‘विरोध-रस’ विवादपूर्ण / डॉ. सुधेश व अन्य समीक्षाएँ

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  आप की पुस्तक में आप द्वारा विवेचित ‘विरोध-रस’ भी विवादपूर्ण है। आपका वाक्य है-‘आक्रोश ऊपर से भले शोक जैसा लगता है क्योंकि दुःख का समावेश ...

 

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आप की पुस्तक में आप द्वारा विवेचित ‘विरोध-रस’ भी विवादपूर्ण है। आपका वाक्य है-‘आक्रोश ऊपर से भले शोक जैसा लगता है क्योंकि दुःख का समावेश दोनों में समान रूप से है...।’ यह दोषपूर्ण धारणा पर आधृत है। शोक में दुःख की अनुभूति होती है, पर आक्रोश में क्रोध का अनुभव होता है, दुःख का नहीं। यह बात दूसरी है कि क्रोध का परिणाम दुःखद हो। कविता का जन्म दुःख से तो सारी दुनिया मानती है पर आप कविता का जन्म आक्रोश से मानते हैं, जिसके मूल में क्रोध होता है, दुःख नहीं। अपनी स्थापना में आप इस अति तक चले गए कि इस ‘विरोध’ को कविता का ‘आदि-रस’ घोषित कर दिया। यह शास्त्र-संगत और मनोविज्ञान समर्थित नहीं है। शास्त्र तर्काश्रित होता है और तर्क विवेक पर आधृत होता है। कोई कुतर्क बौद्धिक व्यायाम के बाद तर्क नहीं बन सकता। यदि आप मेरी बात को अन्यथा न लें तो रामचन्द्र शुक्ल की पुस्तकें ‘रसमीमांसा और ‘चिन्तामणि-भाग-1’ पढि़ए। दूसरी पुस्तक में शुक्लजी ने मनोविकारों के बारे में लिखा है। रस-चिन्तन जैसे गंभीर विषय पर पत्रकार की तरह नहीं लिखा जा सकता, जिसे कुछ भी लिखने की जल्दी होती है।

तेवरी में पूर्ण स्वदेशी भावना

|| ग़ज़ल आइलुन फाइलुन में लिप्त आयातित विधा।|

+ गौरीशंकर वैश्य ‘ विनम्र ’

उ.प्र. हिंदी संस्थान के पुस्तकालय में तेवरीपक्ष के ताजा अंक का अवलोकन कर आश्चर्य हुआ कि 32 वर्षों से प्रकाशित पत्रिका को तेवरी नाम की सार्थकता सिद्ध करने का दुसाध्य प्रयास करना पड़ रहा है। मेरी यह धारणा इसलिए बलवती हुई क्योकि “ तेवरी इसलिए तेवरी है “ मंच से पूरे 14 पृष्ठ में आत्ममंथन प्रस्तुत किया गया है। जब परिवार के शिशु का नामकरण कर देते हैं तब बाद में उसमें मीनमेख क्या निकालना। बल्कि किसी अन्य से तुलना न कर उसे पूर्ण और सक्षम बनाना ही उचित होगा। ग़ज़ल आइलुन फाइलुन में लिप्त आयातित विधा है , तेवरी पूर्ण स्वदेशी भावना से परिपुष्ट विचारभिव्यति `|

रमेशराज ने दिलायी तेवरी को विधागत पहचान

+विश्वप्रताप भारती

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रमेशराज छन्दबद्ध कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं। रस के क्षेत्र में “ विचार और रस “, “ विरोधरस “ नामक दो पुस्तकों के माध्यम से रस के क्षेत्र में जहाँ आपने रस को व्यापकता प्रदान की है , वर्तमान विचारशील कविता को रस से जोड़ा है। वहीं ग़ज़ल से रोमानी पक्ष से व्यवस्था विरोध के तेवर को अलग कर उसे तेवरी के रूप में स्थापित किया है तथा हिंदी साहित्य में तेवरी के विधागत वैचारिक विमर्श को आगे बढ़ाया है।

