बाल-विज्ञान-कथा / टाइटन की सैर / डॉ. अरविन्द दुबे

SHARE:

बाल-विज्ञान-कथा टाइटन की सैर - डॉ. अरविन्द दुबे राजू आज फिर नदी के किनारे उसी जगह पर खड़ा था जहां कुछ महीनों पहले उसकी नीनो से अचानक मुलाकात...

बाल-विज्ञान-कथा टाइटन की सैर - डॉ. अरविन्द दुबे

राजू आज फिर नदी के किनारे उसी जगह पर खड़ा था जहां कुछ महीनों पहले उसकी नीनो से अचानक मुलाकात हुई थी। वही नीनो जो किसी किसी अज्ञात ग्रह का वासी था जो अपने चार साथियों के साथ मानसिक ऊर्जा के द्वारा प्रकाश की गति से भी तेज चलने वाले यान पर सवार होकर रहने के लिए एक शांत जगह की तलाश में पृथ्वी पर आया था। यह वही नीनो था जो एक भाषा परिवर्तक यंत्र के जरिए पृथ्वी पर बोली जाने वाली सारी भाषाओं को सुन कर समझ सकता था और बोलने पर उसकी आवाज सामने वाले को उसकी ही भाषा में सुनाई देती थी। कमाल का यंत्र था वह, जिसे तकनीकी रूप से हम मानवों से बहुत विकसित, नीनो की जाति के वैज्ञानिकों, ने तैयार किया था। राजू की अच्छी तरह याद है कि नीनो ने उसे बताया था कि उसके अपने ग्रह पर, वहां के निवासियों की अकड़ के चलते, विभिन्न क्षेत्रों में भयंकर युद्ध हुआ था जिसमें आणुविक, एंटीग्रेविटी और बहुत सारे हथियारों का जम कर प्रयोग हुआ था। इस युद्ध में वहां की नब्बे प्रतिशत आबादी समाप्त हो गई थी। वातावरण में इतना विकरण था कि वहां सांस लेना भी मौत को दावत देना था। नीनो के ग्रह के बचे-खुचे लोग छोटे-छोटे समूहों में जेनेरशनशिपों में बैठकर वहां से भाग निकले थे। यह जेनेरेशन शिप एक तरह से एक पूरा चलता फिरता शहर ही होते थे जिनमें हर चीज स्वनियंत्रित होती थी। बिना कोई ईंधन भरे मानसिक ऊर्जा से संचालित यह जेनेरेशन शिप शताब्दियों तक अंतरिक्ष में चक्कर लगाते रह सकते थे।

{ads-post]

एक विशेष प्रकार की किरणों की अदृश्य दीवार इन जेनेरेशन शिपों को अंतिरिक्षीय हानिकारक विकरणों से बचाती थी। ऐसे ही एक जेनेरेशन शिप में निकला था नीनो का दल, अंतरिक्ष में ऐसी जगह की तलाश  में, जहां उनकी लुटी-पिटी सभ्यता फिर से विकसित हो सके। पृथ्वी पर आकर उन्होंने वहीं द्वेश, कपट और थोथी अकड़ देखी थी; यहां के निवासियों में आणुविक हथियारों सहित पूरी मानवता के संहार में सक्षम हथियारों की होड़ देखी थी; तभी वह समझ गए थे कि एक न एक दिन इस पृथ्वी का भी वही हश्र होगा जो उनके अपने ग्रह का हुआ था। उन्हें लगा था कि पृथ्वी पर भी बसना ठीक नहीं है क्योंकि जब यह आणुविक हथियार प्रयोग होंगे तो उन्हें अन्य पृथ्वी वासियों की तरह यहां से भी जान बचाकर भागना पड़ेगा। अंततः वह यह कहते हुए लौट गए थे कि हम फिर से वही विनाश का दृश्य नहीं देखना चाहते हैं जो हमने अपने ग्रह पर देखा है। वे ऐसी पृथ्वी पर एक बार बस कर फिर से नहीं उजड़ना चाहते थे जिस पर विनाश का खतरा मंडराता उन्हें साफ दिखाई दे रहा था। हालांकि राजू ने उन्हें विश्वास दिलाना चाहा था कि वह बच्चों की इस पीढ़ी पर एक बार भरोसा करके तो देखें। वह देंगे उन्हें एक दुनियां जिसमें छल, कपट और हथियारों की होड़ नहीं होगी और हमेशा शांति रहेगी। पर नीनो और उसके साथी राजू की पुकार को अनसुना करक एक उपयुक्त स्थान की तलाश में चले गए थे, जहां उनकी उजड़ी सभ्यता एक बार फिर पनप सके। हाँ जाते-जाते वह यह वादा जरूर कर गए थे कि एक ठीक-ठाक बसेरा मिलते ही वह उससे मिलने जरूर आएंगे। तब से आज तक राजू नियम से शाम को रोज नदी के किनारे यहां पर आता है क्योंकि न जाने क्यों उसका मन कहता है कि सुदूर ग्रह से आया उसका दोस्त, वह भला प्राणी नीनो, एक न एक दिन उससे मिलने जरूर आएगा। पहले तो उसके अन्य दोस्त भी उसके साथ होते थे पर एक-एक कर के सबने उसके साथ आना छोड़ दिया था। राजू धीरे-धीरे अकेला होता गया। अब वह न किसी के साथ खेलता है और न स्कूल के अलावा और कहीं जाता है। अब तो सपनों में भी उसे नीनो ही दिखता था। राजू पर नीनो का यह भूत इस हद तक सवार था कि कोई उसे सनकी मानता था तो कोई दिन में सपने देखने वाला लड़का। पर इस सबसे बेखबर राजू हर शाम नदी के किनारे इसी जगह पर आता और सूर्य छिपने तक यही बैठा चारों ओर ताकता रहता था। उसके पिता-माता भी सोच में थे कि आखिर राजू को यह हुआ क्या है?

