुम अपना कौन-सा कल्याण कर रहे हो? जो पुरुष संसार की विषय-वासना में ही लगा रहता है, कपटपूर्ण गृहस्थाश्रम में ही डूबा अपने देह-गेह, धन-धरा, दारा-सुत को ही परम पुरुषार्थ मानता है, और थोथी नींव -पर अपने यश का महल खड़ा करना चाहता है, वह अज्ञानी संसार-सागर की लहरों के थपेडे खाता हुआ उसी में भटकता रहता है, अपना वास्तविक कल्याण सिद्ध नहीं कर सकता, लोक-कल्याण तो उस जड़-बुद्धि सें क्या होगा ?''

तप: मूर्ति महर्षि नारद के ये वचन सुनकर राजा के मन को झटका-सा तो लगा, किन्तु उसने कहा-महाभाग नारद जी! जीवन क्षणिक है, इसमें इन्द्रिय सुख की अवहेलना क्या उचित है? और मैं तो, इन्द्र के समान, सैकडों- हजारों यज्ञों का अनुष्ठान करके कल्याण का कार्य भी कर रहा हूँ । आप मेरी निन्दा कैसे कर रहे हैं”

राजा का कथन सुनकर महर्षि का मुख-मण्डल तमतमा उठा । उनकी आँखों से तेज की चिंगारियाँ बरसने लगीं । गंभीर गर्जनापूर्ण वाणी में वे बोले- देखो, देखो राजन्! तुम ने यज्ञों में निर्दयतापूर्वक जिन हजारों निरीह पशुओं की बलि दी है, अपनी स्वार्थ-साधना और रसना-लोलुपता के लिए जिन-जिन .'का पेट-तन काटा है; अपने और अपने कुटुम्ब के सुख-वैभव के लिए जिस-जिस 'को मिट्टी में मिलाया है-उन्हें आकाश में देखो । वे सब तुम्हारे द्वारा दी गई यातनाओं को याद करते हुए बदला लेने के लिए तुम्हारी बाट जोह रहे हैं '

जब तुम परलोक-गमन करोगे, तब ये क्रुद्ध हुए, तुम पर आघात करेंगे । तुमने सुख को सीमित बना दिया है । इन्द्रिय-लोलुपता का परिणाम भयंकर होता है, राजन्! इस सम्बन्ध में मैं तुम्हें राजा पुरंजन का एक प्राचीन उपाख्यान सुनाता हूँ, ध्यान से सुनो।

राजन्, पूर्वकाल में आत्मराम नाम का पूत-मना राजा था । वह अपने परमानन्द अविज्ञात नामक एक मित्र के साथ आनन्द-द्वीप का अधिवासी था । वे दोनों आध्यात्मिक जीवन बिताते हुए आनन्द के साथ रहते थे । एक दिन आत्मराम अपने मित्र से बिछुड़ गया । उसे संसार की हवा लग गई । तरह-तरह के सांसारिक भोगों की लालसा उसमें जाग उठी । वह उन भोगों को भोगने के लिए किसी रमणीक स्थान की खोज में सारी पृथ्वी में घूमता फिरा मगर उसे फिर भी कोई उचित स्थान न मिला ।

आखिर, एक दिन वह घूमता-घूमता हिमालय के दक्षिण में भारतभूमि के एक पर्वतीय प्रदेश में पहुंचा । वहां नौ' द्वारों वाली नवद्वारावती नामक एक सुन्दर नगरी थी । उसने उस नगरी में प्रवेश किया । अपना नाम उसने पुरंजन रख लिया । नगर की शोभा-सज्जा अद्‌भुत थी, एक दम मोहक थी । अपनी कांति के कारण वह नगर इन्द्रपुरी और नागों की नगरी भोगवती पुरी के समान दिखाई देता था । धन-धान्य से भरपूर, प्राकृतिक सुषमा वाले पांच रमणीक बाग-बगीचों से उक्त वह स्थान उसे अवश्य ही अपनी भोग-भूमि बनाने योग्य प्रतीत हुआ । उस प्रदेश की सौन्दर्य-श्री को उद्भ्रान्त-सा देखता हुआ वह घूम रहा था । घूमते-घूमते पुरंजन एक मनोहर वाटिका में प्रविष्ट हुआ । वाटिका के बीच में एक सुन्दर भवन था, और पास ही एक स्वच्छ सरोवर निर्मल जल से लहरा रहा था । उसने भवन की ओर से एक किशोरी सुन्दरी को आते देखा, जो अकस्मात् उसके समीप पहुँच गई थी । उसके साथ दस सेवक थे, और अनेक सहेलियां थीं ।

