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व्यंग्य / मुफ्त तीर्थ यात्रा के नुस्खे / वीरेन्द्र 'सरल'

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पता नहीं क्यों मुझ पर अभी तक आधुनिकता का रंग नहीं चढ़ पाया है। दिमाग में प्राचीनता का ऐसा नशा छाया है कि सूर्योदय से पूर्व ही बिस्तर छोड़ देन...

पता नहीं क्यों मुझ पर अभी तक आधुनिकता का रंग नहीं चढ़ पाया है। दिमाग में प्राचीनता का ऐसा नशा छाया है कि सूर्योदय से पूर्व ही बिस्तर छोड़ देने का आदी हूँ। फिर बोरियत से बचने के लिए मैंने प्रातःकालीन भ्रमण की बड़ी बुरी आदत भी पाल ली है। भ्रमण के समय बस एक अदद विदेशी नस्ल के कुत्ते की कमी बहुत खलती है। साहब और मेम साहबनुमा लोग जब अपने-अपने कुत्तों के साथ सड़क पर निकलते हैं तो वातावरण एकदम कुत्तामय हो जाता है। लगता है कि आज जमाना कुत्तों का है बस अपने मालिक के सामने दुम हिलाते रहो, उनके कदमों में नाक रगड़ते रहो और असहाय निर्बल, गरीब, बेबस, लाचार पर गुर्राते हुए मौज से जियो। कुत्तों के मामले में आत्मनिर्भरता देख मन गदगद हो जाता है, वाह! कितना तरक्की कर गया अपना देश। भाई सीधी सी बात है जब स्वाभिमान का जंगल सिमटने लगे तो शेर की जगह कुत्तों की आबादी ही बढ़ेगी।

कुछ आवश्यक काम से मुझे कुछ दिनों के लिए अपना गाँव जाना पड़ा पर सुबह भ्रमण की बुरी आदत नहीं छूटी। आज भी मैं प्रातःकालीन भ्रमण के लिए निकला था। अभी अंधेरा छटा नहीं था। वातावरण में हल्का धुंधलका छाया हुआ था कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था। हाँ सन्नाटा पसरा होने के कारण दूर की आवाज भी कुछ-कुछ सुनाई दे रही थी। मैं धीरे-धीरे बढ़ता हुआ ग्राम पंचायत के आसपास पहुँचा ही थी कि एक मंत्र जाप सुनकर मेरे कान खड़े हो गये। कोई 'ओउम सरपंचाय नमः' का जाप कर रहा था। पहले मुझे लगा शायद यह मेरा वहम है। इस तरह कोई संरपच के नाम का जप कोई क्यों करेगा। मैं दबे पांव आगे बढ़कर आवाज को ध्यान से सुनने की कोशिश की। आवाज अब बिल्कुल स्पष्ट सुनाई दे रही थी। बार-बार इसी नाम का जाप किया जा रहा था। अस्पष्ट रूप से दिख रहा था कि एक आदमी अपने एक पैर में खड़े होकर दूसरे पैर को अपने घुटने पर टिका रखा था और आसमान की ओर हाथ उठाकर सूर्य नमस्कार की मुद्रा में ग्राम पंचायत की ओर देखते हुए 'ओउम सरपंचाय नमः' का जाप कर रहा था। सुबह-सुबह उस महापुरूष को छेड़ने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। मैं उससे बिना कुछ पूछे आगे बढ़ गया।