हर रोज की तरह राजू आज भी काफी देर से नदी के किनारे पर बैठा था। चूंकि आज स्कूल की छुट्टी थी इसलिए राजू नाश्ता करने के बाद यहीं आकर जम गया था। राजू तरह-तरह के ख्यालों में खोया था कि  उसे लगा कि अचानक हवा तेज-तेज चलने लगी है। फिर किसी भारी चीज के धीरे से गिरने की आवाज आई। पेड़ों पर बैठे पक्षी चीख कर आसमान में चक्कर काटने लगे। राजू को थोड़ा डर भी लगने लगा। आखिर क्या बात हुई? झाड़ियों में कोई जंगली जानवर तो नहीं आ गया? यह पक्षी चीख कर पेड़ों से क्यों उड़े? उसे लगा अब लौटना चाहिए। वह अपनी जगह से उठा और वहां से थोड़ी ही दूर पर बसे अपने गांव की ओर तेज-तेज कदमों से चलने लगा।

'राजू'

राजू को लगा किसी ने उसे पुकारा है। राजू ने पलट कर देखा पर वहां कोई न था। वह मुँह फेर कर उस पतली पगडंडी पर चलने लगा जो गांव की तरफ जाती थी। 'राज' उसके पीछे से आवाज आई। राजू ठिठक गया। एक बार डरते-डरते उसने पीछे मुड़ कर देखा। अबकी बार उसे झाड़ियों से कोई बाहर निकलता नजर आया। राजू वहीं रुक गया। झाडियों से निकलने वाला उसी की ओर बढता आ रहा था। वह भागने को ही था तभी फिर एक आवाज आई 'राज'। राजू जहां था वहीं रूक गया। थोड़ी देर बाद उसी तरह का एक और प्राणी झाड़ियों से निकलता दिखाई दिया। वही करीब 4 फीट का कद, बॅाहें घुटनों तक पहॅुचतीं हुईं, सिर शरीर के मुकाबले काफी बड़ा, लम्बा चेहरा, खाल जैसे सीधे-सीधे हड्डियों पर चिपकी सी दिखी।

"कहीं ये नीनो तो नहीं", उसने सोचा।

राजू की तरफ आनेवाला अब काफी करीब आ गया था।

'अरे ये तो नीनो जैसा है.............बिलकुल नीनो जैसा', राजू ने सोचा। आने वाला अब और पास आ चुका था।

'राज', राजू को अब उसकी आवाज साफ सुनाई दी। वे राजू की ओर बढ़ते आ रहे थे।

राजू ने दूर से पुकारा, "नीनो...........क्या तुम नीनो हो?"

"हां, और तुम 'राजू'?"

"हां मैं राजू हॅू", कहता हुआ राजू दौड़ कर नीनो के पास पहुंच गया।

"मुझे पता था तुम एक दिन जरूर आओंगे", राजू ने हांफते हुए कहा। "तभी तो मैं आ गया।" राजू का दिल बल्लियों उछलने लगा। वह लपक कर आगे बढ़ा। नीनो ने अपने हाथ आगे बढ़ाए तो राजू ने उन हड़ियल हाथों को पकड़ लिया.......बेजान से ठंडे हाथ.... पर आज उसे कुछ भी अलग नहीं लग रहा था।

"नीनो तुम्हारा वह भाषा बदल यंत्र कहां है, आज लाए नहीं क्या?"

"ये रहा , उसी से तो बोल रहा हूँ राजू, वरना तुम मेरी बात कैसे समझ पाते?"

''वाह! आज तो इससे बिलकुल हमारी जैसी बोली सुनाई दे रही है, पहले जैसी नहीं, मैं.........नीनो.........आया दूर से मिलने तुमसे।"

दोनों हंस पड़े।

"ओह मैं तो समझा कि अबकी बार तुम हमारी भाषा सीखकर आए हो।

"सीखी तम्ुहारी भाषा.............पर हम गलत बाले ता तुम सुनता तो हंसता तुम..............."