साक्षात्कार होते ही राजा पुरंजन और वह किशोरी दोनों प्रश्न-भरी दृष्टि से एक दूसरे को देखने लगे । फिर क्षण-भर की शांति के पश्चात् वीर, पुरंजन ने उस सुन्दरी से मधुर वाणी में पूछा-देवी । तुम कौन हो? तुम्हारे -

साथ ये नर-नारी कौन हैं इस भूमि को किसने बनाया, तुम किसकी कन्या हो ?''

''नरश्रेष्ठ! हमें अपने उत्पन्न करने वाले का ठीक-ठीक पता नहीं है । आज हेम सब इस भूमि पर हैं--इसके सिवा मैं और कुछ नहीं जानती; -मुझे यह भी विदित नहीं कि हमारे रहने के लिए यह अदभुत स्थान किसने बनाया । मेरे साथ ये पुरुष मेरे सखा और स्त्रियां मेरी सहेलियां हैं । कहो, आप कहां से पधारे हैं ?''

''घूमते-घूमते इधर आ निकला । सुन्दरी, मैं बहुत थका हूँ, क्या .-कुछ देर यहां विश्राम करने दोगी?',-वीर पुरंजन ने किशोरी की चितवन में चितवन डालते हुए कहा ।

''क्यों नहीं? वीरवर, तुम यहां के सुख वैभव का स्वेच्छा से उपभोग करो, मैं तुम्हारे विश्राम का सब प्रबन्ध करा देती हूँ ।'' यह कहकर उस नाग-कन्या सी किशोरी ने अपने सेवकों को पुरंजन के ठहरने की सारी व्यवस्था करने का आदेश दिया । पुरंजन विश्राम-भवन में चला गया ।

सांध्य-गगन की लालिमा से सरोवर का जल स्वर्णमय दिखाई देता था, मन्द-मन्द पवन तरु-राजि में कंपन भर रहा था । पुष्पों की महक से वातावरण और भी मादक- बना था । सरोवर के तट पर खोया हुआ-सा खड़ा पुरंजन सब कुछ देख रहा था । जब से वह यहां आया था, उसके मन-प्राण एक विचित्र विकलता के अनुभव में डूबे थे । वह अपने आनन्द-द्वीप और -हां के मित्र को मूल चुका था । वह सोच रहा था-कितनी सुषमा भरी है यहां कितना ऐश्वर्य है! क्या यह सब मेरे उपभोग के लिए नहीं? यहाँ के वन-उपवन, मनोहर सरोवर, फल-फूल सब रहस्यपूर्ण हैं-और यह सुन्दरी? उफ देव, यह कैसा माया-जाल है ''

वह इस प्रकार भाव-मग्न था कि पीछे से अकस्मात् उसकी भाव- श्रृंखला को भंग करता हुआ कोमल-कंठ-स्वर सुनाई दिया-युवक, तुम्हें कोई असुविधा तो नहीं ?''

''असुविधा? साध्वी, यहां की प्रत्येक वस्तु ने न जाने कैसी मोहिनी-. सी डाल दी है । यहां से अन्यत्र जाने के बाद भी मैं इस प्रभाव से कभी- मुक्त हो सकूंगा-इसमें संदेह है ।' ' पुरंजन ने उस युवती की ओर दृष्टि- घुमा कर कहा ।

''जाने की जरूरत ही क्या है, वीरवर, यहां के सुख-वैभव का अनन्त'- काल तक स्वेच्छापूर्वक उपभोग करो । समस्त भूमि और इसके पदार्थ. तुम्हारे लिए प्रस्तुत हैं । यहां के स्वामी बनकर रहो ।'' युवती ने रहस्य-' भरी चितवन दौड़ाते हुए कहा ।

''किन्तु स्वामिनी तुम जो हो! ''

' 'आह! क्या हम दोनों एक साथ स्वामी और स्वामिनी नहीं रह सकते! ''-कहते ही युवती का सलज मुख झुक गया और दो अश्रु-बिन्दु'' उसकी सुन्दर आंखों से नीचे पड़े पत्तों पर टप-टप टपक पड़े । उसके इन. शब्दों में कितनी वेदना-विह्वलता, कितना आत्मनिवेदन, हृदय-विपंची की- कौन सी मधुर तान छिपी थी, कौन जाने!

