विज्ञान कथा / अन्तरिक्षचारिणी / डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय

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    अक्तूबर १०, प्रीन आम किमजी, शाम ५ बजे : हर दिन की तरह आज भी किमजी की पहाडियों पर उष्मा का नतर्न हो रहा था। चारों ओर प्रकृति का सौंदर...

    हंस मिलन कुमार की कलाकृति

अक्तूबर १०, प्रीन आम किमजी, शाम ५ बजे :

हर दिन की तरह आज भी किमजी की पहाडियों पर उष्मा का नतर्न हो रहा था। चारों ओर प्रकृति का सौंदर्य टूरिस्टों पर अपना सम्मोहक प्रभाव दिखा रहा था। सिटी सेन्टर पर भीड थी। गोयथे-इंस्टीट्यूट में जरमन भाषा सीखने वालों की भीड़ जो अपलक नेत्रों से किमल्ली झील की सुन्दरता उसमें पैडिल बोटों पर घूमते हुए लोगों को निरख रही थी। उस झील के मध्य में निर्मित सुन्दर किले पर प्रकाश की छटा उसे परीलोक का दुर्ग होने का भ्रम उत्पन्न कर रही थी।

ऐसे वातावरण में रहते हुए वृद्ध क्लूगे का मन अवसाद से भारी था। उन्हें प्रकृति का सौंदर्य बोझिल लग रहा था और उन्हें लोगों की. उन्मुक्तता भयभीत कर रही थी। वे अपने अस्सी वर्ष के पूर्ण हो जाने के प्रभाव से घबरा रहे थे। इसी कारण वे अपने छोटे से मकान के गेट पर खड्डे रहते हुए भी कहां दूर खोये हुए थे।

जीवन के बीते हुए दिनों को वे याद कर रहे थे। उस समय वह सारा वातावरण, किमजी झील में तेजी से घूमती हुयी रंग बिरंगी .प्रालों वाली नौकाएं, पहाडों पर गिरती बर्फ, साथ में पास के पब से उडती मशहूर बायरिशे बियर की सुगंधि और सुन्दर बाबेरियन स्वियाँ, उसे जीवन जीने में सहयोग करती थीं। परन्तु अब.......! अपने एकाकीपन से ऊब कर एक दिन वह पास पार्क में पडी बेंच पर बैठी सुन्दर स्त्री के बगल में जा बैठे उसने उस स्त्री से सुन्दर मौसम की चर्चा की, पर उसका कोई उत्तर न देकर, वह प्रस्तर प्रतिमा सी बैठी रही । एकाकीपन झेल रहे क्लूगे के दूसरे शब्द को सुनकर, वह तेजी से पर्स का उठाकर, झटके से उठकर, चल दी। तुरंत क्लूगे को लगा कि उसने फिर गलती कर दी। पर अब विकल्प ही क्या था। उसे वृद्धावस्था पर क्रोध आ गया था। वह उदास हो गया था। एकाकी होना उसे अभिशाप लगा। वह अवसाद से निकलने के प्रयास में असफल होकर वह उसी में डूब गया। वह गेट से हटकर अपनी इजी चेयर पर बैठ गया। उसने इस दुनिया की निष्ठुरता को पुन: न देखने की आशा में, अपने नेत्रों को बन्द कर लिया।

उसके जरमन शेफर्ड सीजर की गुर्राहट ने उसकी आंखें खोलने पर बाध्य कर दिया। सीजर खडा हुआ था, किसी की आवाज पर। परन्तु क्लूगो को कोई आसपास दिख नहीं रहा था।

उसने स्नेह से सीजर के सर को सहलाया। उसके बाल अभी भी मुलायम थे, पर वे पहले की भांति घने नहीं रह गए थे। उसके बालों की चमक भी घट गयी थी।

क्लूगे उसकी आयु के विषय में सोचने लगे। उन्हें ध्यान आया कि वे सीजर को अपने एक मित्र के यहां से बारह वर्षों पूर्व लाए थे।