"अच्छा अगर तुम बिना भाषा बदल यंत्र के बोलोगे तो गलत बोलोगे और मैं उस पर हसॅूगा?" नीनो से स्वीकृति में सिर हिलाया। अब तक नीनो का दूसरा साथी भी आ पहुंचा था वह भी एकदम नीनो जैसा ही था।

"नीनो क्या यह तुम्हारा भाई है," राजू ने आनेवाले की ओर इशारा किया।

"भाई.........भाई क्या.............?" राजू समझ नहीं पा रहा था कि उसे कैसे समझााए कि भाई क्या होता है? फिर भी उसने समझाने की कोशिश की,

"एक पिता दो बेटे........ भाई-भाई......... " "बेटे.........बेटे क्या.....", नीनो की समझ में जैसे कुछ नहीं आया। राजू ने एक बार फिर समझाने की कोशिश की। उसने नीनो को पहले अपनी एक उंगली दिखाई और बोला मां........"फिर नीनो की उंगली पकड़ी और बोला "पिता" फिर दोनों उंगलियों को एक साथ मिलाया और बोला "बेटा"।

"नही..........मां नहीं..........पिता नहीं............बेटा नहीं.........हम लोग ........" नीनो राजू को कुछ समझाने की कोशिश कर रहा था पर शायद उसके लिए उपयुक्त शब्द नहीं जुटा पा रहा था।

क्या बेटा नही!ं मां नहीं...........पिता नहीं..........बेटा नहीं ...............ठीक है, ठीक है.......खैर जाने दो" यह कह कर राजू ने उसे उस ऊहापोह की स्थिति से उबारा। राजू को जैसे कुछ याद आया । "हां नीनो तुम्हें अपने रहने लिए कोई जगह मिली क्या, या फिर उसी तरह भटक रहे हो?"

"मिली........जगह मिली..........बहुत दूर....... ..."

"बहुत दूर, आखिर किस ग्रह पर?

"ग्रह पर नहीं उपग्रह पर....तुम जानते उपग्रह?"

"हाँ....हाँ उपग्रह यानि कि किसी ग्रह का चंद्रमा

"ठीक कहा "

"क्या कहते हो तुम उसे.......कौन सा है वह ग्रह जिस पर जाकर तुम बसे हो?"

"एक ग्रह ठंडा जिसके चारों ओर बर्फ से बने छल्ले है।"

"अच्छा शनि..."

"तो तुम्हारे यहां उसे शनि कहते हैं?" हाँ तो तुम शनि पर जाकर बसे हो........मगर कैसे ........हमारे सर तो कहते हैं कि शनि पर तो कोई धरातल ही नहीं है वहाँ 1800 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलती हैं और फिर वहां का तापक्रम शून्य से भी काफी नीचे.....तुम्हारी कुल्फी नहीं जम जाती वहाँ?"

"कुल्फी......... कुल्फी क्या......... कुल्फी तो खाते?" ओफो....... कुल्फी क्या........कुल्फी मतलब बर्फ..........बर्फ नहीं जम जाती तुम्हारी वहॉ?" "अरे नहीं हम शनि पर नहीं रहते......"

"तो"

"शनि का चंद्रमा.......हम शनि के एक चंद्रमा पर बसे हैं"

"शनि का चंद्रमा........... कौन सा शनि के तो साठ से ज्यादा चंद्रमा हैं"

"उनमें से ही एक, जिसे तुम लोग टाइटन कहते हो"

"तुम्हें कैसे पता नीनो कि हम किसे क्या कहते हैं?"

"भूल गए, पिछली बार हमने तुम्हें बताया तो था कि हमारे पास पृथ्वी की सारी भाषाओं का वापस मैप है। हमने यहां की तीन अरब पुस्तकालयों की सारी किताबें रिकार्ड कर रखीं हैं..."

"क्या! वैसे एक बात बताओ नीनो इनमें से कितनी किताबें तुम पढ़ पाओगे........ अब तक कितनी पढ़ पाए हो?"

"एक तरह से सारी"

"क्या", राजू का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया।

"हॉ हमारे मस्तिष्क में एक चिप लगाते वह चिप हमको हमारे ग्रह के सुपर कंम्प्यूटर से जोड़ता और हम जो जानकारी चाहते, मिल जाती"

"हूँ तो तुम शनि के चंद्रमा टाइटन पर जाकर बसे

हो"

"बसे नहीं बसने की कोशिश एक........"

"यानि कि अभी तक वहां पर जाकर अपने को ढाल नहीं पाए हो"

"ढाल क्या?"

"अरे तुम्हारे पास तो हमारी भाषा का वायस मैप है

भाषा परिवर्तक यंत्र है फिर भी पूछते हो ढाल क्या?" "पर एक बात बताओ नीनो तुम लोग टाइटन पर ही

क्यों बसे?

