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प्राची - फरवरी 2017 / धारावाहिक आत्मकथा (दूसरी किस्त) / अनचाहा सफर / रतन वर्मा

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  आत्म संदर्भ धारावाहिक आत्मकथा (दूसरी किस्त) अनचाहा सफर रतन वर्मा सुप्रसिद्ध कहानीकार और उपन्यासकार रतन वर्मा उन गिने चुने लेखकों में...

 

आत्म संदर्भ

धारावाहिक आत्मकथा (दूसरी किस्त)

अनचाहा सफर

रतन वर्मा

सुप्रसिद्ध कहानीकार और उपन्यासकार रतन वर्मा उन गिने चुने लेखकों में से हैं, जो निरन्तर साहित्य साधना में रत रहते हैं. उनके कई उपन्यास प्रकाशित होकर चर्चित हो चुके हैं. अब उन्होंने आत्मकथा लेखन में अपना हाथ आजमाने का प्रयास किया है. अभी उनकी आत्मकथा पूरी नहीं हुई है, परन्तु प्राची ने उसे धारावाहिक रूप में प्रकाशित करने की योजना बनाई है. प्राची के जनवरी, 2017 अंक से इसका आरंभ हुआ था. अब प्रस्तुत है इसका दूसरा अंश. संपादक

मेरा निरंकुश होते जाना

ब मैं सिर्फ एक वर्ष का था, तब ही मेरे पिता का निधन हो गया था. हम चार भाई-बहनों में मेरे भैया श्री कामेश्वर प्रसाद वर्मा सबसे बड़े थे. पिता के निधन के समय उनकी उम्र मात्र नौ वर्ष थी. मेरी विधवा हो गयी मां सिर्फ सत्ताईस की थीं तथा मुझसे बड़ी बहन तीन वर्षों की उनसे बड़े मंझले भैया धनेश प्रसाद वर्मा छः वर्ष के थे. मधुबन गाँव में अच्छी-खासी पुस्तैनी सम्पत्ति थी हमारी. वह गाँव मुजफ्फरपुर जिले में अवस्थित था. मुजफ्फरपुर शहर के नया तोला मोहल्ले में एक दो मंजिला मकान भी था, जो आज भी थोड़े परिवर्तन के साथ वहां मौजूद है और जिसमें मेरे इकलौते चचेरे भाई रमाशंकर अपने परिवार के साथ निवास करते हैं.

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मेरे पिता अपने दो भाइयों में बड़े थे. पिता के जीवनकाल में अपने बड़े भाई को मेरे चाचा पिता जैसा ही आदर दिया करते थे. मेरी मां को अपनी मां समान और हम भाई-बहनों को पुत्रवत आत्मीयता देते थे. लेकिन जैसे ही मेरे पिता का निधन हुआ उनका व्यवहार हम सभी के लिए सौतेला जैसा हो गया. हालात यहां तक पहुंच गये कि हमारे लिए उनके साथ रहकर ढंग से सांस लेना भी दुश्वार हो गया. हम जी तो रहे थे, पर जैसे-तैसे जीवन काट लेने की तरह. यह तय था कि चाचा के साथ रहते हुए हम भाइयों और बहन का भविष्य कहीं से भी सुरक्षित नहीं था. हालांकि मैं तो उस समय सिर्फ एक वर्ष का था, लेकिन जब थोड़ी समझ विकसित हुई तो मां अक्सर उन भयावह दिनों के किस्से बताया करती थीं.

हमारे हालात की सूचना मेरे बड़े मामा बिंदेश्वरी प्रसाद वर्मा, जो दरभंगे में रहा करते थे और शहर के गणमान्य लोगों में शुमार थे, उन्हें मिली. वे न सिर्फ जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि समर्पित कांग्रेसी नेता भी थे. अपने दो छोटे भाइयों के लालन-पालन का दायित्व भी उन्हीं के कंधे पर था. उन्हें सिर्फ एक बात का दुःख था कि शादी के दस ग्यारह वर्ष गुजर जाने के बावजूद उन्हें संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी तो जब उन्हें हमारे हालात का पता चला, तब क्रोध तो उन्हें बहुत आया था, पर अपने क्रोध पर नियंत्रण रखते हुए वे चाचा के पास पहुंच गये थे तथा हमारे पूरे परिवार को साथ लेकर दरभंगा आ गये थे.