बारह वर्ष का हो गया सीजर। आयु में बडा है यह। क्लूगे अपने आप बोल उठे 'मेरे साथ रहने के कारण तुम एकाकी नहीं हो, बहुत ही वफादार हां तुम सीजर ।'

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सीजर कानों को खडा किये कुछ सुन रहा था। वह हल्के हल्के गुर्रा रहा था। उसकी आंखें क्रोध से लाल हो गयी थीं।

एकाएक क्लूगे की लगा कि उसका शरीर और मस्तिष्क जडवत हो गया है। उसे लग: कि तैसे कोई उसके शरीर को ऊपर खींच रहा हो, उसे पसीना आ गया वह घबरा गया था। मौत-मृत्यु नहीं.... अभी नहीं.... ¦ उसका हाथ हवा में अपने आप उठ गया। वह देख रहा था कि उसका हाथ विचित्र मुद्रायें बना रहा है। उसे लगा कि उसका दाहिना हाथ और उंगलियां भऱरत-नाट्यम की मुद्रायें बना रहे हैं ¦ क्या मेरा मास्तिष्क कहीं खो गया है। चिन्तित चकित भयभीत क्लूगे ने सोचा

नहीं ऐसा कुछ भी नही है'' के शब्द उसके मस्तिष्क में झनझना उठे।

अक्तूबर १०, प्रीन आम किमजी, शाम ५:३० बजे :

' क्लूगे चैतन्य हुआ। सुदूर गगन में गतिमान एक सफेद बादल के टुकडे पर उसकी आंखें टिक गयी, जैसे वह उसमें छिपे किसी संकेत को पढ़ने का प्रयास कर रहा हो। उसका सर उसी प्रकार झनझना रहा था। जैसे किसी ने शक्तिशाली जड़ दिया हो। उसके हृदय की धड़कन बहुत बढ़ गयी। परन्तु वह संयत होने का प्रयास कर रहा था।..... धीरे-धीरे अपने मस्तिष्क में गूँज रहे उस अज्ञात उद्भव के शब्दों को स्पष्ट करने का प्रयास कर रहा था। उसे लगा कि वह स्वप्न से जाग उठा है।

'तो तुम अन्तरिक्षचारी हो, मेरे मस्तिष्क में तुमने अपना वास बना लिया है'' कहते हुए अपने परिवर्तित स्वर में बोलते हुए वह रुक गया।

उसकी दृष्टि किमजी झील में चल रही नावों में बैठे हयूमनायडों पर टिक गयी। उनमें और कुल पलों में पूर्व देखे गये मानवों में कोई साम्य नहीं था।

.आन्तरिक्षचारियों का इस स्थान पर स्वागत है उसने जोर से कहा। परन्तु इन शब्दों के उच्चारण के बाद वह भ्रमित सा हो गया।

'क्या तुम इस धरा के जीव नहीं हो?' उसके मस्तिष्क में ध्वनि गूँजी |

'हाँ मैं इस धरा का पृथ्वी का वासी था, अनेक वर्षों तक, परन्तु अब अस्सी वर्ष की आयु प्राप्त करने के उपरान्त, मैं स्वयं को भू को इस धरा का वासी नहीं मानता हूँ। क्योंकि मैं इतना एकाकी हूँ अथवा दूसरे शब्दों में मेरे जैसे अनेक व्यक्ति इसी एकाकीपन से घबराकर अपने को इस पृथ्वी का प्राणी मानने में संशय करते हैं। कभी कभी ऐसा लगता है कि हम किसी वीरान ग्रह पर वास कर रहे हों। यहां का जीवन हमारे ऐसे लोगों के बिना भी चल रहा है। हम तो पूरी तरह से अस्तित्व विहीन से हैं। इसी कारण मैं अपने को तुम्हारी भांति मानता हूँ।''

