सबको मारा जिगर के शेरों ने / आसिफ़ सईद

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सबको मारा जिगर के शेरों ने जिगर मुरादाबादी का स्थान उर्दू साहित्य में बहुत ऊंचा है। इनका जन्म मुरादाबाद के एक शायर अली 'नज़र' साहब...

देविंदर शुक्ला की कलाकृति

सबको मारा जिगर के शेरों ने

जिगर मुरादाबादी का स्थान उर्दू साहित्य में बहुत ऊंचा है। इनका जन्म मुरादाबाद के एक शायर अली 'नज़र' साहब के घर हुआ और इनका वास्तविक नाम अली सिकन्दर था। वह बड़े ही मिलनसार सज्जन पुरूष थे और बड़े ही स्वच्छ दय के स्वामी थे, जिगर राजनैतिक बातों से स्वयं को दूर रखते थे, इस सम्बन्ध में वह कहते हैं -

इनका जो फ़र्ज़ है वह अहले सियासत जाने,

मेरा पैग़ाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुँचे।

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जिगर साहब भारतीय संस्कृति का एक विशिष्ट बिन्दु थे, उन्होंने कोट पतलून कभी नहीं पहना। बालों वाली ऊंची काली टोपी और शेरवानी पहनते थे, गरमियों में बारीक मलमल का कुर्ता और अलीगढ़ फ़ैशन का तंग मुहरी का पायजामा पहनते, काली पंप या सलीमशाही जूता उनके लिबास का अंग था। कभी-कभी चूड़ीदार पायजामा भी पहनते परन्तु उसको पहनने और उतारने में जो परेशानी आती उससे बचना चाहते, हुक्के से बचते सिगरेट पीते। जिगर की शिक्षा बहुत साधारण थी। अंगे्रज़ी भाषा का ज्ञान बस नाम मात्र् को था। तेरह वर्ष की आयु से ही उन्होंने शेर कहने शुरू कर दिये थे। आरम्भ में पिता से संशोधन लेते रहे परन्तु बाद में 'दाग़' देहलवी को अपनी ग़ज़लें दिखाईं। दाग़ के बाद मुंशी अमीर उल्ला तसलीम और रसा रामपुरी को ग़ज़ले दिखाते रहे। शायरी में सूफ़ियाना रंग असग़र गोंडवी की संगत का फल था।

1921ई0 में जिगर का पहला दीवान दाग़े जिगर प्रकाशित हुआ। इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने 1923 ई0 में 'शोला-ए-तूर' के नाम से एक संकलन छापा। उर्दू में उन जैसे रोचक गंभीर, मस्त और प्रेममय शायर कम ही हुए हैं। उन्हें अपने जीवनकाल में बड़ी मान्यता प्राप्त हुई। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डॉक्टर की उपाधि दी गयी और उन्हें अपनी पुस्तक 'आतिशोगुल' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। सचमुच जिगर अपनी शायरी से ज़माने पर छा गये थे। उनका जीवन इस शेर की तस्वीर था -

ज़माने पर क्यामत बन के छा जा,

बना बैठा है तूफां दर नफ़स क्या।

या फिर-

गुलशन परस्त हूँ मैं मुझे गुल ही नहीं अज़ीज़,

कांटों से भी निबाह किये जा रहा हूँ मैं।

जिगर कोई दार्शनिक न थे, लेकिन उनकी शायरी में मनोविज्ञान की गहरी छाप देखी जा सकती है, सुन्दरता और प्रेम उनकी शायरी की बुनियाद है, वह पवित्र् प्रेम के पुजारी थे और प्रेम की महानता को समझते थे, तभी तो वह कहते हैं-

मुहब्बत ही अपना मज़हब है लेकिन,

तरीके मुहब्बत जुदा चाहता हूँ।

- - -

न जाने मुहब्बत है क्या चीज़,

बड़ी ही मुहब्बत से हम देखते हैं।

जिगर जीवन में आयी परेशानियों से घबराते नहीं थे बल्कि उनका डटकर सामना करते थे और कहते थे-

अपना ज़माना आप बनाते हैं अहले दिल,

हम वो नहीं कि जिनको ज़माना बना गया।

जिगर का जीवन प्रेममय था, उन्होंने एक बार नहीं कई बार प्रेम की विचित्र् लीला देखी, कभी एक के इ८क में फंसे कभी दूसरे के, वह अपने इसी इ८क को अपनी शायरी का कारण मानते थे -

मेरा कमाले शेर बस इतना है ए जिगर,

वो मुझ पे छा गये मैं ज़माने पे छा गया।

मुरादाबाद छोड़ने के बाद वे आगरा में बस गये वहाँ उन्हें एक तवायफ़ वहीदन से प्यार हो गया। कहा जाता है कि उससे उन्होंने विवाह भी कर लिया था लेकिन विवाह के दो वर्ष बाद ही वह जिगर को रोता छोड़ इस संसार से चली गयी। जिगर पाग़लों की भांति शहर-शहर घूमने लगे, उनकी इस दशा को देख उसी समय के प्रख्यात शायर असगर गोंडवी ने उनकी सहायता की और अपनी साली का विवाह जिगर से करा दिया। परन्तु जिगर साहब इस बीच शराब में इस कदर डूब गये थे कि कहीं इन्हें मुशायरों में भी जाना होता था तो शाराब के नशे में ही गिरते-पड़ते पहुँचते और शराब के सुरूर में ही शेर पढ़ते और अपनी दशा देख स्वयं कहते -