"क्योंकि बहुत बातों में टाइटन तुम्हारी पृथ्वी से मिलता है। जैसे तुम्हारी पृथ्वी के चारों ओर एक चंद्रमा चक्कर लगाता है वैसे ही टाइटन, शनि ग्रह का चंद्रमा जो तुम्हारे चंद्रमा से दो गुने से थोड़ा सा ही छोटा और करीब 16 दिन में शनि का एक चक्कर पूरा करता ....."

"वहां भी आदमी रहते हैं क्या नीनो?"

"नहीं, पर मानता अगर तुम्हारी पृथ्वी के अलावा इस ब्रह्माण्ड में जीवन कहीं और पनपा तो टाइटन पर ....।" "अब वहां ठीक से रह तो रहे हो नीनो?"

"नहीं.............अभी तो वहाँ रहना सीख रहे..." "क्यों अब वहां भी कोई परेशानी है?"

"परेशानी! टाइटन इतना ठंडा कि जम जाएं, शून्य से 180 डिग्री नीचे। "बाप रे!"

"और वातावरण में 97 प्रितशत नाइट्रोजन, आक्सीजन बिलकुल नहीं।"

"तो तुम वहां रहते कैसे हो नीना?"

"हमने बहुत बड़े बुलबुलों के आकार का एक शहर बसाया....वातावरण हमने अपने हिसाब से नियंत्रित किया"

"और सांस लेन के लिए आक्सीजन क्योंकि टाइटन के वातावरण में करीब 97 प्रतिशत तो नाइट्रोजन है पर आक्सीजन बिलकुल नहीं है।

"वह हम वहां की और गैसों से और वहां की जमी बर्फ से निकालते हैं।"

"काश मैं भी देख पाता कि बुलबुलों जैसे शहर कैसे होते हैं?", राजू ने नीनो से कहा। नीनो ने एक पल को सोचा और बोला, "देख सकते हो, हमारे साथ चलो।"

"तुम्हारे साथ..........फिर मेरे माता-पिता मुझे ढूंढेंगे तो?"

"नहीं, शाम तक हम तुम्हें वापस यहीं पहुंचा जाएंगे।"

"क्या बात करते हो!, शनि यहां से लाखों-अरबों किलोमीटर दूर है और तुम मुझे शाम तक वापस लौटा लाओग", राजू ने आश्चर्य से कहा।

"भूल गए तुम, हमारा यान मानसिक ऊर्जा से चलता है इसलिए प्रकाश की गति से हजारों गुना तेज चलता है, मन की गति से "

"क्या?"

हमारे मस्तिष्क में एक चिप लगा..........वह जुड़ा हमारे यान के कम्प्यूटर से ..... जब हम सोचते कि यान चले तो हमारा चिप सिग्नल देता यान कमप्यूटर को, यान चल पड़ता।"

"मतलब यान को चलाने के लिए तुम्हें हाथ-पांव कुछ नहीं चलाना पड़ता है सिर्फ तुम्हें यह सोचना है कि यान चले तो ये कमांड तुम्हारे मस्तिष्क में चली चिप रिसीव करके यानके कम्प्यूटर को दे देती है और तुम्हारा यान चल पड़ता है?"

"ठीक जाना........राजू"

"कमाल है"

"कमाल नहीं मानसिक ऊर्जा का सही पूरा प्रयोग"

"इसका मतलब जब तुम सोचोगे कि यान दाएं मुड़े तो यान दाएं मुड़ जाएगा और जब यह सोचोगे कि यान रुके तो यान रुक जाएगा?"

"ठीक जाना.........यान की तरह हमारे यहां और यंत्र भी सिर्फ सोचने से चलते" राजू की सारी शंकाएं मिट चुकीं थीं। वह मन ही मन नीनो के साथ जाने के लिए तैयार था फिर भी उसने पक्का करने के लिए पूछा, "नीनो हम शाम तक वापस लौट तो आएंगे?"

"बिलकुल"

"तो फिर चलें?"तीनों यान में सवार हो गए। हल्का सा धक्का महसस हुआ और यान चल पड़ा।

थोड़ी देर बाद यान में हल्का सा कंपन महसूस हुआ। नीनो कुछ परेशान सा दिखाई दिया। नीनो के साथी ने नीनो की ओर मुड़ कर देखा और नीनो ने राजू की ओर, मानो कुछ कहना चाहता हो। "क्या बात है नीनो", राजू ने थोड़ा डरते हुए पूछा। नीनो ने राजू की ओर देख कर कहा, "कोई खास बात नहीं। राजू तुम्हें मानसिक ऊर्जा का प्रयोग करने की आदत नहीं.......तुम्हारी पूरी मानसिक ऊर्जा हमें नहीं मिलती.... हमारा यान हम तीनों की पूरी मानसिक ऊर्जा से ही ठीक चलता।"

"तो", राजू ने पूछा।

"तुम सो जाओ.......तुम्हारी मानसिक ऊर्जा पर तुम्हारे जागृत मस्तिष्क का नियंत्रण खत्म ......तुम्हारी पूरी मानसिक ऊर्जा मिलती......प्रयोग होते........यान ठीक चलता.