"ओह ! तो यह बात है'' उसके मस्तिष्क से ध्वनि आती लगी।

"तुम में और मुझ में मात्र एक ही अन्तर है। तुम्हारा मुझसे संपर्क करना, मेरे मस्तिष्क में रहना, एक चमत्कारिक घटना मीडिया के लिए बन सकती है। परन्तु मेरा अस्तित्व नगण्य है। मेरे जैसे करोडों हैं, इस पृथ्वी पर।

"तुम्हारे शब्द कटुता से भरे हुए हैं।'

""तुम सही समझे, मेरे भीतर एकाकी होने, किसी के योग्य न होने की भावना का विष भरा हुआ है।'

"'तुम सम्पन्न हो, शिक्षित हो और प्रीन-आम किम जी जैसे रमणीक स्थान पर निवास करने हुए भी तुम दुखी हो?' .

" 'हाँ तथ्यत: मैं बहुत ही दुखी व्यक्ति व्यक्ति हूँ। मैंने अपने इस दुख की भावना को, मन से निकाल फेंकने के अनेक प्रयास किये, परन्तु मैं सफल न हो सका। सुनो! जब मैं एक सुन्दर युवक-युवती और उनके बच्चों को देखता हूँ, मेरा दर्द . मेरी पीडा उभर आती है।' कहते हुए क्लूगे के आंसू लुढकते हुए नीचे आ गये। उसने अपनी रूमाल से उनको पोंछा और कुछ ठिठकते हुए, रूमाल को ठीक से फोल्ड कर अपनी पाकेट में रख लिया। '. अरे! तुम रो रहे हो' उसके मस्तिष्क में अंतरिक्षचारी की ध्वनि गूँजी पर', इस प्रकार अब तुम्हारा मानसिक तनाव कुछ अंश तक घट जायेगा।

अक्तूबर ११, प्रीन आम किमजी, प्रात: ८ बजे :

सदा की भांति प्रात: काल भ्रमण से वापस आने के बाद क्लूगे कैफे- किमजी में नाश्ता करने गया। वह अपनी प्रिय टेबिल जो केफे के बालकनी से झील का सुन्दर नजारा दिखाती थी, पर बैठ गया। उसकी थकान को झील की तरफ से आ रही मंद वायु ने बहुत कुछ दूर कर दिया था। धीरे-धीरे चलता हुआ वह काउन्टर से काफी लेकर वापस आ रहा था। उस समय उसका हाथ कांपने लगा।

वह समझ गया कि ऐसा क्यों है।

"तुम घबराओ मत', उसके मस्तिष्क में ध्वनि गूंजी ।

"मैं तुम्हारी उपस्थिति जान गया था, तुम मेरे प्रत्येक कार्यकलाप पर दृष्टि रखने लगे हो। तुम मेरे मस्तिष्क का एक रिफरेंस पुस्तिका की भांति प्रयोग कर रहे हो। तुम मेरे शरीर और मन पर अधिपत्य जमाए बैठे हो।' '

'मेरा यही कार्य है, मैं इसी को करने के लिए धरा पर आया हूँ। तुम्हारे ऐसे व्यक्ति को मेरी प्रत्येक आज्ञा माननी होगी। ठीक उसी प्रकार जैसे सीजर तुम्हारे हर आदेश को मानता है।'

क्लूगे का काफी कप पकडे हुए, दाहिना हाथ काँपने लगा। उसे बाये हाथ में पकडड कर, वह सावधानी से अपनी टेबिल पर जा बैठा। कुछ शक्ति की अनुभूति उसे, काफी के सिपों के बाद, आती प्रतीत हुयी। तुम्हारा क्रीत-दास नहीं हूँ, गुलाम नहीं हूँ" उसने दहाइते हुए कहा।

ब्रेकफास्ट लेते हुए लोग चौंक कर उसे देखने लगे। उसके मस्तिष्क में सीजर की गुर्राहट गूँज उठी। अन्तरिक्षचारी उसे चिढ़ा रहा था।

अक्तूबर १२, प्रीन आम किमजी, प्रात: ६ बजे :

क्लूगे रात्रि मैं आराम में सोया। प्रात: काल उसने अपने एकाकीपन को दूर करने के लिए सम्पर्क करने की इच्छा की थी। इसी कारण ब्रेक फास्ट करने समय उसने अपने दाहिने हाथ को ऊपर उठाकर अपने मन में कहा - कल की बात को कल के साथ समाप्त करो। क्या तुम मुझसे बातें करना नहीं चाहोगे? तुम तो हमारी आकाशगंगा के अन्तरतारकीय यात्री हो, व्यवहार कुशल हो। तुम इस समय हो कहाँ?"