भ्रमण से लौटते समय तक अंधेरा छट गया था। हर चीज स्पष्ट दिखाई देने लगी थी। ग्राम पंचायत के पास से गुजरते हुए मैंने देखा कि बाबू झंझटलाल अपने अर्धनग्न शरीर से बहते हुए पसीने को गमछे से पोंछ रहा था। तपस्या के तेज से उसका चेहरा दमक रहा था। उन्होंने मुझे देखकर मुस्कुराते हुए मेरा अभिवादन किया। मैंने उससे पूछा-''अरे भाई! ये आप किस भगवान की तपस्या कर रहे हैं? एक बात कहूँ बुरा मत मानना। आप जो कर रहें हैं वह तपस्या की बहुत पुरानी पद्धति है। आजकल तो इसकी आवश्यकता भी नहीं है बस सीधे चढ़ौती चढ़ाओ और मनवांछित फल पाओं वाला शार्अकट का जमाना है। अरे! एक बात तो मैं आपसे पूछना ही भूल गया। आखिर आप अपने भगवान से इस तपस्या के बदले क्या वरदान चाहते हैं? उन्होंने कहा-''बस काका! एक गरीबी रेखा का कार्ड बन जाये तो यह जीवन सफल हो जाय और मेरा परिवार भी धन्य हो जाय। आजकल गरीबी रेखा का कार्ड, कार्ड नहीं बल्कि अलादीन का चिराग हो गया है। उससे जो मांगो वही मिल जाता है।'' मैंने कहा-''आप सही कह रहे हैं पर आप तो साधन सम्पन्न हैं। भगवान का दिया हुआ सब कुछ है आपके पास, फिर आपको इसकी क्या आवश्यकता पड़ गई है? भाई! गरीबों का कार्ड गरीबों के लिए ही रहने दो, उनके हक पर क्यों डाका डालते हो?''

झझंटलाल मुझे सिर से पैर तक ऐसे घुरने लगा जैसे मैं कोई एलियन होऊँ। फिर मुझे हिकारत की नजर से देखते हुए बड़े ही नाटकीय अंदाज में बोला-''डाका! अरे वाह! हम यदि शासकीय योजनाओं के लाभ लेने के लिए तिकड़म लगाये तो यह डाका हो गया। और वे क्या हैं जो देश को अरबों-खरबों का चूना लगा कर गधे के सींग की तरह गायब हो जा रहे हैं और चौकीदारी करने वाले उनका मुँह ताकते रह जा रहे हैं। अरे काका! यहाँ तो उजले कपड़ों में अपने काले चरित्र को छिपाये हुए ऐसे-ऐसे खतरनाक डाकू हैं जिनके आगे चम्बल के नामी डाकू भी शर्म से पानी-पानी होकर या तो उनका शिष्यत्व ग्रहण कर ले या शर्म से चूल्लू भर पानी में डूब कर मर जाय। आजकल के डाकू इतना प्यार से गला रेतते हैं कि गर्दन कटने के बाद भी पता नहीं चलता। ऐसे डाकुओं के बारे में कहने के लिए भी कुछ है आप के पास? यहाँ चोर-चोर मौसेरे भाई ही नहीं बल्कि चौंकीदार-चौंकीदार भी चचेरे भाई हैं, समझे आप?''

मैंने उन्हें समझाने की चेष्टा करते हुए कहा-''भाई! ये तो वही बात हुई कि आपकी चौकीदारी में वो देश को इतना चूना लगा गया अब हमारे समय ये इतना चूना लगा गया। हिसाब बराबर हो गया। इसमें हमारे और आपके पास कुछ करने के लिए क्या रह जाता है। मैं मानता हूँ कि गरीबों के लिए बनी योजनाओं का लाभ बहुत से साधन-सम्पन्न लोग उठा रहे हैं। ये ऐसे लोग है जो इतने सिद्धहस्त होते हैं कि कुष्ठ रोगियों के कल्याण के लिए भी कोई अच्छी योजना बने तो उसका लाभ उठाने के लिए अपने आपको परिवार सहित कुष्ठ रोगी भी घोषित करा डाले। यदि मृतकों के लिए कोई योजना बने तो उसका लाभ उठाने के लिए अपना मुत्यु प्रमाण-पत्र तक पेश कर दे। पर इसका ये मतलब तो नहीं कि सब यही करने लगे। आप पढ़े-लिखे समझदार आदमी हैं, आपको ये सब शोभा नहीं देता।''

मैंने झंझट लाल को समझदार कहने की गुस्ताखी क्या कर दी कि मुझ पर आफत टूट पड़ी। वह वैसे ही भड़क गया जैसे ईमानदार कहने पर पुलिस। उसने कहा-''आपको शरम आनी चाहिए। किसको क्या कहना चाहिए इस उमर में भी आपको इसकी तमीज नहीं है। क्या मैं आपको समझदार नजर आता हूँ और फिर पढ़ाई लिखाई का समझदारी से क्या संबंध? यदि देश के पढ़े-लिखे लोग समझदार हैं तो क्या घपला-घोटाला और भ्रष्ट्राचार अनपढ़ लोग कर रहे हैं?