रमेशराज ने तेवरी विधा को पहचान और स्थायित्व प्रदान करने के लिए “ तेवरीपक्ष ” पत्रिका के साथ साथ “ अभी जुबां कटी नही “, “कबीर ज़िन्दा है “, “इतिहास घायल है ” जैसे कई तेवरी संग्रहों का सम्पादन किया। हिंदी की प्रगतिशील जनवादी कविता में जिला अलीगढ से बहुत से नाम आगे आते हैं , उनमें रमेशराज शीर्षस्थ हैं। ये कहना गलत न होगा कि आलोचकों ने उनकी पुस्तकों को तो पढ़ा किन्तु उनकी चर्चा करने से कतराते रहे। उनकी इस चुप्पी के दौरान कुछ रचनाकारों ने तो तेवरी लिखने वालों को “तेवरीबाज़ ” तक कह डाला।

श्री रमेशराज अपनी लम्बी तेवरी (तेवर शतक ) “घड़ा पाप का भर रहा ” के माध्यम से एक बार फिर चर्चा में हैं।इस संग्रह की 100 से ऊपर तेवरवाली तेवरी को पढकर हर एक सामाजिक यह महसूस कर सकता है – “अरे ये तो हमारे मन की बात कह दी ” शायद तेवरीकार के लेखनकर्म की यही सफलता है।

सामान्यतया कविता दूसरों को कुछ बताने के लिए लिखी जाती है जो मानवीयता के पक्ष की मुखर आवाज़ होती है। मानवीयता के स्तर पर कविता में जो भाव आते हैं वे अद्भुत होते हैं। रमेशराज की कविता (तेवरी ) में ये भाव एक बड़ी सीमा तक विद्यमान हैं –

तेरे भीतर आग है , लड़ने के संकेत

बन्धु किसी पापी के सम्मुख तीखेपन की मौत न हो।

++ ++ ++

जन जन की पीड़ा हरे जो दे धवल प्रकाश

जो लाता सबको खुशहाली उस चिन्तन की मौत न हो।

दरअसल आज आदमी की ज़िन्दगी इतनी बेबस और उदास हो गयी है कि वह समय के साथ से , जीवन के हाथ से छूटता जा रहा है। सम्वेदनशून्य समाज की स्थिति तेवरीकार रमेशराज को सर्वाधिक पीड़ित करती है –

कायर ने कुछ सोचकर ली है भूल सुधार

डर पर पड़ते भारी अब इस संशोधन की मौत न हो।

समाज में जो परिवर्तन या घटनाएँ हो रहीं हैं वे किसी एक विषय पर केन्द्रित नहीं। घटनाओं के आकर प्रकारों में बीभत्सता परिलक्षित हो रही है। इन घटनाओं के माध्यम से नई अपसंस्कृति जन्म ले रही है फलतः लूट , हत्या , चोरी , बलात्कार , घोटाले , नेताओं का भ्रटाचार , सरकारी कर्मचारियों की रिश्वतखोरी अब चरम पर हैं| रमेशराज के इस विद्रूप को उजागर करने और इससे उबरने के प्रयास देखिये –

लोकपाल का अस्त्र ले जो उतरा मैदान

करो दुआएं यारो ऐसे रघुनन्दन की मौत न हो।

++ ++ ++

नया जाँचआयोग भी जांच करेगा खाक

ये भी क्या देगा गारन्टी कालेधन की मौत न हो।

कविता में भोगे हुए यथार्थ की लगातार चर्चा हुयी है लेकिन उसके चित्रण तक। दलित लेखकों ने अपने लेखन में जहाँ समस्याओं को उजागर किया है वहीं उनका समाधान भी बताया है। रमेशराज दलित नहीं हैं किन्तु उनका जन्म एक विपन्न परिवार में हुआ , इस नाते दलितों के प्रति उनकी तेवरियों में वही पीड़ा घनीभूत है, जो दलित लेखकों के लेखन में दृष्टिगोचर हो रही है।

निस्संदेह आज दलितों ने निरंतर प्रयास से अपना जीवन-स्तर बदला है। अपने लिए अनंत सम्भावनाओं का आकाश तैयार किया है। किन्तु समाज में अभी भी कुछ ऐसा है जिससे तेवरीकार आहत है-

पूंजीपति के हित यहाँ साध रही सरकार

निर्बल दलित भूख से पीड़ित अति निर्धन की मौत न हो।

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लिया उसे पत्नी बना जिसका पिता दबंग

सारी बस्ती आशंकित है अब हरिजन की मौत न हो।

तेवरीकार ने आज़ादी की लड़ाई का चित्रण उन दोगले चरित्रों को उजागर करते हुए किया है, जिन्होंने आजादी के दीवानों की पीठ में छुरे घोंपे-

