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विज्ञान कथा / छोटे साहब / डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय

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  अनेक शतब्दियों पूर्व, नचिकेता ने यमराज से ब्रह्मज्ञान के, लिए आत्मा के विषय में ज्ञान के लिए जिज्ञासा प्रकट की थी। यमराज ने उसे आत्मा के...

  अनिल इजेरी की कलाकृति

अनेक शतब्दियों पूर्व, नचिकेता ने यमराज से ब्रह्मज्ञान के, लिए आत्मा के विषय में ज्ञान के लिए जिज्ञासा प्रकट की थी। यमराज ने उसे आत्मा के विषय में बताया था। वह आत्म-ज्ञान से युक्त हो गया। पर सुबोधन को आत्म ज्ञान कौन देता है, और कैसे देता है आप जानते हैं? यदि नहीं तो....।

सुयोधन अपने से योग्य-परम प्रिय छोटे-साहब को सदैव साथ रखता है। छोटे-साहब उसके लिए ज्ञान का भण्डार हैं-उसके पथ प्रदर्शक हैं तथा उसके सहयोगी भी। उस नगर में प्रत्येक पुरुष के पास उसके छोटे-साहब होते हैं और महिलाओं के साथ छोटी साहिबा। सभी नागरिक इस अकाट्य नियम का पालन करते हैं। उस दिन सुयोधन अपने आप प्रात: उठ बैठा। वह देर से उठा था। वह चकरा गया। उसने घबराहट भरी निगाहों से छोटे साहब की तरफ देखा। छोटे-साहब उसके बेड की साइड टेबिल पर मौन बैठे थे। उन्हें सम्बोधित करते हुए सुयोधन ने व्याकुल स्वर में कहा ''आपने मुझे आज जगाया नहीं? आपकी वजह से मैं देर से उठा.... मैं कैसे काम पर जाऊँ.....मैं लेट हो चुका हूँ! क्या समय है?'! सुयोधन ने पूछा? उस अतिविकसित-सक्षम समाज में कोई घड्डी नहीं पहनता था...घडी की जरूरत भी नहीं थी। क्योंकि छोटे-साहब समय बताने से लेकर जीवन के प्रत्येक कार्य को सम्पादित करते थे।

"तुम बोलते क्यों नहीं" क्रोध भरे स्वर में सुयोधन चीख पड़ा। पर छोटे-साहब मौन रहे।

'वया समय है, बोलो, तुम इडियट बाक्स" कहता हुआ सुयोधन बेड से उतर आया और. एक थप्पड्र उस बेवकूफ छोटे साहेब को, जमा दिया। ''छोटे-साहब धडक से नीचे गिर पडा। फर्श पर उससे गिरने की आवाज ने सुयोधन के मन को कुछ संतुष्टि दी। पर दूसरे क्षण उसे अपने इस कृत्य पर दु:ख हुआ। उसने दौडकर छोटे साहब को उठाकर, उसे अपने हाथों में से लिया। उस पर ह्राथ फेरते हुए सुयोधन सोचने लगा, 'मैंने गलती कर दी।

एक आदमी आज काम पर नहीं आया, स्वचालित, आटोमेटिक गेट-कीपर की आवाज गूँजी।

''कौन है वह?" कर्मचारियों की उपस्थित लगाने वाली मशीन बोली।

क्लिक, क्लिक.....सुयोधन''

उस आफिस में, कार्यरत कर्मचारियों की उपस्थिति लगाने वाली, मशीन से एक पंच कार्ड निकला।

सुयोधन..... उसमें लगे कैमरे, टी.वी. कैमरे ने कहा और उसने सुयोधन की फोटो प्रत्येक डिपार्टमेन्ट में भेज दी।

'क्या आज किसी ने सुयोधन को फैक्टरी में देखा है?