हमारे आ जाने से उनके घर में जैसे बहार सी आ गयी थी. मैं चूंकि सबसे छोटा था, इसलिए मामी ने मुझे अपनी संतान मान लिया था. हालांकि ऐसा नहीं कि मेरे बड़े भाइयों और बहन को उनके किसी भी प्रकार के तिरस्कार का सामना करना पड़ता रहा था, फिर भी मेरे प्रति उनका स्नेह तुलनात्मक दृष्टि से कुछ अधिक ही था. मुझे मामा-मामी अपने साथ सुलाने लगे थे, जबकि दोनों भैया और दीदी मां के साथ सोया करते थे. मेरे साथ उनके अतिरेक स्नेह का हश्र यह हुआ था कि मैं दिन-प्रतिदिन जिद्दी होता चला गया था. इतना जिद्दी कि क्या मजाल कि मैंने किसी चीज या किसी बात के लिए जिद्द ठान ली और पूरी न हो.

एक घटना की याद तो अगर आज भी आ जाती है, तो अन्तस ठहाका लगा उठता है- मैं चार वर्ष का हो गया था. बाहर ही मामा आराम-कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे और मैं उन्हीं के पास बरामदे में बैठा खेल रहा था. तभी दरवाजे पर नाई का आगमन हुआ. मेरा बाल काटने के लिए उसे बुलवाया गया था. पर मैंने जिद्द ठान ली थी कि बाल नहीं तो नहीं कटवाऊंगा. मामा दुलार-पुचकार करते रहे. अंततः जब मुझे लालच दिया गया कि बाल कटवाने के एवज में मुझे लेमनचूस दिया जायेगा तब मैं राजी हुआ था. लेकिन अभी नाई ने कनपट्टी के बाल पर एक-दो बार कैंची चलायी ही थी कि मैंने जिद्द ठान ली कि मैं अमरूद की शाख पर बैठकर बाल कटवाऊंगा.

हमारे दरवाजे के बाहर दो अमरूद के पेड़ हुआ करते थे. एक तो बहुत ऊँचा और दूसरा मंझोला, जिसकी शाखें छितराई सी थीं और शाखों की ऊँचाई इतनी ही कि जिस पर किसी बच्चे को गोद में लेकर बिठाया जा सके और फिर भी बच्चे का सिर बिठाने वाले के कंधे तक हो.

मामा ने मुझे गोद में लेकर शाख पर बिठा दिया था और खुद दोनों हाथों से मुझे पकड़ रखा था. फिर से नाई ने मेरे बालों पर कैंची चलाना शुरू किया था. अभी उसने दो-चार कैंची ही चलायी थी कि मैंने जिद्द ठान ली थी कि अब नाई के कंधे पर बैठकर बाल कटवाऊंगा.

मेरी इस जिद्द पर मामा को गुस्सा आ गया था, बोले थे, ‘उसके कंधे पर बैठेगा तो बाल कैसे काटेगा वह?’

पर मैं भी अपनी जिद्द पर अडिग था.

अब मामा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया था. गुस्से में उन्होंने मेरे गाल पर हल्की चपत जड़ दी थी. फिर क्या था, मैं ऐसे चिंघाड़ उठा था, जैसे किसी ने मेरी जान ले ली हो. मेरा आर्तनाद अंदर मामी के कानों में पड़ा था. भागती हुई बाहर आयी थीं वह और मुझे गोद में उठाकर सीने से चिपका लिया था उन्होंने. फिर जब उन्हें पता चला कि मामा ने मुझे मारा है तब तो बिफरती नागन हो गयी थीं. वही बरस पड़ी थीं मामा पर, ‘हाथ नहीं टूट गया आपका, इस पर हाथ उठाते? इसीलिए भगवान आपको अपना बच्चा नहीं दे रहे हैं...’ इसके आगे और क्या-क्या बोलती रही थीं वह. इससे अनभिज्ञ मामा को डांट खाते देखकर शायद मैं मन ही मन आह्लादित होता रहा था. मामा लाख अपनी सफायी देते रहे थे, पर मामी पर कोई असर नहीं हुआ था.

