किस्सा बचपन का, प्रणाम किया तो मारा घूंसा / संस्मरण / संजय दुबे

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बात जरा पुरानी है, मेरे बचपने की। मैं स्कूल देर से जाना शुरू किया था। शायद जल्दी जाता भी नहीं था। इसीलिए मेरा नाम मेरे घर के ठीक सामने स्थि...


बात जरा पुरानी है, मेरे बचपने की। मैं स्कूल देर से जाना शुरू किया था। शायद जल्दी जाता भी नहीं था। इसीलिए मेरा नाम मेरे घर के ठीक सामने स्थित नगर महा पालिका प्राथमिक विद्यालय में लिखवाया गया था। वह विशुद्ध हिंदी माध्यम का विद्यालय था, तो आप समझ सकते हैं कि वहां का माहौल कैसा रहा होगा। वहां लड़के-लड़कियां सभी पढ़ते थे। अधिकतर गरीब घरों के ही होते थे। कोई यूनिफार्म या ड्रेस का प्रचलन नहीं था।

टाटपट्टी पर बच्चे बैठकर पढ़ते थे। कुर्सी पर सिर्फ अध्यापक ही बैठते थे। वे हमेशा छड़ी लिए रहते थे। फीस न के बराबर थी।
जब विद्यालय में मेरा दाखिला कराया गया था तो मैं शारीरिक रूप से मजबूत था और थोड़ा मोटा भी। हालांकि मुझे यह बिल्कुल याद नहीं है। घर में बातचीत से पता चला। विद्यालय में नियमित रूप से हारमोनियम की धुन पर पूरे राग के साथ प्रार्थना -


'वह शक्ति हमें दो दया निधे, कर्तव्य मार्ग पर डट जाऊं,
परसेवा, परउपकार में हम जग-जीवन सफल बना जाऊं।
हम दीन दुखी निबलों-विकलों के सेवक बन संताप हरें,
जो हैं अटके-भूले-भटके उनके तारे खुद तर जाएं।
छल, दंभ, द्वेष, पाखंड, झूठ, अन्याय से निशिदिन दूर रहें,
जीवन हो शुद्ध सरल अपना नित प्रेम सुधारस बरसाएं।
निज आन-मान मर्यादा का प्रभु ध्यान रहे अभिमान रहे,
जिस देश-जाति में जन्म लिया बलिदान उसी पर हो जाए'

होती थी। इसके बाद राष्ट्रगान होता था।


एक प्रधानाचार्य थे ठाकुर साहब। इसके अलावा श्री शीतला प्रसाद, श्री शशिकांत पांडेय और एक जायसवाल जी अध्यापक थे। एक अन्य अध्यापक भी थे, उनका नाम याद नहीं आ रहा है। श्री हरिनरेश तिवारी चपरासी थे। हम लोग सभी अध्यापकों को पंडित जी कहकर बुलाते थे। यही सिखाया गया था। स्कूल में पांचवीं कक्षा तक ज्ञान भारती नाम की हिंदी पुस्तक, हमारी दुनिया हमारा समाज नाम से एक सामाजिक विषय की किताब (जिसमें इतिहास, भूगोल और नागरिक शास्त्र सभी थे), विज्ञान आओ करके सीखें-नाम की विज्ञान की पुस्तक और एक किताब गणित की थी, संभवतः उसका नाम प्रारंभिक गणित था। अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू आदि विषय नहीं थे। पीटी जरूर होती थी। उस समय एक बार विद्यालय में घंटी बजती थी, जिसका मतलब था कि प्रार्थना होने जा रही है, सब लोग कतार में खड़े हो जाओ और दूसरी बार घंटी बजती थी छुट्टी होने की, जिसका मतलब सबको पता है। उस समय अलग-अलग विषयों के लिए अलग-अलग घंटी नहीं लगती थी, या कान्वेंट स्कूलों की तरह पीरियड जैसा कोई प्रचलन नहीं था। सुलेख और इमला नियमित रूप से लिखवाए जाते थे।