झाँसी की रानी लिए जब निकली तलवार

कुछ पिठ्ठू तब सोच रहे थे “ प्रभु लन्दन की मौत न हो”।

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यास ‘गोदान’ के पात्र ‘गोबर्धन’ के माध्यम से युवा आक्रोश को इस प्रकार व्यक्त किया है-

झिंगुरी दातादीन को जो अब रहा पछाड़

‘होरी’ के गुस्सैले बेटे ‘गोबरधन’ की मौत न हो।

हिंदी साहित्य में नये-नये प्रयोग होते रहे हैं, आगे भी होते रहेंगे। कविता में “ तेवरी-प्रयोग “ एक सुखद अनुभव है जो सामाजिक सन्दर्भों से गुजरते हुए समसामयिक युगबोध तक ले जाता है। तेवरी की भूमिका कैसी है स्वयं तेवरीकार के शब्दों में अनुभव की जा सकती है-

इस कारण ही तेवरी लिखने बैठे आज

किसी आँख से बहें न आंसू , किसी सपन की मौत न हो।

स्पष्ट है, तेवरी नयी सोच, नयी रौशनी लेकर आयी है। अन्य तेवरी शतकों की तरह ‘ घड़ा पाप का भर रहा ‘ की लम्बी तेवरी आँखें खोलने वाली है। आशा है, हिंदी साहित्य के लेखक तेवरी को स्वीकारने, संवारने में हिचकेंगे नहीं।

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+विश्वप्रताप भारती , बरला, अलीगढ़

मोबा.-8445193301

|| तेवरीपक्ष के माध्यम से काव्य को नई दिशा।|

+डॉ. गौरीशंकर ‘पथिक ’

हिंदी के गीतकारों को उर्दू से सराबोर ‘ ग़ज़ल ’ के मोह से दूर रहना चाहिए। तेवरी के माध्यम से आप हिंदी काव्य को नयी दिशा प्रदान कर रहे हैं। समाज को प्रतुपन्न समस्याएं – आतंकवाद , भ्रष्टाचार ,बलात्कार एवं आरक्षणवाद से उबारने के हेतु तेवरी एक सशक्त माध्यम है।

काव्य का एक नया रस - “ विरोधरस “

+ डॉ. अभिनेष शर्मा

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शोध कृति क्रोध “ विरोधरस “ में श्री रमेशराज ने समझाया है कि क्रोध और आक्रोश में महीन अंतर है। क्रोध अपने विरोधी का विनाश करता है , आक्रोश केवल विनाश की कामना करता है। वह विचारों को बदलने की क्षमता रखता है। विरोध बर्बर आततायी पक्ष को वैचारिक रूप से परिवर्तन की ओर ले जाना चाहता है जबकि क्रोध शत्रु पक्ष का केवल और केवल विनाश करता है।

अब तक साहित्य में जितने रस विराजते हैं , उनकी आभा का एक अलग स्वरूप है , परन्तु “ विरोधरस ” जिसे साहित्य जगत में रमेशराज ने स्थापित करने का प्रयास किया है, स्तुत्य इसलिए है क्योंकि राज जी ने इस नये रस के प्रत्येक अंग पर विस्तार से चर्चा की है।

किसी भी व्यवस्था, विचार, विसंगति, चरित्र, व्यक्तिविशेष , या परम्परा का विरोध करना समाज की सनातन रीति रही है। इस रीति को पूर्ववर्ती रसाचार्यों ने स्थायी भाव साहस या क्रोध के साथ रखकर वीररस अथवा रोद्र्रस के रूप में स्थापित किया है। रसचिंतन को आगे बढ़ाते हुए श्री रमेशराज ने समीक्ष्य पुस्तक “विरोधरस” में बताया है कि वीररस , रौद्ररस से विरोध रस पूरी तरह प्रथक है। विरोध आक्रोशित असहाय, निर्बल आदमी का बयान है। विरोध का जन्म स्थायी भाव आक्रोश से होता है। डॉ. नरेशपाण्डेय चकोर के शब्दों में-

“ विरोधरस ” सचमुच शोधपूर्ण और स्व्गात्योग्य कृति है। इसे नये रस के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।