उक्त घटना का जिक्र मैंने इसलिए किया है, ताकि बता सकूं कि अतिशय प्यार बच्चे को किस तरह जिद्दी बना सकता है, जो उसके व्यक्तित्व के विकास में घातक भी सिद्ध हो सकता है.

मामा और मामी इस उम्मीद से निराश हो ही चुके थे कि अब उन्हें किसी औलाद का सुख भी प्राप्त होगा, इसलिए अपना सारा प्यार वे मुझपर ही न्यौछावर करते रहे थे, लेकिन नियति का खेल भी निराला ही होता है. उसी वर्ष जब मैं चार वर्ष की उम्र पार कर रहा था, मामी के पैर भारी हो गये. और जब मैं पांच वर्ष का हुआ, तब उन्होंने एक पुत्री को जन्म दिया, जिसका नाम मंजु रखा गया. उसके बाद तो मुझे जैसे भगवान का अवतार ही मान लिया गया था. सिर्फ मामा-मामी नहीं, बल्कि आस-पड़ोस, हित नातेदार सभी के मुंह में एक ही बात कि रतन का पैर इतना शुभ है कि मामी की गोद भी भर गयी. फिर तो मामा-मामी जैसे दोनों हाथों से मेरे लिये प्यार लुटाने लग गये थे; हालांकि एक संकट का सामना उन्हें और करना पड़ा था. कमरे में एक अतिरिक्त पलंग की व्यवस्था कर दी गयी थी. उस पर मेरे और मामा के सोने की व्यवस्था की गयी थी और मामी और मंजु की व्यवस्था पुराने बिस्तर पर.

लेकिन यह मुझे कहां मंजूर था. मेरी जिद्द और रोने-चिल्लाने के कारण व्यवस्था में परिवर्तन किया गया था. मैं मामी के साथ सोने लगा था और मंजु मामा के साथ. मगर रोज़ सुबह जब मेरी आँखें खुलती थी, मैं खुद को मामा के बिस्तर पर पाता था.

बचपन का मेरा वह संस्मरण लंबे समय तक मेरे जेह्न में छाया रहा था. बाद में चलकर उस मनोविज्ञान पर मैंने ‘अब चेतना स्वस्थ है’ शीर्षक कहानी की रचना भी की, जिसका प्रकाशन ‘धर्मयुग’ के 1 से 15 जन. 1993 अंक में प्रकाशित हुई और अनेक बार उसका नाट्य रूपांतर का मंचन भी हुआ.

मंजु के जन्म के तीन वर्ष बाद मामी ने एक पुत्र को भी जन्म दिया. अब बड़े मामा का परिवार पूर्ण हो गया था. और मैंने अपने शुभ होने का डंका भी पिटवा दिया था चारों ओर.

मामा के एक घनिष्ठ मित्र हुआ करते थे, जिनका नाम था दयाशंकर प्रसाद. वे एक नामी एडवोकेट थे तथा धनपति भी. लेकिन वे भी संतानविहीन थे. मेरे कदम शुभ हैं, इसकी खबर तो थी ही उन्हें, सो एक दिन बातों-बातों में ही मामा से बोल पड़े, ‘भाई बिन्दा, अब तो तुम दो-दो बच्चों के बाप बन चुके हो. रतन का पैर तो सचमुच तुम्हारे लिए शुभ सिद्ध हुआ. अगर बुरा न मानो तो मैं रतन को गोद लेना चाहता हूँ. मेरे पास इतनी सम्पत्ति है, मगर भोगने वाला...’

शायद वे और भी कुछ बोलते, लेकिन तभी मामा गुस्से से आग बबूला होते हुए बोल पड़े थे, ‘चल उठ! और निकल यहां से. खबरदार जो आज के बाद से तुमने अपना चेहरा दिखाया. रतन मेरा भांजा नहीं, बल्कि बेटा है. मेरे दोनों बच्चों से पहले का बेटा. अब खड़ा क्यों है, जाता क्यों नहीं...’

तमतमाहट दयाशंकर बाबू के चेहरे पर भी उभर आयी थी. फिर भी वे स्पष्टीकरण देना चाह रहे थे, लेकिन मामा ने उनकी एक न सुनी और घर से निकाल बाहर करके ही दम लिया था.