मैं उसके कुतर्क के सामने निरूत्तर हो गया। झंझटलाल से झंझट मोल लेकर कौन झंझट में पड़े यह सोचकर मैं अपनी राह पर आगे बढ़ गया।

इस घटना को एक-दो दिन ही बीते होंगे कि न चाहते हुए भी झंझट लाल से मेरा फिर सामना हो गया। अपनी दाढ़ी बनवाने के लिए मैं सेलून पहुँचा तो देखा कि झंझटलाल अपने बालों को काला कराने के बजाय सफेद करा रहा था। मैं उसे इतना आश्चर्य से देख रहा था कि किसी ठेकेदार को पूर्ण गुणवत्ता और निर्धारित मापदंड के आधार पर काम कराते हुए देख रहा होऊँ, पर मैं चुप रहा। उसकी नजर मुझ पर पड़ी तो वह फिर चालू हो गया। बोला-'' मुझे ऐसे क्यों घूर रहे हैं। आपको मालूम है सरकार अभी वृद्धजनों के लिए कितनी तरह की योजनाएं चला रही है। भाई हम तो समय के साथ चलने वालों में से एक हैं। समय के साथ रंग बदलने में हमें महारत हासिल है। युवाओं के लिए कोई योजना बने तो बाल काले करा लिए और बुजुर्गों के लिए कोई अच्छी योजना हो तो बाल सफेद करा लिए। फर्जी प्रमाण-पत्र बनाने के लिए दो-चार एक्सपर्ट पाल रखे हैं। उनके आगे कुछ टुकड़े फेंको तो वे तुरन्त सामने आकर हुकुम मेरे आका कहते हुए दुम हिलाने लगते हैं। मैं झंझटलाल के मुँह नहीं लगना चाहता था पर वह चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था। आखिर मुझे भी मुँह खोलना ही पड़ा और उसे जवाब देने के लिए कमर कसकर तैयार होना पड़ा। मैंने कहा-'' भाई! यहाँ तो सब अपने आप को ईमानदार नम्बर वन जतलाते हैं, लगता है आप भी उन्हीं में से एक हैं। मगर एक बात कान खोलकर सुन लीजिए, पीतल पर सोने का मुल्लमा ज्यादा दिनों तक चढ़ा नहीं रह सकता। कभी न कभी तो पोल खुल ही जाती है। जब तुम्हारी कलई खुलेगी तब लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचेंगे, पता है। इससे आपका असली चरित्र सबके सामने आ जायेगा, समझे।''

झंझटलाल खंभा नोचने वाली खिसियानी बिल्ली की तरह चरित्र शब्द का उपहास उड़ाते हुए बोला-''काका! आपको बहुत बड़ी गलतफहमी है। अब आदमी का चरित्र उसके आचरण से नहीं बल्कि प्रमाण-पत्र से तय होता है। यहाँ तो चोर, डाकू, अपराधी, दागी भ्रष्ट्राचारी सबके के लिए चरित्र प्रमाण-पत्र जारी होता है मतलब सब के सब चरित्रवान है उसके बाद भी देश और समाज की आज क्या स्थिति है इसे आप और हम भलिभांति जानते और समझते हैं। अब आपके पास और कुछ कहने के लिए है तो कहिए वरना मुँह बंद रखिए।'' झंझटलाल की बातें सुनकर मेरा मुँह वैसा ही खुला रह गया जैसे किसी मतदाता के मत से चुनाव जीते हुए नेता की झिड़की सुनकर मतदाता का मुँह खुला रह जाता है। झंझट लाल से मुँह लगने की मेरी रही-सही हिम्मत भी जाती रही। मैं अपना सा मुँह लिए सेलून से निकल आया और घर लौटने लगा।

