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एक ख़त / सवाई जांगिड़

रिचा गुप्ता की कलाकृति

अपने बचपन में मेरी कोशिश आसपास के संसार को समझने की थी। मैंने अथक प्रयास किया। लेकिन यह हो न सका।

तब मैंने एक ख़त लिखा ... क्या है यह दुनिया? लेकिन मैं वह ख़त पूरा नहीं लिख पाया। जब मैं वह ख़त लिख ही रहा था , तभी आँधी चली। जोर की आँधी। मेरा ख़त आँधी के साथ ऊपर उड़ता चला गया। मैं उसे ऊपर उड़ते हुए देखता रहा । मानों वह ख़त मुझसे कुछ कह रहा हो- "यह जो अपना देश है न ! यही दुनिया है। जहां लोग प्रेम करना जानते हैं। एक दूसरे के साथ हँसी-ख़ुशी रहते हैं।" यह बात मेरे मन में जैसे घर कर गयी थी। मुझे अंदर तक कहीं छू गयी थी। मेरी समझ में यह बात आ रही थी कि- जब तक अपने आस पास लोग हैं, तभी तक दुनिया हैं। ये हँसते-मुसकुराते लोग जब चले जाएंगे। रेत और धूल के कणों में मिल जाएंगे। कुछ भी तो नहीं बचेगा।


फिर मुझे ख्याल आया कि ये लोग मिट्टी के कणों में कैसे मिल जाएंगे?
फिर मैंने एक ख़त लिखा। मैं ख़त लिख ही रहा था कि यकायक बरसात शुरू हो गयी। कागज-अक्षर सभी पानी में गल गए। ख़त घुलता हुआ मिट्टी में मिल गया।
तब मुझे यकीन हुआ कि लोग इसी तरह जाने के बाद मिट्टी बन जाते हैं... धूल कणों में मिल जाती हैं।


बस यही दुनिया है जो यहीं के लोगों से मिलकर बनती है। लोग जाकर भी कहीं नहीं जाते। इस मुल्क की मिट्टी बन जाते हैं।


सवाई जांगिड़
गाँव-लोड़ता

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