राजा पुरंजन उस सुन्दरी के प्रेम-पाश में बंध गया । वह सौ वर्ष तक. उस प्रदेश में रह कर आनन्द भोगता रहा । भोग-विलास ही उसके जीवन कर

क्रम बन गया था । अपनी नगरी के नवों द्वारों से वह नाना प्रकार की सुख-. भोग की सामग्रियां प्राप्त करता । एक द्वार पर वह मधुर से मधुर भोजन.. करता, मदिरा पीता और मद से उन्मत्त हो जाता । दूसरे पर मधुर संगीत-लहरी सुनता । तीसरे द्वार पर मादक सुगंधि का पान करता, तो चौथे पर मनोहर' दृश्यों से अपने को तृप्त करता । इस प्रकार हर द्वार पर उसे इन्द्रिय-सुख प्राप्त, होता । उसका चित्त हर समय तरह-तरह की विषय-वासनाओं में लगा. रहता । वह उस सुन्द्ररी-अपनी पत्नी पुरंजनी के मोह में फंसा रहता ।

वहाँ की समस्त वस्तुओं को अपनी इच्छा के अधीन पाकर, उस स्थान का स्वामी बुना हुआ, वह राजा अहंवादी हो गया, दंभ से भर गया । वह इस मर्द-लोक में देवराज इन्द्र से स्पर्द्धा करने वाला राजा बनने: की अभिलाषा करने लगा । आसुरी वृत्ति बढ़ जाने से उसका चित्त बड़ा कठोर और दयाशून्य हो गया था । वह अपना विशाल धनुष, स्वर्ण-कवच, तथा अक्षय तूनीर ' धारण कर अपने सेवकों के साथ शिकार को जाता और अपने तीखे वार से निरीह पशुओं का निर्मम वध करता । माँस-मदिरा में उसकी आसक्ति। दिनोंदिन बढ़ रही थी । निर्दोष जीव उसके बाणों से तडप-तडप कर प्राण ' त्यागते थे । उसकी यह स्वार्थपूर्ण हिंसा देखकर तीनों लोक थर्रा उठे ।

मद से छका हुआ पुरंजन दिन-रात विलास में ही मग्न रहता । उस कामिनी में ही चित्त लगा रहने के कारण, उसे काल की गति का भी - कुछ मान न रहता 1 उसके कई पुत्र-पुत्रियाँ हुईं । उस की जवानी ढलने लगी । सन्तान के मोह ने भी उसे आ घेरा । उसने अपने पुत्रों तथा कन्याओं.. का विवाह किया । उसका वंश सारे पांचाल देश में फैल गया । अग्नि पुत्र,. पौत्र, गृह, कोश, विषय-सामग्री आदि में दृढ़ ममता हो जाने के कारण वह इन विषयों से बंध गया ।

. बर्हिष्मन फिर तुम्हारी तरह ही प्रजापति बनकर उसने' अनेक. प्रकार के भोगों की ही इच्छा से तरह-तरह के पशु-हिंसामय यज्ञों का- आयोजन आरंभ किया । इस प्रकार वास्तविक कल्याण-पथ को न जानकर- वह कुटुम्ब-पालन तथा अन्य स्वार्थों के हेतु कर्म-बंधन में फंसा रहा । आखिर भोगी पुरुष की कमर तोड़ देने वाली, अत्यन्त अरुचिकर, जीवन की संध्या-- बेला का-वृद्धावस्था का-समय आ पहुँचा ।