अअअ

मैं शायद हर तरह से मामा के लिए शुभ सिद्ध हुआ था. न सिर्फ संतान के मामले में, बल्कि उनके उत्तरोत्तर समृद्ध होते जाने के मामले में भी. मेरे आने के पूर्व दो बार वे वार्ड-आयुक्त के चुनाव में खड़े हुए थे, पर सफल नहीं हो पाये थे. लेकिन मेरे आने के बाद जब उन्होंने चुनाव लड़ा, तब भारी बहुमत से उनकी जीत हुई थी. शहर के गणमान्य नागरिक तो थे ही वे, चुनाव जीतने के बाद उन्हें म्युनिसिपैलिटी के चेयरमैन के ओहदे के लिए भी ऑफर दिया गया था. पर क्योंकि सुरेन्द्र प्रसाद सिन्हा को वे बड़े भाई जैसा ही आदर देते थे, इसलिए उन्होंने खुद से उसके नाम का प्रस्ताव रख दिया था. उसके बाद से भी हर चुनाव जीतते रहे थे वे.

तो घर में मेरा शुभ माना जाना, अन्य लोगों के लिए शुभ था या नहीं, लेकिन मेरे लिए वह घातक ही सिद्ध हुआ था. मेरी जटिल से जटिल फरमाइशें पूरी की जाती रहतीं और मेरी बड़ी से बड़ी गलती पर भी किसी को कुछ कह पाने की इजाजत तो बिल्कुल भी नहीं थी. अगर किसी ने कुछ कह दिया, फिर तो समझिये कि उसने अपनी शामत ही बुला ली हो. मामी ने अगर किसी का भी मेरे प्रति दुर्व्यवहार देख लिया, तो गलती चाहे मेरी ही क्यों नहीं होती, मगर खामियाजा दुर्व्यवहार करने वाले को ही भुगतना पड़ता. चाहे वह मेरी माँ या मामा ही क्यों न हों.

घर में एकमात्र मेरे भैया ही थे, जो बचपन से ही काफी गंभीर प्रकृति के थे. सिर्फ उन्हीं से घर के सारे बच्चे खौफ खाते थे. इसका कारण था कि मामी भी उनकी गंभीर प्रकृति के कारण उन्हें कुछ विशेष सम्मान दिया करती थीं.

काव्य लेखन को भैया ने जब से होश संभाला था, तभी से करना शुरू कर दिया था. माँ तो यह भी कहा करती थीं कि मेरे पिता के जीवन-काल में दूसरी-तीसरी कक्षा से ही भैया कुछ-कुछ लिखते रहे थे. भैया की उस प्रतिभा पर हमारे पिता जी भी गौरवान्वित महसूस किया करते थे. मगर इतना तो समझ ही सकता हूँ मैं कि दूसरी-तीसरी कक्षा में पढ़ने वाला बच्चा भला क्या लिखता रहा होगा.

खैर, तो मामा के संरक्षण में आने के बाद, समय के अंतराल में, कामेश भैया धीरे-धीरे ख्यात होते चले गये थे. इतने ख्यात कि जब वे मारवाड़ी उच्च विद्यालय के छात्र थे, तब उनके हिंदी के शिक्षक का व्यवहार भी उनके साथ मित्रनुमा ही हुआ करता था. और धीरे-धीरे तो उनकी प्रतिष्ठा शहर के प्रत्येक वर्ग के लोगों के बीच बढ़ती गयी थी. जिला और समाज में वे मामा की तरह ही गणमान्य होते गये थे. शायद यही कारण था कि मामा और मामी की नज़रों में वे गंभीरता से महसूस किये जाने लगे थे.

क्रमशः.....

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3789,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,326,ईबुक,182,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2744,कहानी,2067,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,305,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1879,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,675,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,51,साहित्यिक गतिविधियाँ,180,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,51,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: प्राची - फरवरी 2017 / धारावाहिक आत्मकथा (दूसरी किस्त) / अनचाहा सफर / रतन वर्मा
प्राची - फरवरी 2017 / धारावाहिक आत्मकथा (दूसरी किस्त) / अनचाहा सफर / रतन वर्मा
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