उसका दाहिना हाथ ऊपर उठा था। उसने उस हाथ को धीरे से नीचे कर दिया। उसका ब्रेक फास्ट आ गया था। काफी सिप करने हुए उसकी दृष्टि किम जी झील के मध्य स्थित किले के पास तैरते हुए बत्तकों और हंसों के झुण्ड एक गयी। वे सभी प्रसन्नता से झील के नीलम के रंग के पानी में डुबकियाँ लगा रहे थे। उनके घवल-श्वेत बिम्ब जल के स्थिर हो जाने पर नैनाभिराम लगते थे।

अन्यमनस्क सा वह काफी पीने के बाद झील के किनारे टहलने निकल पडा। उसकी आयु अथवा उससे दस-पांच वर्ष इधर उधर के स्त्री-पुरुष झील के किनारे लगी बेंचों पर बैठे प्रकृति की छटा निरख रहे थे।

एक बार उसक मन हुआ कि किसी से बेंच पर बैठ कर बातें की जायें, पर न जाने क्यों उसे घूमना अधिक प्रिय लगा।

अक्तूबर १२, प्रीन आम किमजी, शाम ८ बजे :

क्लूगे के मस्तिष्क पर नियंत्रण किये अन्तरिक्षचारी के लगातार प्रलाप, संदेश, आदेश, अनुरोध और कभी कभी क्लूंगे द्वारा किये गये प्रतिरोधों के उत्तरों ने, उसे बुरी तरफ थका दिया था। कई घण्टों तक किसी अज्ञात भाषा में, पूर्ण रूपेण मानव के लिए अपरिचित भाषा में बातें करते, क्लूगे को लगा कि कहीं वह शाइजोफ्रेनिक, अथवा विक्षिप्त तो नहीं हो गया है। वह उठकर अपनी प्रिय इजीचेयर पर बैठ गया। तनाव का परिष्कार करने हेतु उसने अपने सिटिंग रूम की खिडकियों को खेल दिया। अब उसे लग रहा था कि उसकी शक्ति कितनी घट गयी है, जैसे किसी ने उसका आपरेशन कर दिया हो। चारों तरफ सन्नाटा था, चिड्रियों की चहचहाट उसे कभी कभी भंग कर देती थी। क्लूगे आंखे बन्द कर बैठा था। उसे शान्ति की अनुभूति हो रही थी।

''लगता है तुम थक गए' उसके मस्तिष्क में ध्वनि गूँजी ।

'. हाँ | मैं थक गया हूँ, तुम भी मौन हो जाओ' क्लूगे ने थके स्वर से उत्तर दिया।

'वास्तव में मैं भी थक गया हूँ" अन्तरिक्षचारी की आवाज उसके मस्तिष्क में पुन: गूँजी।

अन्तरिक्षचारी भी थक सकता है, इसकी कल्पना क्लूगे ने नहीं की थी। उसे तो अन्तरिक्षचारी अतीव शक्तिमान, बुद्धिमान और अन्तरिक्ष यात्राओं का विशेषज्ञ लगा था। यह अलग बात थी कि उसके शरीर के विषय में. क्लूगे नहीं जानता था पर उसके मस्तिष्क तो है ही, यह निश्चित था। मस्तिष्क थक सकता है। इस दृष्टि से अन्तरिक्षचारी की बात सही हो सकती है।

