प्राची - नवंबर 2016 - त्रिलोचन की कुछ कवितायें /चयन : श्याम सुशील

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त्रिलोचन की कुछ कवितायें चयन : श्याम सुशील ध्वनिग्राहक ध्वनिग्राहक हूं मैं. समाज में उठने वाली     ध्वनियां पकड़ लिया करता हूं. इस पर कोई...

त्रिलोचन की कुछ कवितायें

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चयन : श्याम सुशील

ध्वनिग्राहक
ध्वनिग्राहक हूं मैं. समाज में उठने वाली
    ध्वनियां पकड़ लिया करता हूं. इस पर कोई
    अगर चिढ़े तो उसकी बुद्धि कहीं है खोई
कहना यही पड़ेगा. अगर न हो हरियाली
कहां दिखा सकता हूं? फिर आंखों पर मेरी
    चश्मा हरा नहीं है. यह नवीन ऐयारी
    मुझे पसंद नहीं है. जो इसकी तैयारी
करते हों वे करें. अगर कोठरी अंधेरी
है तो उसे अंधेरी समझाने-कहने का
    मुझको है अधिकार. सिफारिश से, सेवा से
    गला सत्य का कभी न घोटूंगा. मेवा से
बरंब्रूहि न कहूंगा और न चुप रहने का.
    लड़ता हुआ समाज, नई आशा अभिलाषा,
    नए चित्र के साथ नई देता हूं भाषा.


(दिगंत से)
उस जनपद का कवि हूं

उस जनपद का कवि हूं जो भूखा-दूखा है,
नंगा है, अनजान है, कला-नहीं जानता
कैसी होती है क्या है, वह नहीं मानता
कविता कुछ भी दे सकती है. कब सूखा है
उसके जीवन का सोता, इतिहास ही बता सकता है. वह उदासीन बिल्कुल अपने से,
अपने समाज से है, दुनिया को सपने से
अलग नहीं मानता, उसे कुछ भी नहीं पता
दुनिया कहां से कहां पहुंची, अब समाज में
वे विचार रह गए नहीं हैं जिनको ढोता
चला जा रहा है वह, अपने आंसू बोता
विफल मनोरथ होने पर अथवा अकाज में.
धरम कमाता है वह तुलसीकृत रामायण
सुन-पढ़कर, जपता है नारायण नारायण.
(‘उस जनपद का कवि हूं’ से)


अपराजेय
हिंदी की कविता, उनकी कविता है जिनकी
    सांसों को आराम नहीं था, और जिन्होंने
    सारा जीवन लगा दिया कल्मष को धोने
में समाज के, नहीं काम करने में घिन की
कभी किसी दिन. हिंदी में सतरंगी आभा
    विभव भूति की नहीं मिलेगी, जन जीवन के
    चित्र मिलेंगे, घर के वन के सबके मन के
भाव मिलेंगे, बोए हुए खेत में डाभा
जैसे एक साथ आता है, कुछ ऐसे ही
    वातावरण एक से भावों से छा जाता
    है, फिर प्राणों-प्राणों में एकत्व दिखाता.
नेह उमड़ आए तो दूर कहां है नेही.
    भाव उन्हीं का सबका है जो थे अभावमय,
    पर अभाव से दबे नहीं जागे स्वभावमय.
(दिगंत से)


हंसकर, गाकर और खेलकर
हंसकर, गाकर और खेलकर पथ जीवन का
अब तक मैंने पार किया है, लेकिन मेरी
बात और है, ढंग और है मेरे मन का,
उसी ओर चलता है जिधर निगाह न फेरी
दुनिया ने. दुखों ने कितनी आंख तरेरी,
लेकिन मेरा कदम किसी दिन कहीं न अटका-
घोर घटा हो, वर्षा हो, तूफान, अंधेरी
रात हो. अगर चलते-चलते भूला-भटका
लगा नहीं. जो गिरता-पड़ता आगे बढ़ता
है, करता कर्तव्य है, उसे किसका खटका,
पग-पग गिनकर पर्वत-श्रृंगों पर हूं चढ़ता.
आभारी हूं मैं, पथ के सब आघातों का,
मिट्टी जिनसे वज्र हुई उन उत्पातों का.
(‘अनकहनी भी कुछ कहनी’ से)

बिस्तरा है न चारपाई है
बिस्तरा है न चारपाई है.
जिंदगी खूब हमने पाई है.

कल अंधेरे में जिसने सर काटा,
नाम मत लो हमारा भाई है.

ठोकरें दर-ब-दर की थी हम थे,
कम नहीं हमने मुंह की खाई है.

कब तलक तीर वे नहीं छूते,
अब इसी बात पर लड़ाई है.

आदमी जी रहा है मरने को,
सबसे ऊपर यही सचाई है.

आदमी जी रहा है मरने को,
सबसे ऊपर यही सचाई है.

कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम,
धुन कहां वह संभल के आई है.