सबको मारा जिगर के शेरों ने।

और जिगर को शराब ने मारा।।

किन्हीं कारणों से उन्हें दूसरी पत्नी को भी तलाक देना पड़ा और बाद में उन्हें मैनपुरी की एक तवायफ़ शीराज़न से प्रेम हो गया, वह तवायफ़ की गली को तूर कहा करते थे, तूर उस पर्वत का नाम है जहाँ हज़रत मूसा को परमात्मा द्वारा प्रकाश दिखाई दिया था। इन्हीं बातों से जिगर ने अपने काव्य-संग्रह का नाम 'शोला ए-तूर' रखा।

जीवन नैया चलाने के लिए जिगर ने स्टेशनों पर चश्मे भी बेचे, चेहरे की बनावट कुछ ऐसी थी कि अच्छे ख़ासे बदसूरत व्यक्ति गिने जाते थे, मगर बदसूरती अच्छे शेर कहने की क्षमता तले दब गयी थी। उर्दू के हास्य लेखक शौकत थानवी ने शायद बिल्कुल ठीक लिखा है कि शेर पढ़ते समय उनकी शक्ल एकदम बदल जाती थी और उनके चेहरे पर लालित्य आ जाता था। एक सुन्दर मुस्कान एक मनोहर कोमलता तथा सरलता के प्रभाव से जिगर का व्यक्तित्व किरणें भी बिखेरने लगता था, उनके शेरों की कुछ पंक्तियाँ और देखिए -

क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क ने जाना है,

हम ख़ाक नशीनों की ठोकर में ज़माना है।

- - -

अब उनका क्या भरोसा वो आयें या ना आयें,

आ ऐ ग़में मुहब्बत तुझको गले लगाऐं।

ऊपर हमने लिखा कि जिगर साहब ने असगर गोंडवी की साली से विवाह किया फिर उसको तलाक दे दी। बाद में असगर साहब ने साली से स्वयं विवाह कर लिया यह एक विचित्र् सी बात है कि असगर साहब की मृत्यु के पश्चात जिगर ने फिर उसी लड़की से दोबारा विवाह कर लिया परन्तु विवाह इस शर्त पर हुआ कि जिगर शराब को छोड़ देंगे पुराने प्रेम ने कुछ ऐसा ज़ोर मारा कि जिगर इस शर्त को मान गये। हृदय पर वहीदन के मरने का जो घाव था वह भी मिट गया और शीराज़न को भी उन्होंने भुला दिया।

जिगर के शेर पढ़ने का ढंग कुछ ऐसा मोहक और तरन्नुम जादूभरा था कि उस समय के उभरते नौजवान शायर उन जैसा शेर कहने और उन्हीं के से ढंग से शेर पढ़ने की न केवल चेष्टा करते बल्कि अपना हुलिया, रूप-रंग जिगर जैसा ही बना लेते। लम्बे उलझे बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी, अस्त-व्यस्त कपड़े, उन्हीं की तरह बेतहाशा शराब पीना। जिगर के शेर देख जान पड़ता है कि प्रेम उनके शरीर में शराब की भांति ही दौड़ता था, वह कहते थे-

दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद।

अब मुझको नहीं कुछ भी मुहब्बत के सिवा याद।।

- - -

एक लफ़्ज़े मुहब्बत अदना ये फ़साना है।

सिमटे तो दिले आशिक फैले तो ज़माना है।।

हम इ८क के मारों का बस इतना ही फ़साना है।

रोने को नहीं कोई हंसने को ज़माना है।।

उनका गला इतना मधुर था कि जब वह गाकर पढ़ते थे तो श्रोता मंत्र्मुग्ध हो जाते। उनकी आवाज़ जादू का सा असर करती थी। उनके कुछ करूणादायक शेरों पर भी दृष्टि डालते हैं-

इससे बढ़कर दोस्त कोई दूसरा होता नहीं, सब जुदा हो जायें ग़म जुदा होता नहीं।

- - -

निगाहे लुत्फ़ की इक-इक अदा ने लूट लिया,

वफ़ा के भेस में उस बेवफ़ा ने लूट लिया।

- - -

बताओ क्या तुम्हारे दिल पर गुज़रे,

अगर कोई तुम्हीं सा बेवफ़ा हो।

मुशायरों को अपने विशिष्ट व्यक्तित्व से रंगीन बनाने वाला और जीवन के मर्म को इशारों से समझाने वाला यह शायर अपने विषय में स्वयं ही सत्य कह गया है-

जानकर मिन जुमलाए ख़ासाने मयख़ाना मुझे,

मुद्दतों रोया करेंगे जामों पैमाना मुझे।

अपने अन्तिम समय में यह महान शायर ज़िला गोंडे में ही रहने लगा था और वहीं सन् 1958 में इस प्रतिभाशाली शायर ने शरीर रूपी मिट्टी का चोला उतार कर संसार में नाता तोड़ लिया और जाते-जाते कह गया-

जान दे दी जिगर ने आज पाए यार पर।

उम्र भर की बेकरारी को करार आ ही गया ।।

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डॉ0 आसिफ़ सईद

जी-4, रिज़वी अपार्टमेन्ट, द्वितीय

मेडिकल रोड, अलीगढ़

उ0प्र0 भारत

नाम

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मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: सबको मारा जिगर के शेरों ने / आसिफ़ सईद
सबको मारा जिगर के शेरों ने / आसिफ़ सईद
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रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2017/05/blog-post_61.html
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