गणतंत्र दिवस विशेष : चलो कहीं ओर चलें / राम कृष्ण खुराना

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चलो कहीं ओर चलें CHALO KAHIN AUR CHALEN राम कृष्ण खुराना एक और गणतंत्र दिवस मनाने का दिन आ गया ! वो गणतंत्र जो हमें देश के लाखों वीर...

चलो कहीं ओर चलें

CHALO KAHIN AUR CHALEN

राम कृष्ण खुराना

एक और गणतंत्र दिवस मनाने का दिन आ गया ! वो गणतंत्र जो हमें देश के लाखों वीरों की कुर्बानी देकर आज़ादी हासिल होने के बाद मिला ! आज़ादी के बाद देश को सुचारु रुप से चलाने के लिए हमने एक संविधान बनाया ! जिससे देश में व्यवस्था स्थापित हो और देश का शासन, जन-जीवन और सारा प्रबंध चल सके ! हमारे कार्यों को एक दिशा मिल सके ! सभी कार्य एक मर्यादा में एक मानदण्ड के अनुसार संचालित हों ! किसी प्रकार की अव्यवस्था, किसी प्रकार का कोई असंतुलन अथवा कोई दुराचार न रहे ! अच्छे और ऊंचे आदर्शों का पालन हो जिससे देश व देश की जनता तरक्की करे ! देश आगे बढे, दुनिया में हमारे देश का डंका बजे ! हमेशा से ही राम राज्य का सपना और उच्च आदर्श ही हमारा लक्ष्य रहा है ! देश में सभी एक दूसरे से प्यार करें ! सुख-शान्ति हो ! सभी को रोज़गार मिले, रहने के लिए घर हो, भर पेट भोजन मिले ! क्योंकि बिना भोजन के तो भजन भी सम्भव नहीं होता ! नीरज की यह पंक्तिया भी कुछ इसी प्रकार की बात कहती हैं !

तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है,

बाग के बाग को बीमार बना देती है !

भूखे पेट को देशभक्ति सिखाने वालों,

भूख इंसान को गद्दार बना देती है !

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यथा राजा तथा प्रजा ! अर्थात जैसा राजा होगा वैसी ही प्रजा होगी ! यदि शासक ईमानदार और अच्छा होगा तो जनता भी ईमानदार और अच्छी होगी ! राजा के संस्कार प्रजा में स्वाभाविक रुप से आ जाते हैं ! राजा के धर्मनिष्ठ होने पर प्रजा भी चरित्रवान हो जाती है ! परंतु आज का माहौल बदल गया है ! आज हमने जिन नेताओं पर भरोसा करके सत्ता पर बिठाया था उनकी नज़रे बदल गई लगती हैं ! जैसे कि :

न आंसू अलग हैं न आहें अलग हैं !

किसी धर्म की न राहें अलग हैं !

मगर सोचता हूं कुछ सिरफिरों की,

वतन के लिए क्यों निगाहें अलग हैं !!

सत्ता की छत पर तो कुत्ता भी बडा लगता है ! परंतु वह तो छत की ऊंचाई है, कुत्ते की नहीं ! हमें सत्ता पर खडे कुत्ते की सेवा नहीं करनी चाहिए ! दुनिया में कुछ न बिकने वाले और कुछ न खरीदने वाले लोग भी होने चाहिए ! शासन पर बने रहने या आने का मोह और बिना परिश्रम के जल्द से जल्द धन बटोर लेने की भावना देश को बरबाद कर रही है ! आज देश मे चतुरता की राजनीति का बोलबाला है ! चरित्र की राजनीति समाप्त हो चुकी है ! आज समय और परिस्थियों को राजनीति में अस्त्र की तरह इस्तेमाल किया जाता है ! लोग अपने आप को खुदा समझने लग गए हैं ! इंसान नदारद हो गया है ! किसी ने सही कहा है :

तेरे बन्दों को क्या हो गया है !

जिसे देखो खुदा हो गया है !

मुल्क में सब मयस्सर है लेकिन,

सिर्फ इंसा हवा हो गया है !