....." मैं सो जाऊँ तो मेरा जागृत मस्तिष्क मानसिक ऊर्जा के प्रयोग में रुकावट पैदा नहीं करेगा?"

"ठीक"

"पर मुझे कोई परेशानी ..........."

"परेशानी कोई नहीं.....केवल नींद, सचमुच की नींद ....राजू डर गया। वह सोना नहीं चाहता था पता नहीं ये लोग क्या करे उसके बाद। उसे पछतावा हो रहा था कि वह उनके साथ क्यों आया?

"सोना ...........बोलो"

"नहीं मैं सोना नहीं चाहता, मैं यान की खिड़की से बाहर झांक कर देखना चाहता हॅू", राजू ने बहाना बनाया।

"बाहर देखना, बाहर कुछ नहीं....अंधेरा, घना अंधेरा........बाहर कुछ दिखाई नहीं देता, सो जाओ प्लीज।

यान में एक बार फिर कंपन हुआ। राजू ने सोचा कि अगर वह न सोया तो क्या पता यान चले ही न या यहीं से गिर कर नष्ट हो जाए। अगर वह सो जाता है तो पता नहीं ये लोग उसके बाद उसके साथ क्या करें? अंततः उसने फैसला कर लिया कि वह सो ही जाएगा। यूं मरने से तो सोना अच्छा। "सोना?"

"हां" राजू की मरी सी आवाज निकली, "पर मुझे तो नींद ही नहीं आ रही है कैसे सोऊं", राजू डर रहा था। "उस नीली रोशनी की ओर देखो", नीनो ने कहा। राजू नीली रोशनी की ओर देखने लगा और उसकी पलकें अपने आप मुंदने लगीं।

"राजू जागो हम पहुंचने ही वाले हैं," नीनो राजू की झिंझोड़ कर जगाने का प्रयास कर रहा था। राजू ने आंखें खोल दी।

"हम कहां आ गए", अपनी नींद खुलते ही राजू ने प्रश्न किया।

"शनि के पास..................."

"शनि के पास क्यों? हमें तो उसके उपग्रह टाइटन पर जाना था। क्या यान भटक गया", राजू ने घबरा कर प्रश्न किया।

"नहीं यान  भटका नहीं, जानते टाइटन शनि से हजारों किलोमीटर दूर?"

"हां-हां तुमने बताया था कि टाइटन को अपनी धुरी पर घूमने में भी उतना ही समय लेता है जितना शनि की एक परिक्रमा करने में इसलिए इसका एक भाग हमेशा शनि की और रहता है दूसरा हमेशा उससे दूर।"

"इसलिए हम शनि की एक लाई बाई के बाद टाइटन की कक्षा में प्रवेश करते।"

"लाई बाई क्या?"

"लाई बाई मतलब शनि का एक चक्कर लगा कर हमारा यान पहुंचता टाइटन की कक्षा में, फिर धीरे-धीरे उतरता टाइटन पर।"

एक झटका लगा और यान शनि की कक्षा में प्रवेश कर गया।

"क्या मै शनि को देख सकता हूं, राजू ने पूछा"

"हां यान की गति धीमी तुम देख सकते" यान में एक ओर एक खिड़की खुली शनि नजर आने लगा पर यह सब कुछ मिनटों तक ही दिखा क्यों कि तेज गति से चलता यान टाइटन की कक्षा में प्रवेश कर गया था।

"थोड़ी देर में हम टाइटन पर पहुंचते .............

..", नीनो कह रहा था। राजू उत्सुकता से टाइटन पर उतरने की प्रतीक्षा करने लगा। पर उसे अभी नीचे कोई मानव निर्मित रचना नजर नहीं आ रही थी। चारों तरफ कोहरा सा नजर आता था।

"नीनो यह कोहरा", राजू ने प्रश्नवाचक निगाहों से देखा।

"मीथेन गैस से बना कोहरा", नीनो ने उत्तर दिया।

"तभी यहां कुछ दिख नहीं रहा है"

"लो देखो", नीनो ने यान का राडार चालू कर दिया। यान की दीवार पर नीचे के चित्र साफ नजर आने लगे। अब टाइटन पर झीलें पहाड़, मैदान बालू के ढ़ेर साफ नजर आ रहे थे। यान जैसे ही टाइटन के दूसरी ओर पहुंचा तो कई बहुत बड़े-बड़े दानवाकार बुलबुले नजर आने लगे जो वड़ी तेजी से पास आ रहे थें।