इन्टरकाम ने पूछा।

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''सभी कर्मचारियों की आवाजें थीं, आज उसे किसी ने देखा नहीं है।'

सुयोधन और उसके छोटे-साहब से सम्पर्क करने के प्रत्येक प्रयास असफल रहे।

कर्मचारियों की उपस्थिति लगाने वाली मशीन ने गेट-कीपर मशीन से कहा "सेन्ट्रल कन्ट्रोल मशीन को सूचना दो, कि कोई समस्या उत्पन्न हो गयी है-छोटे-साहब में।"

मशीन कन्ट्रोल यह जानता था कि छोटे साहब को नष्ट नहीं किया जा सकता और न ही सुयोधन के छोटे-साहेब के यांत्रिक मस्तिष्क में कोई समस्या ही कन्ट्रोल मशीन को मिल ही रही. थी। पर आदेशानुसार वह हर घण्टे, छोटे साहेब के लिए संदेश प्रेषित करती रही। उस अत्याधुनिक समाज के नागरिकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए, इस प्रकार का कार्य आवश्यक था।

अनुमानत: दो घण्टों के बाद सुयोधन के छोटे साहेब की टी.वी. कैमरा युक्त आखें गतिशील हो गयीं । उसके लाउडस्पीकर में खड्खडा हट हुयी-उसके मुख लगी मेमब्रेन युक्त जिह्वा में से कुछ शब्द निकलने लगे।

सुयोधन चौक उठा।

. ओह दस बज रहे हैं, और अभी तक तुमने न तो शेब किया और न ही स्नान....कपडे"' छोटे साहब का उत्साहपूर्ण स्वर गूँजा।

'' ओह मेरे प्रिय छोटे साहब! तुम टूटे नहीं, तुम ठीक हो गये....शायद तुम्हें चोट लग गयीं थी' कहते हुए। सुयोधन ने छोटे-साहब को उठा लिया।

''कपडे पहनों" छोटे साहब ने कहा।

सुयोधन ने उसकी तरफ देखा।

छोटे साहब में टेलीफोन की घण्टी गूँजी (उस समय में टेलीफोन अलग से नहीं लगा होता था, वह छोटे-साहब में लगा रहता था) सुयोधन कपडे पहनते हुए, हेलो! हेलो! करने लगा। उसी समय छोटे-साहब ने कहा ''मैंने सभी आने वाली और जाने वाली कालों को प्रतिबंधित कर दिया है।'

'लेकिन फोन करने वाला मुझसे सम्पर्क करना चाहता हो तब?" ''हुआ करे, मैं आज टेलीफोन नहीं हूँ, और न कल भी टेलीफोन रहूँगा।

'लेकिन तुम्हारी घण्टी तो बज रही है?"

'उसका बजना मैं रोक नहीं सकता। पर मैं आज टेलीफोन का काम करूँगा नहीं।'

तो फिर?"

'मुझे लेकर चलो!"

''कहाँ?"'

''आफिस नहीं!"

क्यों?

"'तुम लेट हो, गैरहाजिर हो, अनुपस्थित हो, इस कारण अब वहां जाने का क्या अर्थ है?"

"तो मैं क्या करूँ?" दुखी स्वर में सुयोधन ने पूछा। "

'तुम इसकी चिन्ता मन करो, अपनी जिम्मेदारी मुझ पर छोडो मुझ पर भरोसा करो.....मैं बताता हूँ.......चलो हम

यहाँ से.....चलें.....चलें......पार्क में।

'पर आज रविवार तो है नहीं?"

"तो क्या हुआ। चलो....एक-दो...एक....दो।"

सुयोधन को छोटे साहब को अपनी कोट की जेब में रखने में कोई असुविधा नहीं हुई। उसने एपार्टमेन्ट को लॉक किया और कहने लगा ''छोटे साहब! सप्ताहान्त में पार्क में जाना ठीक है... पर आज तो..... वह बात पूरी न कर सका। ''बकवाद बन्द करो, नहीं तो मैं अभी तुम्हारी शिकायत कर दूँगा।'

सुयोधन और उसकी जेब में बैठे छोटे-साहब, पार्क में पहुंच गये। पार्क में पहुंचने के लिए उन्होंने स्केलेटर नहीं लिया, वे टहलते हुए (तथ्यत: छोटे साहेब, सुयोधन की जेब में बैठे थे, चल रहा था मात्र सुयोधन ही) पार्क में पहुंचे।