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डॉ.अभिनेष शर्मा, देव हॉस्पिटल, खिरनी गेट , अलीगढ़

मोबा.-9837503132

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“ विरोधरस ” सचमुच शोधपूर्ण और स्व्गात्योग्य कृति है। इसे नये रस के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।

+ डॉ. नरेशपाण्डेय चकोर

विरोधरस के सभी पक्ष ज्ञानवर्धक व उत्तेजक

+रामचन्द्र शुक्ल

“ विरोधरस ” , नया रस। इसे मान्यता मिलनी चाहिए।

+डॉ. स्वर्ण किरन

रमेशराज जी शोध कृति "विरोधरस" साहित्य जगत को अनुपम देन हैं । इस शोध कृति में गहन चिंतन , सोच और तार्किकता के साथ " विरोध रस " को स्थापित किया गया है।आने वाली पीढी "विरोधरस " पर डॉक्टरेट / डी.लिट्. की उपाधियाँ भी ग्रहण करे तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

+ब्रह्मदेव शर्मा।|

“ विरोधरस : “ शोधपूर्ण उपलब्धि

इं. त्रिलोक सिंह ठ्कुरेला

“ विरोधरस ” पर विस्तृत जानकारी मन प्रफुल्लित करती ह। इस शोधपूर्ण उपलब्धि को साहित्य जगत द्वारा सहज भाव से स्वीकार करना चाहिए।

+|| विरोधरस रचनात्मक कार्य।| +डॉ. मक्खनलाल पाराशर

समाज में जो विरोधीवृत्तियाँ बढ़ पनप फलफूल रहीं हैं, उनकी ओर आपने समाज का ध्यान आकर्षित कराने हेतु साहित्य क्षेत्र में विरोधरस के रूप में बेहद जरूरी रचनात्मक कार्य किया है।

+|| विरोध रस स्थापित होगा।| +भगवानदास जैन

‘विरोधरस’ को एक रस के रूप में स्थापित करने के लिए आप|| रामेशराज।| बेहद मशक्कत और जद्दोजहद कर रहे हैं। आपने इसके विविध अन्गों का भी भरपूर विश्लेषण किया है। आपको सफलता मिलेगी।

+|| विरोध क्रोध से सर्वथा भिन्न।| +परमलाल गुप

भारतीय समीक्षा में रस ही कविता का प्राणतत्त्व माना गया है। रसों की संख्या निर्धारित नहीं की जा सकती है। इस कारण ही परम्परागत रसों के आलावा वात्सल्य , भक्तिरस और जुड़े। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने प्रकृति रस को भी स्वीकारा। असल में कुछ भाव तो ऐसे हैं कि आलम्बन बदल जाने से वे स्वतंत्र रूप धारण कर लेते हैं।’ ‘प्रेम’ ऐसा ही मानो सत्य है। कुछ संचारी भी इतने सशक्त हो जाते हैं कि उनसे रस का परिपाक हो जाता है। परम्परत रूप से रमेशराज का ‘विरोधरस’ रौद्र रस के अंतर्गत आता है परन्तु वह विरोध जिसमें व्यवस्था के प्रति अथवा किसी सामाजिक बुराई के प्रति गुस्सा या आक्रोश हो वह व्यक्तिगत क्रोध से सर्वथा भिन्न होता है। +डॉ. परमलाल गुप्त

‘विरोध रस’ पर विस्तृत जानकारी मन प्रफुल्लित करती है। इस शोधपूर्ण उपलब्धि को साहित्य जगत द्वारा सहज भाव से स्वीकार कर लेना चाहिए।

+इं. त्रिलोक सिंह ठकुरेला

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समीक्ष्य कृति “घड़ा पाप का भर रहा ” की पंक्तियाँ समकालीन समाज की विसंगतियों , विरोधाभासों और विद्रूपताओं पर करारी चोट करती प्रतीत होती हैं। काव्यकला निश्चय ही भाषा द्वारा भावों की साधना होती है , इस कला में आप (रमेशराज) निपुण हैं। आपकी यह लम्बी तेवरी मन को छूती है इसलिए आप बधाई के पात्र हैं।

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नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: ‘विरोध-रस’ विवादपूर्ण / डॉ. सुधेश व अन्य समीक्षाएँ
‘विरोध-रस’ विवादपूर्ण / डॉ. सुधेश व अन्य समीक्षाएँ
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