"अब हम पहुंचने वाले हैं" नीनो ने कहा।

यान जाकर एक बुलबले के एक हिस्से पर चिपक गया। यान के एक हिस्से में एक दरवाजा खुल गया था। आगे एक संकरी सुरंग थी जिसमें भरपूर प्रकाश था। तीनों लोग जैसे ही यान से बाहर निकल कर सुरंग में आए उनके पीछे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया। राजन ने घबराकर बंद दरवाजे की ओर देखा। "हमारे बुलबुले शहर का अपना वातावरण.....टाइटन से अलग। दरवाजा बंद.....बाहर का वातावरण बाहर, अंदर कर अंदर....मिलावट नहीं" नीनो राजू को समझाने की कोशिश कर रहा था। सुरंग समाप्त होने पर फिर एक ऐसा ही दरवाजा था जो नीनो के पहुंचते ही अपने आप खुल गया और उनके अंदर प्रवेश करते ही अपने आप बंद हो गया। नीनो के तरह के ही एक जीव ने एक तेज रोशनी नीनो के कलाई पर बंधे बेंड पर डाली और नीनो को आगे जाने दिया। इसी तरह उसका दूसरा साथी आगे निकला। अब राजू की बारी थी। राजू के आगे रोशनी डाल कर वह अस्पष्ट स्वर में कुछ भनभुनाया। नीनो ने अपना भाषा परिवर्तक यंत्र उतारा और उस व्यक्ति से बात करने लगा। लगता था उनमें किसी बात पर बहस हो रही थी। अंततः उनमें सहमति हो गई और तीनों लोग आगे चले।

"चलो चलें", नीनो ने अब अपना भाषा बदल यंत्र पहन लिया था। राजू को घर की कल्पना गुदगुदा गई। नीनो पास के एक दरवाजे के पास पहुंचा। उसने एक नजर दरवाजे को देखा और दरवाजा खुल गया। राजू ने उनके साथ दरवाजे में प्रवेश किया। पर यह क्या वे तो एक उसी तरह के स्लाइडर या खिसकने वाले झूले के ऊपर बैठे थे जैसा कि आम तौर पर पार्कों में लगा होता है। इसके दूसरी एक दीवार पर एक चमकीली स्क्रीन लगी थी। जब वे तीनों लोग उस झूले पर बैठ गए तो नीनो ने उस स्क्रीन की ओर देखा। स्क्रीन के ऊपर रोशनी में कुछ अंक चमके। नीनो के उस स्क्रीन से नजर हटाते ही वे अपने आप उस खिसकने वाले झूले पर बहुत तेजी से खिसकने लगे। राजू को लगा कहीं वह किसी चीज से टकरा न जाए। उसकी चीख निकल गई।

"घबराना नहीं यह हमारे यहाँ का यातायात सिस्टम....हम उस स्क्रीन में फीड किया कहां जाना, वहीं जाकर रुक जाएगा अपने आप....... कोई खतरा नहीं", नीनो ने उसे सांत्वना दी। सचमुच ही वे एक दरवाजे के पास जाकर अपने आप रुक गए। उन लोगों के पहुंचते ही दरवाजा अपने आप खुल गया। अब वे एक गोल  कमरे में थे जिस में एक ही कमरे में सेल्फ बनाकर काफी जगह निकाली गई थी। उसमें नीनो जैसे चेहरेवाले दो जीव और थे। उनके चेहरे की खाल अपेक्षात लटक गई थी जिस से लगता था कि वे नीनो से ज्यादा उम्र के थे। राजू ने उन्हें हाथ जोडकर प्रणाम किया तो वे दोनों आश्चर्य सक कुछ बोले। राजू ने नीनो की ओर देखा कि कहीं उस से कुछ गलत तो नहीं हो गया?

"तुम क्या किया यह",  नीनो ने पूछा।

"प्रणाम", हमारे यहां बड़ों को प्रणाम करते हैं, ये तुम्हारे माता-पिता हैं न", राजू ने जानना चाहा।

"माता-पिता क्या", नीनो ने एक क्षण को सुपर कंप्यूटर से संपर्क किया और बोला, "ओह माता-पिता, हमारे यहां माता-पिता नहीं .....सुपीरियर और जूनियर......ये मेरे सुपीरियर हैं......हम इनके साथ एक ही स्पेस में रहते...हमको यहां के संस्कार देना इनका उत्तरदायित्व......." राजू हैरान था उसने पूछा, "माता नहीं......पिता नहीं फिर तुम लोग........" "हमारे यहां जब कोई अपना जूनियर चाहता...अपने शरीर से एक कोशिका सेंटर में देता.......उस कोशिका से क्लोन करके जूनियर बनता........पूरा जूनियर", नीनो ने समझाने की कोशिश की। राजू की आंखें आश्चर्य से फैलती जा रही थीं।

".............एक सुपीरियर को सिर्फ एक ही जूिनयर की परमीशन बस......ये दोनों सुपीरियर हम दोनों जूनियर" "नीनो तुम्हारा भी कोई जूनियर..."

"नहीं अभी मेरे पास सुपीरियर होने भर के लाइफ पॉइंट नहीं"

"नीनो तुम्हारा कमरा कहां है" राजू ने उत्सुकता पूछा।

"कमरा"...........कमरा नहीं स्पेस ......उधर", नीनो ने उसी कमरे के एक हिस्से की और इशारा किया । तुम्हारा मतलब यही एक कमरा तुम सारे लोगों के लिए"

" ठीक समझता....." "पर........."