राजन्! मनुष्य का दंभ, अहंकार और ऐश्वर्य लोगों की ईर्ष्या,- द्वेष और शत्रुता का कारण बनता है । राजा पुरंजन को इस प्रकार अभिमान-- पूर्वक निर्बाध ऐश्वर्य भोगते देख कर गंधर्व राज चण्डवेग ने ईर्ष्या-द्वेषवश उसके नगर को लूटने के लिए चढ़ाई कर दी । इतने दिनों तक विषय-भोग में मस्त तथा स्त्री के वशीभूत रहने के कारण अब तक वह इस अवश्यंभावी- - भय से अनभिज्ञ ही था । गंधर्वराज द्वारा नगर की हानि देखकर वह बहुत चिंतित हुआ । गंधर्वराज चंडवेग ने उसकी नगरी के एक भाग को उजाड़ डाला। वह विवेकहीन, विषयी, अशक्त राजा सब कुछ देखते रहने के सिवा कुछ. न कर सका ।

राजन्, इन्हीं दिनों राजा कालराज की एक कन्या, जिसका नाम जरारानी था, वर की खोज में तीनों लोकों में भटक रही थी, उसे कोई स्वीकार करने को प्रस्तुत न था । अन्त में वह यवनराज भयराज के पास पहुँची, और दीनता के स्वर में बोली-''वीरवर, आप यवनों में श्रेष्ठ हैं । मैं आप से प्रेम करती हूँ, और आपको पति बनाना चाहती हूँ ।''

उस की बात सुनकर भयराज पहले तो मुस्कराये, फिर कुछ सोचकर 'कहने लगे-''देवी, तेरे पिता कालराज मेरे भाई-तुल्य हैं । तुम्हारा यह -प्रस्ताव सर्वथा अनुचित है । किन्तु घबराओ नहीं; मैं तुझे अपनी पुत्री के समान समझकर योग्य वर की प्राप्ति कराऊंगा । तुम विश्राम करो, कल समस्त व्यवस्था हो जायगी ।''

अगले दिन यवनराज भय ने जरारानी को बुला कर कहा-''देखो, -मैंने विचार कर तेरे लिए एक वर निश्चित किया है । वह नवद्वारावती का 'राजा पुरंजन है । सीधी तरह से तो वह भी तुझे स्वीकार नहीं करेगा । इसलिए तू मेरी सेना ले जाकर उसपर आक्रमण कर दे और जबरदस्ती उसे 'प्राप्त कर । मेरी सेना की सहायता से तू उसपर अवश्य-विजय प्राप्त कर लेगी । अपने भाई प्रज्वार के साथ मैं भी तुम्हारी सहायता के लिए आऊं गा ।''

उसी दिन यवनराज भयराज के सैनिकों के साथ जरारानी ने पुरी .को घेर लिया । सब ओर से नगरी के नवों द्वारों का ध्वंस होने लगा । .नगरी के स्वामीत्व का दंभ रखने वाले तथा पुत्र, पौत्र, स्त्री आदि में मोहग्रस्त राजा पुरंजन को नाना प्रकार के क्लेश सताने लगे । उसका सारा ऐश्वर्य नष्ट हो गया । काल-कन्या ने अपने आक्रमण से उसकी कमर तोड़ डाली । वह प्रतिकार करने में अशक्त था । उसकी नगरी कुछ गंधर्वराज ने नष्ट की थी, रही-सही यवनों और काल-कन्या ने कुचल दी । निर्बल और क्षीण हुए उस राजा को अनुभव हुआ कि उसकी देह को काल-कन्या ने पूर्णातया अपने बद में किया हुआ है । उसके पुत्र, पौत्र, दारा यह सब देखने के सिवा कुछ -नहीं कर सकते, और वे स्नेह-शून्य से भी हो गए हैं ।

यह सब कुछ देखकर वह अपार चिंता में डूब गया । उसे बचने का कोई उपाय नहीं दीख रहा था । अत: वह पुरी को छोड़ने के लिए विवश हो गया । इतने में अपने भाई प्रज्वार के साथ यवनराज भय आ धमका । प्रज्वार ने नगरी में,आग लगा' दी । उस मोह-ग्रस्त, देह-गेह आदि में 'मैं-मेरे' का भाव रखने वाले अत्यन्त बुद्धिहीन राजा को ऐसी अवस्था में भी अपने परम हितैषी मित्र अविज्ञात और अपने आनन्द-द्वीप का स्मरण नहीं आया ।