झंझटलाल के घर के पास से गुजर रहा था तो उसकी पत्नी की कर्कश आवाज सुनाई दी जो किसी से बहस करते हुए कह रही थी कि मेरी उम्र पैंसठ वर्ष है मतलब है। इसके लिए उमं प्रमाण-पत्र की क्या आवश्यकता है। मैं जो कह रही हूँ वही सही है। आपके इस सरकारी फार्म में स्पष्ट लिखा है कि उत्तरदाता जो उत्तर दे वही सही है। मैं जो अपनी उम्र बता रही हूँ, आप उसे ही इस फार्म पर लिखिए। अगर-मगर करके मुझसे बहसबाजी मत कीजिए वरना मैं आपके विरूद्ध उच्च कार्यालय में शिकायत कर दूंगी फिर मत कहना। आवाज सुनकर जिज्ञासावश कुछ देर वहीं ठिठक गया। कुछ ही देर में एक बदहवास सा आदमी उस घर से बड़बड़ाते हुए निकला। वह बड़बड़ा रहा था कि अजीब औरत है देखने में तो तीस-पैंतीस से ज्यादा की नहीं लगती और अपने आप को पैंसठ का बताती है।

उस आदमी की दशा और दुर्दशा के साथ ही उसके हाथों में रखे थैले से मैं समझ गया था कि यह कोई सरकारी शिक्षक है और किसी सर्वे के सिलसिले में यहाँ आया है। तभी इस अंदाज में झंझटलाल की पत्नी के द्वारा इसकी पूजा-आरती की गई है और कोई दूसरा कारण मुझे समझ में नहीं आया। मुझे डर भी लग रहा था यदि इस झंझट दम्पति के झमेले में पड़ने से कहीं मेरी भी तबीयत से स्वागत सत्कार न हो जाय। इस डर से में आगे बढ़ गया। मेरे सिर पर झंझटलाल की बातों का भूत इस कदर सवार हो गया था कि मैं सपने में भी उसकी जिक्र आने से आतंकित हो जाया करता था। इसलिए हमेशा झंझट दम्पति से एक निश्चित दूरी बनाये रखता था। अपने गाँव का कार्य निपटाकर मैं पुनः शहर लौट आया और इस घटना को लगभग भूल गया।

चार-छै महीने के बाद मुझे फिर कोई आवश्यक काम से गाँव जाना पड़ा। घर पहुँचते ही पता चला कि झंझटलाल के घर कथा-पूजन का आयोजन है। कथा-पूजन का कारण पूछने पर पता चला कि झंझट दम्पति मुख्यमंत्री वृद्धजन तीर्थ योजना का भरपूर लाभ उठाते हुए क्रमशः चारों धाम की यात्रा पूर्ण कर चुके हैं और वृद्धावस्था पेंशन योजना के लाभ से लाभान्वित हो रहे हैं। मुझे लगा अरे ये झंझट लाल तो जुगाड़ तकनीकी के विशेषज्ञ है। अयोग्य होते हुए भी शासकीय योजनाओं का भरपूर लाभ उठाने में माहिर। इनका तो सार्वजनिक अभिनंदन होना चाहिए। इन्हें किसी राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया जाना चाहिए। जय हो झंझट दम्पति की।

भाई! मुझे तो केवल एक झंझट दम्पति के पावन चरित को जानने और लिखने का परम सौभाग्य मिला है। पता नहीं देश में ऐसे कितने है? अपने आसपास जरा गौर से देखिए तो सही। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप एक ढूंढेंगे तो हजार मिलेंगे।

वीरेन्द्र सरल

ग्राम-बोड़रा( मगरलोड़)

जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)

मोबाइल- 7828243377

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रचनाकार: व्यंग्य / मुफ्त तीर्थ यात्रा के नुस्खे / वीरेन्द्र 'सरल'
व्यंग्य / मुफ्त तीर्थ यात्रा के नुस्खे / वीरेन्द्र 'सरल'
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