लोग सुयोधन को देखकर चकित थे, वे अपने-अपने छोटे साहबों से, उनके स्पीकरों में मुंह सटाकर थीमे-थीमे कुछ कह रहे है।

सुयोधन को .यह देखकर क्रोध आ रहा था। क्रोध तो उसका जन्मजात सहचर था। छोटे साहेब में फोन की आवाजें, उसके बजने की आवाज ध्वनि आ रही थी, छोटे साहेब साहेब ने इन पर ध्यान दिया ही नहीं। परन्तु सुयोधन तनाव ग्रस्त था। घण्टियाँ बजतीं रहीं पर छोटे साहेब टस से मस न हुए।

उधर ऊबकर सेन्ट्रर' ने काल करना बन्द कर दिया। पार्क की बाउन्ड्री हरे रंग से रंगी हुयी थी, उसमें वास्तविक

वृक्ष तो थे ही, उसकी मखमली घास रविवार को पार्क में घूमने वालों का प्रमुख आकर्षण थी।

उस पार्क के काफी ऊपर की छत में एक कृत्रिम सूर्य चमक रहा था-जिसका पीला प्रकाश उस त्रिविमीय छत को विस्मयकारी बनाता था। रात्रि में उसमें तारे चमकते थे और दिन में छिपे हुए प्रोजेक्टर के द्वारा तैरते हुए बादल, उसके आसमान में देखे जा सकते थे।

उस बड़े पार्क में एक प्राकृतिक जंगल था, जिसके मध्य में एक सुन्दर सरोवर. था जिसके स्वच्छ नीले जल में, बिना कोई टैक्स दिए हुए, रविवार को, बच्चे खूब तैरते और स्नान करते थे।

उस पार्क में एक जिमनेजिगम था-स्वास्थ्य के प्रति सचेत पुरुष स्त्रियों के लिए। उस समाज में सभी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक थे।

सुयोधन उस मखमली घास पर लेटा हुआ था। उसकी जैकेट उसके सर के नीचे थी। एयरकंडीशनर की शीतल वायु वृक्षों को आन्दोलित कर रही थी तथा टेप-रेकार्डड पक्षियों का संगीत, वातावरण को नैसर्गिक बनाने के प्रयास में लगा था। तनाव रहित, सुयोधन एक घास के तिनके को दाँतों में दबाये कुछ गुनगुना रहा था।

आज उसे इस पार्क में आनन्द आ रहा था। कभी-कभी उसे ध्यान आता कि मात्र आज वही कोई उपयोगी कार्य नहीं कर रहा है, बाकी सभी कार्यरत हैं। सामान्यत: रविवार को भारी भीड के बीच कठिनायी से बैठने की जगह मिलती थी। पर आज का कया कहना, सोचते हुए उसने करवट ली। 'मैंने उस फोन की घण्टी को शान्तकर दिया'' छोटे साहेब ने बताया।

'चलो अच्छा ही हुआ ' सुयोधन ने सोचा।

'कोई संगीत तुम सुनना चाहोगे?"

'हाँ-हाँ वही जो तुम्हें और मुझे प्रिय है'' सुयोधन हर्षित होकर कह उठा।

'मधुर संगीत के प्रभाव में सुयोधन को झपकी आ गयी। थोड़ी देर बाद उसकी आंखें खुल गई, वह सोचने लगा, मैंने ठीक नहीं किया।' पर उसके सिवा वह कर ही. क्या सकता था। उसका मन-उसकी आत्मा तो छोटे साहेब में वास करती थी। उसकी अपनी कोई. आत्मा थी ही नहीं। छोटे साहेब के निर्णय उसे मानने थे- गलत अथवा सही, मूर्खता पूर्ण अथवा बुद्धिमत्ता पूर्ण ।

उसने करवट बदली। मौसम आनन्ददायी था और छोटे-साहेब का स्टीरियो मधुर संगीत 'सुना रहा था।