तंम्हारे जैसा बड़ा-बड़ा स्पेस यहां नहीं......सब आर्टीफिशियल स्पेस ...नियंत्रित वातावरण..."

"फिर किचन, बाथरूम....शौचालय.............. " नीनो ने ये शब्द सुनकर एक बारगी एकबारगी कुछ सोचा फिर बोला, "ओह किचन खाना की जगह"

"खाना बनाने की जगह", राजू ने भूल सुधारी।

"जहां खाना बनता वहीं खाना खाता....... तुम को भूख लगी?" राजू को सचमुच भूख लगी थी बोला, "लगी जोर की भूख लगी।" नीनो ने कहा, "खाना अपने स्पेस में नहीं खाते एक बुलबुले के सारे लोगों का खाना एक ही जगह बनता, वहीं चलते...."  पलक झपकते ही खिसकने वाले झूलों पर सवार होकर वे भोजन कक्ष में पहुंचे। खाने को कमरा भी अजीब था। वहां एक रेलवे की टिकिट खिड़की जैसी जगह थी जिस के एक ओर एक चमकीला पर्दा लगा था जिस पर कुछ अक्षर चमक रहे थे। नीनो ने कुछ अक्षरों पर उंगली रखी तो तीन प्लेटें काउंटर पर आ गईं उनमें कुछ काली काली गोलियां थीं। नीनो ने एक प्लेट उठाकर राजू को दी और बोला -

"खाओ"

"क्या है यह.............", राजू भौंचक्का था।

"खाना....इनर्जी बस....पूरे दिन की इनर्जी  को काफी, खाकर तो देखो। तीन गोलियां खाकर लम्बे समय तक तुम्हें भूख-प्यास नहीं" राजूने तीन गोलियां उठाई और मुंह में डालीं। इनमें कोई स्वाद न था। वह जबरदस्ती उन्हें निगलने की कोशिश करने लगा पर गोलियां थी कि उसके हलक में चिपकी जाती थी।

"पानी", वह चिल्लाया। नीनो उठकर तेजी से भागा और एक गिलास पानी ले आया। पानी पी कर राजू की जान में जान आई। गोलियां निगलते ही लगा उसके पूरे शरीर में गरमी भर गई थी पर थोड़ी ही देर में सब सामान्य हो गया। उसकी भूख खत्म हो गई थी।

"ओह..." उसने एक गहरी सांस ली, "तो पानी है तुम्हारे यहां?" "पानी......पानी नहीं.......पानी बनाते......यलू सले में हाइड्रोजन और आक्सीजन मिलाकर.......आक्सीजन भी यहां नहीं......आक्सीजन काबर्न डाइ आक्साइडड से निकालते ...बहुत कम पानी पीते हम"

"पर यहां उतरते समय तो मुझे झीलें दिखी थीं"

"वह पानी नहीं ....द्रव मीथेन...... हम पानी को तरह उसे इस्तेमाल करना सीख रहे"

"पानी नहीं, तब तुम नहाते कैसे हो", राजू ने जानना चाहा। नीनो एक क्षण को खामोश हुआ। वह सुपर कंप्यूटर से नहाने के बारे में जानकारी ले रहा था। क्षण भर बाद बोला, "नहाना नहीं......... डिसइंफेक्शन चेम्बर......वहां जाता..........डिसइंफेक्टेंट किरणों से सारा शरीर डिसइंफेक्ट करता.

.........बैक्टीरिया खत्म..........गंदगी खत्म... " मतलब तुम हमारी तरह नहीं नहाते हो? सिर्फ केमीकल से अपने आप को जीवाणु रहित करते हो?" नीनो ने सहमति में सिर हिलाया।

"नीनो क्या हम घूमने के लिए बुलबुले से बाहर जा सकते हैं", राजू ने पूछा।

"बाहर का वातावरण बहुत कठिन ........बहुत ठंडा शून्य से 180 डिग्री नीचे...........टाइटन के वातावरण का दबाब तंम्हारी पृथ्वी का डेढ़ गुना......वातावरण में आक्सीजन बिलकुल नहीं ......फिर भी हम बाहर जाते.....