''मुझे अपनी बातों से निर्देशों से थका देने के बाद तुम भी थक गये, मुझे प्रसन्नता है। तुम्हें थकना आवश्यक था। इस पृथ्वी. पर तुमको किसी ने बुलाया नहीं था, और न किसी ने तुम्हें हमारी प्रौद्योगिकी की प्रगति का अध्ययन करने के लिए निमंत्रण ही दिया था। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि तुम किस लिए आये हो यहां पर?" क्लूगे ने कहा।

'मैं अपने दायित्व का निर्वाह कर रहा हूँ। हमारे ग्रह से अनेक व्यक्ति (?) हाँ, तुम मुझे व्यक्ति कह सकते हो, अदृष्य व्यक्ति, मस्तिष्क पर नियंत्रण करने वाले व्यक्ति, आकाशगंगा की उन्नत सभ्यता वाले ग्रहों पर यात्रा करते हैं।'

''तुम्हारी तरह?" चकित भाव से क्लूगे ने पूछा।

'तुम ठीक समझे।"

'यह एकत्रित सूचनाएँ तुम अपने ग्रह पर किसको प्रेरित करते हो।' '

गीगा को।

''गीगा कौन है?"

'मानव की दृष्टि से अदृष्य रहकर कार्य करने वाला।

'यंत्र अथवा उन्नत मस्तिष्क!''.

'तुम दोनों कह सकते हो' हँसने का, प्रथम बार, हँसने का प्रयास करते हुए अन्तरिक्षचारी ने उत्तर दिया।

'आज की वार्ता को मैं समाप्त. करना चाहता हूँ, कुछ संदेश आ रहे हैं। मैं कल प्रात: कल ६ बजे सम्पर्क करूँगा"

सुन कर क्लूगे ने गहरी साँस ली।

वह टहलता हुआ अपने प्रिय रेस्ट्रां ''होख श्वान" जो झील के दूसरे छोर पर था में जा पहुंचा।

शाम का डिनऱ वह यहीं लेता था। वेटर उसे पहचानता था। 'गुटेव आवेन्द ! हर क्लूगे" के अभिवादन के साथ उसे उसी निश्चित चेयर पर बैठने का संकेत कर, मीनू कार्ड पकड़ा दिया। . वेटर- गारसॉ के आते ही क्लूगे ने उसको ''कापूसीनों"' लाने का आर्डर दिया। ''सुबीतो सीन्योर" कहते. हुए इटैलियन वेटर मुस्कुराया और उसकी टेबिल पर 'कापूसीनों' की बाटल और ग्लास रख दिया। क्लूगे आज अपनी मानसिक थकान दूर करना चाहता था जो अन्तरिक्षचारी से कभी जरमन तो कभी अंग्रेजी और कभी किसी अज्ञात भाषा में बातें करने के परिणाम स्वरूप उत्पन्न हुई थी।

उसने गॉरसां के आते ही फुल प्लेट रैवीओली का आर्डर दिया और 'होनिंग-साकेल' वाइन का। आज उसमें बहुत दिनों के बाद जिजीविषा जागृत हुयी थी। वह भोजन और वाइन का आनन्द ले रहा था।

उस रात क्लूगे तनाव रहित सोया।

अक्तूबर १३, प्रीन आम किमी जी, प्रात: ६ बजे :

मशीन से लगी पेन ने एक पीक, फिर वैली और फिर पीक के क्रम को बरकरार रखा। उसकी बीप बीप की आवाज लगातार गूंज रही थी।

क्लूगे के दाहिने हाथ की वेन में धंसी निडिल और उसके शरीर से लगे एलेक्ट्रोडों ने उसके रक्त एवं हृदय की गतिविधियों को रेकार्ड कर लिया था। इक्जामिनेशन टेबल पर लेटे हुए क्लूगे को उस पर बिछी प्लास्टिक कवर में लगे फीते ने कस कर बांध रखा था।