भारत में सिर्फ दो जातियां हैं ! एक जाति में गरीब और निम्न वर्गीय लोग हैं ! इन लोगों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी बहुत कठिन है ! दूसरी जाति के लोग वो है  जिसमें वे अमीर, नेता, अधिकारी लोग आते हैं, जो जनता की गाढ़ी कमाई को हडप कर अपने पेट की गोलाई को बढा रहे हैं ! जिनके खाते  स्विस बैंकों में हैं और करोड़ों-अरबों के वारे-न्यारे हो रहे हैं । आम जनता की मेहनत  की गाढ़ी कमाई से सिर्फ नेता लोग ही अपना घर  नहीं भर रहे हैं  बल्कि बडे अधिकारी भी इस खेल में पूरी तरह से शामिल हैं ! गरीब और गरीब होता जा रहा है ! अमीरों के खज़ाने की कोई सीमा नहीं है ! मंहगाई ने खाद्य-पदार्थों और आम जरूरत की वस्तुओं को दुर्लभ बना दिया है ! एकाएक उनकी कीमत आसमान छूने लगी है ! लोगो के लिए अपना पेट पालना भी मुश्किल हो गया है !

यहां तन ढकने की खातिर खुद तन ही बिकने लगता है !

कोई पेट पालने निकला तो कोई पेट में पलने लगता है !!

विदेशी कहते हैं कि हमने हिन्दुस्तान देखा है ! परंतु हमें गांधी का हिन्दुस्तान कहीं भी नज़र नहीं आया ! स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात स्वंतत्रता को बनाये रखने के लिए भी बलिदान की आवश्यकता होती है ! अच्छी व्यवस्था के लिए कोई छोटा रास्ता नहीं होता ! कोई शार्ट-कट नहीं होता ! हमें उसी प्रकार ईमानदार बने रह कर संघर्ष करना पडता है ! कार खरीदने के बाद कार की सवारी करने के लिए उसे चुस्त व दुरस्त रखना पडता है ! उसके तेल-पानी का पूरा ख्याल रखना पडता है ! घर बनाने के बाद उसकी साफ-सफाई और साज़-सज़्ज़ा बनाए रखने के लिए मेहनत जरूरी होती है ! परंतु हमारी सोच को पता नहीं क्या हो गया है ! देश में कानून व्यवस्था की हालत बद से बदत्तर होती जा रही है ! लगता है कि हम कानून बनाते ही तोडने के लिए हैं ! तभी सतीश कुमार कहते हैं कि :

जाने क्यों हमें नियम रास नहीं आते,

अनुशासन, संयम हमारे पास नहीं आते !

इसी बात को सुश्री आशा खत्री अपने शब्दों में कहती हैं :

नियमों की अवहेलना आदत हुई हमारी,

जहां थी मनाही, चप्पल वहीं उतारी !

आज देश में भ्रष्टाचार, मंह्गाई, बेईमानी, बलात्कार की घटनायें बढती जा रही हैं ! हमारा देश इन बुराईयों का पर्याय बनता जा रहा है ! जब नेताओं से इस बारे में पूछा जाता है कि यह बुराईयां कब समाप्त होंगीं तो वे ज्योतिषी न होने का रोना रोने लगते हैं ! जनता इन नेताओं से ज्योतिषी होने की उम्मीद भी नहीं करती ! क्या देश की मंहगाई को रोकने का काम ज्योतिषियों का है ? देश के मतदाताओं ने नेताओं को इसलिए देश की सत्ता के शिखर पर बैठाया है  ताकि वे आम आदमी की मुश्किलों को समझें और उन्हें सुलझांयें ! जनता की आशाओं पर खरे उतरें ! जनता की तकलीफों को समझें ! आज जनता त्राहि-त्राहि कर रही है ! उसका दुख-दर्द सुनने के लिए, उसकी तकलीफ को जानने के लिए, उसकी मुश्किल हल करने के लिए किसी के पास समय ही नहीं है ! नेताओं ने आज़ादी को अपना घर भरने का लाईसेंस मान लिया है ! उनको कोई रोकने वाला नहीं है और जनता की कोई सुनने वाला नहीं है ! अब तो इस दर्द को इन शब्दों में कहने का मन करता है :

कहां तो तय था चिराग हर घर के लिए,

कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए !

यहां दरखतों के साये में धूप लगती है,

चलो कहीं ओर चलें उम्र भर के लिए !!

khuranarkk@yahoo.in

राम कृष्ण खुराना

9988927450

R K KHURANA

नाम

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद 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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर 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जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: गणतंत्र दिवस विशेष : चलो कहीं ओर चलें / राम कृष्ण खुराना
गणतंत्र दिवस विशेष : चलो कहीं ओर चलें / राम कृष्ण खुराना
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