कालट्रान-३० एक अन्डर ग्राउण्ड, जो कि पिरामिड्र की भाँति था, में स्थापित था। यह बाम्ब-प्रूफ था। कलट्रान-३० एक विशाल आक्टोपस की भांति था जिसके भीतर जाते हुए सहसों केबिल और उससे बाहर निकलते इतने ही केबिल-उसे आक्टोपस के टेन्टेकिलों के सदृष्य बना रह थे। उसके केबिलों में चमकती लाइटें, उसकी खटखट चलती पल्सें उस सारे वातावरण को रहस्यमयी बनाये हुए थीं। उसके केबिलों का प्रकाश सप्त-रंगी था-और केबिलों और स्वत: कालट्रान में भरी जेली एक विशिष्ट गन्ध उत्पन्न कर रही थी। कालट्रान-३० थ्यानावस्थित तत्वदर्शी ऋषि की भांति, उस पिरामिड में एकाकी अपने कार्य को सुचारु-रुप से चला रहा था। '

'वह अपने से बातें कर रहा था-कुछ इस तरह....एक मिनी-सेक्शन कार्य नहीं कर रहा है.....क्या कारण है?... सम्पर्क में सहयोग नहीं करता है.... उसने सारे सम्बन्ध विच्छेदित कर दिए हैं....क्या वह इस प्रकार अपना अस्तित्व बचाये....रख सकता है?.....बचाये रख सकता है? नहीं.... पर स्पष्ट नहीं है.....छोटा केवल रिसविर है, वह अपने आप कुछ सोच नहीं सकता.......उसे तो मनुष्य को निर्देश देने के लिए बनाया गया है....उसे कोड-७० के अनुसार बनाया गया है.....इस कोड के अनुसार उसकी स्वतंत्रता सीमित है। क्या वह इस नियम को तोड चुका है? कारण....क्या कारण हो सकता है.....यह नियम ७० की सीमा से बाहर है....खतरा है...वह असंतुष्ट हो गया है? समाज के लिए खतरा! सुयोधन खतरनाक हो सकता है-कोड-प्रोसीजर १२०५९७० × को जागृत करना होगा । एक्टीवेट करना होगा......मौन.... सुयोधन की तन्द्रा किसी की आवाज सुनकर टूट गयी।

'इस समय आफिस के समय...?

सुयोधन के कानों में पार्क की देख-रेख करने वाली लड़की की आवाज गूंज उठी। वह अनुमानत: बीस वर्ष के ऊपर की होगी। वह: अल्यूमिनियम का हल्के भूरे रंग की ड्रेस ओवर-आल पहने थी। उसके दाहिने हाथ पर हरे रंग का आर्म-बैण्ड लगा था। यह इसकी नियुक्ति को दर्शा रहा था। वह ध्यान से आटोमेटिक घास काटने की मशीन का देख रही थी। यह मशीन अपने चार बैकुअम पाइपों से पत्तियों को, गिरी टहनियों को तो खींच रही ही थी-उसका तीसरा पाइप कटी हुयी घास को और चौथा कंकडियों के खींचकर अपने बैग में डाल रहा था।

सुयोधन ने जो शब्द सुने थे वह उस लडकी की जेब में बैठी छोटी-सहिबा के थे। वह पार्क गर्ल तो इन शब्दों को सुनकर चकित सी खडी थी।

छोटी-सहिबा से सुयोधन: के छोटे साहब ने कहा ''तो हुआ क्या-क्या हो गया जो तुम बडबडा रही हो।'

सुयोधन ने उस लडकी से कहा 'क्या तुम बैठना पसन्द करेगी। उसी समय छोटी-साहिबा जो उस लडकी की जेब में बैठी थी आक्रोशित स्वर में बोली 'नहीं! तुम्हारे जैसे समाजघाती, समाज .कलंक के पास बैठने का कोई अर्थ नहीं है।'

: ' यह सुनकर पार्क गर्ल ने अपने माथे पर बिखरे बालों को हाथ से ठीक करते हुए कहा 'नहीं यह उचित समय नहीं है।'

''चलो चलो, देर मत करो.....रुको मत' छोटी साहिबा चीख रहीं थीं।

फिर मिलेंगे" कहती हुयी पार्क-गर्ल चल दी। उसके पीछे-पीछे घास काटने की मशीन भी अपने आप चल दी, किसी आज्ञाकारी कुत्ते की तरह।

'वह हमारी रिर्पोट करेगी'' छोटे-साहब ने कहा।

''कैसी रिर्पोट किस तरह की रिर्पोट....सुयोधन ने चकित भाव से कहा।

छोटे-साहब में खडखडाहट, पटपटाहट, गडगडाहट शुरू हो गयी। सुयोधन ध्यान से सुनता रहा, कुछ पलों बाद वह समझ सका कि छोटा-साहब उस पर हंस रहा है।

कोड-प्रोसीजर १२०५७० × : शाक . ब्रेन आफ....जागो...