. तुम्हें लिए हम बाहर जाते।" नीनो ने राजू को एक विशेष तरह के कपडे दिए, "प्रेशर सूट......इसमें आक्सीजन......ताप नियंत्रित.....सर्दी नहीं लगता.........यहां का वायुमडल दबाब तुम्हारी पृथ्वी से

डेढ़ गुना पर प्रेशर सूट के साथ परेशानी नहीं।" प्रेशर सूट, पहनते ही राजू के शरीर पर अपने आप फिट हो गया। नीनो ने अपनी कलाई पर बंधे यंत्र का बटन दबाया। थोडी देर में खिडकियों वाली एक पिरामिड के आकार की चीज उनके पास आकर रुकी।

"यह क्या नीनो", राजू ने पूछा।

"स्पेस कॉप्टर, इसके अंदर बैठने पर तुम पर टाइटन का बाहरी वातावरण कुछ असर नहीं ........इसके अंदर तुम सुरक्षित", नीनो ने बताया।

स्पेस कॉप्टर का दरवाजा खुला। राजू नीनो के साथ उसके अंदर बैठ गया।

थोड़ी देर में जब नीनो और राजू टाइटन पर मीथेन की झीलें, धूल के टीले, पहाड़ और मैदान देख कर लौट रहे थे तो राजू को घर की सुधि आई। उस ने नीनो से कहा, "अब मुझे पृथ्वी पर वापस छोड़ो तुमने वादा किया था।" "ठीक है", नीनो ने सिर हिलाया। लौटते समय वे खिसकने वाले झूले पर चढ़कर उसी रास्ते से लौटे जिस से वे गए थे। वह आदमी जो उन्हें इस बुलबुले वाले शहर में घुसते समय मिला था वह फिर वहीं मौजूद था। नीनो की उससे फिर कुछ बहस हुई जिसे राजू समझ नही सका क्योंकि तब नीनो ने भाषा परिवर्तक यंत्र उतार दिया था।

"हमें इधर से चलना.........तुम्हारा मेिडकल चेक-अप होना तब वापस जाना", नीनो ने राजू को समझाया। राजू को डर लग रहा था पर मानने के अलावा कोई दूसरा उपाय न था। वह नीनो के साथ दूसरी ओर चल दिया। नीनो राजू को फिसलने वाले झूले पर बिठाकर एक और बलबुले में ले गया। अब वे एक बड़े कमरे में थे जिसमें तरह-तरह के यंत्र लगे थे। नीनो की तरह के एक जीव ने उसे एक मेज पर लेटने को कहा। राजू ने डरकर नीनो की ओर देखा।

"डरना नहीं, चेक-अप, सिर्फ चेक-अप........कोई कष्ट नहीं", नीनो ने सांत्वना दी। राजू मेज पर चढकर लेट गया। नीनो की शक्ल के जीव ने एक यंत्र दीवार से खीचकर राजू के ऊपर लगा दिया। थोड़ी देर बाद उसमें से एक लाल रोशनी निकल कर राजू के सिर पर गिरने लगी। उसे इस लाल रोशनी देखने को कहा गया। राजू ने लाल रोशनी देखना शुरू किया और उसकी आंखें अपने आप मुंदने लगीं। उठो दोस्त हम वापस आते हैं",  नीनों राजू को झिंझोड़ कर जगा रहा था।

राजू ने ऑखें खेाल दीं।

"कहां हैं हम," राजू ने अगड़ाई लेते हुए पूछा।" "पृथ्वी पर, जहां से हम जाते" राजू ने देखा वे यान के बाहर थे, वहीं, जहां से वे गए थे। सूरज छिपने वाला था।

"तो मैं जाऊँ", राजू ने कहा।

"हां जाओ पर हमें भूलना मत दोस्त......हम फिर मिलते", उन्होने हाथ हिलाया और यान के अंदर चले गए।

यान का दरवाजा बंद हुआ और यान वापस उड़ गया। राजू घर की ओर चल दिया। वह याद करने की कोशिश करने लगा कि वह तो यहां नीनो का इंतजार कर रहा था। उसके बाद क्या हुआ उसे कुछ भी याद नहीं आ रहा था। उसे नहीं मालूम था कि चेक अप करने के बहाने नीनो की दुनिया के लोगों ने यान में चढ़ने से लेकर टाइटन पर जाने और वहाँ से लौट कर धरती पर पुन वापस आने तक की उसकी स्मृतियों को एक विकसित यंत्र द्वारा उसके मस्तिष्क से मिटा दिया था। सूरज डूब रहा था राजू लंबे लंबे डग भरता हुआ अपने घर की ओर बढ़ने लगा। 

-- 

image

ई-मेल : drarvinddubey2004@gmail.com

COMMENTS

BLOGGER: 1
  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’समानान्तर सत्ता स्थापित करते नक्सली : ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

    जवाब देंहटाएं
रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: बाल-विज्ञान-कथा / टाइटन की सैर / डॉ. अरविन्द दुबे
बाल-विज्ञान-कथा / टाइटन की सैर / डॉ. अरविन्द दुबे
https://lh3.googleusercontent.com/-fMnzYNX1Zh4/WQBY4mBVSNI/AAAAAAAA4Wo/BmgnwMCzsjsnJoeo_ZA3F5975cduwm4cACHM/image_thumb%255B4%255D?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-fMnzYNX1Zh4/WQBY4mBVSNI/AAAAAAAA4Wo/BmgnwMCzsjsnJoeo_ZA3F5975cduwm4cACHM/s72-c/image_thumb%255B4%255D?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2017/04/blog-post_815.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2017/04/blog-post_815.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content