सभी उपकरण स्वचालित थे और उनके परिणाम क्लूगे के हेल्थडेटा बैंक में स्टोर होते थे। कोई चिकित्सक नहीं रहता था वहाँ, जब तक शरीर में कुछ असमान्यता उत्पन्न न हो जाये।' वैसे भी अब तो मशीनें चिकित्सक बन गयी हैं, संवेदना रहित। क्या वे मुझमें और अन्तरिक्षचारी में निहित मानवीय अथवा जैविक अंश को समझ पायेंगी? हमारा पुराना समय बेहतर था। चिकित्सक और व्यक्ति में वैचारिक सामन्जस्य था, सौहार्द था, मानवता थी पर अब? क्लूगे की विचार शृंखला टैस्ट समाप्त की यांत्रिक ध्वनि ने भंगकर दिया।

१३ अक्तूबर, प्रीन आम किम जी प्रात: ८ बजे :

"तुम्हारा स्वास्थ्य तो बिल्कुल ठीक है। जी जीन्ड गेसुन्ड अन्तरिक्षचारी ने जरमन में कहा।

'आज मुझे मीटिंग में जाना है।'

कैसी मीटिंग?"

"आकाशगंगा के सभी वासियों की जिन पर हमारा नियंत्रण है।''

"तो मैं एकाकी तुम्हारा शिकार नहीं हूँ।" -

'तुम विष बुझी बातें कर रहे हो। मैं तो सहजता से.

' मैं तुम्हारी सहजता से परिचित हूँ, पर यह तो बताओ कि मीटिंग में डिसकस करने का क्या खास बिन्दु होता है?"

क्लूगे ने थोडा सहज होकर कहा।.

'विभिन्न सभ्यतायें, जो अन्तरिक्ष में फैली हुयी हैं, उनकी टेक्नोलोजी, प्रौद्योगिकी और विज्ञान के विकास का अपने ग्रह के हेतु उपयोग करने के संदर्भ में चर्चा होती है।''

''कब जाना है तुम्हें?"

''तुम्हारे ग्रह की. समस्त सूचनाएँ एकत्र करने के उपरान्त ही यह यात्रा संभव होगी' अन्तरिक्षचारी का उत्तर था।

क्लूगे को लगा कि अन्तरिक्षचारी कुछ सोचने लगा।

कुछ पल शान्ति में बीते। अन्तरिक्षचारी ने कहा 'तुम अपनी बेटी के पति को पसन्द नहीं करते हो।'

"तो तुम मेरे ब्रेन की मेमरी कुरेद रहे हो?"

'ठीक समझा तुमने ।'

'हाँ मैं उसे पसन्द नहीं करता हूँ" मुख में कडुवाहट की अनुभूति करते हुए क्लूगे ने उत्तर दिया। '

'कारण मैं जान गया हूँ'

'ठीक है, तो फिर?"

'तुम्हारा बेटा सर्जन है, और उसकी पत्नी गाइनेक?"

'हाँ तुम्हें ठीक पता चल गया है।''

'क्यों कि वे बहुत ही व्यस्त हैं' क्लूगे का संतुलित उत्तर था।

'क्या तुमको, तुम्हारी दिवंगत पत्नी की याद नहीं आती है।

स्वाभाविक है कि आती है पर उसकी कमी को मैं अब सहन कर सकता हूँ। क्या करूँ?! आह भुरते हुए क्लूगे की आवाज, विगत की स्मृतियों में डूब गयी है, ऐसा अन्तरिक्षचारी को अनुभव हुआ।

''मुझे अपनी दिवंगत बहन से संवेदना है 'उत्तर था अन्तरिक्षचारी का, जिसको सुनकर क्लूगे चौंक उठा। 'क्या तुम स्त्री हो?"

'तुम क्या समझ रहे थे, अभी तक?"