सभी बच्चों के पास लकड़ी की तख्ती होती थी और सफेद खड़िया पानी में घोरकर एक छोटी सी शीशी में रख लेते थे, जिसे दुद्धी कहते थे। उसी से तख्ती पर लिखते थे। पांच घंटे के विद्यालय समय में पांच-छह बार घर भागकर आता था और फिर जाता था। घर विद्यालय के सामने होने से यह फायदा था। छुट्टी के समय सब बच्चे कतार से खड़े होते थे और पंजीरी की तरह सबको दरिया मिलती थी। जब मैं कक्षा दो या तीन में रहा होऊंगा, उस समय शशिकांत पांडेय अध्यापक बार-बार घर जाने पर हमको डंडे से खूब पीटते थे। मेरी जमकर पिटाई हुई है, लेकिन घर भागना कभी नहीं छूटा। उस समय पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को झंडारोहण के बाद प्रभात फेरी निकलती थी। रास्ते में 'झंडा ऊंचा रहे हमारा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा' गाते हुए हम लोग चलते थे। आधा दूर पहुंचने पर जलेबी मिलती थी और विद्यालय लौटने पर एक-एक लड्डू भी।


हिंदी की किताब में पहला अध्याय एक कविता का था-सूरज निकला चिड़िया बोलीं, कलियों ने भी आंखें खोलीं, आसमान में छाई लाली, हवा बही सुख देने वाली। इसी तरह अगली कक्षा में कविता थी-उठो लाल अब आंखें खोलो, पानी लाई हूं मुंह धो लो, बीती रात कमल दल फूले, उनके ऊपर भौरे झूले आदि। किसी कक्षा में हिंदी की पुस्तक में एक कविता थी-रण बीच चौकड़ी भर-भर कर चेतक बन गया निराला था, राणा प्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था-मुझे बहुत अच्छी लगती थी और मैं इसे अक्सर गुनगुनाया करता था। हर शनिवार को बालसभा होती थी, उसमें मैं यह गाया करता था।


गणित के अध्यापक अक्सर बताते थे कि तौल की सबसे छोटी इकाई ग्राम होती है, फिर डेकाग्राम, हेक्टोग्राम और किलोग्राम होता है। इसी तरह नाप की सबसे छोटी इकाई मिलीमीटर होती थी, फिर डेसीमीटर, सेंटीमीटर और मीटर होती है। मुझे यह अच्छी तरह याद रहती थी।


कक्षा चार और पांच में सरकंडे की कलम और स्याही से लिखने का नियम था। हम लोग एक शीशी में नीली स्याही भरकर रखते थे और सरकंडे की कलम से कापी पर लिखते थे। वह गीला रहता था, उस पर खिड़की के पास की धूल डाल देते थे। वह उस गीलापन को सोख लेती थी। फिर उसे झाड़ लेते थे। शायद किसी को विश्वास न हो लेकिन मेरी राइटिंग सबसे अच्छी रहती थी। दो ही चीज में मैं सबसे आगे था। एक राइटिंग और दूसरी पीटी। उस समय लेजिम के साथ नियमित पीटी होती थी। एक बार जिले भर के बच्चों को शहर के साउथ मलाका स्थित विद्यालय में ले जाया गया। हम लोग इक्के में बैठकर वहां गए थे। वहां एक घंटे तक पीटी का कड़ा अभ्यास कराया गया और उसमें मैं जिलेभर में पहले स्थान पर रहा। पीटी के बाद दो-दो केले भी खाने के लिए मिले थे। बाद में मुझे काटन की एक शर्ट और हाफ पैंट दी गई थी।


उस समय सरकारी विद्यालयों में कक्षा पांच और आठ में बोर्ड की परीक्षा होती थी। नैनी के सभी विद्यालयों की परीक्षा मेरे ही विद्यालय में थी। परीक्षा के दिन हम लोग एक बड़ी दफ्ती लेते थे। उस पर रंगीन कागज चिपकाकर देवी-देवताओं की फोटो लगा लेते थे। बचपन में सिखाया गया था कि जब पर्चा मिले तो उसे भगवान को दिखा देना चाहिए। इससे परीक्षा अच्छी होती थी। बहरहाल पांचवीं कक्षा में जब मैं बोर्ड की परीक्षा देने जा रहा था, तो कुछ ऐसा महसूस कर रहा था या अपने को समझता था, जैसा आज कोई आईएएस में प्री और मेन की परीक्षा को सफलतापूर्वक निकाल कर इंटरव्यू देने जाते समय अपने को समझता होगा। परीक्षा के बाद रिजल्ट मिला और मैं उछलते-कूदते घर पहुंचा, क्योंकि मैं बढ़िया से पास हो गया था। इसलिए खूब मस्ती की और आइस-पाइस, अक्कड़-बक्कड़, गिट्टीफोड़ आदि खेला।