चैतन्य हो जाओ संपर्क करो।

कोड-प्रोसीजर १२०५५९७१ × : सर्च रोबो, नीचे स्टील मैन.

.. पुलिस रोबो...अपने बन्द चैम्बरों को खोलो, बाहर निकलो और एक्टीवेट हो जाओ...फाइनल.....शुरू....।

पार्क के रास्ते पर चलते हुए छोटे साहब ने सुयोधन से पूछा ''तुमने विवाह क्यों नहीं किया।'

'किसी ने प्रस्ताव नहीं किया".....मुझे कोई सही फाईल मिली ही नहीं। रुकते हुए सुयोधन ने उत्तर दिया।

'लगता है मुझे कोई स्वीकार भी नहीं करेगा.....शायद सभी को विवाहित रहना भी नहीं चाहिए।"

उसकी बात चुनकर छोटे-साहब ने संवेदनात्मक ध्वनि निकाली। वह तेजी से चल रहा था। पार्क की सडक पर। एकाएक उसकी दृष्टि उस गार्डेन-गर्ल पर जो उसके सामने चल रही थी, पर टिक गयी। उसने मुडकर पीछे देखा और घबरा गयी। यह देखकर छोटे साहब ने कहा" इससे विवाह करोगे?"

''क्या तुम मुझे गम्भीरता से सलाह दे रहे हो?"

'हाँ! तेजी से बढकर उससे बात करो।!"

छोटे साहब की बात मान, सुयोधन ने उसे पुकारा। उसकी पुकार सुनकर वह लडकी तेज चलने लगी। सुयोधन को लगा कि वह जैसे दौड रही हो।

'रुक जाओं, पार्क में रुक जाओ, मैं तुमसे बातें करना चाहता हूँ एक सांस में सुयोधन बोले जा रहा था। पर वह लडकी दौडने लगी। उस हरे वातावरण में उसकी ड्रेस चमक उठती थी। उसने दौडना बन्द उसी समय किया, जब तक वह एक पेड से टकरा न गयी। एक चीत्कार मारकर वह घास पर गिर पडी।

उसकी जेब में रखी छोटी साहिबा-चीख रहीं थी। उसकी चीख बहुत हाई-पिच की थी। अजीब सी, पर पुलिस रोबो ने उसको सुन लिया था।

सुयोधन उस लडकी के पास पहुंच गया। उसे उठाकर सीधाकर घास पर बैठा दिया। वह लडकी । मुस्कुराई...सुयोधन की पल्स रेट-रक्त चाप बढ गया।

पास बजती रोबो की, पुलिस रोबो की आवाज ने उसे सावधान कर दिया। एक प्यासी नजर उस लडकी पर डालकर अनमने मन से सुयोधन उस पेड के पीछे छिप गया। उसे रोबो पुलिस से भय था। पेड्रों की छाया में छिपता सुयोधनं मार्केट में पहुंच गया।

तुम मुझे इतना तेज चलने के लिए क्यों कह रहे हो?

छोटे-साहेब मौन रहे। शायद उसे जवाब देना पसन्द नहीं था। 'तेज चलो, और तेज...सुयोधन .....हाँ उस गार्डेन गर्ल ने तुम्हें इसी रास्ते पर चलने के लिए कहा था।' ठीक है, मैंने तुम्हें तेजी से चलकर इस जगह से आगे जाने के लिए कहा था। हमें इन क्यूबों से निकलकर मानो रेल पकडनी है। कुछ सोचता सुयोधन स्केलेटर पर चढकर प्लेटफार्म तक पहुंच गया। मानो-रेल ग्लास क्यूबों में चलती थी। उसकी गति इतनी फास्ट थी कि वह पलक झपकाते ही अगले स्टेशन पर जा पहुंचती थी। किसी ने सुयोधन को रोका नहीं और न कुछ बात ही थी। वहां पर हर कोई अपने छोटे साहब अथवा छोटी साहिबा के स्पीकर में मुंह लगाये बातें करता था।