उस निर्दय और स्वार्थी राजा ने जिन निर्दोष पशुओं की हिंसा की थी, जिनकी बलि दी थी, वे सब नरक में उसके प्रति क्रुद्ध होकर उसे अपने लौह- सदृश दृढ़ भागों से विदीर्ण करने लगे-उसे सताने लगे । वह वर्षों तक नारकीय अंधकार में पड़ा नारकीय जीवन बिताता रहा ।

राजन्! अगले जन्म में पुरंजन विदर्भराज की कन्या के रूप में उत्पन्न हुआ । राजा विदर्भ ने विवाह-योग्य होने पर परम-पराक्रमी पाण्ड्यनरेश महाराज मलय-ध्वज से उसका विवाह कर दिया । राजा मलयध्वज बडे सात्विक वृत्ति के धर्मात्मा पुरुष थे । लोक-सेवा ही उनके जीवन का व्रत था । स्वार्थ के स्थान पर परमार्थ, विषय-भोग की जगह संयम और त्याग, तथा हिंसा, असत्य, अहंकार आदि के स्थान पर अहिंसा, सत्य और विनम्रता आदि उनके जीवन के अंग थे । दुखी व्यक्ति का दुःख दूर करना, अत्याचारी से पीड़ित जन को छुड़ाना, और मानवता के कल्याण की साधना ही उसके उत्तम कर्म थे । वह पशु-बलि वाले हिंसात्मक यज्ञों में विश्वास न करके सर्वसाधारण के उत्थान- यज्ञ में ही अपने जीवन की आहुति दे रहा था । ऐसे उत्तम महामानव के सम्पर्क में आकर विदर्भ-नन्दिनी (पूर्व जन्म का पुरंजन) के संस्कारगत सभी विकार नष्ट हो गए । वह भी अपने पति की तरह त्याग, तप और संयम का जीवन व्यतीत करने लगी । उसकी आत्मा का मैल घुलता जा रहा था ।

राजन्! काल-चक्र बड़ा प्रबल होता है । धर्मपूर्ण आचरण करने चाला राजा मलयध्वज आखिर एक दिन अपने पार्थिव चोले को छोड़कर स्वर्गवासी हुआ । पति की मृत्यु पर साध्वी विदर्भ-नन्दिनी शोकाकुल हो उठी । वह पति के शव के पास जोर-जोर से रोने लगी । जब उसके पति के शव को चिता पर रखा गया, तो विलाप करते-करते उसने पति के-साथ सती होने का निश्चय किया । राजन्! उसी समय. उसका कोई पूर्व-परिचित आत्मज्ञानी: पुरुष वहाँ आया । उसे देख कर वह चौंक पड़ी । उस आगन्तुक ने रोती और बिलखती हुई उस अबला से मधुर वाणी में कहा-'तू कौन है, अपने को पहचान! क्या तूने मुझे नहीं पहचाना? मैं वही तेरा अविज्ञात नाम का. सखा हूँ । स्मरण करो, सखे! तुम मेरे साथ शान्ति के साथ आनन्द-द्वीप में- रहते थे ।''

जब अविज्ञात ने उसे सचेत किया, तो उसे अपने असली स्वरूप का स्मरण हो आया, और वह विदर्भनन्दिनी अपना रुदन आदि छोड्‌कर अपने वास्तविक रूप में स्थित हो गई । उसका आत्मज्ञान, जो मित्र से विछोह के कारण विस्मृत हो गया था, उसे फिर से प्राप्त हुआ । फिर से वे आनन्द-द्वीप- के अधिवासी हुए ।

प्राचीनबर्हि! यह कथा मैंने आत्मज्ञान का उपदेश देने के लिए सुनाई है । व्यक्तिगत स्वार्थ, विषय-वासना, हिंसा, मद-मत्सर आदि से मनुष्य का कोई कल्याण सिद्ध नहीं होता ।

ऋषि के अन्तिम शब्दों की समाप्ति पर, मंत्र-सुध-से बैठे सुनते हुए उस राजा को फिर एक झटका-सा लगा । महर्षि नारद के कथन की गरिमा से उसका मनोमालिन्य वाष्प बनकर दो अश्रुबिन्दुओं के रूप में पृथ्वी पर टपक पडा ।

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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक 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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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रचनाकार: पुरंजनोपाख्यान / एक पौराणिक कथा-रूपक
पुरंजनोपाख्यान / एक पौराणिक कथा-रूपक
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