'"पुरुष.... कुछ । ठिठकते हुए, झेंपते हुए क्लूगे का उत्तर था।

''मैं जानती हूँ कि तुम्हारी पत्नी को संगीत बहुत प्रिय था, मुझे यह भी पता है कि उनको किन-किन कम्पोजरों की म्यूजिक प्रिय थी।

"मुझे आश्चर्य है'' क्लूगे का उत्तर सुनकर अन्तरिक्षचारिणी पहली बार हंसी|

नाम क्या है?" ,

नाम में क्या रखा है'' उत्तर सुनकर क्लूगे ने कहा

'' ओह! तुम ठीक कह रहे हो।'

"क्या तुम मुझे म्यूजिक नहीं सुनाओगे", कुछ आग्रहपूर्ण स्वर में थ्वनि आयी।

"क्यों नहीं? संगीत तो मुझे भी अतिप्रिय है" प्रसन्न होकर क्लूगे ने अन्तरिक्षचारिणी के लिए म्यूजिक आन कर दी। म्यूजिक की तरंगों में वह खो सी गयी थीं वह मौन हो गयी थी।

म्यूजिक के बन्द होने पर उसने कहा '' यह हमारे ग्रह पर नहीं है, हम लोग संगीत प्रेमी नहीं हैं। लेकिन यह संगीत हमारी अवधारण को बदलने में निश्चय ही सफल होगा। कौन इसका कम्पोजर है?"

"केड्रिक चोपिन और यह नाकटर्न नम्बर-२, ई-फ्लैट मेजर, में कम्पोज की गयी है। क्लूग ने प्रसन्नतापूर्ण स्तर में उत्तर दिया।

'हूं! एकाकीपन में संगीत प्रसन्नता जीवन्तता प्रदान करती है। 'क्या तुम भी कभी एकाकी होते हो' मधुर स्वर में क्लूगे ने प्रश्न किया।

'तुम्हारी ही भांति अधिकांश समय' का संक्षिप्त उत्तर अर्थपूर्ण लगा. क्लूगे को।

'मैं तुम्हें और संगीत सुनाना चाहता हूँ, तुम्हारा क्या विचार है?"

'मैं प्रतीक्षा कर रही हूँ' अन्तरिक्षचारिणी का प्रसन्नता भरा उत्तर था। क्लूगे ने बीबाल्डी के फियर यॉर जाइटेन-फोर सीजन" को आनकर दिया।

संगीत के उतार-चढाव में अन्तरिक्ष चारणी और क्लूगे खो गये।

". अभूतपूर्ण कम्पोजीशन है वह कौन कम्पोजर है इसका" अन्तरिक्षचारिणी अपनी उत्सुकता रोक न सकी।

क्लूगे के नाम बताया" और म्यूजिक क्लासिकस काम्पोजीशन मुझे सुनाओ।"'

क्लूगे ने उसे वीथ हावेने की. शूवर्ट की तथा मोजार्ट की आइन क्लाइने नाख्ट म्यूजिक' सुनाया। अन्तरिक्षचारिणी संगीत के सुधा रस में डूब चुकी थी ¦

समय ठहर सा गया था। दोपहर के बारह बज चुके थे। मेरे वापस जाने के संकेत आ चुके हैं। मुझे अभी चल देना होगा। पर मैं यह संगीत काम्पोजीशन क्लासिकल म्यूजिक अपने साथ ले जाकर अपने ग्रह वासियों को प्रथम बार सुनाऊँगी । यह संगीत आनन्दमय है, एकाकीपन दूर करने की प्रभावी औषधि है। तुम्हें अनेक धन्यवाद रार्बट; आउफ वीडर जेन (फिर मिलेंगे) की आवाज के साथ'' अन्तरिक्षचारिणी की ध्वनि मौन हो चुकी थी। *

सामने किमजी झील में पड रहे आकाश में तैरते सफेद बादल के एक टुकडे के प्रतिबिम्ब को, अब राबर्ट क्लूगे अपने एकाकी मन और सूनी आंखों से देख रहा था।

 

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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: विज्ञान कथा / अन्तरिक्षचारिणी / डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय
विज्ञान कथा / अन्तरिक्षचारिणी / डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय
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