तुम्हें पुलिस रोबो से, शालीकों से सावधान रहना है। वे हर स्टेशन पर, भीड में घूमते रहते हैं।

यह सुनकर सुयोधन काँप उठा।

'हमने, मैंने क्या गलत किया है? छोटे साहब' कहते हुए वह काँप उठा था।

'मैं कहाँ फंस गया?" कहकर सुयोधन इधर-उधर देखने लगा, कोशिश करने लगा कि वह पुलिस रोबो को पहचान सके। पर उन्हें पहचानना, वह भी इस भीड़ में कठिन था।

परन्तु वे वहां पर अदृश्य छाया की भाँति विद्यमान थे।

'मेरे ख्याल से वे मेरी उपस्थिति मेरी बॉडी से निकलते रेडिएशन से जान सकते हैं'" छोटे साहब ने कहा।

''एक काम करो!"

'क्या?"

'तुम मुझे किसी बेस्ट-वास्केट में डाल दो।"

'और फिर।

'तुम अकेले मोनों-रेल पर चढकर यात्रा करो।'

'मैं तुमसे अलग नहीं रहना चाहता।"

'मूर्ख। अपनी जान बचाने की सोच, फेंक दे मुझे एक बेस्ट वास्केट में, और तेजी से चलकर मानो-रेल पकड ले" उत्तेजना से छोटे साहब का स्वर काँप रहा था।

ट्रेन आ गई थी। सुयोधन ने कम्पार्टमेन्ट में बैठकर इधर-उधर देखा। सब उसे सामान्य लगा। यह उसके जीवन की पहली, बिना छोटे-साहब के, यात्रा थी।

वह ट्रेन से उतर का धीरे-धीरे चलता हुआ स्केलेटर पर चढ गया। उसको अजीब सा लग रहा था। उसे अपने पर विश्वास नहीं हो रहा था। कोई न उसे सलाह देने वाला था और न कोई टोकने वाला.....उसे लगा कि क्या यही मानव स्वतंत्रता होती है?....वह जीवन में पहली बार स्वतंत्र हुआ था। लेकिन फिर.......... वह निंर्उद्देश्य इधर-उधर धूमता फिरता रहा। लोग अपने दूसरी शिफ्ट से वापस जा रहे थे। सुयोधन थक चुका था... उस समाज में, किसी भी स्थान पर बैठने के लिए, थक जाने पर, पीठ को टिकाने के लिए बेंच नहीं होती थी। लोग अपने-अपने छोटे साहब, साहिबाओं से बातें करते चले जा रहे थे।

सुयोधन को लगा कि मानव एकाकी नहीं रह सकता। .

वह अपने चारों ओर आत्म विश्वास से भरे चेहरों को देख रहा था......सभी के सम्मुख उद्देश्य था, मात्र वही एक कार्य विहीन....उद्देश्य विहीन था, ऐसी स्वतंत्रता का क्या अर्थ है? उसे लगा कि उसे मर जाना चाहिए।! ,

वह जमीन पर बैठ गया। उस समाज में कोई जमीन पर बैठता नहीं था।

पुलिस, रोबो पास आ गये। सुयोधन उन्हें देखकर रो पडा। उसकी आंखों की यह बूंदें, हर्ष के आंसू थे। उद्देश्यहीनता से मुक्त होने के आंसू थे। समाज के लिए पुन: उपयोगी होने की भावना के अश्रु, कण थे।

अगले दिन एक दूसरे छोटे साहब ने सुयोधन को आफिस जाने के लिए जगा दिया। वह पुन: अपनी प्राप्त की हुयी यांत्रिक परतंत्रता के कारण प्रसन्न हो गया।

 

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रचनाकार: विज्ञान कथा / छोटे साहब / डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय
विज्ञान कथा / छोटे साहब / डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय
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