गर्मी की छुट्टियों में मैं मजे में रहता था। इस बीच जुलाई आई और मेरी अगली कक्षा में प्रवेश की बात होने लगी। मेरे घर के सामने वाला विद्यालय सिर्फ पांचवी कक्षा तक ही था। बारिश का मौसम होने से नए विद्यालय में मेरा प्रवेश थोड़ा देर से हुआ। मेरे घर से करीब दो किलोमीटर दूर एक विद्यालय था बाल शिक्षा निकेतन जूनियर हाईस्कूल। मेरी मम्मी और भइया मुझे लेकर वहां गए और कक्षा छह में मेरा प्रवेश हुआ। इसके पहले हमने कभी पांचवी कक्षा के आगे का विद्यालय नहीं देखा था। वह थोड़ा बड़ा था और वहां कई अध्यापक थे। वहां बच्चों को ड्रेस पहननी पड़ती थी। पहली बार मुझे भी आसमानी शर्ट और नेवी ब्लू पैंट तथा इलास्टिक लगी हुई टाई पहनने को मिली। एक बैग, एक टिफिन और अंगूर के गुच्छे की तरह लाल रंग का पानी का एक थर्मस भी दिया गया। जूता-मोजा भी था।

मेरा प्रवेश देर से हुआ था, इसलिए पढ़ाई शुरू होने के करीब दस दिन बाद जब मैं पहली बार स्कूल पहुंचा तो वहां के प्रधानाचार्य श्री दशरथ लाल उपाध्याय (जो भूगोल पढ़ाते थे) कक्षा छह में पढ़ा रहे थे। मैंने कक्षा के सामने जाकर उनसे हाथ जोड़कर बोला, पंडितजी प्रणाम। इस पर वे मुझे देखे और एक जोरदार घूंसा मेरे पीठ पर मारे। आप विश्वास करिए, अगर मैं मजबूत शरीर का न होता तो संभवतः बेहोश हो जाता। मैं समझ नहीं पाया कि उन्होंने मुझे क्यों मारा। बाद में मुझे पता चला कि मैंने उन्हें पंडितजी कहकर प्रणाम किया था, इसलिए पीटा गया। इसमें मेरी क्या गलती थी। जहां मैं पहले पढ़ता था वहां सभी अध्यापकों को पंडित जी ही कहा जाता था। नए स्कूल में आधे-आधे घंटे के बाद अलग-अलग विषयों के अध्यापक या अध्यापिकाएं आते थे। हर आधे घंटे पर घंटी लगती थी। हर कक्षा का एक क्लास टीचर होता था। वह सबकी हाजिरी लेता था।

मुझे यह पता ही नहीं था कि टीचर को सर या मैडम कहा जाता था। इससे यहां का माहौल मेरे लिए बड़ा ही असहजपूर्ण था। मैं बहुत चुपचाप और पीछे की सीट पर बैठता था। पहली बार मुझे अंग्रेजी की किताब मिली। कक्षा छह से मैंने एबीसीडी सीखनी शुरू की। स्कूल में लंबी बेंच और डेस्क पर बच्चे बैठते थे। यह भी मेरे लिए अजूबा था, क्योंकि इसके पहले मैं न तो अंग्रेजी पढ़ा था और न ही बेंच और डेस्क पर बैठा था। पुराने विद्यालय में तो टाटपट्टी पर ही बैठाया जाता था। इस तरह का स्कूल पहली बार देखा था। एक खास बात यह थी कि वहां भी पीटी होती थी और मैं उसमें आगे रहता था। वहां लंच का नियम था। इसलिए मुझे भी रोज घर से टिफिन में खाना लाना पड़ता था और आधी पढ़ाई के बाद उसे खाते थे। बाद में सब कुछ ठीक हो गया। मैंने कक्षा आठ में बोर्ड की परीक्षा दी थी। हालांकि मैं पढ़ाई-लिखाई में औसत विद्यार्थी ही रहा और मार भी खूब खाया करता था, लेकिन पता नहीं क्यों मैं कक्षा में कभी भी अपना होमवर्क अधूरा नहीं रखता था। इसलिए होमवर्क के लिए कभी भी मार नहीं खाया। उन दिनों की बातें अब याद कर बहुत अच्छा लगता है।

संजय दुबे
इलाहाबाद।
नाम

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रचनाकार: किस्सा बचपन का, प्रणाम किया तो मारा घूंसा / संस्मरण / संजय दुबे
किस्सा बचपन का, प्रणाम किया तो मारा घूंसा / संस्मरण / संजय दुबे
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