‘गुलाब और बुलबुल’ से


कोई दिन था जबकि हमको भी बहुत कुछ याद था
कोई दिन था जबकि हमको भी बहुत कुछ याद था
आज वीराना हुआ है, पहले दिन आबाद था.
अपनी चर्चा से शुरू करते हैं अब तो बात सब,
और पहले यह विषय आया तो सबके बाद था.
गुल गया, गुलशन गया, बुलबुल गया, फिर क्या रहा
पूछते हैं अब वे ठहरा किस जगह सैयाद था.
मारे मारे फिरते हैं उस्ताद अब तो देख लो,
मर्म जो समझे कहे पहले वही उस्ताद था.
मन मिला तो मिल गये और मन हटा तो हट गये,
मन की इन मौजों से कोई भी नहीं मतवाद था.
रंग कुछ ऐसा रहा और मौज कुछ ऐसी रही,
आपबीती भी मेरी वह समझे कोई वाद था.
अन्न-जल की बात है, हमने त्रिलोचन को सुना,
आजकल काशी में है, कुछ दिन इलाहाबाद था.
‘गुलाब और बुलबुल’ से


चम्पा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती
चम्पा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती
मैं जब पढ़ने लगता हूं वह आ जाती है
खड़ी-खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता हैः
इस काले चीन्हों से कैसे ये सब स्वर
निकला करते हैं

चम्पा सुंदर की लड़की है
सुंदर ग्वाला है : गायें-भैंसें रखता है
चम्पा चौपायों को लेकर
चरवाही करने जाती है

चम्पा अच्छी है
    चंचल है
नटखट भी है
कभी-कभी वह कलम चुरा देती है
जैसे-तैसे उसे ढूंढ़कर जब लाता हूं
पाता हूं- अब कागज गायब
परेशान फिर हो जाता हूं

चम्पा कहती है :
तुम कागद ही गोदा करते हो दिन-भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है

उस दिन चम्पा आयी, मैंने कहा कि
चम्पा तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है
सब जन पढ़ना-लिखना सीखें

चम्पा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढ़ूंगी
तुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने-लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ूंगी

मैंने कहा कि चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा, तुम गौने जाओगी
कुछ दिन बालम संग-साथ रह चला जायेगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे संदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!

चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो, देखा,
हाय राम, तुम पढ़-लिखकर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करूंगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग-साथ रखूंगी
कलकत्ता मैं कभी न जाने दूंगी
कलकत्ते पर बजर गिरे!


दीवारें दीवारें
दीवारें दीवारें दीवारें दीवारें
चारों ओर खड़ी है. तुम चुपचाप खड़े हो
हाथ धरे छाती पर, मानो वहीं गड़े हो.
मुक्ति चाहते हो तो आओ धक्के मारे
और ढहा दें. उद्यम करते कभी न हारें
ऐसे-वैसे आघातों से. स्तब्ध पड़े हो
किस दुविधा में? हिचक छोड़ दो जरा कड़े हो.
आओ अलगाने वाले अवरोध निवारें.
बाहर सारा विश्व खुला है, वह अगवानी
करने को तैयार खड़ा है पर यह कारा
तुमको रोक रही है क्या तुम रुक जाओगे?
नहीं करोगे ऊंची क्या गरदन अभिमानी?
बांधोगे गंगोत्री में गंगा की धारा
क्या इन दीवारों के आगे झुक जाओगे?
(उस जनपद का कवि हूं)

कविताएं हाथ हैं पांव हैं
कविताएं रहेंगी तो
सपने भी रहेंगे

जीने के लिए
सपने सभी को
आश्वासन देते हैं
भंवर में झकोरे
खाती नाव को
जैसे-तैसे
उबार लेते हैं.

कविताएं
सपनों के संग ही
जीवन के साथ हैं
कभी-कभी पांव हैं
कभी-कभी हाथ हैं.
‘मेरा घर’ से

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त्रिलोचन की एक अवधी कविता
कहेन किहेन जेस तुलसी तेस केसे अब होये

कहेन किहेन जैस तुलसी तैस कैसे अब होये.
कविता केतना जने किहेन हैं आगेउ करिहैं,
अपनी अपनी बिधि से ई भवसागर तरिहैं,
हमहूं तौ अब तक एनहीं ओनहीं कै ढोये,
नाइ सोक सरका तब फरके होइ के रोये.
जे अपनइ बूड़त आ ओसे भला उबरिहैं
कैसे बूड़इवाले संग.संग जरिहैं मरिहैं
जे, ओनहीं जौं हाथ लगावइं तउ सब होये.
तुलसी अपुनां उबरेन औ आन कं उबारेन.
जने.जने कइ नारी अपने हाथेन टोयेन,
सबकइ एक दवाई राम नाम मं राखेन,
काम क्रोध पन कइ तमाम खटराग नेवारेन,
जवन जहां कालिमा रही ओकां खुब धोयेन.
कुलि आगे उतिरान जहां तेतना ओइ भाखेन.


 


अगर चांद मर जाता
त्रिलोचन

 

 


अगर चांद मर जाता
झर जाते तारे सब
क्या करते कविगण तब?

खोजते सौन्दर्य नया?
देखते क्या दुनिया को?
रहते क्या, रहते हैं
जैसे मनु-य सब?
क्या करते कविगण तब?

प्रेमियों का नया मान
उनका तन-मन होता
अथवा टकराते रहते वे सदा
चांद से, तारों से, चातक से, चकोर से
कमल से, सागर से, सरिता से
सबसे
क्या करते कविगण तब?
आंसुओं में बूड़-बूड़
सांसों में उड़-उड़कर
मनमानी कर-धर के
क्या करते कविगण तब
अगर चांद मर जाता
झर जाते तारे सब
क्या करते कविगण तब?

नाम

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: प्राची - नवंबर 2016 - त्रिलोचन की कुछ कवितायें /चयन : श्याम सुशील
प्राची - नवंबर 2016 - त्रिलोचन की कुछ कवितायें /चयन : श्याम सुशील
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